प्रश्न : गरीबी का नारीकरण।
(2015)
उत्तर : गरीबी का नारीकरण एक ऐसी अवधारणा है जो वैश्विक गरीबी में नारी संख्या की विषम प्रतिशतता को दर्शाती है अर्थात गरीब जनसंख्या में नारी संख्या पुरुष संख्या से कहीं अधिक होती है। गरीबी का नारीकरण एक निरपेक्ष अवधारणा न होकर सापेक्ष अवधारणा है जो एक समान बिंदु पर पुरुष व महिला के बीच गरीबी के स्तर को दर्शाती है।
यूनिफेम द्वारा इसका इस रूप में वर्णन किया गया है कि नारी द्वारा गरीबी का बोझ अधिक ....
प्रश्न : ग्रामीण भूमिहीन मजदूर और विकास प्रभावित विस्थान। (सिविल सेवा मुख्य परीक्षा
(2014)
उत्तर : सामान्यतः खेतिहर श्रमिकों या भूमिहीन श्रमिकों से हमारा तात्पर्य उन श्रमिकों से है जो, कृषि कार्य द्वारा अपना जीविकोपार्जन करते हैं और जीवन-निर्वाह के लिए कृषि क्षेत्रें पर ही निर्भर रहते हैं।
राष्ट्रीय श्रम आयोग के अनुसार, भूमिहीन मजदूर वह है, जो मूलतः अकुशल व अव्यवस्थित है और जिसके पास जीविकोपार्जन के लिए अपने श्रम के अतिरिक्त लगभग कुछ भी नहीं होता है। इस प्रकार ऐसे श्रमिक की आय का अधिकांश भाग खेती से प्राप्त मजदूरी ....
प्रश्न : बाल मजदूरी।
(2013)
उत्तर : सामान्यतः वे व्यक्ति जिन्होंने अपनी 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो, बालक कहे जाते हैं। लेकिन ये बालक अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण विभिन्न उद्योगों एवं पेशों में नियोजित होने लगे थे।
भारत में सर्वप्रथम 1938 में Employment of children act पारित करके 14 वर्ष से कम उम्र के बालक के कार्य दशाओं को विनियमित करने का प्रयास किया गया। लेकिन नियोजक द्वारा इन बालकों को खतरनाक कार्यों, पेशाओं एवं उद्योगों ....
प्रश्न : हरित क्रान्ति।
(2013)
उत्तर : 1960 तथा 1970 के दशक के दौरान कृषि क्षेत्र में क्रांति हुई, जिसे हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री दांते वाला का मत है कि भारत में हरित क्रान्ति संस्थागत के बजाय तकनीकी स्वभाव की थी जिससे कृषि के लिए नई विधियों तथा आगतों का प्रयोग होने लगा।
कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए आधुनिक साधनों, जैसे-उर्वरक, कृषि, ट्टण, विपणन व्यवस्था आदि की सहायता से सघन प्रयास करने का विचार रखा। ....
प्रश्न : महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना।
(2013)
उत्तर : मनरेगा का क्रियान्वयन ग्रामीण विकास मंत्रलय द्वारा किया जाता है, जो सरकार के सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक है। 2009-10 में इसका नाम बदलकर मनरेगा कर दिया गया। इस योजना के तहत सरकार की गरीबों तक सीधे पहुंच रहेगी और विकास के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाएगा।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिन का गारंटीशुदा अकुशल मजदूरी रोजगार वित्तीय वर्ष में प्रदान ....
प्रश्न : पंचवर्षीय योजनाएं।
(2013)
उत्तर : भारत की पंचवर्षीय योजनाओं पर आधारित नई सामाजिक व्यवस्था की रूप रेखा निम्नांकित रूप में स्पष्ट की जा सकती है-
पंचवर्षीय योजना के निर्माण की जिम्मेदारी योजना आयोग पर है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इस समय 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) चलाई जा रही है। इस योजना के ....
