भारत का पर्यावरणीय न्यायशास्त्र संरक्षण एवं विकास के मध्य संतुलन - नूपुर जोशी

भारत का पर्यावरणीय न्यायशास्त्र केवल क़ानूनों का संकलन नहीं है; यह पारिस्थितिक संरक्षण और विकासात्मक आकांक्षाओं के मध्य संतुलन साधने के राष्ट्रीय संघर्ष का प्रतिबिंब है। हालांकि, परिभाषागत अस्पष्टताओं, विनियामक शिथिलता और क्रियान्वयन की कमज़ोरियों ने अक्सर पर्यावरण संरक्षण को कमजोर किया है। आज, जब जलवायु संकट और अनियंत्रित शहरीकरण का दबाव चरम पर है, तब अरावली जैसे प्रकरणों में हुए न्यायिक हस्तक्षेप किसी विवाद का अंत नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टिगत पुनर्स्थापन' का शंखनाद हैं। यह पारिस्थितिकी-केंद्रित शासन, वैज्ञानिक सुदृढ़ता और विकास-संरक्षण के सामंजस्य के प्रति नई प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करता है।

भारत का पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (India’s Environmental Jurisprudence), पारिस्थितिक ....

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