प्रश्न : गांधी एक सदाचारी, तपस्वी एवं कार्यशील व्यक्ति थे। ‘‘हिन्द स्वराज’’ के सन्दर्भ में विश्लेषण कीजिए।
(2015)
उत्तर : गांधी जी के लिए स्वराज्य महज राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं हैं अपितु नैतिक स्वतंत्रता भी है। गांधी जी का मानना था कि अगर हमें नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती, तो बाकी सभी स्वतंत्रताएं स्वमेव प्राप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि हम ब्रिटिश के पैरों तले नहीं अपितु ब्रिटिश शासन/संस्कृति के पैरों तले रौंदे जा रहे हैं। अतः नैतिक स्वतंत्रता को वे पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से मुक्त होकर स्वयं पर आश्रित होना मानते थे। अहिंसा गांधी ....
प्रश्न : मुस्लिम व्यक्तिगत कानून बोर्ड, इस्लामी नारी-अधिकारवादी कार्यसूची से किस हद तक सहमत है?
(2015)
उत्तर : इस्लामी नारी-अधिकारवादी कार्यसूची में परंपरागत इस्लामिक कानूनों का उदार व प्रगतिशील तरीके से दोबारा व्याख्या करने की मांग रखी जाती है जबकि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून बोर्ड एक रूढि़वादी संस्था मानी जाती है जो परंपरागत इस्लामिक कानूनों का समर्थन कर ‘शरीयत’ के अनुसार चलने का आह्नान करती है। दोनों धारणाओं की प्रकृति चूंकि एक-दूसरे के विरूद्ध है इसलिए दोनों के बीच सहमति में काफी द्वन्द्व है। बोर्ड द्वारा कई बार नारी शिक्षा व आधुनिक शिक्षा का ....
प्रश्न : स्वतंत्र भारत में किसान आंदोलनों के मुख्य अभिलक्षणों की व्याख्या कीजिए।
(2015)
उत्तर : स्वतंत्र भारत में किसान आंदोलनों के अपने कुछ मुख्य अभिलक्षण रहे हैं जिन्हें सामान्य रूप से दो भागों में बांट कर देखा जा सकता है। पहले प्रकार के आंदोलन वे हैं जो निर्धन, सीमान्त अथवा छोटे किसानों से संबंधित है। इन आंदोलनों की मुख्य विशेषता यह है कि इनमें उनकी आर्थिक दशा सुधारने से जुड़ी मांगें रखी जाती है जैसे कृषि श्रमिक की अधिक मजदूरी तथा बेहतर कार्य दशा। दूसरे प्रकार के आंदोलन अधिक समृद्ध ....
प्रश्न : भारतीय मध्यम वर्ग पर उत्तर-1970 नारी अधिकारवादी आन्दोलनों प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
(2015)
उत्तर : संसार के सभी देशों में कमोबेश रूप में स्त्री पुरुष की दास रही है। पुरुष की वैयक्तिक सम्पत्ति रही है। चाहे जिस रूप में जैसा चाहे वह उसका प्रयोग कर सकता है। स्त्री समाज की जड़ चेतना ने उसे शताब्दियों तक गुलाम की तरह जीवनयापन करने के लिए विवश किया। उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी और थी भी तो उसे प्रकट नहीं कर सकती थी क्योंकि वह मालिक के अधीन थी। यहां तक कि ....
प्रश्न : भारत में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए सामाजिक सुधारों में से कुछ को लिखिए।
(2014)
उत्तर : अस्पृश्यता का इतिहास भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के इतिहास से जुड़ा हुआ है, क्योंकि यह जाति व्यवस्था के साथ ही हमारे देश में गंभीर समस्या रही है। वैदिक काल में अस्पृश्यता शब्द का प्रयोग तो नहीं किया जाता रहा है। परन्तु चंडाल, डोम, अन्त्यज, निषाद आदि शब्दों का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के लिए किया जाता रहा है, जिनका स्तर लगभग अस्पृश्यों जैसा ही था। उस समय पवित्रता अपवित्रता संबंधी विचारों का प्रमुख स्थान था ....
