भारत में निजीकरण की नवीन प्रवृत्ति एवं उसके आर्थिक प्रभाव
ऋषभ गुप्ता
निजीकरण की नवीन प्रवृत्ति के बहुआयामी प्रभाव हो सकते हैं परंतु इसका मुख्य प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यह भारत सरकार द्वारा निर्धारित 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य में सहायक हो सकता है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार अपने राजकोषीय लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है। परंतु इससे संबंधित कुछ चिंताएं भी हैं। यदि इन चिंताओं को ध्यान में रखकर सरकार उचित विनिवेश की नीति अपनाए, तो निजीकरण की यह नवीन प्रवृत्ति भारत की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सकती है।

- वर्तमान में ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारत का विकासमान श्रम पारितंत्र सामाजिक सुरक्षा परिप्रेक्ष्य - नूपुर जोशी
- 2 वैश्विक जलवायु शासन का पुनर्मूल्यांकन कॉप-30 एवं सतत भविष्य की दिशा - आलोक सिंह
- 3 सतत भविष्य के लिए वन संतुलन, संरक्षण एवं समुचित प्रबंधन की अनिवार्यताएं - नूपुर जोशी
- 4 संयुक्त राष्ट्र @80 सुधार, प्रतिनिधित्व एवं बदलती विश्व-व्यवस्था की चुनौतियां - आलोक सिंह
- 5 भारत की पाण्डुलिपि धरोहर प्राचीन ज्ञान का अमूल्य भंडार - संपादकीय डेस्क
- 6 ब्लू इकॉनमी व सतत समुद्री प्रगति भारत का दृष्टिकोण एवं रणनीति - आलोक सिंह
- 7 सतत मृदा प्रबंधन खाद्य सुरक्षा, जलवायु और जीवन का आधार - आलोक सिंह
- 8 माइक्रोप्लास्टिक संकट : मानव स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिक तंत्र के लिए अदृश्य खतरा
- 9 भारत के परिवहन क्षेत्र का विकार्बनीकरण
- 10 ब्रिक्स एवं वैश्विक दक्षिण - आलोक सिंह

