अवधारणा

भारतीय उच्च रक्तचाप प्रबंधन पहल

भारतीय उच्च रक्तचाप प्रबंधन पहल (India Hypertension Management Initiative –IHMI) की शुरुआत 28 नवंबर, 2017 को की गई। IHMI का उद्देश्य हृदय रोग (CVD) से संबंधित विकलांगता और मृत्यु को कम करना, उच्च रक्तचाप के नियंत्रण में सुधार, नमक की खपत को कम करना और कृत्रिम ट्रांस-वसा को समाप्त करना है।

भारत उच्च रक्तचाप प्रबंधन पहल (IHMI) भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR), स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MOHFW), राज्य सरकारों, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक सहयोगी परियोजना है।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम

भारत सरकार ने वर्ष 1982 में मानसिक रोग से निपटने के लिए देश में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के आधारभूत ढांचे की पूर्ण अपर्याप्तता और समुदाय में मानसिक रोग के भारी बोझ को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Mental Health Programme-NMHP) की शुरूआत की। इस कार्यक्रम में वर्ष 1996 में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम जोड़ा गया था।

उद्देश्य

  • समुदाय में निरंतर आधारभूत मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना तथा अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के साथ इन सेवाओं को एकीकृत करना।
  • समुदाय के भीतर रोगियों की प्रारंभिक पहचान और उपचार।
  • सार्वजनिक जागरूकता के माध्यम से मनोरोग के कलंक को समाप्त करना।

भारत में जीवन शैली से संबंधित बीमारियां

मोटापाः भारत में अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या 2005 से 2015 के बीच दोगुनी हो गई। 15.49 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में 20.7 प्रतिशत महिलाएं और 18.6 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त पाए गए हैं। पर्यावरण में डीडीटी, बिस्फेनॉल ए (Bisphenol A), एमएसजी (Mono Sodium Glutamate–MSG) और आर्सेनिक जैसे मोटापाकारक रसायनों की उपस्थिति पाई गई।

मानसिक स्वास्थ्यः 18 वर्ष से अधिक आयु की देश की 10 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या विभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसी मानसिक बीमारियों का जीवनकाल प्रचलन 13 प्रतिशत से अधिक है। सामाजिक समर्थन में कमी, बदलते आहार और आर्थिक अस्थिरता मानसिक विकारों के मुख्य कारण हैं। चीनी का अधिक सेवन मानसिक बीमारी से भी जुड़ा हुआ है। 4.34 माइक्रोग्राम / घन मीटर के वातावरण में PM2.5 की वृद्धि अल्जाइमर के जोखिम को बढ़ा सकती है।

कैंसरः भारत में 2020 तक हर साल 1.73 मिलियन से अधिक नए कैंसर के मामले दर्ज किए जाने की संभावना है। आमतौर पर घरेलू रसायनों और सौंदर्य प्रसाधनों में कैंसर पैदा करने वाले यौगिक होते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि 20 प्रतिशत तक कैंसर के मामलों को पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थों के जोखिम से जोड़ा जा सकता है। तम्बाकू एवं अल्कोहल, वायु प्रदूषण और मांस से भरपूर तथा सब्जियों में कम आहार, इसके प्राथमिक कारण हैं।

हृदय रोगः भारत में होने वाली सभी मौतों का 26 प्रतिशत हृदय रोगों के कारण होता है। शहरी भारत में युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग जोखिम में हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग आबादी कमजोर है। शारीरिक गतिविधि की कमी को हृदय रोगों के सबसे बड़े कारणों में से एक के रूप में पहचाना गया है।

श्वसन संबंधी रोगः भारत में अनुमानित 22.2 मिलियन क्रॉनिक सीओपीडी (Chronic Obstructive Pulmonary Disease – COPD) के रोगी और 2016 में लगभग 35 मिलियन क्रॉनिक अस्थमा के रोगी थे। वाहनों और उद्योग से वायु प्रदूषण के अलावा, ग्लोबल वार्मिंग से श्वसन स्वास्थ्य को भी खतरा बढ़ जाता है। ग्लोबल वार्मिंग ने पराग के मौसम की अवधि को बढ़ाया है और एलर्जी के समय, उत्पादन और वितरण को बदल दिया है।

हार्मोनल विकारः हर 12वां भारतीय मधुमेह से पीड़ित है। अन्य हार्मोनल बीमारियों पर डेटा अभी भी उपलब्ध नहीं है। अध्ययन बताते हैं कि 10 वयस्कों में से एक हाइपोथायरायडिज्म (hypothyroidism) से पीड़ित हैं। हार्मोनल संतुलन बहुत नाजुक होता है और आसानी से विषाक्त पदार्थों, वायु प्रदूषण और यहां तक कि वसा, चीनी और नमक से समृद्ध भोजन से असंतुलित हो जाता है।

खाद्य एलर्जीः भारत में 25.40 मिलियन लोग खाद्य एलर्जी से पीड़ित हो सकते हैं। लगभग 170 खाद्य पदार्थ कथित रूप से एलर्जी का कारण बनते हैं। खाद्य लेबल जो इसे नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारत में एलर्जेन लेबलिंग (Allergen labelling) अब तक शिशु के दूध के विकल्प तक ही सीमित है। भारत में ऐसा कोई तंत्र स्थापित नहीं है, जो जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) खाद्य पदार्थों की स्पष्ट रूप से लेबलिंग करे।