प्रश्न : सम्प्रदाय और पंथ में उदाहरण देकर अन्तर स्पष्ट कीजिए।
(2015)
उत्तर : सम्प्रदाय एक बहुलवादी दृष्टिकोण है जिससे बहुल संख्या में लोग जुड़े होेते हैं। जैसे- हिन्दु सम्प्रदाय, मुस्लिम सम्प्रदाय। परन्तु पंथ एक संकीर्ण अवधारणा है जो सम्प्रदाय से निकलता है। जैसे हिन्दु सम्प्रदाय के अन्दर से शिरडी के साईं बाबा पंथ, श्री-श्री रविशंकर का पंथ आदि। सम्प्रदाय, मत से विकसित होता है जबकि पंथ, सम्प्रदाय से। जब एक मत मध्यमवर्गीय समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त कर लेता है तो सम्प्रदाय का अविर्भाव होता है जबकि पंथ ....
प्रश्न : क्या मातृवंशीय समाज में पुरुष सत्ता अनुपस्थित होती है। विवेचना कीजिए।
(2015)
उत्तर : मातृवंशीय समाज में वंशक्रम महिलाओं से चलता है परंतु आमतौर पर शक्ति उनके पास नहीं होती। सामाजिक नियंत्रण तथा भूमि और अन्य संपत्ति के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति पुरुषों के पास ही रहती है।
अतः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि मातृवंशीय समाज में महिलाएं वंशक्रम बनाए रखती हैं और बच्चों को अपनी माता से सामाजिक प्रास्थिति प्राप्त होती है। मां के माध्यम से उन्हें संपत्ति में अधिकार प्राप्त होता है। ....
प्रश्न : धर्म निरपेक्षीकरण को परिभाषित कीजिए। आधुनिक विश्व में इसके मुख्य आयाम क्या है?
(2015)
उत्तर : धर्मनिरपेक्षता धर्म को राज्यतंत्र से अलग करती है। यह इस दृष्टिकोण का भी समर्थन करती है कि सभी समुदायों को राज्य द्वारा समान अवसर प्रदान किये जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त धर्मनिरपेक्षवादियों को सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति विवेकपूर्ण ढंग से तालमेल रखना चाहिए और सामाजिक जीवन को समतावादी तरीके से समझना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता का अभिप्राय उन विचारों से है जो धार्मिक शिक्षा के विपरीत है। इसे धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया से जोड़ा गया। यह वह प्रक्रिया ....
प्रश्न : ‘‘दुर्खीम के अनुसार, आधुनिक समाज में धर्म का सार वैसा ही है जैसा कि आदिम समाज में था।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2014)
उत्तर : दुर्खीम का कहना है कि धर्म का संबंध पवित्र वस्तुओं से है अर्थात धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों एवं आचरणों की समग्र व्यवस्था है, जो इन पर विश्वास करने वाले को नैतिक समुदाय में आवद्ध करता है। दुर्खीम के अनुसार, कोई भी वस्तु अपने अन्तर्निहित गुणों या उपयोगितावादी मूल्यों के कारण पवित्र नहीं होती, बल्कि इसलिए पवित्र होती है कि समाज इनको विशेष आदर व सम्मान देता है तथा वस्तुओं के क्रम में इनको ....
प्रश्न : धार्मिक पुनरुज्जीवनवाद (रिकाइवलिज्म) साम्प्रदायिकता से किस प्रकार भिन्न हैं? भारतीय संदर्भ से उपयुक्त उदाहरणों के द्वारा सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
(2014)
उत्तर : धार्मिक पुनः प्रवर्तन या पुनरुत्थानवाद एक नवीन सामाजिक परिघटना के तौर पर उभरकर सामने आया एक सामाजिक तथ्य है। यहां पुनरुत्थान या पुनः प्रवर्तन का तात्पर्य है- अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करना। उल्लेखनीय है कि औद्योगीकरण, नगरीकरण, विज्ञान व तकनीकि विकास तथा आधुनिक मूल्यों के व्यापक प्रचार-प्रसार ने एक सामाजिक संस्था के रूप में धर्म को काफी क्षति पहुंचाया था।
यहां तक कि कुछ उद्विकासवादी समाज वैज्ञानिकों ने ऐसे समय तक कल्पना कर ....
