प्रश्न : जनजातियों की स्वतंत्रता के पक्ष में वेरियर एल्विन के विचार।
(2015)
उत्तर : मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति का अध्ययन कर वेरियर एल्विन ने तर्क दिया कि जनजातियां, विशिष्ट समुदाय होती है। अतः उन्हें अपने प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रहना चाहिए। जनजातीय और गैर-जनजातीय लोगों के बीच परस्पर क्रिया के भिन्न इतिहासों के कारण, जनजातीय जनसंख्या में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से विषमता पाई जाती है। ऐसे केवल कुछ ही क्षेत्र हैं जहां जनजातियां वनवासी हैं और खेती करती है जैसे बस्तर (छत्तीसगढ़ में अबूझमाढ़) आर्थिक ....
प्रश्न : जनजातीय उपयोजना के मुख्य उद्देश्य।
(2015)
उत्तर : भारत की विविधता में जनजातीय संस्कृति, क्षेत्र और इतिहास का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है जिसको बनाए रखने के सरकार द्वारा संवैधानिक प्रयास के साथ प्रशासनिक प्रयास किए गए हैं। जनजातीय उपयोजना का प्राथमिक उद्देश्य जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए उनका आर्थिक-सामाजिक विकास करके समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है जिसमें योजनाओं का निर्धारण जनजातियों की स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना है। जनजातियों की धर्मांतरण संबंधी समस्या उनकी पहचान ....
प्रश्न : भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के महत्वपूर्ण घटक।
(2015)
उत्तर : 1976 में संविधान द्वारा शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाला गया जिसका उद्देश्य समावेशी, सहभागिता पूर्ण और समग्र दृष्टिकोण में देश में एक बेहतर शिक्षा नीति तैयार करना है। 1986 की शिक्षा नीति में 1992 में संशोधन कर शिक्षा में एकरूपता और शिक्षा को जन आंदोलन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। शिक्षा का सर्वप्रथम महत्वपूर्ण घटक संविधान में निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा को जमीनी स्तर ....
प्रश्न : भारतीय जाति-व्यवस्था पर लुई ड्यूमा का संदर्भ।
(2015)
उत्तर : ड्यूमा ने जाति व्यवस्था के अपने अध्ययन में भारत विधाशास्त्रीय दृष्टि और संरचनात्मक आगम दोनों का प्रयोग किया है। ड्यूमा के अनुसार भारत में जाति-व्यवस्था पवित्रता और अपवित्रता की विरोधी वैचारिकी मूल्यों एवं विचारों पर आधारित है। जाति व्यवस्था में मनुष्य जो व्यवहार करते हैं उनका आधार वे मूल्य एवं विचार है जिनको समाज में सामूहिक स्वीकृति प्राप्त है और जिन्हें वे अपने व्यवहार से दर्शाते हैं।
ड्यूमा के अनुसार इन विचारों का स्त्रेत धर्मशास्त्रीय ग्रंथों ....
प्रश्न : महात्मा गांधी पर अस्पृश्यों का भरोसा किस सीमा तक था?
(2015)
उत्तर : अस्पृश्यता जैसी अमानुषिक और अन्यायपूर्ण प्रथा के प्रति रोष प्रबुद्ध और शिक्षित भारतीयों के सामान्य प्रजातांत्रिक रोष का ही एक रूप था। महात्मा गांधी द्वारा स्थापित अखिल भारतीय हरिजन संघ जैसी गैर राजनीतिक संस्थाओं ने प्रचार शिक्षा और अन्य व्यावहारिक उपायों द्वारा अछूतों को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकार दिलाने की चेष्टा की।
अस्पृश्यता पर गांधी जी का संपूर्ण चिन्तन व विचार, वैचारिक स्तर पर एक दलित आन्दोलन का द्योतक है। इसलिए वे जीवन पर्यन्त इसकी ....
प्रश्न : क्या भारत में जाति-व्यवस्था परिवर्तित हो रही है, कमजोर पड़ रही है या कि विघटित हो रही है?
(2015)
उत्तर : जाति व्यवस्था को एक बंद सामाजिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जाता है जिसकी सदस्यता जन्म से होती है। परन्तु आर्थिक, राजनैतिक, आधुनिक कारणों से इसमें गतिशीलता विद्यमान रही है और वर्तमान समाज में यह परिवर्तित होने के साथ कमजोर भी पड़ रही है। आज जाति व्यवस्था में आए परिवर्तन अंग्रेजों द्वारा प्रारंभ आधुनिकीकरण की शक्तियों का फल माना जाता है। इसके साथ भारतीय संविधान ने स्वतंत्रता, समानता, बंधुता को बनाए रखने के लिए ....
प्रश्न : जाति व्यवस्था में परिवर्तनों को समझने के लिए श्रीनिवास का संस्कृतिकरण किस सीमा तक एक आधुनिकताकारी या परम्पराकारी बल है?
(2015)
उत्तर : श्रीनिवास जाति व्यवस्था को खुली व्यवस्था के तौर पर देखते हैं एवं जाति व्यवस्था में परिवर्तन को संस्कृतिकरण से जोड़ते हैं। श्रीनिवास के अनुसार जाति व्यवस्था में निचले स्तर की जातियां उच्च जातियों की संस्कृति को अपनाती है।
उच्च जातियों की जीवन शैली, खान-पान, रहन-सहन, परिधान तथा उनके द्वारा सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं एवं विश्वासों को अपनाती है तथा धीरे-धीरे अन्य जातियों की तरह व्यवहार करने लगती है। निम्न जातियां अनेक रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, प्रथाओं आदि को भी ....
प्रश्न : भारतीय परिवार व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तनों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण अध्ययनों का वर्णन कीजिए।
(2015)
उत्तर : सामाजिक और संरचनात्मक परिवर्तनों ने परिवार के आकार, उनकी संरचना को प्रभावित किया है और इस परिवर्तन को समझने के प्रयास में कई समाजशास्त्रियों द्वारा महत्वपूर्ण अध्ययन किए गए हैं। इस संबंध में दो प्रकार के दृष्टिकोण अपनाए गए हैं। प्रथम दृष्टिकोण का यह मानना है कि भारत में पारिवारिक संरचना में परिवर्तन एक सीधी रेखा में हुआ है अर्थात पश्चिमी देशों की तरह इसका विघटन संयुक्त से नाभिकीय परिवार में हुआ है। इसमें मूडे ....
प्रश्न : उत्तर भारत की और दक्षिण भारत की बंधुता प्रणाली की विस्तृत रूप से तुलना कीजिए।
(2015)
उत्तर : उत्तर भारत में विवाह के नकारात्मक नियमों का पालन किया जाता है जबकि दक्षिण भारत में विवाह के सकारात्मक नियम पाए जाते हैं। उत्तर भारत में विवाह संबंध पूर्णतः एक नए परिवार से जुड़ता है जबकि दक्षिण भारत में विवाह संबंध छोटे नातेदारी समूहों के बीच होते हैं तथा माता-पिता दोनों पक्षों के संबंध पर जोर होता है। उत्तर भारत में नातेदारी शब्दावली में रक्त संबंधियों व विवाह संबंधियों में अंतर होता है जबकि दक्षिण ....
प्रश्न : पितृतंत्र क्या है? भारत में यह किस प्रकार बालक समाजीकरण प्रतिरूप को प्रभावित करता है?
(2015)
उत्तर : पितृतंत्र समाज का वह स्वरूप है जहां सत्ता पुरुषों के हाथों में केंद्रित होती है। भारतीय समाज में प्राचीन काल से पितृसत्तात्मक व्यवस्था रही है। इस व्यवस्था में पुरुष घर का मुखिया होता है। धार्मिक अनुष्ठान, आर्थिक, सामाजिक, प्रत्येक क्षेत्र में उसकी भूमिका शीर्ष पर होती है। घर परिवार को चलाने का कार्य उसी का होता है। घर के सभी निर्णयों में अन्तिम मुहर वही लगाता है। संपत्ति एवं उत्तराधिकार की योग्यता उसी के हाथ ....