प्रश्न : क्या नवीन आर्थिक नीति एवं आर्थिक सुधारों से श्रमिक वर्ग आंदोलन कमजोर हुआ है? उदाहरण देकर अपने विचार समझाइये।
(2012)
उत्तर : नवीन आर्थिक नीति एवं आर्थिक सुधारों से श्रमिक वर्ग आंदोलन पर विगत कुछ वर्षों में व्यापक प्रभाव पड़ा है। सरकार द्वारा 1991 के बाद अर्थव्यवस्था में आमूल-मूल परिवर्तन करने हेतु प्रस्तावित आर्थिक नीतियों के तहत लाइसेंसी राज की समाप्ति ने एक नए परिदृश्य को जन्म दिया है। आज बाजार में एक प्रतिस्पर्द्धात्मक माहौल निर्मित हुआ है। बढ़ती हुई आर्थिक गतिविधियों के कारण बाजार में उत्पादन हेतु कई प्रतिस्पर्धा कम्पनियों के आगमन ने श्रमिक वर्ग आंदोलन ....
प्रश्न : हरित क्रान्ति के कुछ सकारात्मक एवं नकारात्मक सामाजिक परिणाम बताइये। हरित क्रांति द्वारा ग्रामीण सामाजिक संरचना में किस प्रकार के परिवर्तन हुए हैं?
(2012)
उत्तर : देश को खाद्यान्न के मामले में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए 60 के दशक में कृषि क्षेत्र में एक प्रौद्योगिकी नवाचार की मदद से एक क्रान्ति की शुरुआत की गयी, जो हरित क्रांति कहलाती है। इसके उन्नत बीज, उर्वरकों, कीटनाशी, सिंचाई के उन्नत साधनों की मदद से फसलों का अत्यधिक उत्पादन किया गया। इस क्रान्ति ने भारतीय किसानों के मध्य कई सकारात्मक तथा नकारात्मक परिणाम को उत्पन्न किया। हरित क्रान्ति के सकारात्मक परिणाम ....
प्रश्न : ग्रामीण भारत में मध्यस्तरीय कृषक वर्ग के समेकन और वृद्धि हेतु उत्तरदायी कारकों पर टिप्पणी कीजिये। यह भारतीय कृषि में पूंजीवाद से किस प्रकार संबंधित हैं?
(2011)
उत्तर : भारत में कृषक तात्पर्य है स्वयं व स्वयं के परिवार द्वारा कृषि करने वाले व्यक्ति से माना जाता है एवं खेती उसकी जीवन शैली होती है। पर मुख्यता 1970 के दशक में हुई हरित क्रान्ति तथा कृषि के आधुनिकीकरण ने भारत में एक नवउदित समृद्ध कृषक वर्ग का विकास किया है। डॉ. श्री निवास ने इनकी परिभाषा देते हुए लिखा है कि ‘‘यह आर्थिक विकास की प्रक्रिया, कृषि के आधुनिकीकरण, कृषि के बाजारीकरण जैसी घटनाओं ....
प्रश्न : ग्रामीण वर्ग संरचना पर हरित क्रान्ति का प्रभाव
(2011)
उत्तर : भारत में साठ के दशक में कृषि क्षेत्र में जैविक तथा मशीनी नवीनताओं की प्रक्रिया की शुरुआत को हरित क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है, जिससे फसल पैदा करने वाले क्षेत्रें की संख्या, फसल की पैदावार में वृद्धि, कृषि उत्पादन क्षमता में वृद्धि कर ग्रामीण वर्ग संरचना को अत्यधिक प्रभावित किया है। हरित क्रान्ति से उत्पादन तथा आमदनी में विभिन्नतायें पैदा हो गई हैं।
हरित क्रान्ति के लाभ कृषक वर्ग में एक समान रूप से वितरित ....
प्रश्न : ‘73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों ने ग्रामीण भारत में सामाजिक लामबंदी को अभिप्रेरित किया है’ इस पर चर्चा कीजिए।
(2004)
उत्तर : देश की पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप प्रदान करने के लिए और इनमें एक रूपता लाने के लिए संसद ने दिसंबर 1992 में संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम 1992 स्वीकार किया। 173वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 में ग्राम सभा को और सक्रिय करने, ग्राम, खंड और जिला स्तरों पर पंचायतों की स्थापना करने, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए हर स्तर पर उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण करने, सभी निर्वाचित संस्थाओं को निर्धारित कार्यकाल ....
