प्रश्न : सामाजिक स्तरीकरण की माक्सीर्य एवं वेबरियन थियोरियों में विभेदन कीजिए।
(2015)
उत्तर : सामाजिक स्तरीकरण की प्रकृति सामाजिक है। सामाजिक सरलीकरण व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है। इसे सम्पूर्ण समाज की भूमिका में देखा जाना चाहिए। सामाजिक स्तरीकरण के सन्दर्भ में मार्क्स एवं बेवर ने अपने अपने विचार दिये। कहीं पर दोनों में समानताएं नजर आती हैं तो कहीं पर असमानताएं।
मार्क्स के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण के दो वर्ग हैं- पहला उत्पादन के साधन एवं संपत्ति के साथ समान संबंध रखने वाले व्यक्तियों का समूह वर्ग कहलाता है। यही ....
प्रश्न : ‘‘कोई भी समाज न तो पूर्णतः खुला हो सकता है न ही पूर्णतः बंद।’’ टिप्पणी करें
(2015)
उत्तर : व्यवहारिक रूप में कोई भी समाज न तो पूर्णतया खुला हो सकता है और न ही पूर्णतया बंद। जाति व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था के बन्द प्रारूप के रूप में देखा जाता है जिसमें प्रस्थिति का निर्धारण जन्म से होता है। फलतः इस प्रस्थिति में परिवर्तन होना अत्यन्त कठिन होता है जबकि वर्ग व्यवस्था को खुले प्रारूप के रूप में देखा जाता है जिसमें प्रस्थिति कर्म के आधार पर निर्धारित होती है अर्थात व्यक्ति अपने गुणों ....
प्रश्न : लिंग (जेंडर) से आप क्या समझते हैं? वह किस प्रकार ‘पुरुष’ की पहचान को आकृति प्रदान करती है?
(2014)
उत्तर : लिंग को सामाजीकरण के एक आधार के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा कोई समाज नहीं है, जिसमें सामाजिक जीवन के कुछ पक्षों में पुरुषों के पास महिलाओं से अधिक धन-संपत्ति, हैसियत और प्रभाव न हों। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट (1980) में कहा गया है कि ‘महिलाओं की जनसंख्या विश्व में आधी है, जो विश्व के पूरे काम का लगभग दो-तिहाई करती है। विश्व की आय का 1/10 भाग प्राप्त करती है और ....
प्रश्न : ‘‘मैक्स वेबर के अनुसार, ‘वर्ग’ तथा ‘प्रस्थिति’ शक्ति के दो विभिन्न आयाम हैं।’’ विवेचना कीजिए।
(2014)
उत्तर : प्रस्थिति समूह की अवधारणा सर्वप्रथम मैक्स वेबर द्वारा प्रस्तुत की गई। ऐसे समूह से उनका तात्पर्य जर्मन समाज में मौजूद जुन्कर्स, उद्योगपतियों और सरकारी कर्मचारियों के सामाजिक प्रस्थिति को प्रदर्शित करने से था।
बेबर के अनुसार, प्रस्थिति समूह, व्यक्तियों द्वारा निर्मित ऐसा समूह है, जिनकी एक समान सामाजिक प्रतिष्ठा हो, एक समान जीवनशैली तथा सामाजिक पहचान हो। वर्ग के विपरीत प्रस्थिति समूह के सदस्य हमेशा अपनी सामाजिक प्रस्थिति के प्रति सजग रहते हैं। मैक्स वेबर के ....
प्रश्न : समाजों की नई सोपानिक सामाजिक व्यवस्था के उदय में स्तरण की मुक्त एवं नियंत्रित पद्धतियां किस प्रकार रूपांतरित हो रही हैं?
(2013)
उत्तर : सामाजिक स्तरीकरण समाज का कम से कम तीन स्तरों में विभाजन है जो स्तर एक या दूसरे से सार्थक आधार पर असमान होते हैं। ये सार्थक आधार अनेक हैं: जैसे उत्पादन के साधनों पर असमान नियंत्रण शक्ति का असमान वितरण, बुद्धि, शिक्षा और ज्ञान की असमान उपलब्धता, अलग-अलग प्रकार के व्यवसाय एवं जीवन शैली। सामाजिक स्तरीकरण को यूरोप में अधिकतर वर्ग विभाजन कहते हैं। सामाजिक स्तरीकरण शब्द संयुक्त राज्य अमेरिका में अधिक लोकप्रिय है। समाजशास्त्र ....
