प्रश्न : कृषि भूमि आमूल परिवर्तनवादी के रूप में ज्योतिराव फुले
(2015)
उत्तर : आधुनिक भारत में समाज एवं व्यवस्था परिवर्तन के अग्रदूत रहे ज्योतिराव फुले ने शिक्षा, श्रमिक, जाति उन्मूलन एवं विधवा पुनर्विवाह आदि मुद्दों पर जोर दिया। ज्योतिराव का मानना था कि जब तक राजनीतिक, न्यायिक तथा लोकतांत्रिक तरीके से सभी वर्गों में प्रवाहित नहीं होगा तब तक किसानों को न्याय नहीं मिलेगा। सर्वप्रथम उनके द्वारा दीनबंधु सार्वजनिक सभा का आयोजन किया तथा सत्यशोधक समाज की स्थापना कर ज्यादा से ज्यादा किसानों को जोड़ा गया। जिसका उद्देश्य ....
प्रश्न : भारत में सामाजिक परिवर्तन का विश्लेषण करने में भारतीय परंपरा के आधुनिकीकरण की रूपावली पर चर्चा कीजिए।
(2015)
उत्तर : इस संबोधन के रूप में आधुनिकता और एक प्रक्रिया के रूप में आधुनिकीकरण समाजशास्त्र में सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
आधुनिकता में परिवर्तन तो निहित है किंतु परिवर्तन की दिशा का भी ज्ञान होता है। शाब्दिक क्रम से आधुनिकता परंपरा के विपरीत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उत्तर औद्योगिक काल की देन है। आधुनिकता एक दृष्टिकोण है जिसमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गतिशीलता पाई जाती है। एक सामान्य धारणा आधुनिकता एवं ....
प्रश्न : भारत में समाज को समझने के लिए, जी.एस. घुर्ये का भारतविद्या अभिगम
(2014)
उत्तर : धुरिये ने भारतीय विद्या उपागम पर काफी बल दिया तथा साथ ही साथ दूसरी तरफ क्षेत्र कार्य का भी सहारा लिया। भारतीय विद्या उपागम के संदर्भ में धुरिये के योगदान को निम्न शीर्षकों के अंतर्गत देखा जा सकता है-
प्रश्न : भारतीय परम्पराओं का आधुनिकीकरण
(2014)
उत्तर : भारतीय समाज में पिछले 200 वर्षों में तीव्रतम परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों का प्रारंभ यूरोपीय देशों जैसे पुर्तगाल, फ्रांस और इंग्लैंड के साथ सम्पर्क में आने से हुआ। विशेषतः ब्रिटिश राज्य की स्थापना ने परम्परा पर पुनः विचार करने के लिए प्रबुद्ध भारतीयों को प्रेरित किया अंग्रेजी शिक्षा, नवीन प्रशासनिक व्यवस्था, लिखित व औपचारिक कानून की सर्वोच्चता एवं उसके सम्मुख राजा और रंक की समानता, न्यायिक व्यवस्था, संचार व यातायात के नए-नए साधनों का ....
प्रश्न : आन्द्रे बेताले द्वारा प्रतिपादित ‘‘वर्ग’’ की परिभाषा।
(2013)
उत्तर : आन्द्रे बेताले वर्ग को उन व्यक्तियों का समूह बताते हैं, जिनके आर्थिक हित समान हैं। उनके अनुसार वर्ग शक्ति आर्थिक आधार पर निर्भर करती है तथा अन्य सुविधाएं, शक्तियां, सम्मान आदि आर्थिक पक्ष से प्रभावित होती हैं। समाज स्वयं अपने को वर्गों में विभाजित कर लेता है। प्रत्येक काल में वर्ग पाए जाते रहे हैं। सामंतवाद में दास-स्वामी, कृषक समाज में भू-स्वामी, कृषक और औद्योगिक पूंजीवादी समाज में मालिक तथा श्रमिक पाए जाते हैं, बेते ....
प्रश्न : पाश्चात्यीकरण सम्बन्धी एम.एन.श्री निवास की अवधारणा।
(2013)
उत्तर : पश्चिमीकरण की अवधारणा में मानवतावाद तथा तर्क बुद्धिवाद के मूल्य सम्मिलित हैं। पश्चिमीकरण संस्कृति (विशेषतया ब्रिटिश संस्कृति) के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों को पश्चिमीकरण कहा जाता है।
श्रीनिवास के अनुसार मानवतावाद तथा तर्क बुद्धिवाद ये दोनों मूल्य आधुनिकीकरण की आवधारणा में नहीं पाए जाते, तथा इसी कारण से श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण की अवधारणा को प्राथमिकता प्रदान की है। पश्चिमीकरण को श्री निवास ने तीन स्तरों के आधार पर समझाया है- प्राथमिक स्तर, द्वितीयक ....