प्रश्न : हिन्दू धर्म के कौन-से आधारिक सिद्धान्त हैं? क्या हिन्दू धर्म एकेश्वरवाद या बहु-ईश्वरवाद पर आधारित है?
(2015)
उत्तर : हिन्दू धर्म कुछ विशिष्ट मूल केंद्रीय विश्वास पद्धतियां हैं ये हैं- ब्रह्म, आत्मा, कर्म, धर्म, अर्थ, मोक्ष की धारणा और शुद्धि और अशुद्धि के विचार आदि हैं। हिन्दू धर्म का संबंध सामाजिक व्यवहार के उन नियमों से है जिन्हें पारम्परिक रूप में वर्ग, आश्रम, गुण के सन्दर्भ में प्रत्येक व्यक्ति के लिए निर्धारित किया जाता है। धर्म सदाचारी जीवन की आधारशिला है। पुरुषार्थ हिन्दू धर्म में सफल जीवन की प्राप्ति हेतु निरंतर प्रयास करने की ....
प्रश्न : प्रवरजन (विशिष्ट वर्ग) कौन होते हैं? सामाजिक रूपान्तरण लाने में उनकी भूमिकाओं पर चर्चा कीजिए।
(2014)
उत्तर : भारत में विशिष्ट वर्ग का उद्भव भारतीय वर्ग-संरचना के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसने समाजशास्त्रियों को अपनी ओर आकर्षित किया है।
विशिष्ट वर्ग, उस वर्ग को कहा जाता है, जो सफेदपोश नौकरी करता है तथा डॉक्टर, वकील, प्रबंधक आदि के रूप में विद्यमान है और जिसमें उच्च उपभोग की प्रवृत्ति होती है तथा जो शारीरिक श्रम को करने से बचा रहता है। घनश्याम शाह व कुछ विद्वानों ने इस वर्ग को ‘पेट्टी बुर्जुआ’ या ....
प्रश्न : भारत में जनजातियों के एकीकरण और स्वायत्तता के बारे में विभिन्न विचारों का विश्लेषण कीजिए।
(2014)
उत्तर : जनजातियों की जिन समस्याओं से हम आज रू-ब-रू हो रहे हैं, वे रातों रात पैदा नहीं हुई है। उनका ऐतिहासिक वृत्तान्त है। ब्रिटिश युग में और इससे भी पहले इन समस्याओं की अभिव्यक्ति जनजातियों ने समय-समय पर अपने आक्रोश और आन्दोलनों द्वारा व्यक्त की है। सीमान्त क्षेत्र में रहने वाली जनजातियों ने नागा और अंगामी नेताओं ने कई बार ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी है। आज भारत सरकार ने जो जनजातीय नीति बनायी है। उसकी ....
प्रश्न : भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्याओं का विवेचन कीजिए।
(2014)
उत्तर : भारतीय संविधान में कहीं भी अल्पसंख्यक समूहों की परिभाषा नहीं है। राजनीतिशास्त्र में अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के आधार पर परिभाषित किया जाता है। यह एक सापेक्षिक अवधारणा है। उदाहरण के लिए एक समूह किसी एक राज्य में अल्पसंख्यक है लेकिन दूसरे राज्य में वह बहुसंख्यक हो सकता है। जम्मू और कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं लेकिन गुजरात या राजस्थान में वे अल्पसंख्यक हैं।
हिन्दू उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में बहुसंख्यक हैं लेकिन जम्मू और कश्मीर ....
प्रश्न : भारतीय समाज के किसानों पर भूमि सुधारों के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
(2014)
उत्तर : स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कृषक समाज की बहुत बड़ी उपलब्धि भूमि सुधार है। यह सही है कि भूमि सुधार के जो लाभ सामान्य कृषक को मिलने चाहिए, वे नहीं मिले हैं, फिर भी देश में यह वातावरण अवश्य बन गया है कि भूमि के स्वामित्व की जो गैर बराबरी है, उसे राज्य सरकारें कम करना अवश्यक चाहती है। भूमि सुधार से भी अधिक महत्वपूर्ण कारक हरित क्रांति का है। इसके कारण खाद्यान्नों के उत्पादन में ....
प्रश्न : ‘भारतीय ग्राम’ के विचार से क्या अर्थ है? समझाइए।
(2014)
उत्तर : भारतीय ग्रामीण सामाजिक संरचना से तात्पर्य गांव में रहने वाले विभिन्न जाति एवं वर्गों के बीच अंतःक्रियात्मक संबंध, शक्ति संरचना, परिवार, विवाह, नातेदारी, लैंगिक संबंध, ग्रामीण आर्थिक संरचना, जाति के अंतः संबंध आदि के ताने-बाने से है।
भारत में ग्रामीण सामाजिक संरचना की अपनी कुछ विशिष्टताएं हैं, जो निम्न हैं-
जाति व्यवस्थाः संयुक्त परिवारों की प्रधानता, नातेदारी संबंधों, वंश संबंध एवं विवाह संबंध पर बल, कृषक वर्ग संरचना।
ग्रामीण शक्ति संरचनाः आर्थिक व्यवस्थाः ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था मुख्यतः भूमि ....
प्रश्न : सांप्रदायिक समरसता के लिए गांधीजी के प्रयास
(2014)
उत्तर : भारत में संप्रदायवादी विचारधारा की प्रकृति चाहे अंतरजातीय हो, अंतरजनजातीय हो, जाति-जनतातिय हो या अंतर धार्मिक हो, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के अलमवरदारों ने बड़े व्यवस्थि ढंग से इसे प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति दर्शाई।
सच्चे अर्थ में सब धर्म एक है ‘‘सर्व धर्म समभाव’’। इस विचार के आधार पर गांधी ने साम्प्रदायिकता पर पूरी शक्ति से प्रहार किया। गांधीजी की विचारधारा रहस्यवादी न होकर यथार्थवादी है। वे धर्म के शाश्वत मूल्यों के आधार पर एकता की बात ....
प्रश्न : उभरते शहरी मध्य वर्ग में महिलाओं की प्रस्थिति पर चर्चा कीजिए।
(2014)
उत्तर : भारत में स्त्रियों की प्रस्थिति बराबर विवादास्पद रही है। एक तरफ उसे महिमा मण्डित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसे ‘‘ढोर, गंवार, शुद्र और पशु’’ समझा जाता है। जब कभी स्त्रियां रोती हैं, आंसू टपकाती है या दहेज की यातना के कारण आत्महत्या करने जाती हैं, तब उन्हें दिलासा दिया जाता है। कहा जाता है कि हम स्त्रियों की प्रस्थिति को इतिहास की आंख से देखें।
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब नहीं ....
प्रश्न : जाति व्यवस्था के अभिलक्षण
(2014)
उत्तर : जाति व्यवस्था भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता है, जो भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण के एक प्रमुख स्वरूप को परिलक्षित करती है। जाति व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय समाज कुछ जातीय समूहों में वर्गीकृत है और ये समूह सोपानिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इसके अंतर्गत एक जाति समूह एक अंतर्विवाही समूह होता है, जिसकी सदस्यता जन्मजात होती है, उसका एक निश्चित व्यवसाय होता है और कुछ विशेषाधिकारों और निर्योग्यताओं के साथ खान-पान और सामाजिक ....
प्रश्न : परम निर्धन की कोटि के सृजन में जाति और वर्ग किस प्रकार एक-दूसरे के साथ आ जाते हैं?
(2014)
उत्तर : वर्ग और जाति के संबंध में लोगों की अलग-अलग धारणाएं हैं। कुछ लोगों का समझना है कि स्तरीकरण के ये दोनों स्वरूप ध्रुवीय या एक-दूसरे के विरोध में है। एक वाद है तो दूसरा प्रतिवाद। समाजशास्त्र में वर्ग और जाति को परस्पर विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने वाले विद्वानों में बोटोमोर, डी सुजा, डयूमों, धुरिये, लीच और श्रीनिवास हैं। वर्ग और जाति के संबंध में एक दूसरी धारणा भी है। इस धारणा के अनुसार, ....
