इलेक्टोरल बॉण्डः राजनीतिक स्वायत्तता या राजनीतिक जवाबदेही का उपाय

इलेक्टोरल बॉण्ड को एक सुधारक उपाय के तौर पर राजनीतिक दलों के धन के स्रोत के लिए तैयार किया गया था। ये बांड 1000, 10,000, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ रुपये के गुणकों में जारी किए गए हैं। यह बॉण्ड भारत के किसी भी नागरिक या भारत में स्थित संस्थान द्वारा खरीदा जा सकता है और अपनी पसंद की पार्टी को दान किया जा सकता है। इस योजना का उद्देश्य था, ‘‘देश के राजनीतिक दलों के चंदे की प्रणाली को पारदर्शी बनाना" और नकदीरहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।

चुनावी बॉण्ड प्राप्त करने की पात्रताः

  • पार्टी को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत होना चाहिए।
  • पार्टी ने हाल के लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम एक प्रतिशत वोट प्राप्त किया हो।

विवाद

  • चुनावी बॉण्ड दानकर्ता की गुमनामी सुनिश्चित करते हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों को अपने राजनीतिक चंदे का रिकॉर्ड रखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता है।
  • चुनावी बॉण्ड आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के दायरे से बाहर हैं। हाल ही में, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने चुनावी बॉन्ड के खरीदारों और इन बॉन्डों को भुना चुके राजनीतिक दलों के विवरण का खुलासा करने से इनकार कर दिया।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा चुनावी बॉण्ड जारी किए जाते हैं, इसलिए सरकार को चुनावी बॉण्ड की बिक्री के विवरण की रिपोर्ट भेजने से इसका दुरुपयोग विपक्ष को धन की कमी उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है।

आगे की राह

  • राजनीतिक दलों और उनके चंदे को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाना।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष राजनीतिक चंदे को सुनिश्चित करने के लिए एसबीआई द्वारा चुनावी बॉण्ड को खरीदने वाले व्यक्तियों कास्वैच्छिक सार्वजनिक खुलासा करना।
  • चुनावों की आंशिक निधि की राज्य द्वारा फंडिग के इंद्रजीत गुप्ता समिति द्वारा अनुशंसित तरीके पर विचार करना।
  • राष्ट्रीय चुनाव कोष का निर्माण और चुनाव के दौरान इससे राजनीतिक दलों को धन उपलब्ध कराना।
  • चुनावी बॉण्ड और उनके खुलासे को लोक लेखा समिति के दायरे में लाना।