प्रश्न : भारत में ‘पी. सी.पी.एन.डी.’ अधिनियम को कार्यान्वित करना क्यों आवश्यक है?
(2015)
उत्तर : भारत में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारतीय संसद द्वारा कानून बनाया गया तथा प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण को प्रतिबंधित किया गया। आज भी भारत के बड़े शहरों में जहां औद्योगिक अस्पताल, स्कूल की उपलब्धता, रोजगार की उपलब्धता आदि सुविधाएं हैं वहां पर भी पुरुष शिशु की चाह होती है। सबसे बेहतर उदाहरण दिल्ली का ही है जहां प्रत्येक 1000 पुरुषों पर 820 महिलाएं जन्म लेती हैं। अतः इसके अलावा ....
प्रश्न : भारत में स्त्रियों एवं बच्चों के दुर्व्यापार की समस्या कितनी गम्भीर है?
(2015)
उत्तर : भारत में स्त्रियों एवं बच्चों के दुर्व्यापार की गंभीरता इससे ही पता चलती है कि प्रत्येक 8 मिनट में एक स्त्री एवं बच्चे का अपहरण, तस्करी के लिए किया जाता है। भारत एशिया का सबसे बड़ा मानव तस्करी का केंद्र माना जाता है।
राज्यों में झारखण्ड प्रथम है। मानव तस्करी, अवैध ड्रग और हथियार व्यापार के बाद तीसरा संगठित अपराध है। यह समस्या भारत की प्रमुख बड़ी समस्याओं में से एक है। भारत में मानव तस्करी ....
प्रश्न : घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005
(2014)
उत्तर : घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2005, 26 अक्टूबर, 2009 से लागू किया गया है। इसका प्राथमिक उद्देश्य पत्नी को पति की हिंसा से बचाना या बिना विवाह एक साथ रहने वाली स्त्रियों को हिंसा से रक्षा करना है।
यह अधिनियम उन महिलाओं की भी रक्षा करती है, जो बहन, विधवा या माता है। इस अधिनियम में वास्तविक दुर्व्यवहार या दुर्व्यवहार की शंका, जो शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक, आर्थिक या यौन हिंसा के रूप में हो सकती ....
प्रश्न : पिछले दशक में सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं के प्रति वर्धित हिंसा में तेजी आने के क्या संभव अधःशायी कारण हैं?
(2014)
उत्तर : महिलाओं के संदर्भ में हिंसा के अनेक रूप देखे जा सकते हैं, जो कि महिलाओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व और प्रतिष्ठा को स्थापित करने में सैद्धांतिक चुनौती के रूप में काम करते हैं। पुरुषों द्वारा महिलाओं व युवतियों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न, छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और इस धारणा को कायम रखते हैं कि महिलाओं को जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में पुरुषों के संरक्षण की आवश्यकता है। महाविद्यालयों सार्वजनिक परिवहनों ....
प्रश्न : शैक्षणिक विषमताओं पर निजीकरण का प्रभाव
(2014)
उत्तर : परम्परागत भारतीय समाज के मुख्य तत्व धर्म की प्रधानता, सोपानिकता, सामूहिकता, प्रदत्त प्रस्थिति को महत्व आदि रहे हैं, जिन्होंने कालान्तर में भारतीय समाज को एक शोषणकारी समाज के रूप में परिणत कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय समाज में नियोजित परिवर्तन के संदर्भ में अधुनिकीकरण के लक्ष्य को स्वीकार किया गया और आधुनिक शिक्षा को इस लक्ष्य के प्राप्ति के साधन के रूप में प्रयुक्त किया गया। चूंकि आधुनिक शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिकता, व्याक्तिवादिता, योग्यता ....
प्रश्न : शिक्षा के अधिकार के प्रमुख लक्षणों की चर्चा कीजिए।
(2013)
उत्तर : शिक्षा के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए ही स्वतंत्रता के पश्चात् पूर्ण साक्षरता प्राप्ति हेतु 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया था। तत्पश्चात् वर्ष 2002 में 86 वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों की शिक्षा को मौलिक अधिकारों से समावेशित किया गया।
ज्ञातव्य है कि मुख्य तौर पर ग्रामीण बालिकाएं पारिवारिक, आर्थिक व सामाजिक कारणों ....
प्रश्न : भारत में कामकाजी महिलाओं की समस्याओं का विवेचन कीजिए।
(2013)
उत्तर : वैश्वीकरण ने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति तथा आत्मनिर्भरता को सकारात्मक दिशा प्रदान किया है, जिसके चलते आज की भारतीय महिलाओं में आत्म सम्मान तथा आर्थिक निर्भरता दृष्टिगोचर होती है जिसकी परिणति महिलाओं का चारदीवारी से बाहर निकलकर शिक्षा तथा नौकरी के क्षेत्र में आना है, जो महिला सशक्तीकरण का प्रमाण है।
हाल के दिनों में देश में हुई घटनाओं से महिला सुरक्षा का प्रश्न देशव्यापी मुद्दा बना है, जिस पर सरकार ने सकारात्मक संज्ञान ....