प्रश्न : महात्मा ज्योतिबा फूले का सत्यशोधक आन्दोलन।
(2013)
उत्तर : सुधार आन्दोलन जहाँ व्यापक स्तर पर धार्मिक सुधार सम्बन्धित है, वहीं विभिन्न वर्गों के सामाजिक आन्दोलन स्वंय की जाति, जनजाति को जाति सोपान से प्रतिष्ठा प्राप्त करने तथा ब्राह्मणों के एकाधिकार को समाप्त करने से सम्बन्धित है।
पिछड़े वर्गों के उत्थान हेतु चलाये गए आन्दोलन में सत्यशोधक समाज आन्दोलन प्रमुख था। महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणों के विरुद्ध एक सशक्त आन्दोलन चलाया। उन्होंने लड़कियों तथा दलितों के लिए विद्यालय तथा विधवाओं के लिए एक ....
प्रश्न : भारतीय समाज के अध्ययन में द्वन्द्वात्मक उपागम की सीमाएं।
(2012)
उत्तर : भारतीय समाज के विश्लेषण में मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य का प्रयोग मुख्यतः बीसवीं सदी के मध्य में दिखाई पड़ता है। कई सामाजिक वैज्ञानिकों, जैसे- राम कृष्ण मुखर्जी, ए.आर. देसाई, डी.पी. मुखर्जी आदि ने द्वन्द्ववाद के आधार पर भारतीय समाज में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर भारतीय समाज का अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया।
डी.पी. मुखजीर् ने भारतीय परम्परा के इस्लामिक तथा पश्चिमी परम्परा के साथ द्वन्द्व के आधार पर भारतीय समाज की व्याख्या की, तो रामकृष्ण मुखर्जी ने ....
प्रश्न : पश्चिमीकरण तथा भारत में संस्थागत परिवर्तन।
(2012)
उत्तर : एम.एन. श्री निवास ने पश्चिमीकरण की अवधारणा को भारतीय समाजशास्त्र में प्रयोग किया। 150 वर्षों के अंग्रेजी शासन-व्यवस्था के फलस्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति में होने वाले परिवर्तन के लिए इन्होंने ‘पश्चिमीकरण’ शब्द का प्रयोग किया है और यह शब्द औद्योगिक संस्थाएं, विचारधाराएं और मूल्य आदि विभिन्न स्तर पर होने वाले परिवर्तनों को आत्मसात करता है। अंग्रेजों के आगमन के कारण पश्चिमी सभ्यताओं के संपर्क के कारण भारतीय जन-मानस में पश्चिमी मूल्यों का प्रचार-प्रसार हुआ।
आधुनिक ....
प्रश्न : ‘लघु परंपरा’ एवं ‘दीर्घ परंपरा’ की अंतः क्रिया।
(2012)
उत्तर : एक विभिन्नता-युक्त समाज के रूप में भारतीय समाज का निर्माण ऐसे बहुत-से छीटे-बड़े समुदायों से मिलकर बना है, जिनकी परम्पराओं, धार्मिक विश्वासों, कर्मकाण्डों और विचारों में अत्यधिकविविधता पायी जाती है। वास्तव में भारत के प्रत्येक ग्रामीण समुदाय की अपनी कुछ पृथक स्थानीय अथवा लघु परंपराएं हैं, जिनके कारण एक लम्बे समय से उन्होने अपनी सांस्कृतिक पहचान की निरन्तरता को बनाए रखा है। राबर्ट रेडफिल्ड ने भारतीय संस्कृति की इसी जटिलता तथा विविधता को समझने के ....
प्रश्न : औपनिवेशिक भारत में समाज सुधार आन्दोलनों ने भारतीय समाज के आधुनिकीकरण में क्या योगदान दिया है?
(2012)
उत्तर : औपनिवेशिक भारत में समाज सुधार आन्दोलनों का प्रमुख उद्देश्य भारत को सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक दृष्टि से एकीकृत कर भारतवासियों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास करना था। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु विभिन्न सामाजिक सुधार आन्दोलनों के द्वारा भारतीय समाज में मौजूद अंधविश्वासों, कुरीतियों तथा अन्य सामाजिक बुराइयों को दूर करने का यथासंभव प्रयास किया गया तथा इसमें बहुत हद तक सफलता भी मिली। इन आन्दोलनों ने परम्परागत भारतीय समाज को आधुनिक समाज ....
