Interview - मुख्य परीक्षा की तैयारी की रणनीति

मुख्य परीक्षा की तैयारी की रणनीति

(AIR)

‘‘किसी भी कार्य को आरंभ करने का तरीका यह है
कि बातें बंद कर के काम शुरू किया जाये।’’ -वाल्ट डिज्नी

सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं यक्ष प्रश्न यही आता है कि प्रारंभिक अथवा मुख्य परीक्षा में से किसकी तैयारी पहले की जाए? क्या दोनों की एक साथ तैयारी संभव है? यदि नहीं तो प्रारंभिक तथा मुख्य परीक्षा की अलग-अलग तैयारी रणनीति होनी चाहिए? इसके लिए अभ्यर्थी दो तरह की रणनीति अपना सकता है।

पहली रणनीतिः पहली रणनीति के तहत, यदि अभ्यर्थी के पास पर्याप्त समय है तो उसे अपनी तैयारी को मुख्य परीक्षा से आरंभ करना चाहिए। ऐसा करते हुए अभ्यर्थी वैकल्पिक विषय के साथ-साथ सामान्य अध्ययन के चारों प्रश्नपत्रों तथा निबंध आदि की तैयारी कर सकता है। उत्तर लेखन का नियमित अभ्यास तथा आवश्यक विषयों पर नोट्स बनाते हुए अभ्यर्थी संपूर्ण पाठ्यक्रम को कवर कर सकता है। मुख्य परीक्षा की तैयारी लगभग 80% हो जाने के पश्चात अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा हेतु तैयारी आरंभ कर सकता है।

दूसरी रणनीतिः दूसरी रणनीति के अंतर्गत, जब अभ्यर्थी के पास समय कम हो तथा वह आने वाली प्राइमरी परीक्षा में बैठना चाहता है तो अभ्यर्थी के लिए आवश्यक क्या होता है कि वह अपनी तैयारी प्रारंभिक परीक्षा से आरंभ करे। इस प्रकार की रणनीति तभी कारगर हो सकती है जब अभ्यर्थी स्व-अध्ययन के माध्यम से तैयारी कर रहा हो।

तैयारी आरंभ करते समय अन्य बातें जो ध्यान में रखी जानी चाहिए

कोचिंग संस्थान कभी भी पृथक रूप में प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी नहीं करवाते हैं। वे पाठ्यक्रम को इस प्रकार से कवर करते हैं जिससे दोनों परीक्षाओं की तैयारी एक साथ हो सके। सामान्य रूप से कोचिंग संस्थानों का उद्देश्य पाठ्यक्रम को पूरा करना होता है। ऐसा करने के पश्चात वे अभ्यर्थियों को स्वतंत्र छोड़ देते हैं तथा यह अभ्यर्थियों को निश्चित करना होता है कि उन्हें अपनी तैयारी को आगे किस प्रकार से जारी रखना है।

  • एक आदर्श स्थिति यह होती है कि परीक्षार्थी जिस वर्ष अपनी तैयारी आरंभ करता है उसके अगले वर्ष में प्रारंभिक परीक्षा में बैठना चाहिए। ऐसा करने से उसे तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है तथा वह परीक्षा में बैठने से पूर्व ही प्रारंभिक प्रथम मुख्य परीक्षा दोनों की तैयारी कर चुका होता है।
  • अनेक विद्यार्थियों में यह भी देखा जाता है कि वे अपनी तैयारी के स्तर को जांचने के लिए अथवा बिना तैयारी के ही एक अथवा दो प्रयास नष्ट कर लेते हैं। ऐसा करने से अभ्यर्थियों का समय तो खराब होता ही है, साथ में उनके पास अवसरों की कमी भी हो जाती है। ऐसा करने वाले अनेक अभ्यर्थी अपनी तैयारी के बेहतर स्तर को प्राप्त करने के बाद यह महसूस करते हैं कि अब उनके पास पर्याप्त अवसर ही नहीं बचे हैं। अतः, आयु की बाध्यता न होने पर अभ्यर्थियों को बिना तैयारी के परीक्षा में नहीं बैठना चाहिए।

पूर्व में हम सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम, विभिन्न प्रश्न पत्रों के लिए निर्धारित अंको तथा पाठ्यक्रम के स्वरूप की एक अवधारणात्मक समझ विकसित कर चुके हैं। अब यहां पर सामान्य अध्ययन के चारों प्रश्नपत्रों (प्रश्नपत्र 1,2,3 तथा 4) की रणनीति पर चर्चा करेंगे।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1

