प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन में परंपरा व आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक संबंध का परीक्षण कीजिए।
(2015)
उत्तर : सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन में परंपरा व आधुनिकता के बीच द्वन्द्वात्मक संबंध पाया जाता है। एक ओर जहां परंपराकरण ने आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बाधित किया है तो दूसरी ओर आधुनिकता ने सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रें में परंपरा को समाप्त करने का प्रयास किया है जिससे आधुनिकीकरण की दिशा में सामाजिक परिवर्तन भी संपोषित हुआ है, परंतु यह परंपरा को पूरी तरह से विस्थापित करने में सफल नहीं रहा है।
परंपरा अपने को श्रेष्ठ मानकर ....
प्रश्न : ‘शिक्षा सामाजिक और आर्थिक असमताओं को बनाए रखने में सहायक होती है।’’ इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2015)
उत्तर : शिक्षा को जहां विषमताओं के प्रति शस्त्र के रूप में देखा जाता है वहीं दूसरी ओर शिक्षा सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को बनाए रखने में सहायक होती है।
समाज में व्यक्ति की समाजिक प्रस्थिति आर्थिक रूप से जुड़ी होती है। व्यक्ति जितना आर्थिक रूप से सक्षम होता है उसकी सामाजिक प्रस्थिति को उतना ऊंचा समझा जाता है। शिक्षा विषमता को बनाए रखने में सहायक है।
एम.एस. गोरे, आर.पी. देसाई का अध्ययन इस संदर्भ में प्रासंगिक है। एक ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन को समझने में ‘सांस्कृतिक पश्चता’ के विचार की प्रासंगिता को स्पष्ट कीजिए।
(2015)
उत्तर : ‘सांस्कृतिक पश्चता’ अवधारणा को सर्वप्रथम आगॅबर्न द्वारा अपनी पुस्तक “Social Change” में प्रयोग किया गया था। आगॅबर्न के अनुसार संस्कृति के दो पक्ष होते हैं- भौतिक संस्कृति व अभौतिक संस्कृति। भौतिक संस्कृति (जिसमें भौतिक वस्तुएं शामिल होती हैं, जैसे- कार, कम्प्यूटर आदि) जब आगे बढ़ जाती है और अभौतिक संस्कृति (जिसमें मूल्य, मान्यताएं, प्रथाएं आदि) पीछे छूट जाने को ही सांस्कृतिक पश्चता की संज्ञा दी जाती है।
‘सांस्कृतिक पश्चता’ सामाजिक परिवर्तन को समझने ....
प्रश्न : शिक्षा प्रायः सामाजिक परिवर्तन का एक अभिकरण माना जाता है। तथापि वास्तविकता में यह असमताओं और रूढि़वाद को प्रवलित भी कर सकती है। चर्चा कीजिए।
(2014)
उत्तर : मनुष्य की आवश्यकता समाज एवं सामाजिक परिवर्तन को जन्म देती है और संतुलन के साथ सामाजिक परिवर्तनों को संभव बनाने में व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जो सामाजिक परिवर्तनों की वांछित दशा को निर्धारित करती है और उस दिशा में सामाजिक परिवर्तनों को अग्रसारित करके सामाजिक व्यवस्था एवं संतुलन को बनाए रखती है।
शिक्षा व्यक्ति को इस बात के लिए तैयार करती है कि सामाजिक परिवर्तनों को नेतृत्व प्रदान करे तथा/या उसके लिए ....
प्रश्न : ‘निर्भरता’ के लातीन अमरीकी दृष्टिकोण पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।
(2014)
उत्तर : अविकसित एवं विकासशील देशों का तकनीकी एवं आर्थिक सहायता के क्षेत्रें में विकसित देशों पर निर्भरता को सामाजिक विकास के संदर्भ में ‘निर्भरता’ की अवधारणा द्वारा स्पष्ट किया जाता है।
निर्भरता के सिद्धांत को सर्वप्रथम पी. बरॉ ने प्रस्तुत किया और कहा कि पश्चिम के औद्योगिक समाजों का समस्त आर्थिक विकास समुद्रपारीय समाजों के आर्थिक अधिशेष के शोषण करने और हड़पने से हुआ है और इसके लिए उन्होंने कई छोटे-छोटे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मापदण्डों का प्रयोग ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के कारकों के रूप में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की परीक्षा कीजिए।
(2013)
उत्तर : सामाजिक परिवर्तन के प्रभावी प्रमुख प्रौद्योगिकी कारक निम्न प्रकार है-
आधुनिक युग में यांत्रिक उपादान किस-किस सीमा तक हमारे सामाजिक या वैयक्तिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। टीवी, यातायात के साधन, प्रतिदिन के उपयोग में आने वाले सामान आदि हमारी मशीनी युग की देन है। इसका असर हमारे व्यवहार, अभिवृत्ति आदि पर पड़ा है।
प्रौद्योगिकी कारकों ....