प्रश्न : ग्रामीण विकास की रणनीतियां।
(2004)
उत्तर : भारत सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में द्रूतगामी तथा निरंतर विकास के लिए पूर्णतः प्रयत्नशील है। ग्रामीण विकास मंत्रालय अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन में लगा हुआ है जिनका उद्देश्य ग्रामीण जनता को योग्य बनाकर उनके जीवन-स्तर को सुधारना है। गरीबी उन्मूलन तथा त्वरित सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य के साथ विकास कार्यक्रमों को समाज के सर्वाधिक उपेक्षित वर्ग तक पहुंचाने के लिए क्रियान्वित की जा रही है। स्वच्छ पेयजल, ग्रामीण आवास तथा सड़क संपर्क को उच्च प्राथमिकता ....
प्रश्न : वैश्वीकरण के सामाजिक परिणाम।
(2004)
उत्तर : सामाजिक-आर्थिक संबंधों का संपूर्ण विश्व तक विस्तार वैश्वीकरण है। वर्तमान समय में, मानव जीवन के अनेक पक्ष, जिन समाजों में हम रह रहे हैं, उनसे हजारों मील दूर स्थित संगठनों और सामाजिक ताने-बाने से प्रभावित होने लगे हैं। इस प्रकार, विश्व एक एकिक समाज व्यवस्था का रूप धारण करता जा रहा है। इस संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्ववाद के द्वारा एक ऐसी नवीन चेतना का उदय हो रहा है कि संपूर्ण ....
प्रश्न : विवेचना कीजिए कि किस प्रकार व्यावसायिक विविधता ने भारत में सामाजिक स्तरीकरण के प्रारूप को प्रभावित किया है?
(2003)
उत्तर : व्यावसायिक विविधता ने भारत में सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न पक्षों को भिन्न-भिन्न रूप में प्रभावित किया है। परंपरावादी भारत की सामाजिक संरचना मुख्य रूप से जाति व्यवस्था से जुड़ी हुई थी जो भारत में सामाजिक स्तरीकरण का एक प्रमुख पक्ष है। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण जाति के लोग मुख्यतः पूजा-पाठ से जुड़े रहे हैं दूसरी ओर चमार जाति के लोग जूता वगैरह का व्यवसाय करते रहे हैं। परंतु आधुनिकीकरण, शिक्षा का प्रसार एवं नगरीकरण के ....
प्रश्न : हरितक्रांति के सामाजिक परिणाम।
(2003)
उत्तर : 1960 के दशक के मध्य से कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण जैविक तथा मशीनी नवीनताओं की प्रक्रिया शुरू हुई जिनका परिणाम हरित क्रांति है। हरित क्रांति का अभिप्राय कृषि के क्षेत्र में उन जैविक तथा मशीनी नवीनताओं से है जिनका प्रयोग उच्च पैदावार वाले बीजों, रासायनिक खादों, ट्रैक्टरों, नलकूपों आदि में पाया जाता है। सबसे पहले हरित क्रांति पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयी तथा धीरे-धीरे अन्य प्रदेशों के विशेष क्षेत्रों में भी ....
प्रश्न : नव-धनाढ्य कृषिक वर्ग के अभिलक्षण।
(2002)
उत्तर : नव-धनाढ्य कृषक वर्ग वास्तव में भारतीय जमींदारी पद्धति से विकसित एक व्यवस्था है। इस वर्ग में व्यक्ति बहुत तरीकों से अपनी प्रस्थिति को कायम रखने का प्रयास करता है। यह कृषक वर्ग न सिर्फ कृषि पर ही आधारित होते हैं बल्कि औद्योगिक व्यवस्थाओं पर भी नियंत्रण रखते हैं। हम संक्षेप में इसके कुछ प्रमुख अभिलक्षण पर प्रकाश डाल सकते हैं-
प्रश्न : निजीकरण एवं विश्वव्यापीकरण (भूमंडलीकरण)
(2001)
उत्तर : निजीकरण एवं विश्वव्यापीकरण एक-दूसरे से अंतःसंबंधित हैं। वास्तव में निजीकरण भूमंडलीकरण का ही परिणाम है। भूमंडलीकरण के फलस्वरूप सभी क्षेत्रों को व्यापार के लिए स्वतंत्र कर स्वतंत्र बाजार प्रणाली की शुरुआत हुई। भूमंडलीकरण मूलतः तकनीकी, प्रोद्योगिकी एवं संचार के आदान-प्रदान के लिए प्रकाश में लाया गया था। इस नीति के तहत विभिन्न देशों के आयात-निर्यात के प्रतिबंध ढीले कर दिये गये जिसके कारण बहु-राष्ट्रीय कंपनियों की संख्या बढ़ने लगी जिससे देश के आंतरिक उत्पादित वस्तुओं ....
