भारतीय जेलों में महिला कैदी: संवैधानिक अधिकार बनाम ज़मीनी हकीकत
हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भारतीय जेलों में कैदियों, विशेषकर महिला कैदियों एवं उनके साथ रह रहे बच्चों द्वारा सामना की जा रही विभिन्न कठिनाइयों पर स्वत: संज्ञान लिया है। चूंकि जेलें संविधान के तहत राज्य सूची का विषय हैं, इसीलिए इन कठिनाइयों के मद्देनज़र, आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
- यह पहल इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन एवं समानता जैसे मूलभूत अधिकार प्रदान करता है, जिसमें कैदी भी समान रूप से शामिल हैं, ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 बच्चों के लिए डिजिटल सुरक्षा: अधिकार, जोखिम और नियामकीय अंतराल
- 2 ऊर्जा सुरक्षा: भारत का नया रणनीतिक दृष्टिकोण
- 3 भारत की जैव-अर्थव्यवस्था: नवाचार, अवसर और नीतिगत चुनौतियाँ
- 4 शहरी भारत की पुनर्कल्पना: एकीकृत, टिकाऊ और भविष्य-उन्मुख बुनियादी ढांचे की ओर
- 5 लोचशील आपूर्ति शृंखलाएँ: भारत की आर्थिक सुरक्षा का एक सुदृढ़ स्तंभ
- 6 भारत में सुदृढ़ नवाचार पारितंत्र का निर्माण: क्षमताएँ और संरचनात्मक बाधाएँ
- 7 प्रतीकात्मकता से परिवर्तन की ओर: भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी
- 8 भारत में गिग कर्मियों के अधिकार: मान्यता बनाम वास्तविकता
- 9 भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु: नैतिक मुद्दे एवं चुनौतियाँ
- 10 संप्रभु ऊर्जा आत्मनिर्भरता: भारत की रणनीतिक आवश्यकता