प्रश्न : समकालीन दलित आन्दोलनों की गत्यात्मकता
(2014)
उत्तर : भारतीय समाज में वे जातियां, जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था में वर्ण-व्यवस्था से बाहर थी, जिन्हें ‘अवर्ण’ अथवा अस्पृश्य माना जाता था, जाति पदानुक्रम में न्यूनतम स्तर पर रखा जाता था और जो कई तरह की निर्योग्यताओं की शिकार थी, को दलित की संज्ञा दी जाती है साथ ही, उनके द्वारा अपनी स्थिति में सुधार हेतु किये गए सामूहिक प्रयास को दलित आंदोलन कहा जाता है।
भारतीय समाज में दलित आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सबसे निचले ....
प्रश्न : भारतीय संदर्भ में, महिला आंदोलन की दूसरी लहर के प्रमुख अभिलक्षण क्या हैं?
(2014)
उत्तर : अंग्रेजी के आगमन के साथ ही भारत में आधुनिक शिक्षा के साथ ही आधुनिक मूल्यों-स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता आदि का प्रसार हुआ जिससे महिलाओं में भी इनके प्रति चेतना विकसित हुई और उन्हें अपनी स्थिति के प्रति वंचना का बोध हुआ। महिला आंदोलन की दूसरी लहर के प्रमुख अभिलक्षण इस प्रकार हैं:
प्रश्न : पारिस्थिति नारी-अधिकारवाद के एक उदाहरण के रूप में ‘चिपको आंदोलन’ पर चर्चा कीजिए।
(2014)
उत्तर : पारिस्थितिकीय पहलू सामान्यतः किसानों, महिलाओं एवं जनजातियों से जुड़ होते हैं जिनकी जीविका मुख्यतः वन, प्राकृतिक संसाधान तथा जलाशयों आदि पर निर्भर होता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात विकास के आधुनिक मॉडल को अपनाया गया और इस दिशा में कई प्रयास किये गये। विकास संबंधी इन क्रियाकलापों ने भारत में भी कई तरह के नवीन पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय समस्याओं को उत्पन्न किया। इसके कारण बहुत से पर्यावरणीय आंदोलन शुरू हो गये। घनश्याम शाह द्वारा भारत में ....
प्रश्न : आधुनिक भारत में किसान आंदोलनों के मुख्य लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
(2013)
उत्तर : भारत में ब्रिटिश शासन काल प्रारंभ से ही किसानों की समस्या बनी रही। ब्रिटिश प्रशासकीय परिवर्तनों के साथ-साथ किसानों की समस्याओं में वृद्धि होती गई।
देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग लगान व्यवस्था के चलते किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। किसानों में गरीबी, ऋणग्रस्तता तथा बेकारी की समस्या बढ़ती गई। परंतु राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भी इस संस्थान ने किसानों की स्थिति पर विशेष ध्यान नहीं दिया। इसका कारण प्रारंभिक कांग्रेस के ....
प्रश्न : अलग राज्यों के आन्दोलन के समाजशास्त्रीय पक्षों का विवेचन कीजिये।
(2013)
उत्तर : स्वतंत्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया। भाषाई आधार पर सर्वप्रथम आंध्र प्रदेश राज्य का गठन किया गया था। विभिन्न क्षेत्रें की मांगों के अनुरूप कालांतर में राज्यों का पुनर्गठन या नये राज्यों का गठन किया जाता रहा है। तेलंगाना से पूर्व वर्ष 2000 में आदिवासी बहुल झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था तथा पहाड़ी जिलों को मिलाकर उत्तराखंड बनाया गया था। नये राज्य के रूप में तेलंगाना के गठन ....