प्रश्न : भारतीय समाज पर पश्चिम का प्रभाव।
(2001)
उत्तर : भारतीय समाज पर पश्चिम का प्रभाव का आकलन हम मूलतः पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत करते हैं। श्रीनिवास के अनुसार विभिन्न जातियों खासतौर पर उच्च जातियों ने ब्रिटिश लोगों की विभिन्न सांस्कृतिक प्रणालियों को अपना लिया है। सांस्कृतिक अनुकरण के अतिरिक्त विज्ञान, प्रोद्योगिकी, शिक्षा, वैचारिकी और मूल्यों के क्षेत्रों में बहुत सी बातें स्वीकार की गई हैं। पश्चिमीकरण की अवधारणा में मानवतावाद और तर्कबुद्धिवाद के मूल्य आधारित है। श्रीनिवास के अनुसार ये दोनों मूल्य ‘आधुनिकीकरण’ ....
प्रश्न : निर्धनता उपशमन कार्यक्रम
(2001)
उत्तर : 1997-98 में गरीब से संबंधित अनेक कार्यक्रम को एक व्यवस्थित रूप दिया गया। नौंवी योजना सरकार की नीति के चार महत्वपूर्ण आयामों के संदर्भ में विकसित की गई, ये हैं जीवन-स्तर सुधारना, उत्पादक रोजगार जुटाना, क्षेत्रीय संतुलन रखना और आत्मनिर्भरता लाना। योजना का मुख्य केंद्र है- ‘सामाजिक विकास और समानता के साथ विकास’। ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी उन्मूलन के लिए निम्नांकित कार्यक्रम चलाये गये हैं:
प्रश्न : भारत के लिए वैश्वीकरण के परिणाम
(2000)
उत्तर : वैश्वीकरण का प्रयोग सर्वप्रथम सारे विश्व को तकनीकी एवं संचार के माध्यम से एक छत प्रदान करने के रूप में हुआ था, जिसे हम ‘ग्लोबल विलेज’ कहते हैं। वैश्वीकरण किसी भी देश के लिए अभिशाप एवं वरदान दोनों है। परंतु जहां तक विकासशील देश का सवाल है, वहां अधिक दुष्परिणाम ही देखने को मिला है। इसका कारण यह है कि विकसित देश अपनी सुविधानुसार विकासशील देशों का शोषण करती हैं एवं यह प्रक्रिया इसमें काफी ....
प्रश्न : ‘हरित क्रांति’ से आपका क्या अभिप्राय है और इसके सामाजिक आर्थिक परिणाम क्या है? विवेचना कीजिए।
(1999)
उत्तर : 1960 के दशक के मध्य से कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण जैविक तथा मशीनी नवीनताओं की प्रक्रिया शुरू हुई जिनका परिणाम हरित क्रांति है। शुरू में यह पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रही। धीरे-धीरे यह अन्य राज्यों के कुछ हिस्सों में भी फैल गई। इसके फलस्वरूप, इन क्षेत्रों में किसान उच्च पैदावार वाले बीज, अधिक मात्र में रासायनिक खाद, सिंचाई के लिए पर्याप्त मात्र में पानी तथा आधुनिक कृषि तकनीकी जैसे ट्रैक्टर, ....
प्रश्न : परंपरागत ग्रामीण आर्थिक संरचनाओं पर बाजार अर्थव्यवस्था के प्रभावों का मूल्याकंन कीजिए।
(1998)
उत्तर : परंपरागत ग्रामीण आर्थिक संरचना पर बाजार अर्थव्यवस्था के प्रभावों का मूल्यांकन करने से पहले हम यहां बाजार अर्थव्यवस्था के बारे में संक्षिप्त जानकारी देना चाहेंगे।