प्रश्न : क्या धर्म विज्ञान का प्रतिवादी है? टिप्पणी कीजिए।
(2013)
उत्तर : शिक्षा का मुख्य उद्देश्य साधारणतया मानवता के गुणों का विकास करना है। ऋग्वेद में कहा गया है कि शिक्षा वह है जो व्यक्ति को समाज में अभिमान रहित व आत्मविश्वासी बनाये। जहां धर्म प्राचीनकाल से जुड़ा हुआ है वहीं विज्ञान हमें आधुनिकता तथा प्रगति की ओर ले जा रहा है। धर्म विश्वास है तथा ईश्वर से संबंधित है। धर्म जीवन-दर्शन और जीव-मार्ग का नाम है। मानव के विभिन्न वर्गों के जीवन-यापन का आधार धर्म ही ....
प्रश्न : उन कारकों की विवेचना कीजिए जो समकालीन विश्व में बढ़ते हुए धार्मिक पुनरुज्जीवन के मार्गदर्शक है।
(2012)
उत्तर : विगत तीन-चार दशकों से वैश्विक मानचित्र पर एक नवीन सामाजिक-धार्मिक परिघटना के रूप में धार्मिक पुररुज्जीवनवाद का उदय हुआ है, जिसका उद्देश्य सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रें में धर्म के महत्व एवं इसके प्रचलन को विस्तार देते हुए इसकी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना है। आज समकालीन विश्व में बढ़ती हुई धार्मिक पुनरुज्जीवनवादी क्रियाकलापों ने एक ओर व्यक्ति को आधुनिक मूल्यों से उत्पन्न पहचान के संकट से निजात दिलाई, तो दूसरी ओर भागम-भाग ....
प्रश्न : बताइये कि दुर्खीम के टोटमवाद के अध्ययन ने धर्म की वास्तविकता को किस प्रकार दर्शाया?
(2012)
उत्तर : दुर्खीम ने धर्म के अपने समाजशास्त्रीय अध्ययन के द्वारा धर्म संबंधित प्रचलित पूर्व सिद्धांत यथा प्रकृतिवाद, जीववाद, मानावाद तथा विकासवादी सिद्धांत के स्थान पर इसका समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया। दुर्खीम ने आस्ट्रेलिया की अरूण्य जनजाति के मध्य प्रचलित टोटमवाद के अध्ययन के द्वारा धर्म संबंधी समाजशास्त्रीय सिद्धांत को प्रस्तुत किया। इन्होंने इसे प्राथमिक व साधारण धर्म कहा, जो अरूण्टा जनजाति के लोगों की जिन्दगी में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
दुर्खीम के अनुसार टोटमवाद केवल इसलिए ....
प्रश्न : संप्रदाय पंथ तथा धर्म की परिभाषा दीजिए। किस तरह से वेबर के धर्म के विचार दुर्खीम से भिन्न हैं?
(2011)
उत्तर : एक धार्मिक समूह जिसमें एकान्तिकता अपेक्षाकृत मानसिक गतिहीनता तथा किसी पंथ विशेष के विचारों के अंध एवं हठधर्मी अनुसरण की विशेषताएं पाई जाती हैं, सम्प्रदाय कहलाता है, अर्थात् जब एक मत मध्यवर्गीय समाज में सम्मानीय स्थान प्राप्त कर लेता है तथा इसकी धार्मिक प्रचंडता में कुछ कमी आ जाती है, तब संप्रदाय का अविर्भाव होता है। इस प्रकार संप्रदाय मत में विकसित होता है तथा इसमें और धर्म संस्था में अनेक समानताएं पाई जाती हैं। ....
प्रश्न : ‘‘विज्ञान के पास तार्किक लक्ष्यों तक के लिए इंद्रियानुभाविक साधन हैं और धर्म के पास तार्किक लक्ष्यों तक के लिए गैर-इंद्रियानुभविक साधन हैं।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2010)
उत्तर : विज्ञान के पास प्रायोगिक एवं तार्किक दोनों आधार है- मानव जीवन से संबंधित घटनाओं को समझने के लिए एवं मानव जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए। धर्म भी यही कार्य हजारों वर्षों से करता आ रहा है।
बिना किसी व्यावहारिक स्पष्टीकरण के टेलर का तर्क है कि धर्म की उत्पत्ति मानव के बौद्धिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही हुआ है। वहीं मिलर का मानना है कि धर्म की उत्पत्ति मानव के भावुक मन की ....
