वैश्विक जलवायु शासन का पुनर्मूल्यांकन कॉप-30 एवं सतत भविष्य की दिशा - आलोक सिंह
वैश्विक जलवायु संकट अब निर्णायक दशक में प्रवेश कर चुका है। औद्योगिक युग-पूर्व स्तरों की तुलना में तापमान 1.2°C से अधिक हो गया है और महाद्वीपों में जलवायु-जनित आपदाएँ लगातार तीव्र होती जा रही हैं। ऐसे समय में एक अधिक न्यायसंगत और प्रभावी जलवायु शासन व्यवस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित COP30 सम्मेलन उस ऐतिहासिक मोड़ पर संपन्न हुआ जब वर्तमान में वैश्विक जलवायु राजनीति गहरे विभाजन से जूझ रही है, जलवायु वित्तीय प्रतिबद्धताएँ डगमगा रही हैं और राष्ट्र आर्थिक प्राथमिकताओं को पारिस्थितिक अनिवार्यताओं के साथ संतुलित करने के लिए संघर्ष ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 'क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट्स' पर बढ़ता विवाद
- 2 चिकित्सा आपात स्थितियों में 'प्रोटीन जैव-सेंसर' की भूमिका
- 3 फास्ट ट्रैक कोर्ट: क्या परीक्षा पेपर लीक जैसे अपराधों पर लगेगी प्रभावी रोक?
- 4 Gen Z आंदोलन: विरोध-प्रदर्शन का अधिकार और संवैधानिक सीमाएँ
- 5 अमेरिका–ईरान इस्लामाबाद समझौता: पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक शुरुआत
- 6 अल नीनो : भारत के लिए एक गंभीर विकासात्मक चुनौती क्यों?
- 7 भारत का अप्रत्याशित 'बेबी बस्ट': विश्व के लिए एक जनसांख्यिकीय चेतावनी
- 8 भारत में रोजगार योग्यता संकट: डिग्री और कौशल के बीच बढ़ती खाई
- 9 16वाँ वित्त आयोग: कर-वितरण, उपकर और संघीय संतुलन का प्रश्न
- 10 भारत में ध्वनि प्रदूषण : पर्यावरणीय न्याय की नई चुनौती