प्रश्न : समाजशास्त्र की प्रकार्यवादी परंपरा की समीक्षात्मक परीक्षा कीजिए।
(2013)
उत्तर : समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जाता है। समाज मानवीय संबंधों व मानवीय अंतः क्रियाओं से निर्मित होता है। अतः कहा जाता है कि समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है। यह उन क्रियाओं से संबंधित है जिनके द्वारा मानवीय संबंध स्थापित होते हैं।
समाजशास्त्र अनेक संस्थाओं व सामाजिक प्रक्रियाओं से संबंधित है। समाजशास्त्र को अनेक उपविभागों जैसे, जननांकिकी, ग्रामीण समाजशास्त्र आदि में विभाजित किया जा सकता है।
विभिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र को अपने-अपने ....
प्रश्न : विकासजन्य विस्थापन के सामाजिक आयामों की परीक्षा कीजिए।
(2013)
उत्तर : किसी भी राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास मेंबउपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों, कच्चे माल, पूंजी की पर्याप्तता तथा मानव शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता होते हुए भी पूंजी की कमी तथा मानव शक्ति की अधिकता के कारण आर्थिक विकास बाधित हो रहा है। आज विश्व जिस ज्वालामुखी पर्वत पर बैठा है वह किसी भी समय फट सकता है और विश्व युद्ध का रूप बनकर सामने आ सकता ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के चलते समाजों द्वारा अनुभूत संघर्षों एवं तनावों को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
(2013)
उत्तर : सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य उन बदलावों से है, जो सामाजिक संगठन अर्थात समाज की संरचना व प्रकार्यों में घटित होता है।
परिवर्तन संरचना प्रकार्यों के साथ-साथ संबंधों, समाज के आकार में, विभिन्न अंगों में तथा समाज संतुलन अथवा संगठन में भी घटित होता है। संक्षेप में, सामाजिक संरचना, प्रकार्य तथा अंतर्संबंधों में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन है। सामाजिक परिवर्तन के मार्ग में
संघर्षों एवं तनावों को निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
1. तनाव
प्रश्न : उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक सिद्धान्तों का समीक्षात्मक परीक्षण कीजिए।
(2013)
उत्तर : समाजशास्त्रीय साहित्य में संस्कृतिकरण की अवधारणा को लाने का श्रेय एम.एन. श्रीनिवास को जाता है। इस अवधारणा द्वारा उन्होंने भारतीय जाति प्रथा की संरचना तथा संस्तरण में होने वाले परिवर्तनों को समझाने की कोशिश की है। संस्कृतिकरण जाति प्रथा के अन्तर्गत एक क्रियाशील प्रक्रिया है। श्रीनिवास ने सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक सिद्धान्त को समझाते हुए कहा कि संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न द्विज जाति या जनजाति या अन्य समूह किसी उच्च व ....
प्रश्न : मार्क्स द्वारा दिए गए समाज के वर्गीकरण में सामन्ती एवं दास समाजों को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, वे एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?
(2012)
उत्तर : मार्क्स ने अपने ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या की। मार्क्स ने उत्पादन के साधन तथा उत्पादन के संबंधों के मध्य परिवर्तन के आधार पर विभिन्न युगों की भौतिकवादी व्याख्या के आधार पर विभिन्न युगों की भौतिकवादी व्याख्या के आधार पर पांच युग बताए जो निम्नांकित हैंµ
मार्क्स के अनुसार आदिम साम्यवादी युग सबसे प्रारम्भिक युग था। इस युग में उत्पादन के साधन किसी ....