प्रश्न : सकारात्मक धर्म
(2010)
उत्तर : सकारात्मक धर्म का संबंध विज्ञान पर आधारित धर्म से है। इसे मानवता का धर्म भी कहा जाता है। इस धर्म के प्रणेता अगस्त काम्टे हैं। काम्टे का यह धर्म नैतिकता पर आधारित है, जो दैविक शक्ति में आस्था नहीं रखता है। काम्टे का यह धर्म, धर्मशास्त्र विषयक धर्म के विरुद्ध भी है। इस धर्म के अनुसार आराधना का वस्तु मानव होना चाहिए, ईश्वर नहीं। काम्टे का मत है कि जो समाज सकारात्मक सिद्धांत पर आधारित ....
प्रश्न : वैश्वीकरण के संदर्भ में धार्मिक पुनरुज्जीवनवाद और कट्टरवाद के सामाजिक आयामों का परीक्षण कीजिए।
(2010)
उत्तर : हाल के वर्षों में यह माना जा रहा था कि आधुनिकता के प्रसार से धार्मिक विश्वासों में लोगों की रूचि कम होगी और धर्मनिरपेक्षता को आधुनिक समय में धार्मिक पुनरुज्जीवनवाद से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
इसके उदाहरण विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं। जैसे- वर्तमान समय में विभिन्न धार्मिक विश्वासों का लोगों के जीवन पर प्रभाव, प्रचलित धार्मिक प्रथाओं की समाज में मौजूदगी आदि। बहुत से समाजशास्त्रियों एवं विद्वानों का मानना ....
प्रश्न : समकालीन भारत में परिवार के प्रकारों और रूपों में नई प्रवृतियां।
(2008)
उत्तर : भारत में सामान्यतः परिवार से तात्पर्य संयुक्त परिवार से ही है। यह व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है, जो वैवाहिक, रक्त एवं गोद लिए गए सम्बन्धों से जुड़ा होता है। इसमें दो से अधिक पीढ़ी के सदस्य एक साथ और एक छत के नीचे रहते हैं, एक सामान्य रसोई में भोजन करते हैं, सामान्य सम्पति के स्वामी होते है, एक ही कुल देवता की पूजा करते हैं और पारस्परिक कर्तव्य तथा भावनात्मक एकता से आबद्ध ....
प्रश्न : पूर्व-आधुनिक समाजों में धार्मिक विश्वासों एवं रीतियों के उद्गम
(2005)
उत्तर : अनेक मानवशास्त्रियों ने पूर्व आधुनिक समाजों में धार्मिक विश्वासों एवं रीतियों के उद्गम को ज्ञात करने के लिए आदिम समाजों का अध्ययन किया। आदिम समाज छोटे एवं सरल प्रकृति के होते हैं। अतः वे संस्कृति के प्रारम्भिक रूप एवं उद्गम को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। अनेक मानवशास्त्रियों ने सोचा कि आदिम समाजों से ही आधुनिक जटिल समाजों की उत्पत्ति हुई है। अतः आदिम समाजों में ही धर्म की उत्पत्ति का पता लगाने का ....
प्रश्न : भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका को दृष्टांतिक मॉडलों के तौर पर लेते हुए बहुलवादी समाज में धर्म के प्रकार्यात्मक और साथ ही साथ अप्रकार्यात्मक पक्षों का परीक्षण कीजिए।
(2004)
उत्तर : निश्चित रूप से भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही बहुलवादी समाज हैं जिसमें विभिन्न धर्मों के मानने वाले लोग निवास करते हैं। धर्म संस्कृति का एक अंग है। यह मानव जीवन से संबंधित विभिन्न कार्यों की पूर्ति करता है। यही कारण है कि हमें आदिकाल से लेकर आधुनिक समाज तक सभी समाजों में धर्म देखने को मिलता है। वास्तव में धर्म का वैयक्तिक और सामाजिक दोनों प्रकार का महत्व होता है। परंतु प्रायोगिक तौर ....
प्रश्न : सामाजिक संचलनों की विचारधारा और रणनीति
(2004)
उत्तर : किसी भी सामाजिक आंदोलन की प्रकृति को निर्धारित करने में नेतृत्व एवं विचारधारा की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। विचारधारा लोगों के समूहों द्वारा माने जाने वाली विश्वासों की एक व्यवस्था है। यह स्थिति को समझने में मदद करती है। इसके अतिरिक्त यह लोगों द्वारा अपनाई गयी क्रियाओं को वैधता प्रदान करती है। इस प्रकार जैसे किसी आंदोलन के मार्गदर्शन हेतु नेतृत्व के साथ रणनीति एक आवश्यक तत्व होता है उसी प्रकार विचारधारा भी आवश्यक होती ....