प्रश्न : क्या केन्द्रीय (एकांकी) परिवार परंपरागत भारत में विद्यमान था? आई.पी. देसाई के विचारों के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
(2012)
उत्तर : भारतीय समाज की सबसे छोटी संरचनात्मक इकाई परिवार है। परिवार का निर्माण विवाह की संस्था के द्वारा होता है। परम्परागत भारतीय समाज मूल रुप से संयुक्त परिवार का समाज है। कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार भारतीय परिवार का मतलब ही संयुक्त परिवार है। भारत में परिवार संबंधी अध्ययन करने वालों में आई-पी- देसाई का प्रमुख स्थान रहा है।
देसाई की सबसे बड़ी परिकल्पना यह है कि भारत में जब कभी हम परिवार की बात करते हैं तो ....
प्रश्न : वैश्वीकरण तथा अनौपचारिक क्षेत्र की वृद्धि में सम्पर्क बिन्दु क्या हैं? इन्होंने श्रमिक वर्ग की प्रकृति और प्रकार्यात्मकता को किस प्रकार प्रभावित किया है?
(2011)
उत्तर : राज्य की अर्थनीति के कारण सामाजिक संरचना के व्यवसायों में बहुत बड़ा अन्तर आया है। इस अन्तर को व्यवसायिक विकेन्द्रीकरण कहते हैं। प्रवीण पटेल व एन.आर. सेठ ने समाजशास्त्र और सामाजिक मानवशास्त्र की ट्रेंड रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार परम्परागत व्यवसायों का स्थान आधुनिक व्यवसायों ने ले लिया है और इन सभी आधुनिक व्यवसायों का केन्द्र बिन्दु आय है। अगर प्राथमिक अथवा पारम्परिक अर्थव्यवस्था पर नजर डालें तो बाजार की भूमिका मामूली थी ....
प्रश्न : भारत में सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन के लिये आधुनिकता तथा परम्परा दो अनुपयुक्त ध्रुवताएं हैं। व्याख्या कीजिए।
(2011)
उत्तर : औपनिवेशिक शासन से लेकर आज तक भारतीय समाज में परिवर्तन की व्याख्या के लिये दो प्रतिक्रियाएं प्रयुक्त की जाती है, जिसे क्रमशः परम्पराओं द्वारा आधुनिकीकरण तथा आधुनिकीकरण द्वारा परम्परा का विस्थापन की संज्ञा दी जाती है। प्रथम प्रकार की प्रक्रिया परम्परावादी विचारकों की थी, जो भारतीय परम्परा में निहित तत्वों को श्रेष्ठ मानते थे और विदेशी वस्तु एवं आदर्श को संदेह की दृष्टि से देखते थे। वे मानते थे कि भारत की श्रेष्ठ उपलब्धियां परम्परागत ....
प्रश्न : योगेन्द्र सिंह के अनुसार विषमजीनी अभिलक्षण जिन्होंने भारतीय परंपरा पर प्रभाव डाला था।
(2010)
उत्तर : योगेन्द्र सिंह ने भारत में आधुनिकीकरण के प्रक्रम को दो भागों में व्यक्त किया है- सांस्कृतिक आधुनिकीकरण एंव संरचनात्मक आधुनिकीकरण। योगेन्द्र सिंह के अनुसार भारत में सांस्कृतिक बदलाव या तो वृहद परंपरा वाली संस्कृति से आया या लघु संस्कृति से आया। भारत में वृहद स्तर पर परिवर्तन संस्कृति के प्रभाव से हुआ, यह परिवर्तन विषमजीवी परिवर्तन के द्वारा आया, जिसका प्रभाव राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं तकनीकी आधुनिकीकरण पर पड़ा। भारत में प्रथम विषमजीनी तत्व-जिसका प्रभाव ....
प्रश्न : समकालीन भारतीय समाज में परिवर्तनों को समझने में, संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य कहां तक सहायक है?