प्रश्न : समाजों में लोगों के सामाजिक रूप से अपवर्जित हो जाने और स्वयं ही अपने को सामाजिक रूप से अपवर्जित कर देने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
(2013)
उत्तर : भारत में गतिशीलता के अवरोधों के कारण भारत को बंद गतिशीलता वाला समाज कह दिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि जाति व वर्ग दोनों में अन्तर गतिशीलता का है। वर्ग तीव्रता से गतिशील होता है तथा जाति अत्यन्त धीमेपन से परिवर्तित होती है। अर्थात वे व्यक्ति समाज की धारा संस्कृति, आचार विचार को आत्मसात करने में पिछड़ जाते हैं, सामाजिक रूप से वे अपवर्जित हो जाते हैं, ये अपवर्जन की क्रिया उनके अन्दर ....
प्रश्न : सामाजिक स्तरण के विश्लेषण के प्रसंग में कार्ल मार्क्स तथा वेबर के दृष्टिकोणों में क्या अन्तर है?
(2013)
उत्तर : सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धान्तों से आशय उन विषयों, प्रक्रियाओं व मान्यताओं से है, जिनके आधार पर विश्व के समाजों में स्तरीकरण होता आया है। कुछ इसे संघर्ष का परिणाम मानते हैं, कुछ विद्वान स्तरीकरण समाज की व्यवस्था में प्रकार्यवादी मानते है तथा कुछ अन्य उन विशेषताओं का वर्णन करते हैं जिनके आधार पर स्तरीकरण की आवश्यकता होती है। स्तरीकरण के सिद्धान्तों में दो सिद्धान्त प्रमुख हैं-
संघर्षवादी सिद्धांत तथा प्रकार्यवादी सिद्धान्त
संघर्षवादी सिद्धांत के प्रमुख समर्थक व ....
प्रश्न : वर्गों का स्तरीकरण
(2012)
उत्तर : वर्ग व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण का सबसे प्रचलित स्वरूप है, जो आधुनिक समाजों में स्तरीकरण का सर्वाधिक प्रचलित व लोकप्रिय आधार है, जो दुनिया के प्रायः सभी समाजों में देखने को मिलता है।
सामाजिक स्तरीकरण का तात्पर्य जहां समाज को एक क्रमबद्ध स्तरों में विभाजित करना है ताकि व्यवस्था का संचालन सही रूप से सम्पन्न किया जा सके।
परंपरागत भारतीय समाज में स्तरीकरण का आधार जाति रहा है, जो आनुवांशिकता पर आधारित एक प्रदत्त प्रस्थिति प्रदान करता था। ....
प्रश्न : सांस्कृतिक-पिछड़ का सिद्धांत-ऑगर्बन एवं निमकॉक
(2012)
उत्तर : डब्ल्यू-एफ-आगबर्न ने 1922 में प्रकाशित अपनी पुस्तक सोशल चेन्ज में सांस्कृतिक-पिछड़ापन या विलम्ब की अवधारणा को प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी समाज की संस्कृति के दो पक्ष होते हैं- भौतिक तथा अभौतिक पक्ष। तकनीकी विकास हमारी संस्कृति के भौतिक पक्ष में तीव्र परिवर्तन लाता है। परन्तु गैर-भौतिक पक्ष सामंजस्य स्थापित करने में असफल रह जाते हैं या वे सांस्कृतिक रूप से पिछड़ जाते हैं।
हम आसानी से देख सकते हैं कि संस्कृति के ....
प्रश्न : हमारे समाज में सोपानीय संबंध सामाजिक गतिशीलता से प्रभावित होते हैं। व्याख्या करें कैसे?