प्रश्न : मानव समाज में संस्कृति के अर्थ एवं सार्थकता पर चर्चा कीजिए व्यक्तित्व के विकास में संस्कृति की भूमिका का समालोचनात्मक रूप से उजागर कीजिए।
(2003)
उत्तर : संस्कृति शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। संस्कृति शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है। संस्कृति का अर्थ होता है विभिन्न संस्कारों के द्वारा सामूहिक जीवन के उद्देश्योंकी प्राप्ति। यह परिमार्जन की एक प्रक्रिया है। संस्कारों को सम्पन्न करके ही एक मानव सामाजिक प्राणी बनता है। समाजशास्त्रीय अर्थ में संस्कृति को समाज की धरोहर या विरासत के रूप में परिभाषित किया गया है। समाज द्वारा निर्मित भौतिक एवं अभौतिक दोनो पक्षों की ....
प्रश्न : धर्म और विज्ञान।
(2001)
उत्तर : धर्म एक सामाजिक संस्था है जिसका समस्त तानाबाना अधिदैविक या उत्प्राकृतिक शक्ति अथवा शक्तियों तथा उनका मानव प्राणी के साथ संबंध के विचार के आधार पर बुना हुआ है। उन्नीसवीं सदी के मानवशास्त्रियों विशेषतः टायलर द्वारा दी गई धर्म की व्याख्या तात्विक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है। टायलर के अनुसार, धर्म देवी-देवताओं तथा अन्य अधि मानवीय प्राणियों जैसे पूर्वज अथवा आत्माओं के प्रति विश्वास तथा इनसे संबंधित कर्मकाण्ड है। धर्म की इस व्याख्या में अवैयक्तिक ....
प्रश्न : धर्म के प्रकार्यात्मक और अप्रकार्यात्मक पक्षों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
(2000)
उत्तर : धर्म संस्कृति का एक अंग है। यह मानव जीवन से संबंधित विभिन्न कार्यों की पूर्ति करता है। यही कारण है कि हमें आदिकाल से लेकर आधुनिक समाज तक सभी समाजों में धर्म देखने को मिलते हैं। धर्म के माध्यम से ही मानव अपने जीवन के लिए कुछ संतोष बटोरने का प्रयत्न करता है। धर्महमें अपनी उन समस्याओं का भी समाधान बता देता है जिन्हें कि विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया है। इस प्रकार वैयक्तिक और ....
प्रश्न : धर्म की सामाजिक आवश्यकता को सविस्तार प्रतिपादित कीजिए। धर्म और विज्ञान के बीच संबंध पर चर्चा कीजिए।
(1999)
उत्तर : धर्म की सामाजिक आवश्यकता के इस तथ्य से पता चलता है कि धर्म स्वयं धार्मिक समूह के लिए तथा समाज के लिए, प्रतिमान अनुरक्षण, तनाव-तिरोहन तथा एकीकरण में योगदान करता है।
समाज का एकीकरण कई तथ्यों पर निर्भर करता है- समान या समान से मूल्य आदेशात्मक और निषेधात्मक सामान्यकों का व्यापक स्वीकरण_ इन संस्थापितों सामान्यकों की पारस्परिक सहयोजित सरकार में बल प्रयोग के साधनों का एकछत्र अधिकार हो, अथवा यह समाज के मान्य अधिकारियों के पास ....
प्रश्न : धार्मिक बहुलवाद।
(1998)
उत्तर : धार्मिक बहुलवाद एक विचारधारा है, जिसमें अनेक धर्मों के लोग साथ-साथ सहिष्णुता के साथ रहते हैं एवं सहयोग की भावना होती है। इसमें हर एक व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिम धर्म को मानने की स्वतंत्रता होती है। अतः धर्म निरपेक्षता की अवधारणा से काफी मिलता-जुलता प्रतीत होता है। भारतीय समाज इसका एक अच्छा उदाहरण हो सकता है। भारत में हमेशा ही विविध प्रकार के धार्मिक विश्वासों को माना जाता रहा है। वास्तव में भारतीय ....