नेशनल कैपिटल गुड्स पॉलिसी, 2016

नेशनल कैपिटल गुड्स पॉलिसी, 2016 कैपिटल को गति प्रदान करती है और मेक इन इंडिया पहल तक पहुँच सुनिश्चित करती है। यह पहली बार है कि जब इस क्षेत्र के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई गई है। नीति द्वारा संबोधित कुछ प्रमुख मुद्दों में वित्त, कच्चे माल, नवाचार और प्रौद्योगिकी, उत्पादकता, गुणवत्ता एवं पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण प्रथाओं की उपलब्धता, निर्यात को बढ़ावा देना तथा घरेलू मांग का निर्माण शामिल है।

यह नीति निम्नलिखित उद्देश्यों पर केन्द्रित हैं

  • मशीन टूल्स, टेक्सटाइल मशीनरी, अर्थमूविंग और माइनिंग मशीनरी, भारी विद्युत उपकरण, प्लास्टिक मशीनरी, प्रिंटिंग और पैकेजिंग मशीनरी खाद्य प्रसंस्करण मशीनरी जैसे प्रमुख पूंजीगत सामानों को एकीकृत करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में परिकल्पित किया जाना है।
  • घरेलु भारी पूंजीगत वस्तुओं के निर्यात को बढ़ाने के लिए ‘हेवी इंडस्ट्री एक्सपोर्ट एंड मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस स्कीम (HIEMDA)' नामक एक सक्षम योजना तैयार करना।
  • नीति में बजटीय आवंटन और पूंजीगत वस्तुओं में प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने की वर्तमान योजना का दायरा बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसमें उत्कृष्टता केंद्र, सामान्य इंजीनियरिंग सुविधा केंद्र, एकीकृत औद्योगिक आधारभूत संरचना पार्क और प्रौद्योगिकी अधिग्रहण निधि कार्यक्रम शामिल हैं।
  • प्रौद्योगिकी अधिग्रहण, प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण, आईपीआर की खरीद, डिजाइन के साथ-साथ पूंजीगत वस्तुओं की ऐसी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के लिए पीपीपी मॉडल के तहत प्रौद्योगिकी विकास कोष शुरू करना।
  • विनिर्माण व सेवा क्षेत्र दोनों में स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी, व्यावसायिक एवं वित्तीय सहायता संसाधनों और सेवाओं की एक सरणी प्रदान करने के लिए क्भ्प् और ब्ळ उद्योग द्वारा 80:20 अनुपात में साझा किए गए कैपिटल गुड्स सेक्टर के लिए एक स्टार्ट-अप केंद्र बनाना।
  • केंद्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान (CPRI) जैसे विकास, परीक्षण और प्रमाणन बुनियादी ढांचे को उन्नत करना।
  • कैपिटल गुड्स स्किल काउंसिल के साथ एक व्यापक कौशल विकास योजना विकसित करना, मौजूदा प्रशिक्षण केंद्रों को अपग्रेड करना, ब्ळ क्षेत्र के कौशल विकास के लिए 5 क्षेत्रीय अत्याधुनिक ग्रीनफील्ड सेंटरों की स्थापना करना है।
  • क्लस्टर दृष्टिकोण के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाना (विशेष रूप से सीजी विनिर्माण एसएमई के लिए)।

चुनौतियां

  • घरेलू मांग निर्माण को प्रभावित करने वाले मुद्देः सार्वजनिक खरीद नीतियों में घरेलू मूल्य संवर्द्धन के प्रति वरीयता का अभाव।
  • जटिल अनुबंध की स्थिति।
  • प्रतिस्थापन के लिए बिना प्रोत्साहन के सेकंड-हैण्ड मशीनरी का लगातार आयात और उपयोग।
  • ‘परियोजना आयात’ के तहत शून्य शुल्क आयात।
  • परियोजना कार्यान्वयन में देरी घरेलू मांग को सीमित करने वाले प्रमुख कारक हैं।

निर्यात को प्रभावित करने वाले मुद्देः

  • प्रतिस्पर्द्धी लघु और दीर्घकालिक वित्तपोषण की अपर्याप्त उपलब्धता।
  • बाजार पहुंच से वंचित निर्यात बाजारों में गैर-टैरिफ बाधाएं।
  • विशेष रूप से छोटे अंतरराष्ट्रीय बाजार आवश्यकताओं की सीमित समझ।
  • भारत के तुलनात्मक लाभ की निर्यात नीति में विकासशील क्षेत्रों के प्रति व्यापार नीति का गैर-संरेखण।
  • उच्च विकास को प्राप्त करने के लिए सभी संबंधित हितधारकों जैसे सरकार, उद्योग, उपयोगकर्ताओं को समान रूप से संकेंद्रित करने और पूंजीगत वस्तु उद्योग के लिए सक्षम नीति से समर्थन की आवश्यकता होगी। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए नेशनल कैपिटल गुड्स पॉलिसी 2016 जारी की गई है।