(2012)
उत्तर : प्राचीन काल से ही भारतीय समाज एक स्तरीकृत समाज रहा है और इस स्तरीकरण का आधार रही है- जाति व्यवस्था। जाति-व्यवस्था विभिन्न जातियों को उनकी शुचिता एवं प्रदूषण के आधार पर एक सोपानक्रम में व्यवस्थित करती है। इस सोपान क्रम में उच्च सोपान क्रम पर स्थित जातियों की सामाजिक प्रस्थिति उच्च होती थी तथा निम्न सोपान पर स्थित जातियों को कई प्रकार की सामाजिक निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था।
जाति अपने सदस्यों पर कठोर सामाजिक ....
प्रश्न : लिंग (Gender) की समस्या
(2011)
उत्तर : लिंग को सामाजिक स्तरीकरण के एक आधार के रूप में देखा जाता है। ऐसा कोई समाज नहीं है जिसमें सामाजिक जीवन के कुछ पक्षों में पुरूषों के पास महिलाओं से अधिक धन-सम्पत्ति, हैसियत और प्रभाव न हो। भोगेन्द्र सिंह के अनुसार, एक श्रेणी के रूप में महिलाएं भारतीय समाज में एक वंचित और भेदभाव के पात्र वाले वर्ग में आती हैं। महिलाओं का इस पुरूष प्रधान शब्दकोश में कहीं काई स्थान नहीं है।
स्त्री-पुरूष के मध्य ....
प्रश्न : वर्ग क्या है? क्या आप सोचते हैं कि वेबर के सामाजिक स्तरीकरण के योगदान मार्क्स से भिन्न हैं?
(2011)
उत्तर : एक वर्ग व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है, जिनकी किसी समाज में समाज प्रस्थिति पद स्तर और साझा जीवनशैली होती है। इसकी रचना आनुवांशिक विशेषताओं को छोड़कर किसी भी अन्य आधार पर हो सकती है। मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार वर्ग ऐसे लोगो का एक समूह है, जिनकी उत्पादन की प्रणाली के आधार पर समान प्रस्थिति होती है और जो राजनीतिक शक्ति-संरचना के साथ साझा रूप में जुड़े होते हैं। मार्क्स दो वर्गों की चर्चा करते ....
प्रश्न : सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा का अर्थ बताइए। परिवर्ती प्रतिमान तथा पैराडाइम के मध्य बोधात्मक सामंजस्य क्या है?
(2011)
उत्तर : एक सामाजिक प्रणाली या व्यवस्था की संरचना का निर्माण प्रस्थितियों तथा भूमिकाओं के अन्तसंबंधों द्वारा होता है तथा इस संरचना का कार्य संचालन क्रियाओं तथा अन्तक्रियाओं के प्रतिमानों के रूप में होता है। सामाजिक व्यवस्था से तात्पर्य एक संरचना को निर्मित करने वाली विभिन्न अंगो या इकाईयों को एक निश्चित संबंद्धता से है, जिनमें प्रकार्यात्मक संबंध के आधार पर वह इन इकाइयों को एक निश्चित सूत्र में बांधती तथा इन्हें स्थायी रूप से गतिशील बनाए ....
प्रश्न : सामाजिक गतिशीलता से आपका क्या अभिप्राय है? गतिशीलता के मुख्य साधनों तथा कारणों की व्याख्या कीजिए।
(2011)
उत्तर : सामाजिक स्तरीकरण की इस व्यवस्था में सामान्यतः व्यक्तियों का और कभी-कभी किसी सम्पूर्ण समूह की भिन्न प्रास्थितियों/स्तरों के बीच होने वाले परिवर्तन को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं, अर्थात् सामाजिक गतिशीलता सामाजिक आकाश में प्रस्थित के परिवर्तन का संकेत देती है। उदाहरणस्वरूप किसी गरीब व्यक्ति द्वारा व्यवसाय में सफल होकर अमीर बन जाना या किसी शिक्षक द्वारा चुनाव लड़कर मंत्री बन जाना, सामाजिक गतिशीलता को दर्शाता है।
सामाजिक गतिशीलता की इस व्यवस्था में लोग या तो एक ....