  • प्रश्नपत्र-1 की प्रकृतिः भारतीय विरासत तथा संस्कृति के जो साक्ष्य हमें प्राप्त हुए हैं उन्हीं के आधार पर हमें अपने इतिहास को समझने में मदद मिलती है। यही कारण है कि पाठ्यक्रम में सर्वप्रथम भारतीय विरासत तथा संस्कृति को समाहित किया गया है। ऐतिहासिक घटनाओं का संबंध किसी न किसी प्रकार की भौगोलिक दशा से होता है और यही कारण है कि इतिहास के बाद भूगोल को पाठ्यक्रम में रखा गया है। इतिहास तथा भूगोल ही किसी भी सामाजिक व्यवस्था को सर्वाधिक रूप से प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रश्नपत्र-1 में सर्वप्रथम भारतीय विरासत एवं संस्कृति, तत्पश्चात इतिहास तथा भूगोल एवं अंत में भारतीय समाज के पाठ्यक्रम को शामिल किया गया है।
  • पढ़ने की रणनीतिः सामान्य अध्ययन के प्रथम प्रश्न पत्र में सर्वप्रथम भारतीय विरासत तथा संस्कृति के साथ-साथ भारत तथा विश्व के इतिहास को शामिल किया गया है। भारतीय विरासत तथा संस्कृति के खंड को इतिहास के खंड से अलग करके पढ़ना एक अच्छे रणनीति का भाग नहीं होगा। दोनों खंडों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए इन्हें एक साथ पढ़ना चाहिए।
  • प्रश्नों का स्वरूपः वर्ष 2015 से पूर्व सामान्य रूप से ऐसे प्रश्न पूछे जाते थे जिनकी प्रकृति अत्यंत सरल थी तथा उन्हें पढ़कर आसानी से समझा जा सकता था कि वह प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक भारत अथवा विश्व इतिहास का प्रश्न है। परंतु वर्तमान समय में यदि विश्व इतिहास को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी खंडों से प्रश्न अंतर्विषयी रुप में पूछे जाते हैं।
    • कुछ प्रश्न ऐसे भी पूछे जाते हैं जो बहु-विषयी प्रकृति के प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए ऐतिहासिक घटनाक्रम के ऐसे प्रश्न जो कहीं न कहीं से भूगोल अथवा भारतीय सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं। ऐसी स्थिति में अभ्यर्थी के समक्ष भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि यह प्रश्न किस खंड से पूछा गया है। क्रॉनिकल पब्लिकेशन ने अपने हाल ही के अंक में मुख्य परीक्षा विशेषांक के अंतर्गत 100 महत्वपूर्ण विषयों पर प्रश्नोत्तर रूप में अध्यन सामग्री प्रकाशित की है। यहां पूछे गए प्रश्न अंतर्विषयी एवं बहु-विषयी प्रकृति के हैं। इन्हें पढ़कर सिविल सेवा परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की वर्तमान प्रकृति को समझा जा सकता है।
    • उपर्युक्त के साथ-साथ कुछ प्रश्न ऐसे भी पूछे जाते हैं कि जो प्रकृति में तो प्रश्नपत्र दो अथवा तीन से संबंधित होते हैं किंतु उन्हें प्रश्न पत्र एक में पूछा जाता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2021 में पूछा गया यह प्रश्न देखिए ‘‘भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया में गिग इकोनामी की भूमिका का परीक्षण कीजिए।’’ यह प्रश्न प्रश्नपत्र-2 के सामाजिक न्याय तथा प्रश्नपत्र-3 के अर्थव्यवस्था वाले खंड से संबंधित है। किंतु, इस प्रश्न को भारतीय समाज के खंड के रूप में प्रश्नपत्र-1 में पूछा गया था। ऐसे प्रश्नों को हल करते समय परीक्षार्थी को अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। उसे संपूर्ण पाठ्यक्रम को इस प्रकार से तैयार करना होगा कि पाठ्यक्रम के किसी भी भाग से पूछे जाने वाले प्रश्नों को अंतर्विषयी एवं बहु-विषयी प्रश्नों के रूप में हल किया जा सके।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2

