न्यायपूर्ण समाज वह है जहाँ विशेषाधिकार कर्तव्य द्वारा संतुलित होता है

महाभारत में एक प्रसंग आता है। हस्तिनापुर का राजसिंहासन केवल शक्ति और अधिकार का प्रतीक नहीं था; उसके साथ प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व का भी भार जुड़ा था। जब अधिकार कर्तव्य से विमुख हो गया, तब राज्य संघर्ष, अन्याय और विनाश की ओर बढ़ा। यह प्रसंग हमें एक शाश्वत सत्य की ओर संकेत करता है कि किसी भी समाज में विशेषाधिकार तभी न्यायसंगत बनते हैं जब वे कर्तव्यों से नियंत्रित और संतुलित हों।

भारतीय संस्कृति में एक लोकप्रिय उक्ति है— "अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।" यद्यपि यह किसी प्राचीन ग्रंथ की प्रत्यक्ष उक्ति नहीं है, किंतु ....

क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |

पूर्व सदस्य? लॉग इन करें


वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |

संबंधित सामग्री