प्रश्न : नृजातीयता एवं विकास
(2010)
उत्तर : नृजातीयता एवं विकासः नृजातीयता एक समूह के लोगों के स्वचेतना से संबंधित है जो सामान्य अनुभव, भाषा, धार्मिक विश्वास, परंपरा, सांस्कृतिक धरोहर आदि पर आधारित है। परंपरागत आधुनिक सिद्धांत में नृजातीयता को एक विकास अवरोधक के रूप में देखा जा सकता है इस विचारधारा के अनुसार जब कोई व्यक्ति नृजातीय पहचान से ग्रसित होता है तब वह अपने आपको राज्य से नहीं जोड़ पाता है।
यह कथन खासकर गरीब राष्ट्रों जैसे-सब-सहारा, दक्षिण एशियाई देशों के ....
प्रश्न : परीक्षण कीजिए कि समाज में नव सोपानिक सामाजिक व्यवस्था के प्रादुर्भाव में स्तरीकरण के मुक्त एवं सवृंत तंत्रें में किस प्रकार से रूपांतरण हो रहा है?
(2010)
उत्तर : यदि वर्तमान में उभरते सामाजिक पदक्रम को देखा जाए तो यह कहना आश्चर्यजनक होगा कि क्या वास्तव में अभी भी समाज में खुला एव बंद स्तरीकरण की प्रक्रिया दो अलग-अलग रूप में कार्य कर रही है? व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो कोई भी समाज पूरी तरह ना खुला होता है और ना ही बंद होता है, यह केवल आदर्श स्वरूप हे जो कभी संभव नहीं हो सकता। वर्तमान समय में दोनों के बीच की ....
प्रश्न : समाजों में सामाजिकता अपवर्जित किए जा रहे लोगों और समाजों में अपने सामाजिकता अपवर्जित करने वाले लोगों के बीच विभेदन कीजिए।
(2010)
उत्तर : सामाजिकता अपवर्जित एक प्रकार की सोच है, जिसका अपना अस्तित्व नहीं है। यह एक सतत् प्रक्रिया है एवं प्रक्रिया में व्यक्ति की स्थिति एक छोर से दूसरे छोर के मध्य गति करती है। गरीब, दबे, विचलित किशोर, अपराधी एवं निम्न जाति के लोग सामाजिकता अपवर्जित की श्रेणी में आते हैं। गरीबी जो मानव जीवन का सबसे खराब अनुभव होता है, समाज में बहुत से अपवर्जिता को जन्म देता है- आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक आदि। ....
प्रश्न : नव आदर्शवादियों और प्रतीकात्मक अन्योन्यक्रियाविदियों के समाजशास्त्र में ‘प्रत्यक्षवाद’ के आलोचक होने के कारणों पर टिप्पणी कीजिये।
(2009)
उत्तर : प्राकृतिक विज्ञान की विधियों के प्रयोग को प्रत्यक्षवाद कहते हैं। सामाजिक तथ्यों के अध्ययन में इनका प्रयोग समाज वैज्ञानिक प्रत्यक्षवाद है। इसकी भी दो धारायें हैं:
(i) प्रत्यक्षवाद तथा(ii) नव प्रत्यक्षवाद।
प्रत्यक्षवाद वास्तव में आदर्शवाद का विकल्प है। समाज के विषय में चिंतन हर काल में होता रहता है, लेकिन ऐसे चिंतन हमेशा तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित नहीं रहता है। कुछ नैतिक आदर्शों, कल्पना और पूर्वाग्रहों से प्रेरित सामाजिक चिंतन आदर्शवाद है। इस प्रकार के चिंतन ....
प्रश्न : सामाजिक स्तरीकरण की किंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर की थियोरी को एक प्रकार्यात्मक थियोरी कहे जाने के क्या कारण हैं?
(2009)
उत्तर : डेविस एवं मूर से पहले मार्क्सवादी विचारधारा की मान्यता थी कि सामाजिक स्तरीकरण समाज की अस्थायी विशेषता है, जिसको समाज के स्वामी वर्ग द्वारा उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के आधार पर निर्मित किया गया है और जो समाज में असमानता, तनाव, शोषण एवं संघर्ष को उत्पन्न करके समाज के लिए दुष्प्रकार्यकारी भूमिका अदा करती है। मार्क्स के विचारों के विपरीत डेविस एवं मूर ने सामाजिक स्तरीकरण की घटना को प्रकार्यवादी मान्यताओं के संदर्भ में ....