प्रश्न : दलित आंदोलन से क्या अभिप्राय है? इसमें उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों की परीक्षण कीजिए।
(2013)
उत्तर : परंपरागत भारतीय समाज में उच्च जातियों का प्रभुत्व था। दलित तथा पिछड़े वर्गों ने राज्य में सत्ता तथा सामाजिक आर्थिक प्रभुत्व प्राप्त करने का प्रयत्न किया। पिछड़ी जातियों का आंदोलन या तो ब्राह्मणवाद का विरोध था या सुधारवाद पर बल। ब्राह्मणों ने अन्य से अपेक्षाकृत ज्यादा उच्चता प्राप्त करने के साथ-साथ पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के कारण अधिक विशेषाधिकार तथा शक्ति भी अर्जित करनी थी। ब्राह्मण संख्यात्मक दृष्टि से अल्पसंख्यक थे तथा आज भी हैं। ....
प्रश्न : क्या आप समझते हैं कि पर्यावरण से संबंधित कुछ नीतियों एवं कानूनों से विकास प्रक्रिया धीमी हुई है? उदाहरण दीजिए पर्यावरण सुरक्षा एवं विकास के उद्देश्यों के बीच एक आदर्श संतुलन कैसे बनाया जा सकता है?
(2012)
उत्तर : हाल के कुछ वर्षों में विकास एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव ने वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। आज वैश्वीकरण के इस दौर में सभी राष्ट्र अपने संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर अपना आर्थिक विकास करना चाहते हैं। इसी आर्थिक विकास की तीव्र प्रक्रिया के कारण पर्यावरण पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा है। सरकार की नई आर्थिक नीति ने इस प्रक्रिया को और विस्तार दिया है।
किसी भी राष्ट्र के विकास हेतु ....
प्रश्न : भारत में महिला आन्दोलन के चरण
(2011)
उत्तर : भारतीय समाज में ऐतिहासिक रूप से विद्यमान निम्न प्रस्थिति व उनसे जुड़ी समस्याओं के उन्मूलन तथा लिंग समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किये गए संगठित प्रयासों को महिला आन्दोलन की संज्ञा दी जाती है, जिन्हें चार भागों में विभक्त किया जा सकता हैः
प्रथम काल (1901-32) में प्रमुख महिला संगठनों जैसे (WIA) वूमैन इण्डियन एसोसिएशन (1917), नेशनल कांउसिल ऑफ वूमैन (N.C.W.), ऑल इण्डिया वूमैन काफ्रेंस (AIWA) 1927 जैसे संगठनों ने ....
प्रश्न : भारत में कृषक आन्दोलनों पर डी. एन. धनागरे के विचारों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2011)
उत्तर : धनागरे के कृषक आन्दोलनों को उनकी संगठनात्मकता तथा कार्य की प्रकृति के आधार पर विश्लेषित कर कृषक आन्दोलन के बारे में निष्कर्ष दिये हैं। धनागरे ने निष्कर्ष दिया कि भारत में किसान आन्दोलन कभी भी आधार स्तर पर संगठित नहीं रहे हैं।
ये आन्दोलन कई क्षेत्रीय स्तरों जैसे महाराष्ट्र में सेत्कारी संघ, उत्तर भारत में भारतीय किसान यूनियन आदि में विभक्त रहे हैं। कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां आन्दोलन की प्रवृत्ति केवल कुछ एक कारणों ....
प्रश्न : महिला सशक्तिकरण में समकालीन महिला आंदोलनों के योगदान का आकलन कीजिए।
(2010)
उत्तर : 19वीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलन से ही भारत में सामाजिक सुधार आंदोलनों की शुरुआत हुई एवं 21वीं सदी में भी यह विभिन्न रूपों में जारी है, जैसे-संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान, कल्याणकारी कार्यक्रम, स्वयंसेवी संस्थाओं की क्रियाशीलता आदि का प्रभाव वर्तमान महिला आंदोलनों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण रहा है।
राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, डी.के. कर्वे आदि के अथक प्रयासों ने लिंग समानता एवं महिला सशक्तिकरण के लिए मजबूत नींव की शुरुआत की। जिसका परिणाम सती ....
