लोकतंत्र की उत्तरजीविता एक सूचित और निष्पक्ष नागरिक समाज पर निर्भर करती है।
लोकतंत्र, जिसे अक्सर 'जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा' शासन कहा जाता है, महज़ एक राजनीतिक ढांचा या चुनाव कराने की मशीनरी नहीं है। यह एक जीवंत और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। यदि लोकतंत्र एक विशाल वटवृक्ष है, तो संविधान उसका तना है, संस्थाएं उसकी शाखाएं हैं, लेकिन एक 'सूचित और निष्पक्ष नागरिक समाज' उस वृक्ष की गहरी जड़ें हैं। जब तक जड़ें सत्य, तथ्य और निष्पक्षता का जल सोखती रहती हैं, तब तक वृक्ष हरा-भरा रहता है। लेकिन जिस दिन नागरिक समाज अज्ञानता, पूर्वाग्रह और सांप्रदायिकता के जहर से सिंचित होने लगता है, लोकतंत्र का ....
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