बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष समस्या के उन्मूलन हेतु शिक्षा एवं सामाजिक सशक्तीकरण आवश्यक
हाल ही में, 'बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006' के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए हैं। इस मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने विस्तार से चर्चा की है कि किस प्रकार बाल विवाह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इस निर्णय में शीर्ष अदालत ने 18 वर्ष पूर्व बाल विवाह निषेध अधिनियम के अधिनियमन के बावजूद भारत में बाल विवाह के खतरनाक स्तर को उजागर किया है। बाल विवाह के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करते हुए हाल ही में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान शुरू ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु: नैतिक मुद्दे एवं चुनौतियाँ
- 2 संप्रभु ऊर्जा आत्मनिर्भरता: भारत की रणनीतिक आवश्यकता
- 3 अंतरराष्ट्रीय क़ानून एवं आत्मरक्षा: आधुनिक संघर्षों में बदलते आयाम
- 4 केमिकल पार्क भारत के विनिर्माण और धारणीयता अभियान को गति
- 5 इस्पात क्षेत्र का विकार्बनीकरण भारत के लिए आर्थिक आवश्यकता और पर्यावरणीय दायित्व
- 6 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट प्रमुख अनुशंसाएं और उभरती चिंताएं
- 7 एथेनॉल सम्मिश्रण ऊर्जा आत्मनिर्भरता बनाम खाद्य आत्मनिर्भरता का द्वंद्व
- 8 प्रहार: सक्रिय आतंकवाद-रोधी रणनीति की नई दिशा
- 9 मासिक धर्म स्वास्थ्य अब मौलिक अधिकार : सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और इसका सामाजिक प्रभाव
- 10 एआई इम्पैक्ट पर नई दिल्ली घोषणा : कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य के लिए भारत की रूपरेखा