(2010)
उत्तर : कोई भी परिप्रेक्ष्य किसी सामाजिक वास्तविकता को व्यवस्थित एवं अर्थपूर्ण ढंग से समझने में एक दिशा निर्देश का कार्य करता है। संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य समाज को व्यवस्थित संरचना के रूप में अध्ययन करता है। यह समाज के विभिन्न संरचनाओं के आंतरिक सम्बन्धों, उनकी गतिशीलता एवं सामाजिक तंत्र को बनाये रखने में उनकी भूमिका आदि का भी अध्ययन करता है।
एम.एन. श्रीनिवास ने अपने अध्ययन कार्यों में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग किया है। श्रीनिवास का मानना है कि ....
प्रश्न : एम.एन. श्रीनिवास और एस.सी. दूबे की भारतीय ग्राम की अपनी-अपनी समझ का उल्लेख करते हुए, उनके परिप्रक्ष्यों की तुलना कीजिए।
(2010)
उत्तर : ग्राम अध्ययन, जिसकी शुरुआत मानवशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास, मैकिम मैरियट, डी.एन. मजूमदार एवं एस.सी. दुबे आदि द्वारा ग्रामीण जीवन के आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलू को संपूर्ण रूप से किया गया था। ग्राम अध्ययन 1950 एवं 1960 के दशक में नये विषय सामाजिक विज्ञान के केन्द्रीय वस्तु भी थे।
श्रीनिवास एवं एस.सी. दुबे का ग्राम अध्ययन भारतीय ग्रामीण समाज हमेशा से भारतीय वृहद समाज का अंग रहा है। इनका यह मत ब्रिटिश समाजशास्त्रियों के मत से बिल्कुल ....
प्रश्न : भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व का ए.आर. देसाई का चरित्रंकन।
(2010)
उत्तर : ए.आर. देसाई मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े होने के कारण किसी भी सामाजिक वास्तविकता को जानने के लिए उसके भौतिक इतिहास की जड़ को खोजते हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सांस्कृतिक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिवाद करते हुए, देसाई स्वतंत्रता आंदोलन को आर्थिक एवं भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखते हैं। देसाई का मानना है कि भारत में अंग्रेजी शासन के आने के साथ भारत के सामंतवादी अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी व्यवस्था का आगमन हुआ। भारत में रेलवे, ....
प्रश्न : नक्सलबाड़ी आंदोलन।
(1999)
उत्तर : फरवरी 1967 में पश्चिम बंगाल में जब कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के सहयोग से संयुक्त मोर्चा सरकार सत्ता में आई, तब कुछ सक्रिय एवं स्थानीय समूहों का उदय हुआ। उनमें से एक चारु मजूमदार तथा कानू सान्याल के नेतृत्व में शुरू किया जिसने कृषक समाज में सशत्रता को विकसित करने पर जोर दिया जिससे किसानों को सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार किया जा सके। प्रारंभ में नेताओं ने बेनामी भूमि पर जबरन कब्जा में कृषकों से ....
प्रश्न : प्रारंभिक-पाश्चात्य प्रभाव के प्रति भारतीय समाज की प्रतिक्रिया
(1998)
उत्तर : भारतीय सामाजिक संस्थाओं की पश्चिमी संस्कृति ने जितना अधिक प्रभावित किया है उसकी तुलना किसी भी दूसरी संस्कृति से नहीं की जा सकती। पश्चिमी संस्कृति की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं भारत के लोगों को अधिक आकर्षित किया। पश्चिमी संस्कृति की यह विशेषताएं हैं- तार्किकता व्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व, समतावादी विचारधारा, मानवीय मूल्यों का महत्व, सामाजिक न्याय तथा भौतिक साधनों में वृद्धि। भारत में जब तक अंग्रेजों का राज्य रहा, हिंदुओं और अंग्रेजों के बीच ....
प्रश्न : कृषि भूमि आमूल परिवर्तनवादी के रूप में ज्योतिराव फुले
उत्तर : आधुनिक भारत में समाज एवं व्यवस्था परिवर्तन के अग्रदूत रहे ज्योतिराव फुले ने शिक्षा, श्रमिक, जाति उन्मूलन एवं विधवा पुनर्विवाह आदि मुद्दों पर जोर दिया। ज्योतिराव का मानना था कि जब तक राजनीतिक, न्यायिक तथा लोकतांत्रिक तरीके से सभी वर्गों में प्रवाहित नहीं होगा तब तक किसानों को न्याय नहीं मिलेगा। सर्वप्रथम उनके द्वारा दीनबंधु सार्वजनिक सभा का आयोजन किया तथा सत्यशोधक समाज की स्थापना कर ज्यादा से ज्यादा किसानों को जोड़ा गया। जिसका उद्देश्य ....