प्रश्न : बहुत से जाति संघर्ष उन जातियों के बीच होते हैं, जो जातियों के सोपानिक पैमाने पर एक-दूसरे के नजदीक होते हैं। इस परिघटना के लिए समाजशास्त्री स्पष्टीकरण दीजिए।
(2014)
उत्तर : जाति-संघर्ष वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक गंभीर समस्या या परिघटना के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। इसका तात्पर्य विभिन्न जातियों या जातीय समूहों के बीच संघर्ष के उस प्रारूप से है, जिसमें वे सामाजिक या सामूहिक हितों को त्याग कर अपनी जातिगत हितों की पूर्ति के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्षशील होते हैं। यह संघर्ष वैचारिक अथवा हिंसात्मक दोनों ही रूपों में अभिव्यक्त होता है, किन्तु इसकी हिंसात्मक प्रकृति ही सामाजिक जीवन के लिए ज्यादा ....
प्रश्न : पितृतंत्र (पैट्रिआर्की) को परिभाषित कीजिए। भारत में यह बालिका की समग्र हकदारी को किस प्रकार प्रभावित करता है?
(2014)
उत्तर : पितृतंत्र या पितृसत्तात्मकता समाज का वह स्वरूप है, जहां सत्ता पुरुषों के हाथों में केन्द्रित होती है। भारतीय समाज में प्राचीन काल से पितृसत्तात्मक व्यवस्था रही है। भारतीय समाज में महिला की भूमिका की संकल्पना पत्नी और मां के रूप में ही रही है।
भारत में महिला की सामाजिक प्रस्थिति पुरुष की तुलना में द्वितीयक श्रेणी की मानी जाती रही है। स्त्रियों की निम्न प्रस्थिति से संबंधित यह समस्या सांस्कृतिक आवश्यकताओं के कारण और भी गहरी ....
प्रश्न : भारत में बंधुत्व प्रणाली (किनशिप सिस्टम) के प्रकार।
(2014)
उत्तर : भारत में बंधुत्व प्रणाली के दो प्रकार मिलते हैं-
प्रश्न : एम. एन. श्रीनिवास की प्रभावी जाति संबंधी अवधारणा के अभिलक्षण कौन-कौन से हैं? आज यथार्थ को समझने में यह कितनी प्रभावी है?
(2013)
उत्तर : भारतीय समाज में जाति अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य संरचनात्मक प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य रहा है, जिसके प्रारम्भिक विचारक श्री निवास रहे हैं। श्री निवास ने इस परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करते हुए रामपुरा गांव के अपने अध्ययन में जातिव्यवस्था, अर्न्तजातीय सम्बन्धों तथा जातिगतिशीलता की आदि पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। अपने जाति व्यवस्था के अध्ययन में श्री निवास ने ड्यूमां के विपरीत यह दर्शाया की जाति प्रस्थिति के निर्धारण में केवल सांस्कृतिक प्रस्थिति ही एक ....
प्रश्न : लुई द्यूमां के ‘होमो हायरेरकीकस’ का समीक्षात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(2013)
उत्तर : सामान्य तौर पर स्तरीकरण के आधारों को दो श्रेणियों-प्रदत्त और अर्जित में बांटा जाता है। प्रदत्त आधार वे हैं, जो हमें जन्म से प्राप्त होते हैं जिनको प्राप्त करने के लिए हम को कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। प्रदत्त आधार में सम्मिलित हैं
अर्जित वे आधार है, जिन्हें व्यक्ति अपने प्रयासों से प्राप्त करता है। ये जन्म से ....
प्रश्न : डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जाति के नाश सम्बन्धी विचारों के प्रमुख अभिलक्षण कौन-कौन से हैं।
(2013)
उत्तर : राष्ट्रीय आन्दोलन में जाति एक बाधा थी, क्योंकि जाति के आधार पर लोग उच्च और निम्न श्रेणियों में विभक्त थे, और विभिन्न जाति समूहों के सदस्यों के बीच खान-पान और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने पर निषेध था। अतः जाति व्यवस्था, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक गहन असमानताओं पर आधारित थी।
चूंकि जाति जन्म पर आधारित थी इसलिए इस व्यवस्था में परिवर्तन वर्जित था। महात्मा गांधी ने जाति प्रथा के विरुद्ध संघर्ष किया,
क्योंकि इसके अन्तर्गत अछूत जातियों ....
प्रश्न : अन्य पिछड़ा वर्ग।
(2013)
उत्तर : काका कालेलकर तथा मण्डल आयोग के अनुसार सम्पूर्ण भारत की 52 से 70% तक जनसंख्या सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी है तथा इनकी शिक्षा, शासन तथा प्रशासन में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में न्यून है। अतः सरकार ने सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों को 27% आरक्षण देना 1993 से स्वीकार किया। यह आरक्षण क्रीमीलियर के अपवाद को छोड़कर पंचायतों, सार्वजनिक सेवाओं में लागू है। कुछ राज्यों में मेडिकल तथा तकनीकी शिक्षा संस्थाओं में भी पिछड़े वर्गों ....
प्रश्न : भारत में प्रजातंत्र की क्षति में साम्प्रदायिकता की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
(2013)
उत्तर : भारत एक विविधतावादी एकात्मक प्रकृति का समाज है। भारत में अनेक धर्म तथा क्षेत्र पाए जाते हैं। विविधता में एकता के लिए भारत दुनिया में अपनी एक अलग मिसाल रखता है, किन्तु कभी-कभी कुटिल राजनीतिक स्वार्थों के लिए धार्मिक व क्षेत्रीय भावनाओं को उत्तेजित कर देश में एकता को खतरा पैदा किया जाता है। धार्मिक उत्तेजना सम्प्रदायवाद तथा क्षेत्र विशेष के प्रति लगाव की भावना, क्षेत्रीयता को जन्म देती है। भारत में साम्प्रदायिकता तथा क्षेत्रवाद ....
प्रश्न : वे कौन से लक्षण हैं, जिनके कारण जनजातियां अन्य जनसंख्या से हटकर अलग दिखाई पड़ती हैं।
(2013)
उत्तर : आदिवासियों का परिचय भारत के अभिजन की दृष्टि में अलग है। ऐसे गैर आदिवासी जो आदिवासियों के आस पास रहते हैं परंतु जो समझदार नहीं हैं, अभिजन नहीं हैं वे आदिवासियों को गन्दा, बेवकूफ, सीधा ओर शोषण के योग्य समझते हैं। भारत के अभिजन इन्हें दो दृष्टिकोण से देखते हैं।
प्रश्न : जनजातियों के सन्दर्भ में नृजातीयता एवं एकीकरण पर टिप्पणी लिखिए।
(2013)
उत्तर : आदिवासियों का परिचय कठिन है। पूरे विश्व में अधिकतर विद्वानों ने आदिवासी की परिभाषा दी है जो बहुत सटीक नहीं है आदिवासियों के सम्बन्ध में अनेक लक्षण दिये जाते हैं।
प्रश्न : नया वन अधिनियम जन जातियों को किस प्रकार प्रभावित करता है?
(2013)
उत्तर : संसद द्वारा ‘‘शेड्यूल्ड ट्राइब्स एण्ड अदर टेªडिशनल फॉरेस्ट ड्वेर्ल्स (रिकोग्रनिशन ऑफ फॉरेस्ट राइट्स) विधेयक 2006 को पारित किया गया था। इस विधेयक ने वन के पारस्परिक निवासियों और समृद्ध जैव-विविधता एवं वन्य-जीवन की अनिवार्यताओं के परिरक्षण के बीच संतुलन कायम करने का प्रयास किया है।
प्रश्न : भारत में कृषिक समाज में वर्ग।
(2013)
उत्तर : वर्ग के सम्बन्ध में मार्क्स तथा वेबर की आवधारणाएं प्रमुख हैं। मार्क्स की अवधारणा आर्थिक पहलू की प्रधानता से प्रभावित है, जबकि वेबर की धारणा आर्थिक के साथ-साथ अन्य कारणों को भी वर्ग के साथ लेकर चलती है। मार्क्स के अनुसार समान आर्थिक हित रखने वाले व्यक्तियों के समूह को वर्ग कहते हैं। उसके अनुसार सभी गैर साम्यवादी समाज वर्ग समाज की आर्थिक पारितोषिक, राजनीतिक शक्ति तथा सामाजिक प्रतिष्ठा आदि का प्रभाह वर्गों की संरचना ....