प्रश्न : विकास और निर्भरता
(2011)
उत्तर : विकास परिवर्तन की एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक देश के अधिकाधिक नागरिक उच्च भौतिक रहन-सहन के स्तर, स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन प्राप्त करने के साथ-साथ अधिकाधिक मात्र में शिक्षित होने का प्रयास करते हैं, अर्थात् सामाजिक जीवन में गुणात्मक सुधार तथा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति को विकास कहते हैं। व्यापक अर्थों में वांछित लक्ष्यों की ओर बढ़ने का नाम ही विकास है, किंतु इसमें प्रयुक्त साधनों और यंत्रें का भी उतना ही महत्व है ....
प्रश्न : ‘विकास कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से कार्यान्वित करने के लिए सामाजिक सहायक यंत्र रचना को मजबूत करने की आवश्यकता है।’ समीक्षा कीजिए।
(2011)
उत्तर : विकास सामाजिक परिवर्तन की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक देश के अधिकाधिक नागरिक उच्च भौतिक रहन-सहन के स्तर, स्वास्थ्य के स्तर एवं दीर्घजीवन को प्राप्त करने के साथ-साथ शिक्षित होने का प्रयास करते हैं। दूसरे शब्दों में, सामाजिक जीवन में भौतिक तथा गुणात्मक सुधार का अधिकाधिक मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की क्षमता वृद्धि विकास कहलाती है। पर यह लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने तथा उत्पादन में वृद्धि के साथ साथ रोजगार में ....
प्रश्न : आधुनिक समाज के संदर्भ में विश्व-व्यवस्था सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
(2011)
उत्तर : प्रमुख समाजशास्त्री ई. वालर स्टेन का विचार भी उल्लेखनीय है, जिन्होंने यद्धपि अपने विचारों को निर्भरता-सिद्धांत में केन्द्र-परिधि की अवधारणा की आलोचना पर आधारित किया है तथा उसने विश्व-व्यवस्था में केन्द्र अर्ध-परिधीय और परिधीय राष्ट्रों के रूप में विश्व को विभाजित करते हुये कमोबेश निर्भरता सिद्धांत के निष्कर्षों को ही स्वीकार किया है।
अविकसित एवं विकासशील देशों का तकनीकी एवं आर्थिक सहायता के क्षेत्र में विकसित देशों पर निर्भरता को सामाजिक विकास के सन्दर्भ में निर्भरता ....
प्रश्न : ‘‘सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के त्वरण में मुख्य शक्तियां विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हैं।’’ समीक्षा कीजिए।
(2011)
उत्तर : प्रौद्योगिकी समाज को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है, क्योंकि प्रौद्योगिकी में कोई भी परिवर्तन किसी संस्था अथवा समूह में परिवर्तन का कारण बनता है। प्रौद्योगिकी समाज को हमारे पर्यावरण में परिवर्तन द्वारा जिसके प्रति हमें अनुकूलित होना पड़ता है, बदलती है, यह परिवर्तन प्रायः भौतिक पर्यावरण में आता है तथा हम इन परिवर्तनों के साथ जो अनुकूलन करते हैं, उससे प्रथाओं एवं सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन हो जाता है। यद्यपि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी निरन्तर ....
प्रश्न : पारंपरिक समाजों पर बाजार अर्थव्यवस्था के सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
(2010)
उत्तर : परंपरागत समाज जो पहले निर्वाह कृषि एवं सरल श्रम विभाजन पर आधारित था। बाजार अर्थव्यवस्था के प्रभाव के कारण इसका स्वरूप बिल्कुल बदल चुका है। परंपरागत समाज में जहां उत्पादकता केवल अपने आवश्यकता को पूरा करने के लिए होता था एवं अतिरिक्त उत्पादन बहुत कम या नहीं के बराबर था। परंतु बाजार की मांग के अनुसार हो रहा है। साथ ही परंपरागत समाज भी अतिरिक्त उत्पादन का सृजन अधिक लाभ कमाने के प्रवृति से करने ....
प्रश्न : विकास द्वारा उत्पेरित विस्थापन के सामाजिक आयामों का परीक्षण कीजिए।
(2010)
उत्तर : विकास से प्रेरित विस्थापन की प्रक्रिया विभिन्न समुदाय एवं लोगों को उनके घर एवं जन्मभूमि से बेघर कर रहा है। यह एक बलपूर्वक किया जाने वाला प्रवास का उदाहरण है। यह विस्थापन जगह-जगह बांध के निर्माण, विद्युत परियोजनाओं के निर्माण, खनन, वायुपत्तन के निर्माण, विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के निर्माण, सैन्य आवास एवं अस्त्र-शस्त्र परीक्षण केन्द्र के निर्माण आदि के कारण हो रहा है। इन सभी विकास कार्यों से केवल जनजातीय समूह ही नही प्रभावित हो ....
