प्रश्न : समाज के अध्ययन में ऐतिहासिक विधि की प्रासंगिकता की विवेचना कीजिए।
(2015)
उत्तर : समाज एक गतिशील व्यवस्था है इसलिए समाज की संरचना, प्रकार्यों व इसमें हो रहे परिवर्तनों के अतीत की स्थिति को भी जानना आवश्यक होता है।
ऐतिहासिक पद्धति में तथ्यों एवं घटनाओं को आधार बनाकर आधुनिक समाज का अध्ययन करना आसान हो जाता है। जिससे अतीत का क्रमबद्ध वर्णन कर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य स्थितियों का और फिर उनके संबंधों का पता चलता है। समाज में क्रियाशील अनेक शक्तियों का आपसी टकराव परिवर्तन का कारण है ....
प्रश्न : सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता एवं मूल्य निरपेक्षता के अनुरक्षण की समस्याओं का परीक्षण करें।
(2015)
उत्तर : तटस्थ व पक्षपात रहित निरीक्षण द्वारा तथ्यों का उनके वास्तविक रूप में संकलन व विश्लेषण ही वस्तुनिष्ठता है। जब कि मूल्य निरपेक्षता, समाजविज्ञान में स्वंय को सामाजिक मूल्यों से अलग रखकर सामाजिक व्यवहार का अध्ययन अनुभाविक ढंग से करना चाहिए।
सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता की कुछ समस्याएं हैं। प्रथम- अध्ययन/अनुसंधान में अपने को पूर्णतया अलग कर लें क्योंकि जिसका वह अध्ययन कर रहा है वह उस सामाजिक प्रणाली का ही भाग होता है। दूसरा- अनुसंधानकर्ता ....
प्रश्न : मानव व्यवहार को समझने के लिए अप्रत्यक्षवादी कार्यप्रणाली आवश्यक है। विवेचना कीजिए।
(2015)
उत्तर : सामाजिक विज्ञान की विषय वस्तु संस्कृतिपरक होती है। इसलिए वैज्ञानिक कार्यविधि के अन्तर्गत मनुष्य की चेतना को सीमित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति की चेतना के अन्तिम धरातल पर विज्ञान नहीं पहुंच सकता। बाहरी व्यवहार ही ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है और वैज्ञानिक अध्ययन केवल बाहरी व्यवहारों का ही अध्ययन कर पाता है जबकि ये बाहरी व्यवहार मानव की आन्तरिक चेतना से प्रभावित होते हैं जो कि अप्रत्यक्ष होती है। जब ....
प्रश्न : किस प्रकार वस्तुनिष्ठता मूल्य तटस्थता से भिन्न है? प्रणाली विज्ञान पर वेबर के विचारों के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
(2014)
उत्तर : मूल्य वे सांस्कृतिक अथवा व्यक्तिगत धारणाएं एवं आदर्श हैं, जिनके द्वारा वस्तुओं की एक दूसरे के साथ तुलना की जाती है। ये वे व्यवहार के पैमाने हैं, जिनके आधार पर अच्छे-बुरे, अवांछित, सही-गलत आदि का निर्णय किया जाता है। न्याय, स्वतंत्रता, देशभक्ति, अहिंसा, सत्य आदि मूल्यों के कुछ उदाहरण हैं। ये सभी गुण स्वस्थ एवं संतुलित सामाजिक जीवन के लिए अत्यावश्यक हैं। मूल्यों का प्रयोग किसी भी घटना, अनुभव, वस्तु अथवा तर्क के क्रम विन्यास ....
प्रश्न : किस प्रकार जीवनियां सामाजिक जीवन के अध्ययन के लिए उपयोग की जा सकती हैं?
(2014)
उत्तर : सामाजिक जीवन के अध्ययन के लिए समाजशास्त्र में कई दृष्टिकोण विकसित हैं, जैसे प्रत्यक्षवाद, प्रकार्यवाद, संघर्षवाद आदि। समाजशास्त्र दृष्टिकोण अपने-अपने तरीके से समाज का विश्लेषण करते रहे। उपागम का अर्थ है, किसी व्यक्ति द्वारा किसी वस्तु या प्रघटना के देखने का तरीका किसी भी उपागम से कुछ उपयुक्त अवधारणाएं, अध्ययन पद्धतियों, सिद्धांत या कुछ निश्चित तकनीक जुड़ी है। समाजशास्त्र में 4 प्रमुख उपागम का प्रयोग किया गया है-
हालांकि कुछ ....
प्रश्न : सामाजिक प्रघटना के अध्ययन में किस प्रकार ‘व्याख्यात्मक’ विधि ‘प्रत्यक्षवादी’ उपागम से भिन्न है?