प्रश्न : भारत में औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्रें में क्या अन्तर है।
(2013)
उत्तर : औपचारिक क्षेत्र अर्थात वैसा क्षेत्र जो सरकारी परिधि तथा नियंत्रण में रहता और जिसका उत्तरदायित्व प्राधिकृत अधिकारी तथा संवैधानिक प्रावधान के अनुरूप होता है जैसे वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग आदि। औपचारिक क्षेत्र की बाध्यता होती है कि वह जनकल्याणकारी काम सरकार के नियंत्रण में रहकर करें। अनौपचारिक क्षेत्र वैसा क्षेत्र होता है जो कि स्वतंत्र है, स्वायत्त है अपना निर्णय लेने में इसमें किसी प्रकार की सरकारी बाध्यता नहीं होती है लेकिन सार्वजनिक हित से ....
प्रश्न : भारतीय मध्यवर्ग के प्रमुख लक्षणों की चर्चा कीजिए।
(2013)
उत्तर : पूंजीपति व निम्न वर्ग के बीच पुल का कार्य करने वाले वर्ग को मध्यम वर्ग के नाम से जाना जा सकता है। वकील, डॉक्टर, अभियन्ता, प्रबन्धक आदि मध्यम वर्ग के व्यक्तियों के उदाहरण हैं। मध्य वर्ग कौन हैं इसके सम्बन्ध में मार्क्स की चर्चाओं के कारण विवाद रहा है। मार्क्स ने कहा मूल वर्ग दो ही हैं: एक वे जो उत्पादन के साधनों का नियन्त्रण करते हैं, दूसरे वे जो स्वयं उत्पादन के साधन हैं। ....
प्रश्न : जनजाति और जाति
(2012)
उत्तर : जाति जन्म पर आधारित सामाजिक स्तरीकरण की वह व्यवस्था है, जो अपने सदस्यों पर विवाह, खान-पान, व्यवसाय तथा सामाजिक सहवास सम्बन्धी अनेक प्रतिबन्ध लगाती है, जबकि जनजाति परिवार या परिवारों के समूह का एक संकलन होती है, जिसका एक सामान्य नाम होता है, जिसके सदस्य एक निश्चित भू-भाग पर निवास करते हैं, एक-सी भाषा बोलते हैं। जाति के लोगों का अधिकांशतः एक ही व्यवसाय होता है जबकि एक ही जनजाति के लोग अलग-अलग व्यवसाय करते ....
प्रश्न : परिवर्तित ग्रामीण शक्ति संरचना।
(2012)
उत्तर : डा. योगेन्द्र सिंह ने यह स्पष्ट किया कि परम्परागत ग्रामीण भारत में शक्ति संरचना के तीन आधार प्रमुख थे- जमींदारी प्रथा, ग्राम पंचायत एवं जाति पंचायत। इस शक्ति संरचना में एक ओर जमींदार ग्रामीणों के भौतिक, आर्थिक हितों व आकांक्षाओं के प्रतिनिधि थे, तो दूसरी ओर ग्राम पंचायत तथा जाति पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण राजनीति के स्वरूप का निर्धारण होता था। जमींदारी प्रथा एवं ग्रामीण शक्ति संरचना के बीच अन्तर-संबंधों की व्यवस्था मुख्यतः सम्पत्ति ....
प्रश्न : क्या जनजातीय संस्कृति एवं सामाजिक संरचना पर भौगोलिक एवं आर्थिक गतिशीलता का प्रभाव पड़ा है? उदाहरण दीजिए।
(2012)
उत्तर : जनजातीय संस्कृति एवं सामाजिक संरचना पर भौगोलिक एवं आर्थिक गतिशीलता का व्यापक प्रभाव पड़ा है। आज जनजातियों के मध्य परंपरा तथा आधुनिकता के मध्य होने वाले गतिरोध की मौजूदगी से इसे समझा जा रहा है।
कई जनजातियां रोजगार की तलाश में शहरों की ओर प्रवसन कर गयीं। इस प्रवसन ने उनके सांस्कृतिक मान्यताओं, प्रथाओं, विचारों, विश्वासों को स्थानीय प्रभावी संस्कृति के साथ घुलने-मिलने के कारण एक मिश्रित संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें इसकी अपनी संस्कृति तथा ....
प्रश्न : विवाह की संस्था के समक्ष चुनौतियां।
(2012)
उत्तर : विवाह दो या दो से अधिक विषमलिंगियों के बीच समाज अनुमोदित, औपचारिक तथा अपेक्षाकृत स्थायी लैंगिक संबंधों की व्यवस्था अथवा नियमाचारों का एक पुंज है, जो पारिवारिक जीवन के लिए आवश्यक पारस्परिक दायित्वों एवं अधिकारों द्वारा इन्हें बांधता है। एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह की प्रकृति, आकार-प्रकार और उद्देश्यों में तीव्र गति से परिवर्तन आ रहा है। विवाह पूर्व और विवाह के अतिरिक्त सहवास, सहवासविहीन विवाह, विवाह रहित संतानोत्पादन और लालन-पालन, उच्च तलाक ....
प्रश्न : वैवाहिक स्वजन एवं रक्तमूलक स्वजन।
(2012)
उत्तर : भारतीय समाज की सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था का निर्माण स्वजन या नातेदारी द्वारा होता है। नातेदारी व्यवस्था मानव समाज का एक प्रमुख संगठनकारी सिद्धांत रहा है, जो माता-पिता, संतानों, सहोदरों तथा वैवाहिक दम्पत्तियों के बीच संबंधों को स्थापित करती है। नातेदारी के दो प्रमुख भेद हैं- वैवाहिक नातेदार एवं रक्तमूलक नातेदार।
नातेदारी में प्रथम प्रकार का सम्बन्ध वैवाहिक संबंध है जो समाज या कानूनी आधार पर मान्य होता है। इस आधार पर जुड़े नातेदार विवाह संबंधी ....
प्रश्न : विवाह एक धार्मिक संस्कार तथा विवाह एक समझौता।
(2012)
उत्तर : हिन्दुओं में विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता है। हिन्दू विवाह में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक अनेक प्रकार के धार्मिक विधि-विधानों, अनुष्ठानों एवं आदर्शों की प्रधानता पाई जाती है। हिन्दू विवाह के उद्देश्यों से जीवन में धार्मिकता का महत्व प्रकट होता है, हिन्दुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार तथा अटूट बंधन माना जाता है, जिसे इच्छानुसार कभी भी तोड़ना अनुचित और पाप समझा जाता है। हिन्दू विवाह व्यक्ति के जीवन को परिष्कृत ....
प्रश्न : भारत में जनजातियों में एकता एवं विविधता
(2011)
उत्तर : जनजाति व्यक्तियों का वह समूह है, जो निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करता है। अपना आदिपूर्वज से उद्गम मानता है, एक सामान्य परंपरा को धारण करता है तथा आधुनिक सभ्यता के प्रभावों से वंचित है। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 9 करोड़ 7 लाख है। जनजातीय समाज मंदगति से विकसित समाजों का ही एक स्वरूप है। यदि संस्कृति के सन्दर्भ में देखा जाए तो जनजातीय संस्कृति इस समाज के जीवन ....