प्रश्न : भारत में स्त्री-मर्त्यता के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।
(2013)
उत्तर : महिला की स्थिति को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बौद्धिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बना दिया गया। इसका कारण ये है कि द्वितीय विश्व युद्ध में पुरुषों के युद्ध प्रयासों में लग जाने के कारण महिला अधिक से अधिक आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में शामिल होने लगी।
ब्रिटेन के इतिहासकार हैब्सवर्ग ने कहा मानव इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध एक मील का पत्थर है। क्योंकि इस युद्ध के बाद न केवल राजनैतिक व आर्थिक क्षेत्र में ....
प्रश्न : वैश्वीकरण के संदर्भ में राष्ट्र एवं नागरिकता के प्रत्यय का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2012)
उत्तर : प्राचीन काल से ही नागरिकता को एक राजनीतिक समुदाय की वैध सदस्यता के रूप में पारिभाषित किया गया है। किसी क्षेत्रीय राज्य की सहभागितापूर्ण सदस्यता ही नागरिकता है। कानूनी स्तर पर नागरिकता का अभिप्राय किसी राष्ट्र या राज्य अथवा नगर के सदस्य के अधिकारों एवं कर्त्तव्य से है। वैश्वीकरण के इस दौर में राष्ट्र एवं नागरिकता के प्रत्यय पर काफी विचार-विमर्श विगत कुछ दशकों में समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र में प्रारंभ हुआ है। आज सूचना क्रांति के ....
प्रश्न : शिक्षा और सामाजिक असमानता उन्मूलन
(2012)
उत्तर : शिक्षा के बढ़ते स्तर के कारण सामाजिक असमानता में एक नया आयाम जुटा है कि शिक्षा व्यक्ति के अंदर एक तार्किक, वैज्ञानिक एवं आधुनिक मूल्यों, विचारों वाले दृष्टिकोण को विकसित करती है। भारत में प्राचीन काल से ही सामाजिक स्तरीकरण का आधार जाति-व्यवस्था रहा है। यहां जातियों को शुचिता एवं प्रदूषण के आधार पर एक सोपानक्रम पर मौजूद जातियों को कई प्रकार की सामाजिक निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था। इन सब प्रक्रिया को धर्म ....
प्रश्न : जिन कारकों ने भारत में औद्योगिक आधुनिकीकरण में योगदान दिया है, उनकी विवेचना कीजिए। नवीन औद्योगिक वर्ग संरचना की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
(2012)
उत्तर : भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया अंग्रेजों के शासनकाल में ही प्रारम्भ हुई। शुरूआती दौर में पारसियों तथा गुजरातियों का भारतीय उद्योग पर वर्चस्व रहा, आगे चलकर मारवाड़ी समुदाय ने ये बागडोरअपने हाथ में थामी। जहां तक औद्योगिक आधुनिकीकरण का सवाल है तो यह पिछले तीन-चार दशकों में तेजी से बढ़ा है। भारत में औद्योगिक आधुनिकीकरण के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, जैसे- उद्यमशीलता, सरकार की नीतियां, वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, शिक्षा का बढ़ता स्तर, नवीन आविष्कार ....
प्रश्न : शिक्षा एवं दलित सशक्तीकरण
(2012)
उत्तर : भारतीय समाज में दलित समाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक रुप से सबसे निचले स्तर से संबंधित रहे हैं और जाति निर्योग्यताओं से जुड़ी कई तरह की समस्या के शिकार रहे हैं। ये दलित न सिर्फ निम्न जाति श्रेणी से ताल्लुक रखते हैं, बल्कि भारतीय समाज की वर्ग संरचना में भी निम्न वर्ग से जुडे़ रहे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ये मुख्य रूप से गरीब किसान, मजदूर या कृषि श्रमिक के रूपमें और शहरी अर्थव्यवस्था में वे ....
प्रश्न : लैंगिग श्रम विभाजन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक निर्धारक पर टिप्पणी कीजिए।
(2012)
उत्तर : विश्व के सभी समाजों में लिंग विभाजन का कोई-न-कोई रुप अवश्य पाया जाता है। लिंग आधारित श्रम विभाजन उनमें से प्रमुख है। यह लैंगिग श्रम विभाजन विभिन्न समाज की सत्तामूलक संरचना द्वारा प्रभावित होती है।
उदाहरण के तौर पर पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों की भूमिका प्रधान तथा महिलाओं की भूमिका अपेक्षकृत गौण होती है। पुरुषों को घर-परिवार, समाज, अर्थव्यवस्था तथा शासन व्यवस्था संबंधित कार्यो का दायित्व सौंपा जाता है, तो वहीं महिलाओं को घर-परिवार, बच्चों के ....
