प्रश्न : चरों (वेरिएबल्स) से आप क्या समझते हैं? प्रयोगात्मक अनुसंधान में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए।
(2015)
उत्तर : भौतिक या सामाजिक क्षेत्र से संबंधित परिवर्तन को उस घटना की मात्र में अंतर द्वारा जाना जा सकता है। इस प्रकार की घटना को चर कहा जाता है जो किसी घटना की विशेष मात्र या गुण में परिवर्तन का द्योतक है। कोई भी चर मात्रत्मक (आयु), गुणात्मक (विवाहित-अविवाहित), विच्छिन्न (जिन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता जैसे- आधा अपराध), अविच्छिन्न (जिन्हें विभाजित किया जा सकता है जैसे- पैमाना पर इंच) हो सकते है।
प्रयोगात्मक शोध प्रारूप में ....
प्रश्न : तर्कसंगत प्रभाविता (लैजिटिमेट डौमिनेशन) के प्रारूपों के विश्लेषण में वेबर ने किन संकल्पनाओं का उपयोग किया था?
(2015)
उत्तर : तर्कसंगत प्रभाविता का मतलब ऐसे विचारों व व्यवहारों से है जो तर्क की दृष्टि से संगत व अनुरूप हो और जिनका अनुभव के आधार पर जांच किया जा सकता है। वेबर के अनुसार आधुनिक समाज को समझने हेतु तर्कसंगत शक्तियों का समझना होगा। वेबर ने तर्कसंगति को सामाजिक व्यवस्था के उद्भव के रूप में देखा है तथा अपने अध्ययन में तर्कसंगति की अभिव्यक्ति अलग लेकिन परस्पर तरीके से की है जिनमें पहला है- समाज में ....
प्रश्न : यह क्यों कहा जाता है कि यादृच्छिक प्रतिचयन की विश्वसनीयता व वैधता अधिक होती है?
(2015)
उत्तर : यादृच्छिक प्रतिचयन, प्रतिचयन का शुद्धतम रूप है क्योंकि इसमें समाष्टि के प्रत्येक सदस्य के चुने जाने की समान संभावना होती है। इसलिए इसमें अनुसंधान के दौरान किसी प्रकार के पक्षपात की संभावना नहीं होती। प्रत्येक इकाई का समान महत्व होता है और इन्हीं इकाईयों के आधार पर सही व निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जाता है जिसे समग्र पर लागू किया जाता है।
यादृच्छिक प्रतिचयन में विश्वसनीयता एवं वैधता का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि प्रतिचयन का समय, लागत ....
प्रश्न : उपभोक्ता व्यवहार और इसके सामाजिक सहसंबंधों के अध्ययन के लिए कौन-सी अनुसंधान तकनीक सर्वाधिक उचित होगी? स्पष्ट कीजिए।
(2014)
उत्तर : समाजशास्त्र अमूर्त घटनाओं के अध्ययन के लिए गुणात्मक पद्धतियों का तथा मूर्त घटनाओं के अध्ययन के लिए परिभाषात्मक पद्धतियों का प्रयोग करता है। कहां कौन सी पद्धति का प्रयोग किया जाएगा, यह विषय की प्रकृति पर निर्भर करता है। कहीं किसी विषय के अध्ययन हेतु गुणात्मक एवं परिमाणात्मक दोनों ही पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है।
जिन पद्धतियों की सहायता से अमूर्त तथ्यों का अध्ययन किया जाता है, उन्हें ही गुणात्मक पद्धतियां कहा जाता है। समाजशास्त्र ....
प्रश्न : प्रौद्योगिकी का बढ़ता हुआ उपयोग भारतीय समाज में किस प्रकार स्थियों की प्रस्थिति में परिवर्तन कर रहा है?
(2014)
उत्तर : आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान शब्द का प्रयोग किसी भी ज्ञान की शाखा के लिए प्रयुक्त होता है, जो कि क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित हो। विज्ञान संस्कृति का वह भाग है, जो प्रकृति के क्रमबद्ध ज्ञान को प्रदर्शित करता है। प्रौद्योगिकी वह है, जो कि प्राकृतिक घटना पर मनुष्य के नियंत्रण को निर्देशित करती है। यह प्रौद्योगिकी और मशीनों का क्षेत्र है। वैज्ञानिक अध्ययन का लक्ष्य सत्य का अन्वेषण है, जबकि प्रौद्योगिकी का ....