प्रश्न : भारतीय समाज में ग्रन्थ दृष्टि तथा क्षेत्र दृष्टि
(2011)
उत्तर : औपनिवेशिक शासन काल से लेकर आज तक भारतीय समाज के अध्ययन हेतु कई दृष्टियों का प्रयोग किया जाता है पर उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण ‘ग्रन्थ दृष्टि’ तथा ‘क्षेत्र दृष्टि’ को माना जाता है। भारतीय समाज को देखने की ‘ग्रन्थ दृष्टि’ शास्त्रीय ग्रन्थों, महाकाव्यों, ऐतिहासिक प्रलेखों पर आधारित है, जो परम्परागत चिन्तन तथा दर्शन को आधार बनाकर घटनाओं का विश्लेषण करता है। यह हमें समृद्ध प्राचीन भारतीय संस्कृति तथा प्राचीन संस्कृति का बोधकराता है तथा वर्तमान सामाजिक ....
प्रश्न : परिवार एवं गृहस्थी की अवधारणाओं में अन्तर
(2011)
उत्तर : हाल के वर्षों में समाजशास्त्र में परिवार से मिलती जुलती एक अन्य अवधारणा गृहस्थी (House Hold) का प्रचलन बढ़ा है, जो परिवार से कई मायनों में समान होते हुए भी भिन्न है। परिवार व्यक्तियों का एक ऐसा प्राथमिक समूह है, जिसके सदस्य विवाह, रक्त, गोद लेने, या नातेदारी बंधनों से जुड़कर और प्रायः एक सामान्य निवास में रहते हैं तथा एक सामान्य आर्थिकी में सहयोग करते हुए पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन आदि के रूप में ....
प्रश्न : धर्मनिरपेक्षता तथा लौकिकीकरण में अन्तर, लक्षण तथा सीमायें
(2011)
उत्तर : धर्मनिरपेक्षता आधुनिक एवं केन्द्रीय विचारधारा है, जो सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित करते हुए धर्म के अवैज्ञानिक प्रभाव के उन्मूलन पर बल देती है और इस विचारधारा पर आधारित परिवर्तन की प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्षीकरण या लौकिकीकरण के रूप में जाना जाता है। ब्रायन आर- विल्सन के अनुसार लौकिकीकरण की प्रक्रिया परिवर्तन की
एक ऐसी प्रक्रिया को इंगित करती है, जिसके अर्न्तगत विभिन्न सामाजिक संस्थायें धार्मिक अवधारणों की पकड़ या ....
प्रश्न : दलित समुदाय की बदलती चेतना तथा दायित्व शब्द की अवधारणा
(2011)
उत्तर : औपनिवेशिक काल में अनुसूचित जातियों के लिए सामान्यता ‘दलित वर्ग’ बाह्य जातियां व अस्पृश्य जैसी अभिव्यक्तियां हुईं। गांधीजी इन्हें हरिजन, अर्थात् ईश्वर का जन कहा तो साइमन कमीशन ने अनुसूचित जाति कहा। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त दलित को अनुसूचित जाति ही कहा गया है।
वास्तविक रूप में दलित एक सामाजिक प्रस्थिति है, जबकि अनुसूचित जाति राजनैतिक शब्द है। यह सही है कि पौराणिक काल से दलितों को उच्च जाति के लोगों के द्वारा दबाया जाता रहा ....
प्रश्न : जातिवाद जाति व्यवस्था का आधुनिक संस्करण है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क सहित विवेचना कीजिए।
(2011)
उत्तर : जातिवाद से तात्पर्य किसी जाति समूह द्वारा अपने सामाजिक तथा जातिगत हितों की पूर्ति के लिये दूसरी जाति या जाति समूह के प्रति वैचारिक अथवा हिंसात्मक अभिव्यक्ति या दोनों की अभिव्यक्ति की विचारधारा से है। ऐसी प्रवृत्ति सामाजिक जीवन के लिये अत्यधिक खतरनाक होती है। पारम्परिक सामाजिक व्यवस्था में जाति विभाजन को सांस्कृतिक तथा सामाजिक वैद्यता प्राप्त थी, अतः संघर्ष नहीं था पर आधुनिक मूल्यों से सम्पर्क, शिक्षा, संचार व्यवस्था, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण, स्वतन्त्रता समानता ....
प्रश्न : होमोहियरर्किकस की डूमों की संकल्पना।
(2010)
उत्तर : लुईस डूमों ने अपनी पुस्तक ‘‘होमोहियरर्किस द कास्ट सिस्टम एण्ड इट्स इम्लिीकेशंस’’ में जाति पदक्रम का आधार शुद्धता एवं अशुद्धता की विचारधारा को माना है। इन्होंने भारतीय जाति संरचना को एक संरचनात्मक परिदृश्य में समझने का कार्य किया है। डूमों ने जाति से सम्बन्धित उस विचारधारा को भी नकारा है, जिनके अनुसार भारतीय जाति व्यवस्था वर्ग या स्टेट का दूसरा रूप है। उन्होंने इस बात जोर दिया कि जाति व्यवस्था भारतीय परंपरा की एक विशिष्ट ....
प्रश्न : जाति, वर्ग और शक्ति के बीच परस्पर सम्बन्धों पर चर्चा कीजिए।
(2010)
उत्तर : मैक्स वेबर ने सामाजिक स्तरीकरण की चर्चा तीन संदभों में की है- वर्ग, प्रस्थिति एवं शक्ति। वर्ग का सम्बन्ध किसी व्यक्ति के बाजार की स्थिति से है। प्रस्थिति का सम्बन्ध प्रतिष्ठा, सम्मान एवं आदर से है और शक्ति का सम्बन्ध राजनीतिक शक्ति से है। वेबर के अनुसार ये तीनों बल अलग-अलग रूप में कार्य नहीं करते हैं। बल्कि ये आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए है। वर्तमान भारतीय समाज भी वर्ग, जाति एंव शक्ति ....
प्रश्न : पितृतंत्र और प्रतिष्ठा हत्याओं के बीच अनुबंधन।
(2010)
उत्तर : साधारण शब्दों में पितृतंत्र पुरुषों द्वारा नियंत्रण से सम्बन्धित है। यह भारतीय समाज की एक पुरानी परंपरा है, जिसके अनुसार पुरुष को महिलाओं एवं उनके जीवन से सम्बन्धित मुद्दों को नियंत्रित करने का अधिकार है। एक पितृतंत्र समाज में महिलाओं का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे विषम है, बिना पहचान एवं स्वतंत्रता के।
यह समझा जा रहा था आधुनिक विश्व में पितृतंत्र का धीरे-धीरे विनाश हो रहा है और समाज में मानवीय मूल्यों, लिंग समानता, उदारता, ....
प्रश्न : आई.टी. क्षेत्रक में महिलायें।
(2010)
उत्तर : नासकॉम द्वारा जारी किये गये आंकड़े यह उजागर करते हैं कि महिला तकनीकी कारीगरों की संख्या आई.टी. क्षेत्रक में लगातार बढ़ रही है। महिला एवं पुरुष तकनीकी कारीगरों के बीच जो खाई थी, अब धीरे-धीरे कम हो रही है। जवाहरलाल नेहरू का एक कथन है कि ‘‘यदि किसी देश की दशा को जानना है तो वहां के महिलाओं की स्थिति को देखिये’’।
आई.टी. क्षेत्रक में महिलाओं की लगातार बढ़ती संख्या, इस बात का संकेत दे रही ....
प्रश्न : पारसी समुदाय और भारतीय समाज को उसका योगदान।
(2010)
उत्तर : पारसी और मारवाड़ी ऐसे दो समूह है जो लंबे समय तक ब्रिटिश शासन के सहयोगी रहे थे। ये समुदाय भारत में अंग्रेजों के साथ मिलकर कुछ प्राथमिक स्तर पर उद्योग स्थापित करने में भी सहायक रहे हैं। फारसी समुदाय ब्रिटिश प्रशासन के समर्थक भी थे। इस समुदाय ने सैन्य सुरक्षा की दृष्टि से निर्मित बम्बे किला के निर्माण में भी वित्तीय सहायता प्रदान की। पारसी समुदाय 1857 के क्रांति के समय भी अंग्रेजों के साथ ....
