​"ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का टियर-1 शहरों से केरल जैसे राज्यों की ओर विस्तार भारत की 'नॉलेज इकोनॉमी' के विकेंद्रीकरण का संकेत है।" इसके आर्थिक महत्व और रोजगार सृजन की क्षमता पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्थापित वे इकाइयाँ हैं जो आईटी, अनुसंधान (R&D) और डेटा एनालिटिक्स जैसे जटिल कार्यों को संभालती हैं। वर्तमान में भारत विश्व के लगभग 50% GCC बाजार का नेतृत्व कर रहा है। हाल के वर्षों में, इन केंद्रों का विस्तार बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे टियर-1 शहरों से हटकर केरल जैसे राज्यों की ओर होना भारत की 'नॉलेज इकोनॉमी' के विकेंद्रीकरण का एक स्पष्ट संकेत है।

विकेंद्रीकरण के प्रमुख कारक:

  1. टियर-1 शहरों में संतृप्ति :बड़े शहरों में उच्च परिचालन लागत, यातायात की समस्या और प्रतिभा प्रतिधारण (Talent Retention) की चुनौतियां MNCs को नए विकल्पों की ....

क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |

पूर्व सदस्य? लॉग इन करें


वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |

संबंधित सामग्री

मुख्य विशेष