प्रश्न : सामाजिक शोध की मात्रत्मक विधियों की सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
(2013)
उत्तर : स्टुअर्ट चेज, कार्ल पियर्सन तथा बोटोमोर आदि ने माना है कि विज्ञान का संबंध ‘‘विषय-वस्तु’’ से न होकर ‘‘पद्धति’’ से है अर्थात कोई भी विषय जो कि वैज्ञानिक पद्वति का प्रयोग करता है, विज्ञान की श्रेणी में रखा जा सकता है।
विज्ञान को ‘‘ज्ञान का क्रमबद्ध संकलन’’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसकी विशेषताएं हैं-
वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण हैं-
प्रश्न : अनुसंधान (शोध) में गुणात्मक एवं गणनात्मक पद्धतियों की भिन्नता बताइये।
(2012)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान में घटनाओं के अध्ययन के लिए विषय वस्तु की प्रकृति के आधार पर दो प्रकार की अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है, पहला गुणात्मक पद्धति तथा दूसरा गणनात्मक या परिमाणात्मक पद्धति। कहीं-कहीं किसी विषय के अध्ययन हेतु गुणात्मक तथा परिमाणात्मक दोनों ही पद्धति का साथ-साथ प्रयोग किया जाता है।
जिन पद्धतियों की सहायता से अमूर्त्त तथ्यों का अध्ययन किया जाता है, उन्हें गुणात्मक पद्धतियां कहा जाता है। समाजशास्त्र में अमूर्त्त तथ्यों या घटनाओं ....
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान की व्यक्तिनिष्ठ पद्धति क्या है? आंकड़ों के एकत्रीकरण के लिए केन्द्र समूह विवेचन (एफ.जी.डी.) का उपयुक्त उदाहरणों सहित एक तकनीकी के रूप में परीक्षण कीजिए।
(2011)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान के अन्तर्गत हम विभिन्न सामाजिक समस्याओं के विभिन्न पहलुओं की खोज करते हैं। घटनाओं को देखने-परखने के दो प्रमुख दृष्टिकोण हैं- व्यक्तिपरक और वस्तुपरक। जब घटनाओं का अध्ययन व्यक्ति के दृष्टिकोण या परिप्रेक्ष्य से किया जाता है, तब इसे व्यक्तिपरकता या व्यक्तिनिष्ठता कहते हैं। इस अवधारणा को वस्तुपरकता के विपर्यय (विरोध) के रूप में प्रयोग किया जाता है और प्रत्यक्षवादी विद्वान इस दृष्टिकोण की आलोचना करते हैं। यही नहीं, संरचनावादियों, मार्क्सवादियों और मनोविश्लेषण ....
प्रश्न : आकस्मिक लाभवृति
(2010)
उत्तर : आकस्मिक लाभवृत्तिः आक्स्मिक लाभवृत्ति ऐसे तथ्यों से संबंधित है जो सैद्धांतिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे तथ्य किसी शोध के दौरान शोधकर्ता को प्राप्त होते हैं और शोधकर्ता को नई खोज में मदद करते हैं जिसका उसे पहले से पूर्वानुमान नहीं होता है। आकस्मिक लाभवृत्ति का उपयोग अनसेम लेवनार्ड स्ट्रॉस और बी.जी. ग्लेसर द्वारा ग्राउण्डेड सिद्धांत के प्रतिपादन में किया गया था। आकस्मिक लाभवृत्ति की अवधारणा समाजशास्त्री आर.के. मार्टन के विचार पर आधारित है। ....
प्रश्न : नियमान्वेशी और व्यक्त्यांकन विधियां
(2010)
उत्तर : नियमान्वेशी और व्यक्त्यांकन विधियां: नियमान्वेशी विधि वह शोध प्रणाली है, जिसमें तथ्य विश्लेषण सिद्धांतों के निर्माण की ओर निर्देशित होते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इस विधि का उपयोग स्वतः न होकर किसी विषय वस्तु के निष्कर्ष निर्माण में होता है। समाजशास्त्र एवं भौतिक विज्ञान दोनों ही नियमान्वेशी विज्ञान हैं, जिनका प्रमुख उद्देश्य अमूर्त निष्कर्ष का निर्माण है जो विशिष्ट घटनाओं एवं व्यक्तिगत तथ्यों पर आधारित है। व्यक्त्यांकन विधि मानव व्यवहार अध्ययन की वह विधि है, ....