प्रश्न : उन रूपों का समालोचनात्मक आकलन कीजिए, जिनमें अस्पृश्यता पर आचरण करना अभी तक भी जारी है
(2010)
उत्तर : आजादी को 60 वर्ष बाद भी भारत की धरती पर अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई जीवित है। कुछ क्षेत्रें में सामाजिक परिवर्तन हुए हैं परंतु उसका अस्तित्व, जातिवाद, पूर्वाग्रह एवं भेद-भाव के सागर में एक तुच्छ जल बूंद की भांति है। संवैधानिक प्रतिबंध के बावजूद अस्पृश्यता विभिन्न नवीन अवतारों के साथ देश के अनेक भागों में विद्यमान है।
वैज्ञानिक रूप से भारतीय दंड संहिता में अस्पृश्यता एक दंडनीय अपराध है, फिर भी लाखों दलित अस्पृश्यता जैसी ....
प्रश्न : जाति की उत्पत्ति के प्रजातीय सिद्धान्त।
(2005)
उत्तर : जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति को स्पष्ट करने में प्रजातीय आधार को लगभग सभी विद्वानों ने किसी न किसी रूप में अवश्य स्वीकार किया है। एक ओर रिजले और मजूमदार जैसे विद्वान इस कारक को सबसे अधिक महत्व देते हैं, जबकि दूसरी ओर धुरिये, एन.के. दत्त और राय ने प्रजातीय आधार को एक सहयोगी आधार के रूप में ही स्वीकार किया है। विभिन्न विद्वानों के अनुसार जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति में प्रजातीय कारकों के योगदान को इस प्रकार ....
प्रश्न : कृषक समाजों के लक्षण।
(2005)
उत्तर : रॉबर्ट रेडफील्ड ने कृषक समाज अवधारणा के माध्यम से ग्रामीण समाज की आन्तरिक एवं बाह्य संरचना को समझाने का प्रयत्न किया है। कृषक समाजों में काफी जटिलता और स्तरीकरण देखने को मिलता है। ऐसे समाजों में कई प्रकार के समूह, वर्ग एवं श्रेणियां सम्मिलित हैं, जिनमें संबंधित लोगों को किसी भी स्वीकृत अर्थ में कृषक नहीं कहा जा सकता।
कृषक समाजों के लक्षण को स्पष्ट करने की दृष्टि से आन्द्रे बिताई ने कृषक शब्द के तीन ....
प्रश्न : पीढ़ी अन्तराल।
(2005)
उत्तर : पीढ़ी अंतराल निश्चित रूप से एक आधुनिक घटना है परन्तु यह प्राचीन काल में भी विद्यमान रहा है। एस.एन. एजेनटाड ने माना है कि अन्तर पीढ़ीय अन्तर्क्रिया अनौपचारिक मित्र समूहों में अधिक मुक्त वातावरण में फलती है। सार्वभौमिक शिक्षा की तरह यद्यपि कम सीमा में, उद्योग में काम और आफिस में नौकरी ने भी अनेक युवकों को अपनी पहचान बनाने और सामूहिक अनुभव प्राप्त करने का आधार प्रदान किया है। कभी-कभी युवक प्रभावी मानदण्डों के ....
प्रश्न : भारत में मध्यम वर्ग के उद्गम की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए। राष्ट्रीय विकास में मध्यम वर्ग ने क्या भूमिका निभाई है?
(2005)
उत्तर : आधुनिक भारत में सामाजिक वर्ग सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण भाग है सभी कालों में सामाजिक वर्ग सदैव विद्यमान रहा है परन्तु जैसा कि सामाजिक वर्ग हमें आज भारत में दिखता है, उसका प्रादुर्भाव अंग्रेजी शासन में हुआ था। आधुनिक शिक्षा के साथ राज्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था का विकास वे अन्य सामाजिक शक्तियां थीं जिन्होंने भारत में नये वर्गों को स्वरूप प्रदान किया।
वास्तव में, अंग्रेजी शासन द्वारा लाई गई नई आर्थिक व राज्य व्यवस्थाओं को, ....
प्रश्न : भारत में जनजातीय समुदायों के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए। जनजातीय पहचान पर प्रभाव डालने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।
(2005)
उत्तर : जनजातीय समुदाय मूल रूप में बहुत ही समान प्रकृति के होते हैं तथा जिनके पास सरल प्रविधि भी होती है। अधिकतर जनजातियां जीववाद में विश्वास करती हैं, जिसके अनुसार सभी वस्तुओं-चेतन और जड़ में स्थाई या अस्थाई रूप से आत्माएं रहती हैं।अक्सर कोई कार्य इन आत्माओं के कारण होता है। कुछ आत्माओं की पूजा की जाती है और कुछ का आदर किया जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जीववाद जनजातियों में धर्म का ....
प्रश्न : सामाजिक न्याय के लिए एक साधन के रूप में, शिक्षा का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(2004)
उत्तर : शिक्षा का एक माध्यम के रूप में तीन उद्देश्यों पर प्रकाश डाला जा सकता हैः
प्रश्न : उत्तर भारत में जाति लामबंदी।
(2004)
उत्तर : उत्तर भारत में जाति लामबंदी वर्तमान राजनीति का एक मुख्य हिस्सा सा बनता जा रहा है। जाति लामबंदी वास्तव में राजनीतिक क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करने का एक जरिया है। जाति आधारित राजनैतिक दल का निर्माण हो रहा है। हाल के दशकों में उत्तर भारत में यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है। विभिन्न राजनैतिक दल भी जाति आधारित समीकरण पर विश्वास करता है। इस प्रवृति ने क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों को जन्म दिया है।
उत्तर भारत ....
प्रश्न : भारतीय समाज पर मुसलमानों का प्रभाव।
(2004)
उत्तर : भारतीय समाज एवं संस्कृति पर मुसलमानों के प्रभाव का एक इतिहास रहा है। इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक, भारतीय संस्कृति पर इस्लाम का प्रभाव में लिखा है कि इस्लामिक संस्कृति के प्रभाव के कारण दक्षिण भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण आया। एच.पी. श्रीनिवास मूर्ति और एस.यू. कामथ ने भारतीय समाज पर इस्लाम के प्रभाव के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार- ‘हिंदू समाज को घोर-जातिवादी और अन्य बनाने में ....
प्रश्न : सामंतवाद और अर्ध-सामंतवाद।
(2004)
उत्तर : सामान्यतः अंग्रेजी के ‘फ्रयुडलिज्म’ शब्द का प्रयोग एक ऐसी कुलीन तंत्रीय, सैनिक तथा धर्म प्रधान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए किया जाता है, जिसका मध्ययुगीन यूरोप में प्रभुत्व रहा है। किन्तु इससे मिलती-जुलती व्यवस्था के साक्ष्य जापान में भी पाये गये हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत भूमि का विभाजन छोटी अथवा बड़ी जागीरों के रूप में किया जाता है तो बड़े सामंतों द्वारा छोटे-छोटे जागीरदारों को इस शर्त पर दी जाती है कि ....
प्रश्न : प्रबल (प्रभु) जातियों के लक्षणों का वर्णन कीजिए। भारतीय ग्रामीण राजनीति में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए।
(2003)
उत्तर : प्रभु जाति के समानांतर अनेक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इनमें प्रबल जाति, प्रभुता संपन्न जाति, प्रभावी जाति तथा संरक्षक जाति आदि प्रचलित शब्द हैं। यह सभी शब्द एक ग्रामीण समुदाय के अंतर्गत किसी ऐसे जाति समूह का बोध कराते हैं जिसके द्वारा गांव में पारस्परिक संबंधों तथा ग्रामीण एकता को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित किया जाता है। प्रभु जाति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए प्रो. श्रीनिवास के अनुसार एक जाति को ....
