लोकतंत्र की उत्तरजीविता एक सूचित और निष्पक्ष नागरिक समाज पर निर्भर करती है।
लोकतंत्र, जिसे अक्सर 'जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा' शासन कहा जाता है, महज़ एक राजनीतिक ढांचा या चुनाव कराने की मशीनरी नहीं है। यह एक जीवंत और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। यदि लोकतंत्र एक विशाल वटवृक्ष है, तो संविधान उसका तना है, संस्थाएं उसकी शाखाएं हैं, लेकिन एक 'सूचित और निष्पक्ष नागरिक समाज' उस वृक्ष की गहरी जड़ें हैं। जब तक जड़ें सत्य, तथ्य और निष्पक्षता का जल सोखती रहती हैं, तब तक वृक्ष हरा-भरा रहता है। लेकिन जिस दिन नागरिक समाज अज्ञानता, पूर्वाग्रह और सांप्रदायिकता के जहर से सिंचित होने लगता है, लोकतंत्र का ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 केवल इसलिए कि आपके पास विकल्प है इसका अर्थ यह कदापि नही की उनमे से कोई एक ठीक होगा ही - डॉ. श्याम सुंदर पाठक
- 2 जीवन, स्वयं को अर्थपूर्ण बनाने का अवसर है
- 3 क्या हम सभ्यता के पतन की राह पर हैं?
- 4 क्या अधिक मूल्यवान है, बुद्धिमत्ता या चेतना?
- 5 कौशल विकास के माध्यम से ग्रामीण भारत का रूपांतरण
- 6 सार्वजनिक नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता
- 7 विकास जैसी गतिशील प्रक्रिया में मानवाधिकार, मूल्यवान मार्गदर्शक हैं
- 8 ओटीटी प्लेटफार्मः विनियमन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- 9 क्या 21वीं सदी के नेटिज़ेंस के लिए गोपनीयता एक भ्रम है?
- 10 शहरी मध्य वर्ग, भारत के रूपांतरण की कुंजी है