  • प्रश्नपत्र-2 की प्रकृतिः भारतीय विरासत एवं संस्कृति, इतिहास भूगोल तथा सामाजिक व्यवस्था के पश्चात प्रश्नपत्र-2 के अंतर्गत ऐसे विषयों को शामिल किया गया है जो एक देश के रूप में भारत तथा इसकी सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करते हैं। इस प्रश्नपत्र में शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों संबंधों को लिया गया है।
  • प्रश्नों का स्वरूपः प्रश्नपत्र-2 में संविधान निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया से लेकर शासन व्यवस्था की विभिन्न विशेषताओं, शासन प्रणाली की शक्तियों, विभिन्न संगठनों के कार्य एवं उत्तरदायित्व तथा शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में आने वाली चुनौतियों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। अभ्यर्थी से क्या अपेक्षा की जाती है कि वह उत्तर लेखन के दौरान इस प्रकार के सुझाव प्रस्तुत करे जो भविष्य में एक सिविल सेवक से अपेक्षित किए जाते हो।
    • एक विशिष्ट खंड के रूप में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लिया गया है तथा प्रतिवर्ष भारत के पड़ोसी देशों अथवा अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ आर्थिक राजनैतिक एवं भू-राजनैतिक संबंधों पर आधारित प्रश्न आते हैं। इन प्रश्नों को अभ्यर्थी उपयुक्त रेखाचित्र एवं ग्राफ की सहायता से हल कर सकता है। किंतु, इसकी प्रकृति अत्यधिक समसामयिक होने के कारण अभ्यर्थी के लिए करंट अफेयर्स से अपनी जानकारी को अद्यतन रखना अत्यंत आवश्यक होता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3

  • प्रश्नपत्र-3 की प्रकृतिः सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्र-3 में प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव-विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। राष्ट्रीय तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह सभी मुद्दे ज्वलंत प्रकार के हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान समय में किसी भी देश के आर्थिक विकास हेतु उच्च स्तर की प्रौद्योगिकी तथा सुरक्षित माहौल का होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। साथ ही जैव विविधता, पर्यावरण तथा आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे कहीं न कहीं से अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के हैं। अभ्यर्थी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विषयों की तैयारी इस रूप में करें कि एक सिविल सेवक बनने के पश्चात विभिन्न परिवर्तनकारी भूमिकाओं का निर्वहन उपयुक्त ढंग से कर सकें।
  • प्रश्नों का स्वरूपः इस प्रश्न पत्र में प्रौद्योगिकी तथा आर्थिक विकास से संबंधित प्रश्नों की तैयारी के लिए समसामयिक घटनाक्रम अथवा करंट अफेयर्स को मुख्य आधार बनाना चाहिए। जैव विविधता, आपदा प्रबंधन तथा पर्यावरण जैसे खंड प्रश्नपत्र-1 के भूगोल खंड से संबंधित हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि इन खंडों के माध्यम से अभ्यर्थी को भौगोलिक घटनाओं की व्यावहारिक प्रकृति (Applied Nature) को समझने का प्रयास करना चाहिए।
    • आंतरिक सुरक्षा एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है जिस से संबंधित प्रश्न इस प्रश्नपत्र के अंतर्गत पूछे जाते हैं। ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए अभ्यर्थी से अपेक्षा की जाती है कि वह विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों तथा रक्षा के क्षेत्र में नए विकास कार्यों से अवगत रहे।

नोटः उपर्युक्त दोनों प्रश्नपत्रों (प्रश्नपत्र-2 तथा 3) में अभ्यर्थी के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि उसे अपनी तैयारी इन विषयों की अवधारणात्मक समझ बनाते हुए करंट अफेयर्स तथा समसामयिक मुद्दों से स्वयं को अद्यतन रखना चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-4

