बौद्ध और जैन वास्तुकला

स्तूप एक गुंबदनुमा पवित्र स्मारक है जिसमें बुद्ध के अवशेष या अन्य पवित्र वस्तुएं रखी जाती हैं। बौद्ध वास्तुकला में इसका धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व है। ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से पहले भारत में उत्पन्न हुए स्तूप, साधारण समाधि-स्थलों से विकसित होकर पवित्र बौद्ध स्मारक बन गए और बौद्ध पूजा-पाठ का केंद्र बन गए ।

स्तूप शब्द का उल्लेख ऋग्वेद (एस्तुका), अथर्ववेद और अन्य ग्रंथों में मिलता है, जो जमीन पर निर्मित संरचनाओं को संदर्भित करता है। पाली शब्द " थुपा" का अर्थ किसी अवशेष से युक्त शंकु के आकार का ढेर या मंदिर होता है।

स्तूपों की उत्पत्ति और ....

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