(2014)
उत्तर : प्राकृतिक विज्ञान की विधियों के प्रयोग को प्रत्यक्षवाद कहते हैं। सामाजिक तथ्यों के अध्ययन में इनका प्रयोग समाज वैज्ञानिक प्रत्यक्षवाद है- इसकी भी दो धाराएं हैं-
प्रत्यक्षवाद वास्तव में आदर्शवाद का विकल्प है। समाज के विषय में चिंतन हर काल में होता रहा है, लेकिन ऐसा चिंतन हमेशा तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित नहीं रहता है। कुछ नैतिक आदर्शों, कल्पना और पूर्वग्रहों से प्रेरित होकर सामाजिक चिंतन आदर्शवाद है। आदर्शवादी चिंता कोरी कल्पना भी हो ....
प्रश्न : समाजशास्त्रीय अनुशीलन में सकारात्मक दृष्टि की समीक्षात्मक परीक्षा कीजिए।
(2013)
उत्तर : वर्तमान विश्व में अपने ज्ञान को एक नवीन परिप्रेक्ष्य में लाने में समाजशास्त्र केन्द्रीय महत्व रखता है। यह समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है। समाज से हमारा तात्पर्य सभी प्रकार के व्यक्तियों के मध्य पाई जाने वाली सभी प्रकार की संस्थाओं तथा संगठनों से होता है। अर्थात यह सामाजिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करता है।
समाजशास्त्र की आवश्यकता का अनुभव जटिल समाजों व विभिन्न सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए किया गया। कालांतर में इस विज्ञान का महत्व ....
प्रश्न : “सामाजिक तथ्य को वस्तु की तरह निरूपित किया जाता है।“ विवेचना कीजिए।
(2012)
उत्तर : समाजशास्त्र को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने तथा इसकी विषय-वस्तु की सीमाओं को पारिभाषित तथा निर्धारित करने में फ्रांसीसी समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम का महत्वपूर्ण स्थान है। दुर्खीम का मानना था कि समाजशास्त्रियों को पद्धतिशास्त्र के रूप में सामाजिक तथ्यों की वस्तु के रूप में अनुभवजन्य अन्वेषण की वस्तुपरक प्रणाली विकसित करनी चाहिए। समाजशास्त्र की व्याख्यात्मक विधि को मनोविज्ञान से भिन्न सिद्ध करने हेतु दुर्खीम ने सुझाव दिया कि समाजशास्त्र को समाज के वृहत्त स्तर विश्लेषण पर ....
प्रश्न : तथ्य, मूल्य और वस्तुनिष्ठता
(2012)
उत्तर : समाजशास्त्र के अन्तर्गत सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है और यह अध्ययन तथ्यों पर आधारित होता है। इस प्रकार वह घटना जो वास्तविक रूप में घटित हुई हो तथा जिसे सत्यापित किया जा सके, तथ्य कहलाता है। यह मूर्त तथा अमूर्त दोनों हो सकता है, जिसका वास्तविक निरीक्षण या अनुभव संभव एवं जिसकी पुनः परीक्षण या जांच संभव है। समाजशास्त्र में सिद्धान्त निर्माण हेतु आवश्यक कच्चा माल के रूप में तथ्य उपयोगी होते ....
प्रश्न : विश्वसनीयता का प्रामाणिकता
(2011)
उत्तर : किसी भी प्रमाण को तभी विश्वसनीय माना जाता है, जबकि उसके बार-बार प्रयोग करने से एक ही प्रकार के निष्कर्ष निकलते हों, अर्थात् विश्वसनीयता का अंकन नतीजों की एकरूपता से किया जाता है। सामाजिक विज्ञानों में प्रमापन उपकरणों के साथ यह गंभीर समस्या है कि उन्हें जितनी बार प्रयुक्त किया जायेगा, परिणाम हमेशा भिन्न ही आयेंगे। अतः सामाजिक विज्ञानों में प्रमापनों के उपयोग में पुनरावृति की भिन्नता परिणामों में रहेगी, प्रमापन विधि उतनी ही अधिक ....
प्रश्न : तथ्य एवं मूल्य
(2011)
उत्तर : किसी भी कथन को तथ्य (Fact) के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है। तथ्यों के बारे में यह माना जाता है कि वे अस्थायी तौर पर ही सही होते हैं, जबतक उन्हें असत्य करार नहीं कर दिया जाता है। इस प्रकार तथ्य यर्थाथता की एक ऐसी प्रमाण्य घटना हैं जिसकी प्रामाणिकता की पुष्टि आनुभविक आधार पर की जा सकती है। नैतिक या आध्यात्मिक तथ्यों और वैज्ञानिक तथ्यों में अन्तर होता है। वैज्ञानिक तथ्य निरीक्षण ....
