प्रश्न : प्रेस की स्वतंत्रता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
(2015)
उत्तर : स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही प्रेस की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण विषय रहा है और इसी महत्व को देखते हुए संविधान निर्माताओं ने प्रेस की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत माना है। प्रेस की स्वतंत्रता का शासन करने वाली संस्थाओं के प्रति विश्वास तथा अविश्वास पैदा करने से सीधा संबंध है। आज प्रेस की भूमिका इतनी बढ़ गयी है कि इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने ....
प्रश्न : एक विवेकी लोकतंत्री के रूप में बी-आर- अम्बेडकर पर चर्चा कीजिए।
(2015)
उत्तर : डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत में उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान मिला। उनकी सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से प्रदर्शित होती है। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और इन्होंने समाज रूप से रूढि़वादी और जातिवादी हिन्दू समाज और इस्लाम की ....
प्रश्न : भारतीय राष्ट्रवाद के विश्लेषण में मार्क्सवादी उपागम की व्याख्या कीजिए।
(2015)
उत्तर : प्रत्येक समाज में सहयोग और संघर्ष पाया जाता है और सामान्य रूप से इसी सहयोग और संघर्ष को मार्क्स ने अपने अध्ययन का केंद्र बिंदु बनाया था। मार्क्सवादी परिपेक्ष्य में व्यवस्था में पाए जाने वाले तनाव और संघर्ष के आयामों को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। इस परिपेक्ष्य के समर्थक इस बात पर बल देते हैं कि आधुनिक समाज तनाव व संघर्ष से आक्रान्त है और सामाजिक जीवन में सामान्य सहमति न होकर असहमति, प्रतिस्पर्धा ....
प्रश्न : भारतीय राष्ट्रीयता की सामाजिक पृष्ठभूमि का विवेचन कीजिए।
(2014)
उत्तर : अन्य सामाजिक तथ्यों की तरह राष्ट्रवाद भी ऐतिहासिक तथ्य है। लोक जीवन के विकास क्रम में वस्तुनिष्ठ और भावनिष्ठ दोनों प्रकार के ऐतिहासिक तत्वों की परिपक्वता के पश्चात राष्ट्रवाद का उद्भव हुआ। जैसे ई एच कार ने लिखा है। सही अर्थों में राष्ट्रों का उदय मध्ययुग की समाप्ति पर ही हुआ। व्यापक राष्ट्रीयता के आधार पर समाज राज्य और संसकृति के उद्भव के पूर्व संसार के विभिन्न भागों का जन जीवन मोटे तौर पर इन ....
प्रश्न : सामाजिक परिवर्तन के जीवंत रूप में संविधान।
(2012)
उत्तर : समाज एक निरंतर परिवर्तनशील अवधारणा के रूप में जाना जाता है और विभिन्न ऐतिहासिक कालानुक्रम में यह परिवर्तन की गतिशील प्रक्रिया देखी जा सकती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के कई देशों में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा विकसित हुई तथा सामाजिक परिवर्तन के परम्परागत कारणों के स्थान पर संवैधानिक व विधिक सामाजिक परिवर्तन को सार्वभौमिक रुप से सहायता मिलने लगी।
भारत में भी इसी क्रम में आजादी के बाद निर्मित संविधानिक व्यवस्था के तहत ....
प्रश्न : क्षेत्रीय राजनीतिक अभिजन एवं प्रजातांत्रिक प्रक्रिया।
(2012)
उत्तर : भारत में प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करने में क्षेत्रीय राजनीतिक अभिजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। क्षेत्रीय स्तर पर लोगों को जागरूक कर उनके अधिकार एवं कर्त्तव्यों संबंधी हितों को पूरा करने में इन क्षेत्रीय राजनीतिक अभिजन की भूमिका विगत कुछ दशकों में काफी बढ़ी है। भारत में एकपरिसंघात्मक शासन प्रणाली के कारण केन्द्र तथा राज्यों में मध्य संबंध काफी उतार-चढ़ाव वाली प्रकृति के रहे है। केन्द्र में अगर किसी पार्टी की सरकार सत्ता ....