प्रश्न : सामाजिक संचलन की संरचना।
(2009)
उत्तर : समाज की प्रकृति परिवर्तनशील होती है। इसमें संगठन एवं विघटन की स्थिति आती रहती है। इनके परिणामस्वरूप उत्पन्न दशाओं के उन्मूलन हेतु जब समाज के सदस्य मुख्यतः परिवर्तन लाने या कभी-कभी परिवर्तन को रोकने हेतु सामूहिक प्रयास करते हैं तो इसे सामाजिक आंदोलन कहते हैं।
सी-डब्ल्यू- किंग, एम.एस.ए. राव आदि ने जहां इसे परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया के रूप में पारिभाषित किया है, वहीं टर्नर ने इसमें परिवर्तन को रोकने हेतु किये गये प्रयासों को भी ....
प्रश्न : किन महत्त्वपूर्ण तरीकों से धर्म सामाजिक स्थायित्व और सामाजिक परिवर्तन दोनों के लिए एक बल हो सकता है? चर्चा कीजिए।
(2008)
उत्तर : धर्म मानव का अलौकिक शक्ति से सम्बन्ध जोड़ता है। इसका सम्बन्ध मानव की भावनाओं, श्रद्धा एवं भक्ति से है। अतः धर्म कर्म या अधिक मात्र में अधिप्राकृतिक तत्वों, शक्तियों, स्थानों और आत्माओं से सम्बन्धित विश्वासों तथा आचरणों की एक संगठित व्यवस्था है। दुर्खीम के अनुसार जिन वस्तुओं को पवित्र माना जाता है, धर्म उनसे सम्बन्धित विश्वासों और व्यवहारों की एकीकृत प्रणाली है। इसके द्वारा समान विश्वासों और व्यवहारों के अनुयायी एक नैतिक समुदाय में एकबद्ध ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के एक अभिकर्ता के रूप में शिक्षा।
(2008)
उत्तर : सामाजिक परिवर्तन एक तटस्थ प्रक्रिया है। इसमें अच्छाई या बुराई के भाव सम्मिलित नहीं होते बस यह प्रक्रिया चलती रहती है। हां प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। सामाजिक परिवर्तन भी किसी न किसी कारक का ही परिणाम हैं अर्थात् सामाजिक परिवर्तन को समझने व जानने के लिए उन कारकों को भी जानना आवश्यक है, जो परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है, जैसे जनसंख्यात्मक कारक, वेबर का धार्मिक कारक, शैक्षणिक कारक, ....
प्रश्न : प्राकृतिक और सामाजिक असमताओं के तंत्रें में सोपान किस प्रकार बन कर खड़ा हो जाता है?
(2008)
उत्तर : प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में सुविधा शक्ति तथा प्रतिष्ठा के आधार पर निर्मित श्रेणियों तथा स्तरों का अस्तित्व पाया जाता है। सुविधा तथा शक्ति के उपयोग की दृष्टि से इन विभिन्न स्तरों का सामाजिक संरचना में स्थानक्रम निर्धारित होता है।
जिनके पास अधिक सुविधा और शक्ति होती है, उनका सामाजिक स्तर उच्च होता है। कम सुविधा और शक्ति वाले लोगों की श्रेणी अथवा उनका सामाजिक स्तर निम्न होता है। विभिन्न समाजों में इतिहास ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के एक साधन के रूप में शिक्षा।
(2007)
उत्तर : समाज और शिक्षा के बीच सम्बन्ध उदारवाद सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा के क्षेत्र में अल्प उपलब्धियां, शिक्षा का कार्यात्मक दृष्टिकोण और उच्च शिक्षा में संकट, आदि विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। शिक्षा आवश्यक ज्ञान और दक्षता प्रदान करती है, जो व्यक्ति को समाज में आदर्श रूप में कार्य करने योग्य बनाती है। शिक्षा वैचारिक मान्यताओं से प्रेरित होती है, जो समाज से ही ली जाती हैं, किन्तु इसका कार्य सांस्कृतिक विरासत हस्तांतरण में ....