प्रश्न : पृथक राज्यों का निर्माण करने की बढ़ती हुई मांगों के लिए उत्तरदायी कारक।
(2010)
उत्तर : अलग राज्यों के निर्माण एवं कुछ क्षेत्रें का भारतीय संघ से अलग होने की मांग, इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि किस तरह क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता एवं राजनीतिक ढांचा के लिए खतरा बनता जा रहा है। विदर्भ, तेलंगाना एवं ऐसे क्षेत्र, जहां स्वायत्तता एवं अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन काफी दिनों से चल रहा है। साथ ही देश में दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग की भी मांग बढ़ रही है। इस ....
प्रश्न : नृजातीय आंदोलन।
(2010)
उत्तर : सांस्कृतिक एवं नृजातीय विविधता भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता है। भाषा, प्रजाति, धर्म आदि पर आधारित अनेकों नृजातीय बहुलता भारत में पायी जाती है एवं नृजातीय संघर्ष भारतीय राजनीति का प्रमुख भाग बन गया है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया एवं सामाजिक परिवर्तन ने नृजातीय संघर्ष को बढ़ावा देने का कार्य किया है क्योंकि विकास का प्रभाव सभी नृजातीय समूहों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा है।
नृजातीय शब्द का अर्थ एक ही भाषा, प्रजाति, धर्म, ....
प्रश्न : निम्न जातियों में सामाजिक गतिशीलता की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए तथा इस प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने में पिछड़ी जाति आन्दोलन की भूमिका की विवेचना कीजिए।
(2005)
उत्तर : एम.एन. श्रीनिवास ने कहा है कि जब परम्परात्मक भारतीय समाज स्थिर लक्षण वाला था, फिर भी इसने स्थानीय श्रेणी क्रम में जातियों की उर्धवोन्मुखी और अधोन्मुखी गतिशीलता को नहीं रोका। सुरजीत सिन्हा ने भी संकेत किया है कि कई कबीले विजय तथा शक्ति प्राप्ति के बल पर श्रत्तियता का दावा करके शादी स्थिति तक पहुंच गए।
सिलवर वर्ग ने विराग के माध्यम से भारत में सामाजिक गतिशीलता की चर्चा की है। आश्रमों की योजना से संन्यास ....
प्रश्न : आत्म-सम्मान आन्दोलन।
(2005)
उत्तर : पेरियार ई.वी. रामास्वामी ने 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन की शुरूआत की थी। यह आंदोलन मूलतः सामाजिक सुधार आंदोलन के कोटि में रखा जाता है। यह आंदोलन गैर-ब्राह्मण तथा छुआछूत के विरूद्ध चलाये गये थे। इस आंदोलन की मूल बात यह थी कि इसमें ब्राह्मण की उच्चता की प्रवृत्ति को बहिष्कार कर गैर-ब्राह्मण को आत्मसम्मान दिलाना था।
इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-
प्रश्न : भारत में विवाह-आयु पर सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
(2004)
उत्तर : भारत में विवाह की आयु पर वर्तमान समय में बदलती परिस्थितियों के फलस्वरूप निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है और यह प्रभाव मुख्यतः परंपरागत विवाह की संरचना पर पड़ा है जो कुछ वर्ष पहले बाल-विवाह के रूप में समाज में देखने को मिलता था। परंतु आधुनिकीकरण की प्रक्रिया, शिक्षा, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण एवं सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक चेतना ने विवाह की आयु में परिवर्तन कर बाल-विवाह की प्रवृत्ति को समाप्त करने में तो नहीं परंतु बहुत कम ....