प्रश्न : भारत में लोकतंत्रीय प्रणाली के लचीलेपन के कारणों की पहचान कीजिए।
(2010)
उत्तर : आज से लगभग 60 वर्ष पहले जब नये भारत का गठन पाकिस्तान के बंटवारे के बाद हुआ, तब लोगों के मन में शंका थी क्या इतना विविधता एवं विषमता वाला देश संगठित रह पायेगा। भारत जो विश्व के चार प्रमुख धर्मों का जन्म स्थली भी रहा है, इसे एक अलग पहचान एवं अनेकता में एकता का बल प्रदान करता है। भारत में संसदीय जनतंत्र की स्थापना एवं एक जन उदार राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना, जवाहरलाल ....
प्रश्न : बहुवाद तथा राष्ट्रीय एकता।
(2005)
उत्तर : बहुवाद समाज एक ऐसा समाज है जो धर्म, भाषा, जाति, प्रजाति, नस्ल आदि के आधार पर विभिन्न समूहों और समाजों में बंटे होते हैं। वास्तव में, बहुल समाज की ये विशेषताएं बहुधा सभी समाजों में देखने को मिलती हैं, अतः यह अवधारणा कभी-कभी ‘बहुल-सांस्कृतिक समाज’ के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग की जाती है। भारत और अमेरिका इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं जहां अनेक जाति, प्रजाति, धर्म, नस्ल, संस्कृति, भाषा के लोग रहते हैं।
किसी भी राष्ट्र ....
प्रश्न : भारत में राजनीतिक दलों के सामाजिक आधार की विवेचना कीजिए। भारतीय प्रजातंत्र पर इसका क्या प्रभाव रहा है?
(2005)
उत्तर : राजनीतिक दल के आधार के बारे में राजनैतिक समाजशास्त्रियों का विचार राजनैतिक वैज्ञानिकों से भिन्न है। राजनैतिक समाजशास्त्रियों ने राजनीतिक दल का आधार सामाजिक समूह माना है। मैक्स वेबर ने राजनीतिक दल को सामाजिक संबंध की एक सामूहिक प्रकार से माना है जो मूलतः भर्ती की निःशुल्क प्रविधि पर निर्भर करता है। राजनीतिक दल एक सामाजिक समूह है जो संबंध के अन्तः निर्भरता पर आधारित होती है। दूसरी बात यह है कि यह लक्ष्य प्राप्ति ....
प्रश्न : नागरिक समाज में धर्म की भूमिका।
(2004)
उत्तर : नागरिक समाज वास्तव में समाज के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता प्रदान करता है जिसके अंतर्गत व्यक्ति एक निश्चित सिद्धांत एवं नीति के अनुरूप बेहिचक कार्य सम्पन्न करता है। इसमें किसी समूह या व्यक्ति का प्रभुत्व से इन्कार किया जाता है। परंतु कार्ल मार्क्स ने नागरिक समाज के संबंध का प्रयोग एक ऐसे भ्रष्ठ पूंजीवादी समाज के लिए किया है जो चरम व्यक्तिवादिता तथा भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा पर आधारित होता है। इस भ्रष्ट पूंजीवादी समाज के फलस्वरूप ....
प्रश्न : प्रवसन और जनजातीय समाप्त।
(2004)
उत्तर : प्रवसन एवं जनजातीय समाज की अवधारणा का सम्मिलित रूप को अलग नहीं किया जा सकता है। भारत में जनजातीय समाज के प्रवसन के मुख्य दो कारण रहे है- एक औद्योगिकरण एवं दूसरा विस्थापन। परंपरागत रूप से आदिवासी समाज जंगलों में एवं प्रकृति की गोद में निवास करने वाला माना जाता था परंतु वर्तमान समय में ये लोग अपने प्राकृतिक निवास से बाहर निकले हैं, जिसका प्रमुख कारण जंगलों पर राज्य का प्रभुत्व स्थापित होना है।
औद्योगीकरण ....