प्रश्न : ‘‘एक समाज की सतत्विधानता एवं विकास के लिए शिक्षा एक आधारभूमि क्रिया होती है।’’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।
(2006)
उत्तर : शिक्षा का संबंध समाज की दिशा के साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए शिक्षा की प्रत्येक समाज में महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा को पारिभाषित करते हुए दुर्खीम का कथन है कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग पुरानी पीढ़ी उस पीढ़ी पर करती है जो सामाजिक जीवन के लिए अभी प्रस्तुत नहीं हैं। इसका उद्देश्य बच्चे में उन मौखिक, नैतिक और बौद्धिक दिशाओं को विकसित तथा जाग्रत करना है जिसकी अपेक्षा उससे सम्पूर्ण समाज और ....
प्रश्न : निर्देशित सामाजिक परिवर्तन में आते मानवीय परिवर्तन।
(2006)
उत्तर : सामाजिक विनिर्माण के लिए निर्देशित सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है, कॉम्ट के अनुसार, क्योंकि व्यक्ति में आगे की ओर देखने की शक्ति मौजूद है और इसी शक्ति की सहायता से वह दशाओं में इच्छित परिवर्तन ला सकता है। वार्ड के अनुसार आज के परिवर्तनशील समाजों में नियोजन के बिना सम्पूर्ण समाज को कल्याण की दिशा में आगे बढ़ाना असंभव है।
आज वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विघटन से संबंधित कई समस्याएं यहां मौजूद हैं। निर्देशित सामाजिक परिवर्तन ....
प्रश्न : विज्ञान की सामाजिक जिम्मेवारी का विचार समझाइये। विकासशील समाजों के पिछड़ेपन को दूर करने में विज्ञान तथा टेक्नोलोजी के विकास के सामाजिक परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
(2006)
उत्तर : रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता में लिखा है कि विज्ञान जितना समाज के लिए लाभदायक है, उतना ही विनाशक। अतः यह दूधारी तलवार है जो सुरक्षा और विनाश दोनों कर सकता है। अतः इसके प्रयोग को सावधानी से किया जाना चाहिए। रामधारी सिंह दिनकर के इस दृष्टिकोण का अत्यंत समाजशास्त्रीय महत्व है। विज्ञान चूंकि समाज की उन आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी होता है, जिससे समाज व्यक्ति की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है। ....
प्रश्न : भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक परिणाम
(2005)
उत्तर : भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सामाजिक परिणाम का आकलन हम इस बात से करते हैं कि यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के फलस्वरूप प्रत्यक्ष रूप से हमें निम्नांकित सामाजिक परिणाम देखने को मिलता है-
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन एवं आधुनिकीकरण के एक उपकरण के रूप में सार्वजनिक शिक्षा पर चर्चा कीजिए।
(2005)
उत्तर : शिक्षा न केवल सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करती है, बल्कि अनेक दृष्टियों से आधुनिकीकरण के एक घटक के रूप में भी कार्य करती है।
शिक्षा निश्चित रूप से सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों को प्रभावित करती है। इस अर्थ में यह न केवल सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करती है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के एक घटक के रूप में भी क्रियाशील रहती है। शिक्षा अपने को अधिक से अधिक रचनात्मक कार्यों में लगाए रखती है और परिवर्तन ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के मार्क्सवादी और पार्सनवादी विचारों का एक तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए और समकालीन भारत में सामाजिक विकास के लिए प्रत्येक विचार की प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए।
(2004)
उत्तर : सामाजिक परिवर्तन किसी भी समाज का एक शाश्वत नियम एवं घटना है। वस्तुतः समाजशास्त्र का उद्भव भी सामाजिक परिवर्तनों की व्याख्या के लिए ही हुआ है। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं का विश्लेषण हम मुख्यतः उद्विकासीय, चक्रीय, संघर्ष तथा प्रकार्यवादी सिद्धांतों के अंतर्गत करते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा मूल रूप से मार्क्स के विचारों पर आधारित सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत है जो क्रांति पर जोर देता है जबकि टालकट पारसंस ने सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को स्पष्ट ....
