सरकारी स्कूलों का बंद होना: शिक्षा के अधिकार और सामाजिक न्याय के सामने बढ़ता संकट
सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल स्कूलों की संख्या में कमी का प्रश्न नहीं है, बल्कि शिक्षा के अधिकार, सामाजिक समानता और कमजोर वर्गों के भविष्य से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
भारत में सरकारी स्कूलों के लगातार बंद होने की प्रवृत्ति देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रही है। हालिया नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद हुए, अर्थात औसतन लगभग 25 स्कूल प्रतिदिन। इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में नामांकन लगभग 2.26 करोड़ घट गया। कुल छात्र नामांकन में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी भी वर्ष 2005 ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारत की डेटा सेंटर संबंधी दुविधा: जल संकट बनाम डिजिटल विस्तार
- 2 कृत्रिम बुद्धिमत्ता: भारत की उभरती आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता
- 3 परीक्षाओं की विश्वसनीयता का संकट: क्या राधाकृष्णन समिति बनेगी समाधान?
- 4 आतंकवाद पर SCO का कड़ा रुख : भारत की कूटनीतिक विजय
- 5 'क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट्स' पर बढ़ता विवाद
- 6 चिकित्सा आपात स्थितियों में 'प्रोटीन जैव-सेंसर' की भूमिका
- 7 फास्ट ट्रैक कोर्ट: क्या परीक्षा पेपर लीक जैसे अपराधों पर लगेगी प्रभावी रोक?
- 8 Gen Z आंदोलन: विरोध-प्रदर्शन का अधिकार और संवैधानिक सीमाएँ
- 9 अमेरिका–ईरान इस्लामाबाद समझौता: पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक शुरुआत
- 10 अल नीनो : भारत के लिए एक गंभीर विकासात्मक चुनौती क्यों?

