आर्थिक सुधार व वृद्धि दर - वर्तमान भारतीय परिदृश्य
नवीन
|
आर्थिक सुधारों को सतर्कतापूर्वक तथा समुचित पूर्व योजना के साथ लागू करना एक बेहतर रणनीति होगी। इससे नीतियों के कार्यान्वयन में अनावश्यक विसंगतियों व परिचालन की समस्याओं से बचा जा सकेगा, जिसका लाभ सरकार के साथ-साथ नागरिकों को भी होगा। |
भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था तथा बदलते समाज के लिए सुधारों की स्पष्ट अनिवार्यता है। समय-समय पर सामाजिक, वैधानिक व आर्थिक सुधार होते रहें हैं जो एक गतिशील समाज, राष्ट्र व आर्थिक व्यवस्था के लिए प्रासंगिक है। समयानुकूल निरंतर सुधार होते रहने से ऐतिहासिक व तकनीकी विसंगतियां कम होती हैं तथा समाज व राष्ट्र ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारत की डेटा सेंटर संबंधी दुविधा: जल संकट बनाम डिजिटल विस्तार
- 2 कृत्रिम बुद्धिमत्ता: भारत की उभरती आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता
- 3 परीक्षाओं की विश्वसनीयता का संकट: क्या राधाकृष्णन समिति बनेगी समाधान?
- 4 सरकारी स्कूलों का बंद होना: शिक्षा के अधिकार और सामाजिक न्याय के सामने बढ़ता संकट
- 5 आतंकवाद पर SCO का कड़ा रुख : भारत की कूटनीतिक विजय
- 6 'क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट्स' पर बढ़ता विवाद
- 7 चिकित्सा आपात स्थितियों में 'प्रोटीन जैव-सेंसर' की भूमिका
- 8 फास्ट ट्रैक कोर्ट: क्या परीक्षा पेपर लीक जैसे अपराधों पर लगेगी प्रभावी रोक?
- 9 Gen Z आंदोलन: विरोध-प्रदर्शन का अधिकार और संवैधानिक सीमाएँ
- 10 अमेरिका–ईरान इस्लामाबाद समझौता: पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक शुरुआत