प्रश्न : मुक्त और संवृत तंत्रें में सामाजिक गतिशीलता।
(2008)
उत्तर : गतिशीलता का अर्थ होता है परिवर्तन। यह परिवर्तन जब मनुष्य के सामाजिक पदों में होता है तो उसे सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। मोटे तौर पर सामाजिक गतिशीलता में व्यक्ति या समूह की प्रस्थिति में अंतर आ जाता है। इस व्यवस्था में लोग या तो एक प्रस्थिति से दूसरी प्रस्थिति में समान स्तर पर या फिर व्यक्तिगत गुणों के खोने या पाने पर ऊपर से नीचे या ऊपर की ओर आते-जाते हैं।
उनकी इस गतिशीलता की मात्र ....
प्रश्न : स्व से मीड का अभिप्राय।
(2008)
उत्तर : समाजशास्त्री और अन्तः क्रियावादी विचारकों ने व्यक्ति और समाज के मध्य सम्बन्ध को व्यक्ति की चेतना से जोड़ा है। इनके अनुसार सामाजिक संरचना व्यक्ति की चेतना में बनती-बिगड़ती तथा परिवर्तित होती हैं। इन्होंने समाजशास्त्र में एक नवीन परम्परा का आरम्भ किया, जो सामाजिक अन्तःक्रियावाद के नाम से जानी जाती है। मीड ने समाज को व्यक्ति की चेतना में निर्मित प्रक्रिया के रूप में देखा तथा व्यक्ति के ‘स्व’ एवं समाज के उद्भव और विकास की ....
प्रश्न : उर्ध्वाधर सामाजिक गतिशीलता।
(2006)
उत्तर : सामाजिक गतिशीलता से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह का सामाजिक स्तरण में स्थान परिवर्तन से है। यह स्थान परिवर्तन पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, धन, आदि की प्राप्ति या उसके ह्रास के कारण होता है। सर्वप्रथम सोरोकिन ने दो प्रकार की सामाजिक गतिशीलता की चर्चा की हैः
क्षैतिज गतिशीलता में व्यक्ति के व्यवसाय, स्थान आदि में परिवर्तन होता है, परंतु सामाजिक स्तरण में उसकी स्थिति अपरिवर्तित रहती है। जबकि उर्ध्वाधर गतिशीलता में व्यक्ति के मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा आदि ....
प्रश्न : सामाजिक संरचना के एक सिद्धांत के रूप में जाति- व्यवस्था।
(2006)
उत्तर : परम्परागत भारतीय सामाजिक संरचना जाति-व्यवस्था पर आधारित है। जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज को एक संस्तरण में विभाजित कर दिया है। जाति-व्यवस्था भारतीय समाज की एकमात्र विशेषता है। जाति एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसकी सदस्यता जन्मजात होती है। प्रत्येक जाति का एक नाम और एक व्यवसाय होता है। दत्ता, धैर्य आदि ने जाति की निम्नलिखित विशेषताएं बतायीं:
प्रश्न : समाज में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता किस प्रकार से समस्याजनक होती है? हल सुझाइए।
(2005)
उत्तर : समाज में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता के समस्यात्मक पहलु से पूर्व यह आवश्यक है कि दोनों शब्दों का अर्थ स्पष्ट किया जाए।
क्षैतिज सामाजिक गतिशीलताः जब किसी संस्तरित व्यवस्था में संक्रमण के कारण परिस्थिति एवं भूमिका दोनों में परिवर्तन आ जाता है, तब इसे समस्तरी या क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। इस प्रकार की गतिशीलता के कारण सामाजिक वर्ग की प्रस्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है। यह व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति में होने वाला ....
प्रश्न : समाज में शक्ति के अभिजात्य और शक्ति संरचना में नव आभिजात्य का उदय
(2005)
उत्तर : अमेरिका के शासक अभिजनों के संदर्भ में सी.डब्ल्यु.मिल्स ने इस अवधारण का विकास किया और इसी नाम से सन् 1956 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी। मिल्स के विश्लेषण के अनुसार, ये ऐसे अभिजन होते हैं जिनमें व्यापार, सरकार और सेना के अगुवा लोग सम्मिलित होते हैं। ये लोग समान सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण आपस में बंधे होते हैं। यही नहीं, इन तीनों वर्गों में आपस में अदला-बदली भी होती रहती है। मिल्स की इस पुस्तक ....
