व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
- विवेक उपाध्याय
सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाला अहसान अहमद लगातार इस द्वंद्व में रहता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है। जब वह अन्नादुरई जैसे वैज्ञानिक के बारे में पढ़ता है जिसे प्रतिष्पर्धी देशों की गुप्तचर संस्थाओं ने सूचना के अधिकार से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर षड्यंत्र का शिकार बना लिया तब उसे राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण लगने लगती है। वहीं जब वह ‘माई नेम इज खान’जैसी फिल्म देखता है जिसमें एक व्यक्ति को मात्र धार्मिक पहचान के आधार पर सुरक्षा संस्थाओं के द्वारा प्रताडि़त किया गया तब ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 लोकतंत्र की उत्तरजीविता एक सूचित और निष्पक्ष नागरिक समाज पर निर्भर करती है।
- 2 आत्म-जागरूकता के बिना, ज्ञान केवल एक उपकरण है; इसके साथ, यह ज्ञानोदय है।
- 3 केवल इसलिए कि आपके पास विकल्प है इसका अर्थ यह कदापि नही की उनमे से कोई एक ठीक होगा ही - डॉ. श्याम सुंदर पाठक
- 4 जीवन, स्वयं को अर्थपूर्ण बनाने का अवसर है
- 5 क्या हम सभ्यता के पतन की राह पर हैं?
- 6 क्या अधिक मूल्यवान है, बुद्धिमत्ता या चेतना?
- 7 कौशल विकास के माध्यम से ग्रामीण भारत का रूपांतरण
- 8 सार्वजनिक नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता
- 9 विकास जैसी गतिशील प्रक्रिया में मानवाधिकार, मूल्यवान मार्गदर्शक हैं
- 10 ओटीटी प्लेटफार्मः विनियमन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