प्रश्न : भ्रष्टाचार के सामाजिक- सांस्कृतिकपरिणामों का विश्लेषण कीजिए और उसकी रोकथाम करने के लिए उपचारक उपाय सुझाइये।
(2004)
उत्तर : भ्रष्टाचार बहुत व्यापक शब्द है। इसे रिश्वत के रूप में समझा जा सकता है। इसे निजी लाभ के लिए सार्वजनिक शक्ति का इस प्रकार प्रयोग करना, जिसमें कानून तोड़ना शामिल हो या जिससे समाज के मानदंडों का विचलन हुआ हो, भी कहा जाता है।
वर्तमान समय में भारतीय समाज में भ्रष्टाचार अपने विकराल रूप में इस तरह फैल चुका है कि अब यह मात्र व्यवहार न होकर एक स्वीकृति मनोवृति बन चुका है। भले ही इसका ....
प्रश्न : भ्रष्टाचार के सामाजिक आयाम।
(2003)
उत्तर : भ्रष्टाचार के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा तरीका है जो सार्वजनिक साधन या शक्ति का उपयोग व्यक्ति निजी लाभ के लिए करता है एवं कानून का उल्लंघन करता है। समाज में भ्रष्टाचार अनेक स्वरूपों में फैला हुआ है। इनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं- रिश्वत, भाई-भतीजावाद, दर्विनियोग, संरक्षण, और पक्षपात। सामाजिक विश्लेषण बताता है कि सामाजिक बंधन और नातेदारी भ्रष्टाचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आधुनिक प्रशासक का सबसे ....
प्रश्न : भारत में सांप्रदायिक तनाओं के लिए उत्तरदायी सामाजिक-आर्थिक कारकों का वर्णन कीजिए। इनको नियंत्रित करने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
(2003)
उत्तर : एक समुदाय के सदस्य जो दूसरे समुदाय के सदस्यों और धर्मों के विरुद्ध प्रतिरोध करते हैं। उन्हें सांप्रदायिक कहा जा सकता है। यह विरोध किसी विशेष समुदाय पर झूठे आरोप लगाना, क्षति पहुंचाना, और जानबूझकर कर अपमानित करने का रूप है। उससे भी अधिक यह विरोध लूटना, असहाय और निर्वल व्यक्तियों के घरों और दुकानदारों को आग लगाना, उनकी स्त्रियों को अपमानित करना और औरतों को जान से मार देने तक का वीभत्स रूप भी ....
प्रश्न : दबाव समूहों तथा हित समूहों में अंतर बताइए। समकालीन भारतीय राजनीति में कुछ प्रमुख दबाव समूहों की भूमिका का वर्णन कीजिए।
(2003)
उत्तर : राजनीतिक प्रक्रिया में दबाव समूहों का विशिष्ट महत्व है। ऐसा भी समय था जब दबाव तथा हित समूहों को अनैतिक माना जाता एवं हेय-दृष्टि से देखा जाता था। किन्तु आधुनिक काल में दबाव तथा हित समूहों को लोकतंत्र का पक्षपोषक एवं सहयोगी माना जाने लगा है। विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्था में इन समूहों का महत्व और योगदान इतना अधिक बढ़ गया है कि इन्हें न केवल एक आवश्यक बुराई माना जाता है अपितु राजनीतिक ....
प्रश्न : क्या धर्मनिरपेक्षता एक कमजोर विचारधारा है? भारत में धर्मनिरपेक्षता विरोधी रुखों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(2002)
उत्तर : धर्मनिरपेक्षता शब्द सबसे पहले 1851 में जार्ज जैकब होलीओक ने प्रयोग किया था। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता के उदय के साथ ही सांसारिक जीवन के क्रियाकलापों में धर्म का हस्तक्षेप कम होता गया। इस संदर्भ में ‘धर्मनिरपेक्षता’ को ‘धर्महीनता’ माना गया है। पिटर बर्जर ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म का निजीकरण माना है। परंतु भारत में धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा पश्चिम के शब्दों का प्रयोग केवल राज्य के संदर्भ में किया गया है। भारतीय धर्म-निरपेक्षता मुख्यतः सांप्रदायिकता विरोधी ....