प्रश्न : सामाजिक स्तरण पर द्वंद्व परिप्रेक्ष्य पर संक्षेप में चर्चा कीजिए और इस विचार का परीक्षण कीजिए कि भारत में सामाजिक असमता, दृढ़ सामाजिक स्तरण प्रणाली का फलन है।
(2004)
उत्तर : कार्ल मार्क्स ने अपने वर्ग संघर्ष की विचारधारा के आधार पर सामाजिक स्तरण को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक साम्यवादी घोषणापत्र में लिखा है। आज तक अस्तित्व में रहे समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है। अर्थात् प्रत्येक काल में वर्ग रहे हैं और उनके बीच निरंतर संघर्ष रहा है। स्वतंत्र लोग व दास, कुलीन व अकुलीन, सामन्त और अर्ध दास, अत्याचारी व पीडि़त, ये सभी वर्ग विभिन्न कालों में ....
प्रश्न : ‘सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में समाजीकरण और सामाजिक नियंत्रण एक-दूसरे के पूरक होते हैं।’ उपयुक्त उदाहरणों के साथ अपने उत्तर को सुस्पष्ट कीजिए।
(2004)
उत्तर : टॉलकॉट पारसंस, आर.के. मर्टन, डेविस, स्मेलसर इत्यादि प्रकार्यवादियों ने सामाजिक व्यवस्था को दो स्तरों पर देखने का प्रयास किया है- एक संरचना के स्तर पर और दूसरा प्रकार्य के स्तर पर। इस आधार पर यह कहा जा सकता है समाजीकरण एक गत्यात्मक प्रक्रिया से संबेंधित है जबकि सामाजिक नियंत्रण प्रकार्यात्मक संरचनात्मक आधार से संबंधित है। परंतु इस तथ्य से अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि समाजीकरण और सामाजिक नियंत्रण दोनों मिलकर सामाजिक व्यवस्था के ....
प्रश्न : सामाजिक असमानता और सामाजिक स्तरण के बीच संकल्पनात्मक विभेद का परीक्षण कीजिए। सामाजिक स्तरण तंत्र की प्रकृति और रूप किस प्रकार सामाजिक गतिशीलता के प्रारूपों का निर्धारण करते हैं?
(2003)
उत्तर : सामाजिक स्तरण समाज मे मौजूद असमानता का एक पहलू है। सभी समाजों में सामाजिक व्यवस्थाओं में उत्पन्न असमानताएं मौजूद रहती हैं। प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में सुविधा, शक्ति और प्रतिष्ठा के आधार पर निर्मित श्रेणियों तथा स्तरों का अस्तित्व पाया जाता है। सुविधा तथा शक्ति के उपयोग के दृष्टिकोण से इन विभिन्न स्तरों का सामाजिक संरचना में स्थानक्रम निर्धारित होता है। जिनके पास अधिक सुविधा और शक्ति होती है, उनका सामाजिक स्तर ....
प्रश्न : सामाजिक स्तरीकरण सिद्धान्त से संबंधित मेलविन टयुमिन की समीक्षा कीजिए।
(2002)
उत्तर : मेलविन टयुनिम मुख्यतः डेविस एवं मूरे की सामाजिक स्तरीकरण सिद्धान्त की आलोचना के लिए प्रसिद्ध हैं। ट्युमिन ने मूरे के प्रकार्यात्मक सिद्धान्त को स्थिति पर आधारित प्रकार्यात्मक महत्व के मापन पर प्रश्न किया है। डेविस एवं मूरे ने अपने सिद्धान्त में यह तथ्य निरूपित किया है कि उच्चतर श्रेणी की पुरस्कृत स्थिति निश्चित रूप से अधिक महत्वपूर्ण है। परंतु, इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि बहुत से व्यवसाय निम्न प्रकार ....