प्रश्न : स्थिति परिवर्तन तथा संरचनात्मक परिवर्तन
(2012)
उत्तर : परम्परागत जाति व्यवस्था में सामाजिक सांस्कृतिक गतिशीलता को स्पष्ट करने के लिए एम.एन. श्री निवास ने सांस्कृतिकरण की अवधारणा प्रस्तुत की। इनके अनुसार संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई नीच हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह, किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता है। सामान्यतः संस्कृतिकरण के साथ-साथ और उसके परिणामस्वरूप सम्बद्ध जाति ऊपर की ओर गतिशील होती है, किन्तु संस्कृतिकरण ....
प्रश्न : उन सामाजिक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए, जिनका महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में वृद्धि में योगदान रहा है। महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के उभरते स्वरूप क्या हैं? इस समस्या के नियंत्रण के लिए उपयुक्त उपाय सुझाइये।
(2012)
उत्तर : सामाजिक जीवन का प्रत्येक पक्ष जो स्त्रियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व, प्रतिष्ठा, गरिमा को स्थापित करने में बाधक के रूप में क्रियाशील है, स्त्रियों के प्रति हिंसा का प्रतीक है। यूँ तो भारतीयसमाज में स्त्रियों की प्रस्थिति ऐतिहासिक काल से लेकर अब तक बहुत अच्छी नहीं रही है, फिर भी इन दिनों तीव्र सामाजिक परिवर्तन के कारण स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के मामलों में काफी वृद्धि हुई है। शिक्षा के विकास के कारण आज महिलाओं की ....
प्रश्न : समकालीन भारतीय समाज में परिवर्तन की विरोधाभासी प्रकृति की विवेचना कीजिए। इसके लिए उत्तरदायी कारकों की व्याख्या कीजिए।
(2005)
उत्तर : बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भारतीय समाज को परम्परागत समाज समझा जाता था यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने हमारे देश को औद्योगिक बनाने का प्रयत्न किया और अनेक सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन लाने की भी कोशिश की, लेकिन लोगों के जीवन के गुणात्मक सुधार करने और जीवन स्तर उठाने में उनकी रूचि नहीं थी। योगेन्द्र सिंह तथा एस.सी. दुबे जैसे विद्वानों का मत है कि दोनों का सह-अस्तित्व हो सकता है। परम्परावाद को स्वीकारने का यह ....
प्रश्न : शिक्षा में असमानता।
(2005)
उत्तर : यद्यपि यह एक तथ्य है कि सभी मनुष्य योग्यता और दक्षता में समान नहीं हैं और ऐसे समाज की कल्पना करना भी अविवेकपूर्ण और आदर्शहीन होगा जो अपने सभी सदस्यों को एक समान स्थिति और लाभ प्रदान कर सके। फिर भी उनके उद्देश्यों और आकांक्षाओं की प्राप्ति के लिए सभी लोगों को समान अवसर प्रदान करना आवश्यक है। अतः इस समाज का प्रयत्न, जो अवसरों की समानता के लिए कटिबद्ध है, अधिकतर सेवाएं प्रदान करने ....
प्रश्न : शिक्षा एवं सामाजिक गतिशीलता।
(2001)
उत्तर : शिक्षा एवं सामाजिक गतिशीलता में सीधा संबंध है। शिक्षा ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा सामाजिक गतिशीलता की गति को त्वरित किया जा सकता है। शिक्षा के फलस्वरूप व्यक्तियों में स्वयं की चेतना के साथ-साथ ज्ञान एवं समाज में अर्जित प्रस्थिति प्राप्त करता है जो वास्तव में सामाजिक गतिशीलता का द्योतक है।
सामाजिक गतिशीलता दोनों प्रकार की हो सकती है- सामाजिक एवं व्यावसायिक। सामाजिक गतिशीलता के अंतर्गत हम उदग्र एवं समस्तरीय दोनों प्रकार की ....
प्रश्न : सामाजिक न्याय।
(1999)
उत्तर : एक सावयवी रूप में संगठित समाज के निर्माण के लिए व्यक्तियों का तर्क संगत सहयोग, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यताओं के अनुसार फलने-फूलने तथा जीवन को सही ढंग से जीने की कला सीखने के समान तथा वास्तविक अवसर प्राप्त हो सके, सामाजिक न्याय कहलाती है। सामाजिक न्याय प्रजातंत्र की एक आवश्यक शर्त है।
सामाजिक न्याय का अर्थ सामान्यतः यह लगाया जाता है कि समाज के सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से वंचित खण्डों या वर्गों को ....