प्रश्न : नक्सलबाड़ी आंदोलन के वैचारिक और रणनीतिक अभिलक्षणों का विश्लेषण कीजिए।
(2002)
उत्तर : उत्तर बंगाल के दार्जलिंग जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में पचासवीं दशक से कम्युनिस्टों ने संथाल, उरांव एवं राजवंशी जनजाति लोग जो प्रकृति से sharecroppers एवं चायइस्टेट में लेबर के बीच एक सामाजिक आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन में किसान तथा कृषक मजदूरों ने उन लोगों के विरुद्ध हिंसात्मक संघर्ष किया, जिन्हें वे अपना शोषक मानते थे। यह आंदोलन 1965 में सर्वप्रथम इस क्षेत्र के चारु मजूमदार के नेतृत्व में शुरू किया गया जो पूर्णतः कृषक ....
प्रश्न : दलित चेतना का अविर्भाव।
(2002)
उत्तर : दलित के लिए साइमन कमीशन ने अनुसूचित जाति नामक शब्द 1927 में प्रयोग किया। औपनिवेशिक काल में, अनुसूचित जातियों के लिए सामान्यतया ‘दलित वर्ग’ ‘बाह्य’ जातियां व ‘अस्पृश्य’ जैसी अभिव्यक्तियां प्रयुक्त हुई। गांधी जी ने इन्हें ‘हरिजन’ (ईश्वर के जन) की संज्ञा दी। परंतु 1935 में भारत सरकार अधिनियम के पास होने के उपरांत प्रायः इन्हें अनुसूचित जातियां ही कहा गया है। वास्तविक रूप में, दलित एक सामाजिक प्रस्थिति का शब्द है जब अनुसूचित जाति ....
प्रश्न : भारत में स्त्रियों के लिए विद्यमान कल्याणकारी कार्यक्रमों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। क्या इनसे भारत में स्त्रियों के सभी वर्ग लाभान्वित हुए है?
(2001)
उत्तर : मानव संसाधन विकास मंत्रालय में 1985 में महिला और बाल विकास विभाग का गठन किया गया। इसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के लिए आवश्यक सर्वांगीण विकास की जरूरत को पूरा करना है। यह विभाग देश में महिलाओं और बच्चों की स्थिति में सुधार के लिए कार्य कर रहे सरकारी तथा गैर-सरकारी दोनों तरह के संगठनों के प्रयासों में तालमेल कायम करने के साथ-साथ इस संबंध में योजनाएं, नीतियां और कार्यक्रम तैयार करने तथा कानूनों के ....
प्रश्न : सत्य शोधक समाज।
(2001)
उत्तर : यह समाज पश्चिमी भारत में ज्योतिराव गोविन्दराव फूले ने 1873 में निम्न जातियों के विभिन्न क्षेत्रों में न्याय के लिए स्थापना किया। इस समाज का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गांे को सामाजिक न्याय दिलाने से था।
ज्योतिराव फूले यह समझते थे कि ब्राह्मण लोग धर्म की आड़ लेकर अन्य वर्णों पर अत्याचार करते हैं तथा उन्हें अपना दास बना लेते हैं। ज्योतिबा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं की कमजोर वर्गों के लोगों के हितों ....
प्रश्न : भारत में सुधार आंदोलनों के रूप में आर्य समाज एवं रामकृष्ण मिशन की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
(2001)
उत्तर : भारत में सामाजिक आंदोलन केवल विरोध और असहमति प्रकट करने वाले आंदोलन ही नहीं रहे हैं, बल्कि सुधारात्मक, प्रतिक्रियात्मक के साथ-साथ सामाजिक-धार्मिक और स्वतंत्रता आंदोलन भी रहे हैं। ये आंदोलन जिन्हें ‘परिवर्तन को प्रोत्साहित/विरोध करने के सामूहिक प्रयत्न’ कहा गया है, बौद्धिक विकास, सामाजिक संरचना, वैचारिक वरीयताओं और सत्य के ज्ञान आदि से अस्तित्व में आये। यह सर्वविदित सत्य है कि समाज की विशेषताएं ही आंदोलनों के प्रारूप तैयार करती है। अतः सामाजिक संरचना के ....