प्रश्न : समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के बीच तुलना
(2009)
उत्तर : अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या आर्थिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र को वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं वितरण का अध्ययन भी कहा गया है। इस शास्त्र के द्वारा धन के उत्पादन एवं वितरण और उपभोग से सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। धन से सम्बन्धित मानवीय क्रियाओं या गतिविधियों को अर्थशास्त्र में प्रमुखता देने का कारण यह है कि धन आवश्यकताओं या इच्छाओं की पूर्ति का ....
प्रश्न : धार्मिक जीवन के प्रारंभिक स्वरूप एवं समाज में धर्म की भूमिका के बारे में के विश्लेषण का विवरण दीजिए। आधुनिक औद्योगिक समाजों में वे धर्म के अस्तित्व को कैसे समझाते हैं?
(2007)
उत्तर : इमाइल दुर्खीम का विचार है कि समाज में पायी जाने वाली प्रत्येक संस्था सामूहिक जीवन द्वारा स्वीकार किये गये व्यवहारों और प्रतिमानों का प्रतीक है। धर्म एक सामाजिक तथ्य है और इसमें जो धार्मिक विचार और क्रियाएं पाई जाती हैं, वे समूह की मान्यताओं को अभिव्यक्ति करती हैं। धर्म नैतिक रूप से मानव समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक है।
दुर्खीम ने अपनी पुस्तक में धर्म के स्वरूप और प्रकृति पर प्रकाश डालने का प्रयास किया ....
प्रश्न : सामाजिक तथ्य
(2007)
उत्तर : यह एक अत्यंत जटिल विचार है, जिसमें बाह्यता, बाध्यता और अपरिहार्यता के गुण विद्यमान होते हैं। दुर्खाइम के शब्दों में, एक सामाजिक तथ्य व्यवहार (सोचने-समझने, अनुभव करने या क्रिया सम्पादित करने) का एक भाग है, जो प्रेक्षक की दृष्टि में वस्तुपरक है तथा जिसकी प्रकृति बाध्यता मूलक होती है। सामाजिक संबंध तथा इन्हें नियंत्रित करने वाली प्रथाओं, परम्पराओं, कानून, धार्मिक, विश्वास, व्यावसायिक मान्यताओं की व्याख्या दुर्खाइम ने सामाजिक तथ्य के रूप में की है। दुर्खाइम ....
प्रश्न : समाज में एक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र।
(2007)
उत्तर : इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि विज्ञान क्या है? वस्तुतः विज्ञान एक दृष्टिकोण है। किसी समस्या, परिस्थिति या तथ्य को सुव्यवस्थित ढंग से समझने के प्रयास को हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण कह सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि विज्ञान अपने आप में एक विषय-वस्तु नहीं है, बल्कि विश्लेषण की एक विधि का नाम है। समाजशास्त्र कितना वैज्ञानिक विषय है, इसे हम जॉनसन द्वारा दिये गये चार बिन्दुओं के आधार पर देख सकते ....
प्रश्न : धर्म और विज्ञान।
(2006)
उत्तर : धर्म, मानव का संबंध आलौकिक शक्तियों के साथ जोड़ता है। धर्म न केवल मानव की आंतरिक जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को भी प्रभावित करता है। धर्म आदिम एवं आधुनिक दोनों समाजों में पाया जाता है। धर्म को पारिभाषित करते हुए यह कहा जा सकता है कि धर्म किसी न किसी अति मानवीय, अलौकिक या समाजोपरि शक्ति पर विश्वास है। जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति एवं पवित्रता की धारणा है।
इसके ....
प्रश्न : सिद्धांत और तथ्य
(2002)
उत्तर : किसी भी सामाजिक विज्ञान के लिए दोनों के परस्पर संबंधों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। सिद्धान्त किसी भी विज्ञान/सामाजिक विज्ञान का एक सामान्यीकृत कथन होता है, जो लगभग सभी परिस्थितियों पर लागू किया जा सकता है। दूसरी ओर, तथ्य शाब्दिक रूप से समाज में पाये जाने वाले किसी भी परिस्थिति का सही अवलोकन एवं प्राप्त आंकड़े का सही मूल्यांकन होता है।
परंतु यहां पर सिद्धान्त एवं तथ्य का मतलब समाजशास्त्र में दो प्रकार के ....
प्रश्न : विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र।
(2002)
उत्तर : समाजशास्त्र की परिभाषा समाज के विज्ञान के रूप में हमेशा से दी जाती रही है। जहां तक समाज और विज्ञान का सवाल है तो इसका तात्पर्य यह है कि समाज का अध्ययन व्यवस्थित वैज्ञानिक, विधियों के द्वारा किया जाये। आगस्त कॉम्ट एवं इमाईल दुर्खीम ने समाजशास्त्र की प्रकृति को विज्ञान के रूप में समझने की कोशिश की है। इन्होंने समाजशास्त्र का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से करने की बात की है, जो प्राकृतिक विज्ञानों की विधि ....