प्रश्न : समाजशास्त्रीय अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता की समस्याएं
(2009)
उत्तर : तटस्थ एवं पक्षपात रहित निरीक्षण द्वारा तथ्यों का उनके वास्तविक रूप में संकलन व विश्लेषण ही वस्तुनिष्ठता है। दूसरे शब्दों में अपने स्वयं की भावना, विचार, उचित-अनुचित के निर्णय, विश्वास, आशा और आकांक्षाओं से प्रभावित न होकर किसी भी तथ्य या घटना को फ्जैसा वह हैय् उसी के रूप में देखना व विश्लेषण करना वस्तुनिष्ठता है। घटना/तथ्य का यह वास्तविक रूप कटु हो सकता है, अनैतिक हो सकता है और अनुसंधानकर्ता की समस्त आशाओं, आदर्शों ....
प्रश्न : प्रायिकता और प्रायिकतेतर प्रतिचयन विधियों के बीच विभेदन कीजिए। प्रतिचयन डिजाइनों के कितने प्रकार हैं?
(2009)
उत्तर : प्रतिचयन की मुख्यतः दो विधियां हैं- प्रायिकता प्रतिचयन तथा प्रायिकेत्तर प्रतिचयन।
प्रतिचयन या न्यायदर्शी (Sample) के चयन में जब ऐसी विधि का प्रयोग करते हैं, जिससे जनसंख्या के प्रतिनिधित्व की संभावना होती है, तब उसे प्रायिकता प्रतिचयन की संज्ञा दी जाती है। जी.सी. हेलमेस्तर के अनुसार प्रायिकता प्रतिचयन उसे कहते हैं, जिसमें जनसंख्या के प्रत्येक सदस्य को प्रतिचयन में सम्मिलित होने की या चयन किए जाने की समान संभावना होती है। एक सदस्य का दूसरे पर ....
प्रश्न : आधुनिक विश्व में समाजों का धर्मनिरपेक्षीकरण।
(2009)
उत्तर : धर्मनिरपेक्षता आधुनिक एवं केंद्रीय विचारधारा है, जो सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों के तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित करते हुये धर्म के अवैज्ञानिक प्रभाव के उन्मूलन पर बल देती है। इस विचारधारा पर आधारित परिवर्तन को धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया को इंगित करती है, जिसके अंतर्गत विभिन्न सामाजिक संस्थायें धार्मिक अवधारणाओं की पकड़ या प्रभाव से बहुत हद तक मुक्त हो जाती है। इस तरह धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत प्रतिदिन ....
प्रश्न : आधुनिक पूंजीवाद के उद्भव में, मैक्स वेबर के अनुसार विशिष्ट धार्मिक विचारों की क्या भूमिका है?
(2009)
उत्तर : वेबरकालीन यूरोपीय समाज में धर्म एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसका विश्लेषण विभिन्न विद्वानों द्वारा अलग-अलग संदर्भों में किया गया था। एक तरफ, मार्क्स ने समाज की अर्थव्यवस्था को समाज के अधोसंरचना के रूप में स्वीकार करते हुये धर्म को अर्थव्यवस्था द्वारा निर्धारित माना और इसे स्वामी अथवा पूंजीपति वर्ग के हितों का संरक्षण करने वाला तथा परिवर्तन विरोधी संस्था के रूप में व्याख्यायित किया। दूसरी तरफ, दुर्खीम ने धर्म का प्रकार्यवादी विश्लेषण प्रस्तुत किया और ....
प्रश्न : “धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, विज्ञान के बिना धर्म अंधा है।“ यूरोप, यू.एस.ए. और भारत में उभरते हुये समाजशास्त्रीय संदर्भों के प्रकाश में, इस कथन पर समालोचनात्मक टिप्पणी कीजिये।
(2009)
उत्तर : धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास एवं उनसे जुड़े कर्मकांडों की एक व्यवस्था है, जबकि विज्ञान तथ्यों पर आधारित ज्ञान है, जो निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग और वर्गीकरण की वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्राप्त होता है। धर्म और विज्ञान दोनों ही मानव समाज की प्रमुख संस्था है और समाजशास्त्र में दोनों के बीच अवधारणात्मक स्तर पर कई भेद किये जाते हैं, जैसेः
प्रश्न : समाजशास्त्रीय अध्ययनों में प्रतिचयन का क्या महत्व होता है? सरल यादृच्छिक प्रतिचयन और स्तरित यादृच्छिक प्रतिचयन के बीच विभेदन कीजिए।
(2008)
उत्तर : समग्र में से कुछ इकाइयों को अध्ययन हेतु प्रतिनिधि के रूप में चुनाव प्रतिचयन कहलाता है। प्रतिचयन सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षण की आधारशिला है। किसी भी प्रकार का अध्ययन करने से पूर्व अनुसंधानकर्ता यह तय करता है कि वह समूह के सभी सदस्यों से संपर्क स्थापित कर तथ्यों का संकलन करेगा या उनमें से कुछ सदस्यों को प्रतिनिधि के रूप में चुनकर उनका अध्ययन करेगा। इस प्रकार क्षेत्र से अनुसंधान सम्बन्धी आंकड़े दो प्रकार से ....