प्रश्न : आत्मसम्मान आंदोलन।
(2000)
उत्तर : आत्मसम्मान आंदोलन मूल रूप में व्यक्ति वर्ग अपनी बुरी आदतों और हीनता की भावना का त्याग कर आत्मसम्मानपूर्ण जीवन जीने से संबंधित आंदोलन है। यह आंदोलन दलितों से जुड़ा हुआ है। इस आंदोलन का नेतृत्व करने का श्रेय डा. भीमराव अंबेडकर को जाता है जिन्होंने महार आंदोलन के द्वारा दलितों को विभिन्न क्रियाकलापों में भाग लेने का अवसर प्रदान करवाया था। डा. अंबेडकर ने जाति प्रथा में व्याप्त कुरीतियों का जमकर विरोध किया एवं उच्च ....
प्रश्न : ‘महिलाओं को राजनीतिक और आर्थिक शक्ति प्रदान करना जरूरी है लेकिन भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए यह विधान पर्याप्त नहीं है।’ टिप्पणी कीजिए।
(1998)
उत्तर : भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। यद्यपि पिछली एक शताब्दी में ही स्त्रियों की स्थिति में सुधार करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न होते रहे हैं लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् स्त्रियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में जो परिवर्तन हुआ है, उसे एम.एन. श्री निवास ने पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण और जातीय गतिशीलता को इन परिवर्तनों का प्रमुख कारण माना है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार होने तथा औद्योगिकरण के ....
प्रश्न : जातिवादी संगठनों की भूमिका।
(1998)
उत्तर : भारतीय समाज में वर्तमान समय में जाति आधारित अनेको संगठनों का निर्माण हो रहा है। ये संगठन मूल रूप से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। रुडोल्फ का विचार है कि जाति संघों ने जाति को एक नयी स्फूर्ति प्रदान की है और लोकतंत्र ने भारत में जाति को नयी महत्वपूर्ण भूमिका के योग्य बनाया है। एम.एन. श्रीनिवास ने ....
प्रश्न : भारत में पुनरुद्धारवादी सामाजिक आंदोलन।
(1998)
उत्तर : एम.एस.ए. राव ने तीन प्रकार के आंदोलनों की बात की है- सुधारवादी, परिवर्तनवादी और क्रांतिकारी। सुधारवादी आंदोलन मूल्य व्यवस्था में आंशिक परिवर्तन लाते हैं, वे संरचनात्मक परिवर्तनों को प्रभावित नहीं करते। इस प्रकार के आंदोलन हमें मुख्यतः कृषक आंदोलन, जनजातीय आंदोलन, दलित आंदोलन, पिछड़ी जाति/वर्ग आंदोलन और महिला आंदोलन के रूप में देखने को मिलता है। इन सभी आंदोलनों में ये पांच तत्व हैं- (i) सामूहिक लक्ष्य, (ii) वृहद स्वीकृति वाले कार्यक्रमों की समान विचारधारा, ....
प्रश्न : दलित चेतना की अभिव्यक्ति की प्रणाली और विषय वस्तु।
(1998)
उत्तर : भारत में अस्पृश्यता का बहुत पुराना इतिहास है, यद्यपि इसका जन्म और प्रचलन अस्पष्ट और अज्ञात है। 1930 के दशक के प्रारंभ तक अवपीड़ित वर्ग की अधिकांशतः परिभाषा अशुद्धता की धार्मिक अवधारणा के अर्थ में थी। प्रश्न उठता है कि क्या दलित समाज की मुख्य धारा में समाहित हो सकेंगे? युगों की दासता बेडि़यों को तभी समाप्त किया जा सकता है जब दलित स्वयं को शिक्षित और कुशल बना लें और आधुनिक समाज में प्रभावी ....