  • प्रश्नपत्र-4 की प्रकृतिः 1990 के दशक के पश्चात देश में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाया जाने के बाद व्यापक रूप से भ्रष्टाचार तथा सरकारी कार्यों में अनियमितताओं में वृद्धि देखी गई। इसी आधार पर एक लंबे समय से सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम में नीतिशास्त्र को शामिल करने की बात की जा रही थी। अभ्यर्थी के नैतिक स्तर, सत्यनिष्ठा तथा अभिरुचि का पता लगाने के लिए एक विशिष्ट पाठ्यक्रम को इस प्रश्नपत्र में शामिल किया गया है। इन्हीं नैतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अभ्यर्थी से अपेक्षा की जाती है कि वह कानूनी एवं नीतिगत मुद्दों की भी जानकारी रखे तथा उन्हें अपने उत्तर में शामिल करे।
  • प्रश्नों की प्रकृतिः सिविल सेवा परीक्षा के सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्र-4 की तैयारी हेतु अभ्यर्थी को विशिष्ट रणनीति अपनाना चाहिए। कुछ समय पूर्व तक इस प्रश्न पत्र में पूछे जाने वाले प्रश्न स्थाई प्रकृति (Static Nature) के होते थे। कुछ निश्चित शब्दावलीयों के आधार पर इन प्रश्नों को तैयार किया जाता था तथा परीक्षार्थी से अपेक्षा की जाती थी कि वह उनकी उचित व्याख्या करे।
    • किंतु, वर्तमान कुछ वर्षों में प्रश्नों की प्रकृति में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। अब प्रश्न अधिक व्यवहारिक (Applied) रूप में पूछे जाते हैं। अभी के समक्ष कुछ चुनौतियों को प्रस्तुत किया जाता है तथा उसे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विवेक का प्रयोग करते हुए उचित समाधान दे।

विशिष्ट रणनीति का निर्माण करना

प्रश्नों की परिवर्तन प्रकृति के कारण यह देखा गया है कि अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र-4 के प्रथम भाग में कम अंक प्राप्त हो रहे हैं जबकि द्वितीय भाग में अधिक अंक मिल रहे हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि अभ्यर्थी को प्रश्नों की स्थाई तथा व्यवहारिक प्रकृति के बीच मध्य संतुलन बनाने में कठिनाई आती है।

  • इस प्रश्नपत्र को हल करने में अभ्यर्थी को निरंतर रूप से सामाजिक सरोकार, सामाजिक हित तथा जनता से जुड़े हुए मुद्दों पर अपनी पकड़ बनाए रखनी होगी। अभ्यर्थी अतिरिक्त नोट्स तैयार करके ऐसे उदाहरण एकत्र कर सकतें है जिनका परीक्षा के समय इस प्रश्न पत्र में उपयोग किया जा सके।
  • इस प्रश्नपत्र में केस स्टडी आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं जिन की तैयारी किसी विशिष्ट किताब अथवा पत्रिका के आधार पर नहीं की जा सकती है। इस प्रकार के प्रश्न अभ्यर्थी के मूल्य व्यक्तित्व की पहचान करने के उद्देश्य से निर्मित किए जाते हैं तथा अभ्यर्थी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी वास्तविक भावनाओं के आधार पर उत्तर दे।
  • एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रश्न पत्र में पूछे जाने वाले प्रश्नों का संबंध करंट अफ़ेयर्स तथा समसामयिक घटनाक्रमों से होता है। ऐसे में अभ्यर्थी इन प्रश्नों को हल करते हुए वर्षभर तैयार किए गए करंट अफ़ेयर्स से उदाहरण अपने उत्तर में शामिल कर सकतें है।

मुख्य परीक्षा की तैयारी किस प्रकार करें?

पढ़ाई की रणनीतिः मुख्य परीक्षा की तैयारी के समय क्रमबद्ध रूप से विषयों को पढ़ना चाहिए।

  • अभ्यर्थी इतिहास तथा भारतीय विरासत एवं संस्कृति को एक साथ तत्पश्चात भूगोल तथा भूगोल के बाद अनिवार्य रूप से भारतीय सामाजिक व्यवस्था से संबंधित खंड का अध्ययन करना चाहिए।
  • एक बार सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था स्पष्ट रूपरेखा निर्मित होने के पश्चात सामान्य अध्ययन के द्वितीय प्रश्न पत्र के विभिन्न खंडों विशेषकर शासन व्यवस्था संविधान शासन प्रणाली सामाजिक न्याय तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बेहतर रूप में समझा जा सकता है। इन विषयों को द्वितीय प्रश्न पत्र में इसीलिए शामिल किया गया है क्योंकि इन्हें किसी सामाजिक व्यवस्था अथवा संरचना पर ही लागू किया जाता है।
  • अगले प्रश्नपत्र (प्रश्नपत्र-3) में ऐसे विषयों को शामिल किया गया है जो समाज अथवा देश की अर्थव्यवस्था पर्यावरण तथा सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। अतः, ऐसे विषयों की तैयारी करते समय अभ्यर्थी को समसामयिक घटनाक्रम का विशेष रूप से ध्यान रखना होगा। क्योंकि इनमें पूछे जाने वाले लगभग सभी प्रश्न करंट अफेयर्स आधारित होते हैं।

