गांधार मूर्तिकला – रोमन, ग्रीक, मध्य एशियाई, ग्रीको-बैक्ट्रियन तत्व
|
गांधाराई कला: प्रभाव और विशेषता |
||
|
प्रभाव का स्रोत |
प्रमुख विशेषताएं |
विशिष्ट विवरण/उदाहरण |
|
मध्य एशियाई (फारसी) प्रभाव |
वेशभूषा और आभूषण |
मूर्तियों में पहने गए वस्त्र और गहने फारसी शैली से अत्यधिक प्रेरित थे। |
|
सजावटी रूपांकन |
कला में फूलों, बेलों और जटिल सजावटी डिजाइनों का उपयोग फारसी कला से लिया गया था। |
|
|
स्थापत्य शैली |
गांधाराई स्तूपों और विहारों की बनावट में मध्य एशियाई निर्माण तत्वों की झलक मिलती है। |
|
|
यूनानी-बैक्ट्रियाई प्रभाव |
यथार्थवादी चित्रण |
मानव शरीर की सटीक संरचना, मांसपेशियों का विवरण और शारीरिक यथार्थवाद यूनानी कला की देन है। |
|
मूर्तिकला तकनीक |
वस्त्रों की परतों को दिखाने के लिए 'चोगा' (Choga) और 'हिमाटियन' (Himation) जैसी तकनीकों का प्रयोग। |
|
|
बुद्ध .... | ||
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारतीय चित्रकला का विकास
- 2 गुप्तकालीन मुद्राशास्त्रीय
- 3 प्रारंभिक भारतीय शिलालेखों में तांडव नृत्य
- 4 कला रूपों में प्रतीकवाद और उत्कृष्टता
- 5 तकनीकी परिवर्तन और प्रशासन
- 6 भूगोल और इतिहास का अंतर्संबंध
- 7 जीआई टैग (GI Tags) का सांस्कृतिक महत्व
- 8 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) का संरक्षण और यूनेस्को की भूमिका
- 9 सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
- 10 भारतीय समाज के मूल मूल्य

