पितृत्व विवाद में डीएनए परीक्षण: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में डीएनए परीक्षण (DNA Test) कराने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि पितृत्व (Paternity) से जुड़े विवादों में न्याय के हित में वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा लिया जा सकता है। मामले में एक व्यक्ति ने स्वयं को प्रतिवादी का जैविक पुत्र बताते हुए पितृत्व की घोषणा तथा संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग की थी।
कानूनी पृष्ठभूमि
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के अनुसार, वैध विवाह के दौरान या विवाह समाप्त होने के 280 दिनों के भीतर जन्मे बच्चे को पति की वैध संतान माना जाता है। इस ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 रचनात्मक पूर्वन्याय: विवादों के अंतिम समाधान का सिद्धांत
- 2 जून 2026 के घटनाक्रम पर आधारित
- 3 क्रिटिकल मिनरल्स और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण
- 4 भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष
- 5 सेलुलर कृषि और संवर्धित मांस
- 6 भारत का बढ़ता रोग बोझ
- 7 जलवायु परिवर्तन और चुनाव
- 8 मरुस्थलीकरण और सूखे पर G7 घोषणा
- 9 अपशिष्ट जल प्रदूषण से समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को खतरा
- 10 UAE का OPEC से बाहर निकलना
राजव्यवस्था एवं शासन
- 1 अनुच्छेद 21 और प्रजनन स्वायत्तता
- 2 सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के श्रम को दी पहचान
- 3 मानव तस्करी पीड़ितों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई संरक्षण एवं पुनर्वास योजना
- 4 चेक बाउंस बनाम दिवाला कार्यवाही
- 5 न्यायपालिका में AI का उपयोग: सुप्रीम कोर्ट के मसौदा नियम
- 6 अनुसूचित जनजाति ‘डीलिस्टिंग’ विवाद
- 7 भारत में मानव तस्करी के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़्रेमवर्क
- 8 आरक्षित निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट के नए दिशा-निर्देश
- 9 राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का हालिया स्पष्टीकरण