उत्तर लेखन का अभ्यासः पाठ्यक्रम तथा पूर्वर्ती प्रश्नों के अनुसार अपनी समाज का विकास करते हुए अभ्यर्थी दी गई अध्ययन सामग्री को आधार बनाते हुए अपनी तैयारी आरंभ कर सकता है। तैयारी के साथ साथ अभ्यर्थी को उत्तर लेखन शैली के विकास हेतु भी प्रयास आरंभ करने चाहिए। लेखन शैली के अभ्यास में सर्वप्रथम अभ्यर्थी को सामान्य एवं सरल प्रश्न का लेखन करना चाहिए तथा अगले चरण के रूप में ऐसे प्रश्नों को लेना चाहिए जो अंतर्विषयी एवं बहु-विषयी प्रकृति के होते हैं। कठिनाई आने पर अभ्यर्थी पूर्वर्ती प्रश्नों को आधार बना सकते है जिनके उत्तरों को पढ़कर भी वह अपनी भाषा में लेखन कार्य कर सकते है।

  • मुख्य परीक्षा के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण बात यही मानी जाती है कि अभ्यर्थी निश्चित समय अंतराल में अपने उत्तर को कैसे पूर्ण करता है। उत्तर पूर्ण करने के साथ-साथ उसमें गुणवत्तापूर्ण विषय सामग्री भी शामिल करना अत्यंत आवश्यक होता है। अतः लेखन शैली का विकास है एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है और अभ्यर्थी को नियमित रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए।

अवधारणात्मक समझ हेतु सुझावः अभ्यर्थी को सर्वप्रथम पिछले 10 वर्षों में पूछे गए प्रश्नों को क्रमानुसार व्यवस्थित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से अभ्यर्थी परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की बदलती प्रकृति को आसानी से समझ सकते है। तत्पश्चात, उपलब्ध अध्ययन सामग्री को आधार बनाकर आगे का अध्ययन किया जा सकता है।

अनिवार्य भाषा के प्रश्नपत्रों की तैयारी कैसे करें?

मुख्य परीक्षा के दो प्रश्न पत्र अभ्यर्थियों को अनिवार्य विषयों के रूप में तैयार करने होते हैं। इन दोनों प्रश्न पत्रों में अभ्यर्थी को पास होने के बराबर अंक प्राप्त करना आवश्यक होता है।

  • इन अनिवार्य प्रश्न पत्रों में अंग्रेजी का प्रश्न पत्र सभी विद्यार्थियों के लिए होता है तथा एक अन्य क्षेत्रीय भाषा का चयन करना होता है और उत्तर भारत के लगभग सभी छात्र हिंदी को दूसरे अनिवार्य विषय के रूप में चयनित करते हैं।
  • अभ्यर्थी सामान्य रूप से इन प्रश्न पत्रों की तैयारी अलग से नहीं करते हैं तथा सतही तौर पर इन की तैयारी करते हुए इन्हें अति गंभीरता से नहीं लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि अनेक बार बहुत बेहतर छात्र अनिवार्य प्रश्न पत्रों को पास नहीं कर पाते हैं और वे मुख्य परीक्षा से बाहर हो जाते हैं।
  • अभ्यर्थी को चाहिए कि जब वह प्रारंभिक परीक्षा से पूर्व मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहा हो तो उसे थोड़ा थोड़ा समय निकालकर अनिवार्य विषयों के पूर्ववर्ती प्रश्न पत्रों को देखना चाहिए था उन्हें हल करने का प्रयास करना चाहिए।
  • ऐसा करने से अभ्यर्थी को इन प्रश्नों की तैयारी में अतिरिक्त समय देना नहीं पड़ेगा।
  • प्रारंभिक परीक्षा के पश्चात तथा मुख्य परीक्षा से पहले अभ्यर्थी को लगभग 3 महीने बराबर समय मिलता है जिसमें वह अपनी मुख्य परीक्षा की तैयारी को परिमार्जित करता है। इस दौरान भी अभ्यर्थी को थोड़ा-थोड़ा समय निकालते हुए अनिवार्य प्रश्न पत्रों की तैयारी करनी चाहिए।
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