प्रश्न : मुसलमानों में जाति।
(2003)
उत्तर : वास्तव में भारत के मुस्लिम समाज में भी जाति के समान समूह मौजूद हैं, अतः जाति व्यवस्था की सांस्कृतिक विशेषताओं की विवेचना मुस्लिम सामाजिक संगठन का रूप समझने के लिए भी की जा सकती है। अपने मूल की शुद्धता के लिए मुस्लिम लोग जात (जाति के समान) शब्द का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक जाति, मुस्लिम समाज में अंतर्विवाह की इकाई है। एक गांव में प्रत्येक जाति के घर अपनी सामूहिक अस्मिता को पहचानते हैं और ....
प्रश्न : जनजातियों में वर्गों का उद्गमन।
(2003)
उत्तर : एन.के. बोस एवं आंद्रे बेतेई ने जनजातियों का वर्गीकरण का मुख्य आधार भाषा, धर्म एवं पृथकता बतलाया है। बोस ने जनजातीय लोगों को तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया हैः
(1) शिकारी, मछुआरे और संग्रहक (2) झूम कृषक और (3) स्थायी कृषक जो हल और हल खींचने वाले पशुओं को काम में लेते हैं। तीसरी श्रेणी में संथाल, गौंड, भील, उरांव और मुण्डा आदि जनजातियों के लोग हैं। इन जनजातियों के कृषक और गैर-जनजातियों के कृषकों ....
प्रश्न : भारत में कृषक समुदायों में अशांति के लिए उत्तरदायी कृषकों का विवरण दीजिए। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
(2003)
उत्तर : ग्रामीण-जीवन की सभी समस्याओं में कृषक असंतोष आज सर्वाधिक गंभीर समस्या है जो कम या अधिक मात्र में देश के सभी क्षेत्रों और अधिकांश ग्रामीण-जीवन से संबद्ध हो गयी है। यह सच है कि ग्रामीण-जीवन की अन्य समस्याएं कृषक असंतोष का आधार हैं लेकिन यह समस्या स्वयं में आज एक ऐसी स्वतंत्र समस्या के रूप में विकसित हुई है।
प्रो. आन्द्रे बिते का विचार है कि ‘कृषक असंतोष ग्रामीण-जीवन की यद्यपि सर्वप्रमुख समस्या है लेकिन अब ....
प्रश्न : हिंदू सामाजिक संगठन के तत्वमीमांसीय और नैतिक आधारों की चर्चा कीजिए।
(2002)
उत्तर : हिंदू सामाजिक संगठन एक अत्यंत प्राचीन संगठन है। हिंदू सामाजिक संगठन के अंतर्गत बहुत सारी बातें आती है जिसमें हिंदू धार्मिक ग्रंथ, व्यक्ति, परिवार और समाज में अनुसरणीय नैतिक व्यवहारों की चर्चा आती है। जहां तक इस संगठन के तत्वमीमांसीय और नैतिक आधारों की बात है यह वस्तुतः धर्म के समझ से ही स्पष्ट किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि तत्वमीमांसीय आधार का मतलब उच्च प्राकृतिक शक्तियों के विश्वास से होता है ....
प्रश्न : जनजातियों का हिंदू संस्कृति में एकीकरण।
(2002)
उत्तर : विभिन्न जनजातीय समूहों के नृशास्त्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि जनजाति के लोगों के अपने पड़ोसियों के साथ संपर्क के कारण या तो वे आंशिक रूप से अलग हो गए या पूर्णरूप से उनमें घुल-मिल गये। उत्तर भारत की केंद्रीय हिमालय की थारु और खासी जनजातियां पूर्ण रूप से हिन्दुओं के साथ मिल गयीं। इन जनजातियों के लोगों ने हिंदूओं के जाति उपनामों को अपना लिया और जनेऊ भी धारण कर लिया। इन लोगों ....
प्रश्न : लुई डुमां की पवित्रता और अपवित्रता की संकल्पना की विवेचना कीजिए। ये संकल्पनाएं हिंदू जाति व्यवस्था की व्याख्या करने में कहां तक प्रासंगिक है?
(2002)
उत्तर : लुई डुमोंट की पवित्रता और अपवित्रता की अवधारणा उनकी प्रसिद्ध रचना ‘होमो हाइअररकिकस’ में स्पष्ट हुई है। इस पुस्तक के माध्यम से लुई डुमॉ ने भारतविद्या, मानवशास्त्र और उच्च समाजशास्त्रीय सिद्धांतों का बड़ी कुशलता एवं पांडित्यपूर्ण ढंग से समन्वय कर भारतीय जाति व्यवस्था और उसके प्रभावों का सारगर्भित विश्लेषण किया है। वास्तव में डुमॉ ने भारतीय जाति व्यवस्था को संस्तरण के रूप में देखा है। डुमॉ के अनुसार, भारत एक ऐसा धार्मिक समाज है जो ....
प्रश्न : उन तरीकों का परीक्षण कीजिए जिनके द्वारा भारतीय समाज को बहु-सांस्कृतिक समाज के रूप में सुदृढ़ किया जा सकता है। क्या एकल संस्कृति की प्रभाविता भारत में बहु-सांस्कृतिकता के लिए बाधक है?
(2002)
उत्तर : प्रत्येक संस्कृति में एक एकीकरण सिद्धांत और एक जीवन दर्शन होता है, जो संस्कृति के प्रत्येक पहलू में व्याप्त होता है। किसी संस्कृति विशेष के सांस्कृतिक आदर्श में सामान्य रूप से दो अथवा उससे अधिक इकाइयां होती हैं जहां तक बहु-संस्कृति की बात है, यह वास्तव में कई संस्कृतियों का समूह होता है। इस प्रकार के समाज में सभी समूहों को अपनी-अपनी संस्कृति का संचालन करने का पूर्ण अधिकार होता हैं। ये एक-दूसरे की सांस्कृतिक ....
प्रश्न : ब्राह्मणों के बीच असमानता।
(2002)
उत्तर : भारतीय समाज विभिन्न जातियों एवं उपजातियों, धर्मों एवं संप्रदायों में विभक्त है। वैसे तो भारतीय सामाजिक संरचना मुख्यतः चार वर्णों में विभक्त है जिसमें ब्राह्मण पहले दूसरे क्षत्रिय, तीसरे वेश्य एवं शूद्र का स्थान चौथे पायदान (क्रम) पर आता है लेकिन इन चारों वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त इनमें भी विभिन्न संस्तरण जिसके आधार पर इनमें नये संबंध बनते हैं और ये एक-दूसरे से अंतर्संबंधित होते हैं।
ब्राह्मण समुदाय के बीच भी विभिन्न प्रकार की जातियां पायी ....
प्रश्न : कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यकों की समस्याएं।
(2002)
उत्तर : नेहरूजी ने कहा था कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का परीक्षण इस बात से नहीं होना चाहिए कि बहुसंख्यक वर्ग क्या सोचता है बल्कि इस बात से आंका जाना चाहिए कि अल्पसंख्यक वर्ग कैसा महसूस करता है। वास्तव में कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य हैं जहां पर मुख्यतः हिंदू व सिख अल्पसंख्यक है। कश्मीर में आज नहीं बल्कि भारतीय स्वतंत्रता के प्रति के बाद से लोगों पर अत्याचार एवं हत्याएं आम बात सी हो गयी है। आये दिन ....
प्रश्न : भारतीय परिवार की अस्थिरता के लिए उत्तरदायी कारक कौन से हैं? क्या परिवार आधुनिक समाज में स्थित संकट से उत्तरजीवित रह पायेगा?
(2001)
उत्तर : भारतीय परिवार का मतलब मुख्य तौर पर संयुक्त परिवार व्यवस्था से लगाया जाता है। भारतीय परिवार को अस्थिर करने में औद्योगीकरण, नगरीकरण, जनसंख्या में वृद्धि, पश्चिम का प्रभाव एवं वर्तमान कानूनों का योगदान मुख्य रूप से रहा है। इस संबंध में बोटोमोर का कहना है कि ‘संयुक्त परिवार का विघटन केवल औद्योगीकरण से संबंधित दशाओं का ही परिणाम नहीं है बल्कि इसका प्रमुख कारण यह है कि संयुक्त परिवार आर्थिक विकास की आवश्यकताओंको पूरा करने ....