प्रश्न : आरक्षण और पंचायती राज संस्थाएं।
(2002)
उत्तर : अनुच्छेद 40 के अंतर्गत संविधान गांव में स्व सरकार को संगठित करने के लिए ग्राम पंचायत की व्यवस्था करता है। पंचायती राज व्यवस्था को सबसे पहले राजस्थान में 1959 में लागू किया गया है परंतु पंचायती राज को अंतिम रूप से 73वें संविधान संशोधन अधिनियम अप्रैल 1993 में लागू किया गया। जहां तक पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण का प्रश्न है इसके अंतर्गत सभी वर्ग के लोगों को वहां से स्थिति के आधार पर प्राप्त ....
प्रश्न : राजनैतिक अभिजात वर्ग के प्रत्यय को विस्तार से समझाइए। राजनैतिक अभिजात वर्गों के सामाजिक संरचनात्मक स्रोत किस प्रकार उनके राजनैतिक पूर्वाभिमुखीकरण को प्रभावित करते हैं? व्याख्या कीजिए।
(2001)
उत्तर : अभिजन समाज में सर्वाधिक प्रभावशाली और प्रतिष्ठावान स्तर है। ‘अभिजन’ में वे लोग आते हैं जो किसी क्षेत्र में श्रेष्ठ नेता माने जाते हैं। इस प्रकार राजनैतिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, व्यापारिक, कला आदि क्षेत्रों में अभिजन होते हैं। अनेक समाजशास्त्रियों ने इनकी अलग-अलग व्याख्या की है। पेरी गेरियन्ट के अनुसार, ‘कुछ अल्पसंख्यक जो विशिष्ट क्षेत्रों में समाज के मामले में अद्वितीय प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।’ बैंक ने अभिजन को ‘निर्णय करने वाले व्यक्ति जिनकी शक्ति समाज ....
प्रश्न : धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रत्यय की व्याख्या कीजिए और धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में भारत की समस्याओं की विवेचना कीजिए।
(2001)
उत्तर : धर्मनिरपेक्षवाद ऐसी विचारधारा/विश्वास है जिसके आधार पर धर्म और धर्म संबंधी विचारों को इहलोक संबंधी मामलों में जानबूझकर दूर रखा जाना चाहिए। यह तटस्थता की बात है। पीटर बर्गर के अनुसार, धर्मनिरपेक्षीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा समाज व संस्कृति के विभागों को धार्मिक एवं प्रतीकों पर प्रभाव से दूर रखा जाता है।
वेबर धर्मनिरपेक्षीकरण को तर्क-संगतिकरण की एक प्रक्रिया मानते हैं। प्रदत्त लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त सिद्धांत हैं जो वैज्ञानिक विचारों पर ....
प्रश्न : प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण का क्या अर्थ है? भारत में पंचायती राज की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन कीजिए।
(2001)
उत्तर : स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नेताओं का ध्यान ग्रामीण पुनर्निर्माण और पंचायतों की पुनः स्थापना की ओर गया। संविधान की धारा 40 में यह व्यवस्था की गई है कि ‘राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उनको समस्त अधिकार प्रदान करेगा जिससे वे स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य हो जाएं। ‘देश के स्वतंत्र होने के पश्चात् यहां शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया गया और जनता को स्वयं अपने प्रतिनिधियों को ....