प्रश्न : विज्ञान और सामाजिक दायित्व।
(2004)
उत्तर : मानवीय ज्ञान संबंधी समस्याओं का एक दृष्टिकोण विज्ञान के नाम से जाना जाता है जिसके द्वारा आनुभविक प्रेक्षण (इन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव) के आधार पर असीमित वर्ग की घटनाओं के संबंध में सामान्य सिद्धांत खोजने का प्रयास किया जाता है। विज्ञान इस अनुमान पर आधारित है कि विश्व के संबंध में इंद्रियों द्वारा वस्तुपरक ज्ञान संभव है तथा इस ज्ञान की सत्यता की परख अनेक व्यक्तियों के समान प्रेक्षणों द्वारा की जा सकती है। संक्षेप ....
प्रश्न : शिक्षा का निजीकरण और अवसर की समता
(2004)
उत्तर : निजीकरण की अवधारणा निजी स्वामित्व की बहुस्तरीय मात्रत्मक अवधारणा प्रदर्शित करती है। इसका स्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र की शिक्षण संस्थाओं को निजी क्षेत्र में सौंपकर सरकारी एकाधिकार को कम किया जा सकता है। शिक्षा के संबंध में प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक प्रचलित दो धारणाएं प्रमुख रही है-
(i) राज्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राज्य नियंत्रित शिक्षा,
(ii) व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से राज्य के नियंत्रण से परे शिक्षा प्रबंध और संचालन।
आधुनिक काल में ....
प्रश्न : भारत में नई प्रोद्योगिकियों का सामाजिक प्रभाव।
(2003)
उत्तर : नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अनेक परिवर्तन आते हैं। ये परिवर्तन प्रोद्योगिकीय परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न परिवर्तनों के माध्यम से आते है।
(1) श्रम विभाजन एवं कार्यों का विशेषीकरणः प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप अब भारत में उत्पादन बड़े पैमाने पर विशालकाय कारखानों में होने लगा। इन कारखानों में श्रम का चुनाव उसके व्यक्तिगत कार्यशीलता एवं विशेषीकरण के आधार पर होता है। साथ ही विभिन्न कार्यों को ठीक से पूरा करने के लिए विशेष ....
प्रश्न : शिक्षा एवं सामाजिक विकास।
(2003)
उत्तर : शिक्षा एवं सामाजिक विकास के बीच गहरा संबंध है। जैसा कि हम जानते हैं कि शिक्षा वह सशक्त माध्यम है जो व्यक्तियों के चरित्र विकास के साथ-साथ सामाजिक चेतना एवं सामाजिक विकास भी करता है। शिक्षा वर्तमान समय में समाज के हर एक क्षेत्र में भूमिका निभा रहा है। यह एक वो माध्यम है जो व्यक्ति को गतिशीलता प्रदान कर आधुनिक विचारों एवं वैज्ञानिकता से परिचित कराता है।
दूसरी ओर, सामाजिक विकास निश्चित रूप से किसी ....
प्रश्न : विज्ञान की प्रकृति।
(2002)
उत्तर : सामान्य तौर पर सामाजिक विज्ञान एवं विशिष्ट तौर पर समाजशास्त्र में विज्ञान का स्वरूप को लेकर मतभेद है। शाब्दिक रूप से विज्ञान की प्रकृति वस्तुनिष्ठ एवं व्यक्तिगत ज्ञान से परे होती है एवं इसका संचालन अवलोकन, वर्गीकरण, निरीक्षण एवं परीक्षण द्वारा होता है। कॉम्ट एवं दुर्खीम ने प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण से समाज को प्रकृति का एक अंग मानकर समाजशास्त्र को विज्ञान कह डाला। परंतु दूसरी ओर वैज्ञानिक समाजशास्त्र के व्याख्यता कार्ल पॉपर ने किसी भी विज्ञान ....
प्रश्न : सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन।
(2002)
उत्तर : सामाजिक आंदोलन एवं सामाजिक परिवर्तन परस्पर अंतः संबंधित अवधारणाएं हैं। जब किसी समाज में संकट की स्थिति उत्पन्न होती है तो वह सामाजिक आंदोलन का रूप धारण कर लेती है, जिससे उस समाज में सामाजिक परिवर्तन भी अवश्यंभावी हो जाता है।
सामाजिक आंदोलन वास्तव में समाज के समूह द्वारा किसी उद्देश्य की प्राप्ति के द्वारा किया गया एक सुनिश्चित, सुव्यस्थित एवं संगठित प्रयास है। इस प्रकार सामाजिक आंदोलन एक वृहत अवधारणा है, जैसे-जनजाति आंदोलन, वातावरणीय आंदोलन, ....