प्रश्न : सैक्स एवं जेंडर में विभेद कीजिए। जेंडर मुद्दों की उपयुक्त उदाहरणकें सहित विवेचना कीजिए।
(2002)
उत्तर : वास्तव में सैक्स एवं जेंडर दोनों एक ही विषयवस्तु की ओर इंगित करते हैं जिससे यह विरोधाभास पैदा हो जाता है कि दोनों समान हैं परंतु ऐसा नहीं है। दोनों का उपागम एवं क्षेत्र, सामाजिक धरातल पर काफी भिन्न हैं। मुख्यतः सैक्स को जीवशास्त्रीय माना जाता है एवं जेंडर को सांस्कृतिक माना जाता है। अतः सैक्स की विषय-वस्तु को हम जीव विज्ञान/विज्ञान से संबंधित कर सकते हैं परंतु जेंडर पूर्णरूपेण सांस्कृतिक है, जो संस्कृति के ....
प्रश्न : सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक परिवर्तन।
(2002)
उत्तर : सामाजिक गतिशीलता एवं सामाजिक परिवर्तन एक-दूसरे के साथ काफी अंतःसम्बंधित हैं। सामाजिक गतिशीलता के फलस्वरूप ही किसी समाज में सामाजिक परिवर्तन आता है। बिना सामाजिक गतिशीलता के सामाजिक परिवर्तन की कल्पना करना भी व्यर्थ है।
सामाजिक गतिशीलता में समाज में किसी समूह, परिवार एवं व्यक्ति के द्वारा जब एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति में परिभ्रमण हो जाता है। यह गतिशीलता मुख्यतः क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर (Horizontal & Vertical) होती है।
क्षैतिज गतिशीलता में कोई व्यक्ति अपनी ....
प्रश्न : आधुनिक समाज में लैंगिक भूमिकाओं का उभरता प्रारूप
(2001)
उत्तर : आधुनिक समाज में स्त्री-पुरुष के बीच असमानता की प्रवृत्ति घटती जा रही है। वर्तमान समय में चेतना, शिक्षा का बढ़ता स्तर एवं आधुनिकता का स्तर का प्रभाव लैंगिक भूमिकाओं में काफी परिवर्तन लाया है। परंतु दूसरी ओर इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जहां पर सामाजिक संरचना ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है वहां इसका प्रभाव कम ही देखने को मिलता है। नगरों में आधुनिकता के प्रभाव के फलस्वरूप बहुत ही ....
प्रश्न : अंतःपीढ़ी गतिशीलता।
(2000)
उत्तर : अंतःपीढ़ीय संघर्ष मुख्यतः परिवार में बच्चों और माता-पिता के बीच संघर्ष, शिक्षा संस्थाओं में छात्रों और शिक्षकों के बीच संघर्ष, कार्यालयों में पुराने और नये कर्मचारियों के बीच संघर्ष के रूप में देखा जाता है। युवा वर्ग को पुरानी पीढ़ी के साथ संघर्ष और उनके विरुद्ध खड़े होने के प्रेरक तत्वों में प्रमुख हैं- पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव, मनोरंजन के वाणिज्यिक साधनों के लिए मूल्य, बढ़ता खाली समय तथा माता-पिता की अधिक समृद्धि और शक्ति। ....
प्रश्न : सामाजिक गतिशीलता की प्रकृति और अभिलक्षणों पर चर्चा कीजिए। क्या सामाजिक गतिशीलता की प्रकृति और दर को आर्थिक विकास का एक सूचक माना जा सकता है? टिप्पणी कीजिए।
(1999)
उत्तर : किसी समाज की सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था में, सामान्यत व्यक्तियों और कभी-कभी किसी सम्पूर्ण समूह की भिन्न पद-प्रस्थियों के बीच होने वाले संक्रमण/परिवर्तन को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। साधारण अर्थों में आय के बढ़ने या घटने के कारण किसी व्यक्ति का एक वर्ग से दूसरे वर्ग में प्रवेश की स्थिति सामाजिक गतिशीलता को इंगित करती है। सामाजिक गतिशीलता सामाजिक आकाश में पद-प्रस्थिति के परिवर्तन का संकेत देती है।
सामाजिक गतिशीलता को कुछ विद्वानों ने सामाजिक स्थिति ....
प्रश्न : आप स्तरित और अस्तरित सामाजिक स्थितियों के बीच किस प्रकार विभेदन करेंगे? मानव समाज में सामाजिक स्तरण के सर्वव्यापी अस्तित्व के लिए आप क्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करेंगे?