प्रश्न : धार्मिक कट्टरता।
(2000)
उत्तर : धार्मिक कट्टरता धार्मिक उन्माद असहिष्णुता और संकीर्णता के रूप में देखा जाता है। इस प्रवृत्ति के फलस्वरूप ‘राम राज्य’ की कल्पना करना असंभव सा प्रतीत होता है। इस धार्मिक कट्टरता का अंतिम प्रतिफल सांप्रदायिकता के रूप में देखने को मिलता है। यह कट्टरवाद विभिन्न धर्म के अनुयायियों के बीच पाया जाता है और शायद आज के परिप्रेक्ष्य में यह कहना उचित होगा कि यह सामाजिक स्तर पर न रहकर राजनीतिक तंत्र के रूप में विकसित ....
प्रश्न : भारत में प्रजातंत्र के कौन-से प्रकार्य रहे हैं? क्याप्रजातंत्र कुछ एक परंपरागत सामाजिक असमानताओं को हटाने में सफल रहा है?
(2000)
उत्तर : टी.बी. बोटोमोर के अनुसार, ‘प्रजातंत्र का अर्थ है कि लोगों में पर्याप्त मात्र में समानता होनी चाहिए इसका अर्थ यह है कि धन, सामाजिक स्तर या शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने में असमानता इतनी अधिक न हो कि सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों का एक वर्ग स्थायी रूप से दूसरे वर्ग के अधीन हो जाये या राजनीतिक अधिकारों का वास्तविक रूप से उपयोग करने में उनमें असमानता उत्पन्न हो जाये। असमानता दो प्रकार ....
प्रश्न : सत्ता के विकेंद्रीकरण के संदर्भ में 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों की विवेचना कीजिए।
(1999)
उत्तर : देश की पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप प्रदान करने के लिए और इनमें एकरूपता लाने के लिए संसद ने दिसंबर 1992 में संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम 1992 स्वीकार किया। इस संविधान संशोधन अधिनियम में नागालैंड, मेघालय और मिजोरम राज्यों तथा कुछ अन्य निर्दिष्ट क्षेत्रों को छोड़ सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में स्वायत्त शासन व्यवस्था की इकाइयों के रूप में पंचायतें स्थापित करने का प्रावधान हैं। आर्थिक-विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाने तथा ....
प्रश्न : धर्मनिरपेक्षता।
(1999)
उत्तर : ‘धर्म-निरपेक्षता’ शब्द सबसे पहले 1851 में जार्ज जैकब होली ओक ने गढ़ा था। अंग्रेजी में ‘सेक्युलर’ शब्द लैटिन के ‘सेकुलम’ शब्द से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘यह वर्तमान युग’। यह विश्व के लिए प्रयुक्त शब्दों में से भी एक है और काफी लम्बे समय तक सेक्युलर शब्द का अर्थ ‘सांसारिकता’ माना जाता था, जो ‘धर्म’ या ‘पवित्रता’ के प्रतिकूल था। लेकिन होली ओक द्वारा औपचारिक रूप से शब्द गढ़े जाने से बहुत पहले, ....
प्रश्न : राष्ट्रीय एकता।
(1999)
उत्तर : समाजशास्त्री श्री निवास के अनुसार, ‘एकता की अवधारणा हिंदू धर्म के अन्तर्निहित है। भारत के कौन-कौन से हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थान हैं। पूरे देश के हर भाग में शास्त्रीय संस्कृति के कुछ विशिष्ट पहलू दृष्टि-गोचर होते हैं। भारत न केवल हिंदुओं के लिए ही पवित्र भूमि हैं, यह सिख, जैन और बौद्ध-धर्म के अनुयायियों के लिए भी पवित्र स्थल है। मुसलमानों और ईसाइयों के भी भारत में अनेक तीर्थ स्थान हैं। विभिन्न धार्मिक समूहों ....
प्रश्न : क्षेत्रीय राजनीतिक-दलों के उद्भव परिणाम।
(1998)
उत्तर : वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का उद्भव हो रहा है जो विशेष रूप से क्षेत्रीय हित के संबंधों पर आधारित है। कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दल-बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी; झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस; आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी; तमिलनाडु में डी. एम. के.; पी. एम. के. इत्यादि है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उद्भव के परिणाम निम्नलिखित हो सकते हैं-