प्रश्न : औपचारिक शिक्षा की प्रक्रिया एवं समाजीकरण के अंतर को दर्शाइये। सामाजिक परिवर्तन के एक साधन को रूप में औपचारिक शिक्षा की प्रभावकता का परीक्षण करें।
(2001)
उत्तर : कुछ समाजों, विशेषकर जनजाति समाजों में बालक का शिक्षण और समाजीकरण औपचारिक शिक्षा संस्थाओं के बिना होता है। फिर भी सीखने की प्रक्रिया के रूप में शिक्षा सर्वव्यापी होती है चाहे कोई जंगल में रहे या मरुस्थल में या शहर अथवा गांव में। सीखने की सार्वभौमिकता से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि सभी प्रकार का सीखना समाजीकरण होता है उसी प्रकार जैसे सभी प्रकार की शिक्षा भी समाजीकरण के लिए नहीं होती।
यह भी उल्लेखनीय ....
प्रश्न : संरचनात्मक परिवर्तन की संकल्पना पर सविस्तार लिखिए। समाज में संरचनात्मक परिवर्तन के सगोत्रीय कारकों पर उपयुक्त उदाहरणों सहित चर्चा कीजिए।
(1999)
उत्तर : भारत में समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को दो वृहत् श्रेणियों में रखकर विश्लेषित किया है- संरचनात्मक प्रक्रियाएं और सांस्कृतिक प्रक्रियाएं। परिवर्तन की संरचनात्मक प्रक्रियाएं सामाजिक संबंधों के संजाल में होने वाला परिवर्तन है। जाति, नातेदारी, परिवार और व्यावसायिक समूह संरचनात्मकता के कुछ विशिष्टपक्ष हैं। इनके पूर्व निश्चित संबंधों में होने वाले परिवर्तन संरचनात्मक परिवर्तन है। जब एक पारंपरिक कृषि व्यवस्था, जो पारिवारिक श्रम पर आश्रित थी, व्यावसायिक उत्पादन के लिए किराये के मजदूरों ....
प्रश्न : शिक्षा एवं संस्कृति।
(1998)
उत्तर : शिक्षा एवं संस्कृति एक-दूसरे से अंतःसंबंधित हैं। संस्कृति जैसा हम जानते है कि यह एक सीखा हुआ व्यवहार है एवं इसका स्थानांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हुआ करता है। निश्चित रूप से प्राथमिक समाजीकरण की प्रक्रिया का योगदान सांस्कृतिक प्रसार में अधिक है परंतु स्कूल, कॉलेज एवं शिक्षा के अन्य माध्यम सांस्कृतिक गतिशीलता में अभूतपूर्व योगदान करते है। ऑगबर्न ने सांस्कृतिक तत्वों को स्पष्ट करते हुए Cultural lag के सिद्धांत का प्रतिपादन किया ....
प्रश्न : प्रौद्योगिकी में परिवर्तनों के सामाजिक परिणामों का परीक्षण कीजिए। नए उत्पादन प्रक्रमों और उपस्कर से उदाहरणों को देते हुए अपने उत्तर को सोदाहरण समझाइए।
(1998)
उत्तर : प्रोद्योगिकी के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अनेक परिवर्तन आते हैं जिनमें से कुछ इसके प्रत्यक्ष प्रभाव या परिणाम और कुछ अप्रत्यक्ष प्रभाव या परिणाम कहे जा सकते हैं। प्रत्यक्ष प्रभाव वे हैं जो प्रोद्योगिकी परिवर्तन के परिणामस्वरूप अनिवार्यतः और शीघ्र ही समाज में परिवर्तन लाते हैं। ये परिवर्तन स्पष्टतः मालूम पड़ते हैं। अप्रत्यक्ष प्रभाव वे हैं जो समाज से विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के फलस्वरूप अप्रत्यक्ष तरीके से परिवर्तन लाते हैं। ये परिवर्तन प्रोद्योगिकी परिवर्तन के ....