(1999)
उत्तर : सामाजिक स्थिति से हमारा अभिप्राय हमेशा एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के समूह के सामाजिक पद से है। दूसरी तरफ स्तरण से हमारा तात्पर्य समस्त समाज के स्तर पर विभिन्न प्रकार की स्थितियों का श्रेणीबद्ध विभाजन या व्यवस्था से है। स्तरण पूरे समाज को उसकी समग्रता में देखने का प्रयास करता है। स्थिति एवं संस्तरण के निर्धारकों के बीच स्पष्ट फर्क है। वह यह है कि स्तरण के कारक समस्त समाज के विभाजन के कारक ....
प्रश्न : सामाजिक स्तरीकरण के कार्यपरक सिद्धांत का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(1998)
उत्तर : सामाजिक स्तरीकरण के कार्यपरक सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्त्तक किंग्सले डेविस एवं विलबर्ट मूर हैं। इस सिद्धांत के समर्थकों का कहना है कि सामाजिक स्तरण समाज की जरूरतों की उपज है, न की व्यक्तियों की जरूरतों की। साथ ही यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि सामाजिक स्तरीकरण, सामाजिक संगठन के लिए उपयोगी होती है। इस सिद्धांत से संबंधित प्रमुख विचारों को निम्नांकित क्रम में समझा जा सकता हैः
प्रश्न : वर्ग के रूप में जाति।
(1998)
उत्तर : पश्चिमी विद्वानों और विशेषकर ब्रिटिश प्रशासकों और नृजाति-विशेषज्ञों के अनुसार जाति और वर्ग एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। उनकी मान्यता है कि जाति और वर्ग भिन्न प्रकार के सामाजिक स्तरीकरण हैं। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति श्रेणीकृत इकाइयां होती हैं और जाति में समूह श्रेणीकृत होते हैं।
परंतु दूसरी ओर भारतीय समाजशास्त्री यह मानते हैं कि जाति एवं वर्ग एक-दूसरे से संबंधित हैं। जाति और वर्ग दोनों वास्तविक और आनुभाविक हैं। दोनों में अंतःक्रियात्मक और सोपानुगत है ....
प्रश्न : ‘समाजीकरण वह प्रक्रम है जिसके द्वारा हममें से प्रत्येक उस संस्कृति का अर्जन करता है जिसको हम अगली पीढ़ी को संचारित कर देते हैं।’ इस कथन को सविस्तार प्रतिपादित कीजिए और इसकी विभिन्न अवस्थाओं पर चर्चा कीजिए।
(1998)
उत्तर : समाजीकरण एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम समाज के सक्रिय सदस्य बनते हैं। इस प्रक्रिया में समाज के मानदंडों और मूल्यों के आन्तरीकरण के साथ-साथ अपनी सामाजिक भूमिकाओं को सम्पादन करना सीखना दोनों बातें सम्मिलित होती है। इसी प्रक्रिया के द्वारा ‘स्व’ का विकास होता है, अतः कुछ समाजशास्त्रियों ने इसे ‘स्व’ के विकास की प्रक्रिया भी कहा है। इस प्रक्रिया में परिवार, समुदाय और विद्यालय की विशेष भूमिका होती है। यह अविरल ....
प्रश्न : उर्ध्वाधर और क्षैतिज गतिशीलता।
(1998)
उत्तर : सोरोकिन ने सामाजिक गतिशीलता के प्रमुख प्रकारों का उल्लेख किया है- (1) क्षैतिज या समरैखिक सामाजिक गतिशीलता, (2) उदग्र या उर्ध्वाधर या रैखिक सामाजिक गतिशीलता।
क्षैतिज या समरैखिक गतिशीलता में एक व्यक्ति उसी स्तर के एक समूह से दूसरे समूह में गमन करता है। इसे परिभाषित करते हुए गोल्ड एवं कॉब लिखते हैं, ‘बिना सामाजिक वर्ग पद में परिवर्तन किए प्रस्थिति एवं भूमिकाओं के विशेष रूप से व्यावसायिक क्षेत्र में परिवर्तन को क्षैतिज गतिशीलता कहते हैं।’ ....