प्रश्न : भारत में कृषकवर्ग संरचना।
(2001)
उत्तर : यदि हम स्वतंत्रता पश्चात् के भारतीय ग्रामीण वर्ग की संरचना का विश्लेषण करें तो हमें चार वर्ग मिलते हैं: कृषि क्षेत्र में तीन वर्ग हैं, भू-स्वामी, आसामी और मजदूर, जबकि चौथा वर्ग है गैर-कृषि वालों का। ए.आर.देसाई के अनुसार भू-स्वामी लगभग 22 प्रतिशत, आसामी लगभग 27 प्रतिशत तथा श्रमिक वर्ग के 31 प्रतिशत लोग, और 20 प्रतिशत गैर-कृषक हैं। कृषकों का एक बड़ा भाग (60%) सीमान्त किसान होते हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी ....
प्रश्न : जाति और भारतीय राजव्यवस्था
(2001)
उत्तर : जाति एवं भारतीय राजव्यवस्था के बीच वर्तमान समय में अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। रजनी कोठारी ने जाति एवं भारतीय राजव्यवस्था के बीच संबंधों के इस विषय का विश्लेषण करके परीक्षण किया कि जातियों के वोटों के कारण राजनीति व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने पाया कि तीन कारक शिक्षा, सरकारी संरक्षण और धीरे-धीरे विस्तृत मताधिकार प्रमुख हैं। जाति के राजनीति में संलग्न होने के दो परिणाम हुए-जाति व्यवस्था ने राजनैतिक गतिशीलता के लिए नेतृत्व ....
प्रश्न : भारतीय ईसाइयों में जाति प्रथा।
(2000)
उत्तर : भारत में अधिकतर ईसाई मूल निवासियों के धर्म परिवर्तन द्वारा बने हुए हैं सन् 1952 में जिन हिंदुओं ने हिंदू धर्म को छोड़कर ईसाई धर्म अपनाया था उन्हें अपनी मूल जाति समूह से अलग होने पर भी विवश होना पड़ा था। लेकिन उन्होंने अपनी जाति की अवस्थिति कायम रखी। उन्होंने उच्च और निम्न जाति के बीच परंपरागत मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया जबकि वे ईसाई जीवन के नैतिक नियमों के प्रतिकूल थे। केवल इसी तरीके ....
प्रश्न : भारत के सुविधावंचित समूहों के लिए संरक्षात्मक भेदभाव नीति की आलोचनात्मक परीक्षा कीजिए। क्या आप इस नीति से किसी परिवर्तन का सुझाव देंगे?
(2000)
उत्तर : सरंक्षात्मक भेदभाव उन तरीकों में से एक है जिनके आधार पर सरकार सुविधावंचित समूहों के समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करती है। प्रथम, अनेक ऐसे संवैधानिक और अन्य कानूनी प्रावधान हैं जो अस्पृश्यों के प्रति भेदभाव समाप्त करते हैं और उन्हें अन्य नागरिकों के समान ही अधिकार प्रदान करते हैं। द्वितीय, कुछ लाभ केवल अनुसूचित जाति के लोगों को ही उनके योग्य बनाते हैं तथा अन्य लोगों को नहीं, जैसे- छात्रवृत्तियां, ऋण एवं अनुदान आदि। ....
प्रश्न : विभिन्न जनजातीय नीतियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत में जनजातीय विकास के लिए आप कौन-सी जनजातीय नीति का समर्थन करेंगे और क्यों?
(2000)
उत्तर : अनुसूचित जनजातियों के विकास पर और अधिक ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से अक्टूबर 1999 के एक अलग जनजातीय कार्य मंत्रालय का गठन किया गया। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से पृथक किया गया यह मंत्रालय अनुसूचित जनजातियों के बारे में नीति निर्धारित करने,योजनाओं में समन्वय स्थापित करने वाला शीर्ष मंत्रालय है।
देश में 194 समन्वित जनजातीय विकास परियोजनाएं चलायी जा रही है, जहां पर प्रखंडों अथवा प्रखंड समूहों की कुछ जनसंख्या में जनजातीय आबादी 50 ....
प्रश्न : परंपरागत जाति-व्यवस्था में सामाजिक गतिशीलता के कौन-से साधन उपलब्ध थे? समकालीन भारतीय समाज में सामाजिक गतिशीलता के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
(2000)
उत्तर : जब भी जाति एवं सामाजिक गतिशीलता की चर्चा की जाती है तो अनिवार्यतः भारतीय समाज में परिवर्तन की प्रक्रियाओं का जिक्र होता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि जाति व्यवस्था की बंद प्रकृति के बावजूद जातिगत पदक्रम तथा इसके प्रतिमानों में समय-समय पर परिवर्तन आते रहे हैं। उदाहरण के लिए, वैदिक काल में हिंदू धर्म की सांस्कृतिक रीतियां कालांतर में निषिद्ध हो गयीं। इनमें कुछ रीतियों के अनुसार वैदिक हिंदू धर्म जाति-जैववादी था, वैदिक ब्राह्मण-सोमरस ....
प्रश्न : कृषक समाज।
(1999)
उत्तर : कृषकों का वह समूह जिसके लिए कृषि आजीविका का मात्र साधन ही नहीं, वरन् उनकी जीवन-शैली का आधार भी होता है, कृषक समाज कहलाता है। कृषकों के लिए कृषि-वृत्ति का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता। वे व्यापार के लिए नहीं, वरन्, उपभोग के लिए खेती करते है। रेडफिल्ड के शब्दों में, ‘वे ग्रामीण व्यक्ति जो पारम्परिक जीवन-शैली के अंग के रूप में जीवनयापन के लिए अपनी भूमि को खुद जोतते हैं एवं जिसका नियंत्रण भी ....
प्रश्न : धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग की परिभाषा दीजिए। भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों की समस्याओं की विवेचना कीजिए।
(1999)
उत्तर : अल्पसंख्यक की कोई सर्वस्वीकृत परिभाषा नहीं है। अलग-अलग समाज में इसे अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया गया है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी इसे परिभाषित करने में विफल रहा है। राष्ट्र संघ घोषणा पत्र में धार्मिक, भाषाई, जातीय अल्पसंख्यकों को अधिकारों का जिक्र है। फिर भी अल्पसंख्यक वर्ग को इस प्रकार समझा जा सकता है- किसी समुदाय में सरलता से पहचाने जाने वाला ऐसा कोई भी प्रजातिक, धार्मिक अथवा नृजातीय समूह जो पूर्वाग्रहों ....
प्रश्न : शहरी मध्यम वर्ग के बढ़ते विस्तार के कारणों और परिणामों का परीक्षण कीजिए।
(1998)
उत्तर : किसी समाज का आर्थिक तथा सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था का वह भाग जिसका स्तर न हो अत्यधिक निम्न होता है और न ही अत्यधिक ऊंचा। यह सामाजिक वर्ग, कुलीन वर्ग तथा सर्वहारा द्वारा बने सामाजिक माप के दो छोर बिंदुओं के मध्य में स्थित होता है। इस वर्ग में मुख्यतः सफेदपोश तथा निम्न प्रबंधकीय व्यवसायों में कार्यरत व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है।
ब्रिटिश शासनकाल में भारत में जिन सामाजिक वर्गों का उदय हुआ वे इस ....
प्रश्न : धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों के संवैधानिक रक्षा-उपायों का विवेचन कीजिए और भारत में बढ़ते धार्मिक रूढि़वाद के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
(1998)
उत्तर : भारत में अल्पसंख्यकों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है- (क) धार्मिक अल्पसंख्यक, (ख) भाषाई अल्पसंख्यक एवं (ग) जनजातीय अल्पसंख्यक। लगभग सभी देशों में धर्म एवं भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक समूहों को मान्यता प्रदान की गई है। धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों के संवैधानिक रक्षा उपायों हेतु अनेक प्रयास किये गए हैं। भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान किये गये हैं। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व ....