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान में परिकल्पनाओं का महत्व और उनके स्रोत
(2008)
उत्तर : किसी भी अनुसंधान और सर्वेक्षण की समस्या के चुनाव के बाद अनुसंधानकर्ता समस्या के बारे में ‘कार्य-कारण सम्बन्धों’ का पुर्वानुमान लगा लेता है या पूर्व चिंतन कर लेता है, यह पूर्व चिन्तन ही परिकल्पना कहलाती है। अतः स्पष्ट है कि अनुसंधान में परिकल्पना का बहुत महत्व है। गुडे एवं हाट के अनुसार, अच्छे अनुसंधान में परिकल्पना के अभाव में निश्चयात्मक निष्कर्ष प्राप्त करना कठिन है।
इसके अभाव में अध्ययनकर्ता अपने मार्ग से भटक सकता है, इसी ....
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता और मूल्य तटस्थता।
(2004)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान के अंतर्गत हम विभिन्न सामाजिक समस्याओं के विभिन्न पहलुओं की खोज करते हैं। वस्तुनिष्ठता अनुसंधान विधि की अवलोकन, प्रायोगिक एवं तुलनात्मक पद्धति पर आधारित होती है। साथ ही वस्तुनिष्ठता के अंतर्गत सामाजिक तथ्यों का सामान्यता का योगदान होता है। परंतु वास्तविकता यह है कि सामाजिक घटनाएं किसी मूर्त घटना पर आधारित न होकर अमूर्त घटनाओं पर आधारित होती हैं। समाजशास्त्र के अंतर्गत व्याख्या करने वालों को मुख्यतः हम दो उपागमों के अंतर्गत व्याख्या ....
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता और मूल्य-उदासीनता की समस्या पर प्रकाश डालिए। सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में मापन के साधनों से जुड़ी परिसीमाओं की, उपयुक्त उदाहरण देते हुए विशद् व्याख्या कीजिए।
(2003)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान में वस्तुपरकता आवश्यक है। वस्तुपरकता और मूल्य-उदासीनता के अभाव में सामाजिक अनुसंधान को वैज्ञानिकता की ओर ले जाना असंभव है। सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता और मूल्य-उदासीनता की समस्या की विवेचना हम निम्नलिखित रूप में कर सकते हैः
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान में विश्वसनीयता एवं वैधता की उपयोगिता
(2003)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान सामाजिक जीवन एवं घटनाओं को जानने का प्रयास है। अतः सामाजिक जीवन एवं घटनाओं को उद्घाटित करना ही सामाजिक अनुसंधान की मूल आत्मा है। सामाजिक अनुसंधान में हमें नवीन ज्ञान तो प्राप्त होता ही है, साथ ही ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है, जिस पर विश्वास किया जा सके। इस ज्ञान का परीक्षण और पुनः परीक्षण भी किया जा सकता है। जैसेयदि किसी व्यक्ति से वैश्यावृत्ति का कारण पूछा जाय तो शायद वह एक ....
प्रश्न : सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता की समस्याएं
(2000)
उत्तर : सामाजिक अनुसंधान के अंतर्गत हम विभिन्न सामाजिक समस्याओं के विभिन्न पहलुओं की खोज करते हैं। जहां तक वस्तुनिष्ठता की बात है तो यह वास्तव में अनुसंधान विधि की अवलोकन, प्रयोगिक एवं तुलनात्मक पद्धति पर आधारित होती है। साथ ही वस्तुनिष्ठता के अंतर्गत सामाजिक तथ्यों की सामान्यता का योगदान होता है। वास्तव में सामाजिक घटनाएं किसी मूर्त घटना पर आधारित नहीं होता है, बल्कि यह अमूर्त घटनाओं पर आधारित होता है जिसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं ....
प्रश्न : आधार-सामग्री संग्रह की तकनीकी के रूप में प्रश्नावली की परिसीमाएं
(1999)
प्रश्न : प्रतिदर्श की विश्वसनीयता।
(1998)
उत्तर : प्रतिदर्श निश्चित रूप में एक उपयोगी प्रविधि है। इसकी विश्वसनीयता की जांच का अवलोकन हम निम्नांकित बिंदुओं में कर सकते हैं: