Interview - प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी की रणनीति

प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी की रणनीति

(AIR)

प्रारंभिक परीक्षा को इन सभी चरणों में सर्वाधिक कठिन चरण के रूप में माना जाता है क्योंकि इसमें परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक होती है।

अभ्यर्थी के इस परीक्षा में पास होने के पश्चात ही वह मुख्य परीक्षा में बैठ सकता है। अतः यदि कोई अभ्यर्थी वर्ष भर मुख्य परीक्षा की तैयारी करता है और वह प्रारंभिक परीक्षा को पास नहीं कर पाता है तो ऐसी स्थिति में उसे अगले वर्ष का इंतजार करना पड़ता है। यह स्थिति अभ्यर्थी के लिए आर्थिक एवं मानसिक रूप से तनाव उत्पन्न कर सकती है।

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अभ्यर्थी को प्रारंभिक परीक्षा हेतु अपनी तैयारी अधिक सावधानी से करनी चाहिए। प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी के लिए अभ्यर्थी अपनी आवश्यकतानुसार निम्नलिखित में से किसी भी उपागम को अपना सकता हैः

उपागम-1

प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी के लिए बेहतर रणनीति यह होती है कि जब अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहा हो तो उसे प्रारंभिक परीक्षा को ध्यान में रखते हुए पुस्तकों अथवा अपने नोट्स में ऐसे खंडों को हाईलाइट कर लेना चाहिए जो प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो। अभ्यर्थी साथ ही साथ किसी अन्य कॉपी अथवा पेज पर महत्वपूर्ण तथ्यों को नोट भी कर सकता है।

  • अभ्यर्थी पढ़ते समय दो रंगों के हाइलाइटर का उपयोग कर सकता है। एक से उसे मुख्य परीक्षा के लिए जबकि दूसरे से प्रारंभिक परीक्षा से संबंधित तथ्य हाईलाइट करने चाहिए। करंट अफेयर्स की पत्रिकाओं के संदर्भ में भी यही रणनीति अपनानी चाहिए। इसका लाभ अभ्यर्थी को रिवीजन के समय होगा तथा उसे प्रारंभिक परीक्षा के लिए अलग से विशेष ध्यान नहीं देना होगा।

उपागम-2

अनेक परीक्षार्थी अपनी तैयारी का आरंभ प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी से करते हैं। उनके पढ़ने का ढंग आरंभ से ही वस्तुनिष्ठ होता है। लगभग 1 वर्ष की तैयारी के पश्चात इस प्रकार के अभ्यर्थी एक ऐसे स्तर को प्राप्त कर लेते हैं जब वे प्रारंभिक परीक्षा को पास करने में सक्षम हो जाते हैं। ऐसे अभ्यर्थियों को उनके द्वारा दिए जाने वाले बार-बार प्रयासों में प्रारंभिक परीक्षा की अधिक गंभीरता से पढ़ाई नहीं करनी पड़ती है।

  • यदि कोई अभ्यर्थी आरंभ से ही प्राथमिक परीक्षा पर अधिक ध्यान दे रहा है तो उसे संघ लोक सेवा आयोग द्वारा परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति को अधिक से अधिक ध्यान में रखना चाहिए। आयोग प्रतिवर्ष प्रश्नों की प्रकृति में कुछ न कुछ बदलाव करता है। अभ्यर्थी पिछले प्रश्न पत्रों का गहराई से विश्लेषण करके इनकी प्रकृति का आकलन कर सकता है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए विशेष रूप से कितना समय देना चाहिए?

इस संदर्भ में कुछ बातें ऊपर वर्णित की गई हैं कि अभ्यर्थी अपनी तैयारी मुख्य परीक्षा के साथ-साथ अथवा केवल प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी से कर सकता है।

  • यदि अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी मुख्य परीक्षा के साथ करता है तो उसे प्रारंभिक परीक्षा से लगभग एक से डेढ़ महीना पूर्व संपूर्ण रुप से प्रारंभिक परीक्षा पर फोकस करना चाहिए। ऐसा करके अभ्यर्थी वर्ष भर की गई तैयारी का अधिक सुलभता के साथ रिवीजन कर सकता है।
  • कुछ अभ्यर्थी आरंभिक स्तर से ही प्रारंभिक परीक्षा पर ध्यान नहीं देते हैं तथा उनका मुख्य फोकस मुख्य परीक्षा पर रहता है। ऐसे अभ्यर्थियों को प्रारंभिक परीक्षा के पूर्व लगभग 3 से 4 महीने का समय प्रारंभिक परीक्षा को देना चाहिए।
  • अभ्यर्थियों के लिए प्रारंभिक परीक्षा अथवा मुख्य परीक्षा को पूरी तरह से समय देना एक कठिन कार्य होता है। ऐसे में करना यह चाहिए कि जैसे-जैसे नजदीक आती जाए उसी प्रकार अभ्यर्थी को तैयारी के अपने समय का विभाजन करना चाहिए तथा आने वाली परीक्षा को अधिक समय वितरित करना चाहिए।
  • उदाहरण के लिए- यदि अभ्यर्थी के पास तैयारी हेतु 1 वर्ष का समय है तो उसे प्रारंभिक परीक्षा के लगभग 4 महीने पूर्व तक अपना अधिकांश समय मुख्य परीक्षा को देना चाहिए। जब प्रारंभिक परीक्षा के लगभग 4 महीने बचे हो तो अभ्यर्थी धीरे-धीरे अपना समय प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी में बढ़ा सकता है। लगभग 3 महीने बचने पर अभ्यर्थी को पूर्ण रूप से प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी में लग जाना चाहिए। इससे अभ्यर्थी अधिक आसानी से अपनी सफलता सुनिश्चित कर सकता है।

प्रारंभिक परीक्षा में कितने प्रश्न हल करने होते हैं?

प्रारंभिक परीक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे केवल पास करना होता है तथा उसके अंक अंतिम मेरिट लिस्ट में शामिल नहीं किए जाते हैं। वर्तमान समय की प्रवृत्ति को देखा जाए तो अभ्यर्थी यदि 45 से 50 प्रश्न सही कर लेता है तो वह प्रारंभिक परीक्षा को पास करने के योग्य हो जाता है।

  • फिर भी अभ्यर्थी को इस परीक्षा में अनिवार्य रूप से पास करने के लिए ऐसी तैयारी करनी चाहिए कि उसके द्वारा सही किए गए प्रश्नों की संख्या 60 से ऊपर ही हो। अभ्यर्थी यदि 100 प्रश्नों में से 60-65 प्रश्न सही कर लेता है तो वह प्रारंभिक परीक्षा को अवश्य रूप से पास कर लेगा।

प्रारंभिक परीक्षा में प्रश्नों को किस प्रकार हल करें?

प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी से अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि परीक्षा में परीक्षार्थी प्रश्नों को हल किस प्रकार से करे। इसके लिए निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा जा सकता हैः

  • अभ्यर्थी प्रथम चरण में केवल उन्हीं प्रश्नों को हल करें जो उसे बेहतर रूप में आते हो तथा जिनके गलत होने की संभावना नगण्य रहे। प्रश्न पत्र मिलने के पश्चात समय गवाएं बिना अभ्यर्थी यदि पहली बार में 35-40 ऐसे प्रश्न हल कर लेता है जिनके सही होने की संभावना सर्वाधिक होती है तो यह एक बेहतर रणनीति हो सकती है।
  • इसके अगले चरण में अभ्यर्थी को उन प्रश्नों को हल करना चाहिए जो अभ्यर्थी के लिए कम मात्र में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हो। पहले चरण में प्रश्न पत्र को पढ़ते हुए अभ्यर्थी ऐसे प्रश्नों को चिन्हित कर सकता है तथा इन्हें दूसरे चरण में हल करने के लिए छोड़ सकता है। इस चरण में उन्हीं प्रश्नों को हल किया जाना चाहिए जिनके सही होने की संभावना अभ्यर्थी की दृष्टि में लगभग 50% अथवा उससे ऊपर हो।
  • इसी प्रकार, यदि अभ्यर्थी के पास समय है तथा उसके द्वारा हल किए गए प्रश्नों की संख्या अपेक्षित संख्या के बराबर नहीं पहुंच पाई है तो उसे तृतीय चरण में भी प्रश्न पत्र को पढ़ते हुए कुछ प्रश्नों को हल करना चाहिए। द्वितीय तथा तृतीय चरण में अभ्यर्थी प्रश्नों को हल करने की प्रक्रिया में विलोपन विधि (Elimination Method) का प्रयोग कर सकता है।
  • प्रारंभिक परीक्षा के कुछ प्रश्नों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश प्रश्न दो अथवा उससे अधिक कथन वाले होते हैं। अनेक बार अभ्यर्थी को सभी कथनों के बारे में सही जानकारी नहीं होती है किंतु अभ्यर्थी दिए गए कथनों में से पूरी तरह से सही अथवा पूरी तरह से गलत कथनों की पहचान कर सकता है। ऐसा करने के पश्चात विलोपन विधि (Elimination Method) के माध्यम से अभ्यर्थी दिए गए कूट (Code) में से सही उत्तर चून सकता है।
    • विलोपन विधि (Elimination Method) का सहारा लेते हुए अभ्यर्थी को चरम शब्दों (Extreme Words), वाक्य रचना तथा तथ्यात्मक जानकारी के सही अथवा गलत होने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इस विधि का सहारा लेकर अभ्यर्थी परीक्षा में सही प्रश्नों की संख्या में वृद्धि कर सकता है।
  • प्रारंभिक परीक्षा के दोनों प्रश्न पत्रों में 2-2 घंटों का समय दिया जाता है। अभ्यर्थी को अपनी गति बनाए रखते हुए निश्चित समय सीमा में प्रश्न पत्र हल कर लेना चाहिए। इस प्रकार, प्रारंभिक परीक्षा में समय प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अभ्यर्थी को परीक्षा में बैठने से पूर्व प्रश्नों की अधिक से अधिक प्रैक्टिस करनी चाहिए जिससे उसे समय प्रबंधन करने में सहायता मिल सके।

प्रश्नों की प्रकृति

मुख्य परीक्षा की रणनीति के दौरान हमने जो देखा था कि पिछले कुछ वर्षों से प्रश्न अंतर्विषयी तथा बहु-विषयी (Interdisciplinary and Multidisciplinary) प्रकृति के पूछे जा रहे हैं। प्रश्नों की यही प्रवृत्ति प्रारंभिक परीक्षा में भी देखी जा रही है। उदाहरण के लिए-यदि किसी प्रश्न में तीन कथन है तो तीनों कथन अलग-अलग विषयों से संबंधित होते हैं। ऐसे में प्रश्नों को हल करने की प्रक्रिया में अभ्यर्थी को विशिष्ट भ्रम की स्थिति का सामना करना पड़ता है।

  • इस प्रकार, प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी में भी अभ्यर्थी को अंतर्विषयी (Interdisciplinary) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि अभ्यर्थी राजनीति विज्ञान के तहत किसी मूल अधिकार को पड़ रहा है तो उसे या ध्यान देना होगा कि वर्तमान समय में वह मूल अधिकार चर्चा में है अथवा नहीं साथ ही सरकार द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों से भारत के किस सामाजिक समुदाय के अधिकार सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, यह भी देखना होगा कि सरकार ने उक्त सामाजिक समुदाय के कल्याण हेतु क्या कदम उठाए हैं।

पाठ्यक्रम का विभाजन

प्रारंभिक परीक्षा में भी पाठ्यक्रम विभिन्न खंडों में बटा हुआ है। अभ्यर्थी को प्रत्येक खंड का गहराई से अध्ययन करना चाहिए।

  • भारतीय विरासत, कला एवं संस्कृति; इतिहास; भूगोल; राजव्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था के खंडों की तैयारी अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा के साथ-साथ अधिक बेहतर रूप में कर सकता है।
  • प्रारंभिक परीक्षा में पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी से भी व्यापक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस प्रकार के अधिकांश प्रश्न बायोडायवर्सिटी पार्क तथा उद्यानों की स्थिति अथवा उनके महत्व से संबंधित होते हैं। अभ्यर्थी मानचित्र की सहायता से ऐसे खंडों का अध्ययन करके अपनी तैयारी के बेहतर स्तर को प्राप्त कर सकता है।
  • प्रश्न पत्र में विज्ञान तथा तकनीकी से पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या भी ठीक-ठाक रहती है। विज्ञान के संदर्भ में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यहां से पूछे जाने वाले प्रश्न मुख्य रूप से प्रायोगिक (Applied) प्रकार के होते हैं। आयोग भौतिक विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से सीधे प्रश्न नहीं पहुंचता है किंतु इनसे संबंधित ऐसे मुद्दों से प्रश्न पूछे जाते हैं जो समाज, अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास, अंतरिक्ष अनुसंधान तथा रक्षा क्षेत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
    • एक उदाहरण से इस तथ्य को समझ सकते हैं- परीक्षा में नाइट्रोजन अथवा किसी अन्य रसायन को बनाने की विधि नहीं पूछी जाती है बल्कि यह अवश्य पूछा जाता है कि इस प्रकार के रासायनिक तत्वों की मात्र पर्यावरण में बढ़ने के क्या प्रभाव मानव तथा अन्य जीव-जंतुओं पर पड़ेंगे। अतः अभ्यर्थी को तैयारी की संपूर्ण प्रक्रिया में अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित करते रहना चाहिए तथा लगातार इस बात पर नजर बनाए रखनी चाहिए कि विज्ञान एवं तकनीकी तथा पर्यावरणीय घटनाओं का समाज एवं मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
  • विज्ञान खंड से अधिकांश प्रश्न जैव-तकनीकी से संबंधित होते हैं। यहां भी अभ्यर्थी को ध्यान में रखना होगा कि इस प्रकार के प्रश्न प्रत्यक्ष रूप से जीव विज्ञान से नहीं पूछे जाते हैं बल्कि जीव विज्ञान के प्रायोगिक भाग (Applied Section) अर्थात जैव-तकनीकी पर आधारित होते हैं। इस प्रकार अभ्यर्थी को प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी करते समय तथ्यात्मक घटनाओं के साथ-साथ उनके अनुप्रयोगों की जानकारी होना भी आवश्यक हो गया है।
  • करंट अफेयर्स की तैयारी प्रारंभिक परीक्षा के दृष्टिकोण से विशिष्ट रूप में करनी होगी। उदाहरण के लिए 2016 तथा उससे पूर्व परीक्षा में करंट अफेयर्स से सीधे-सीधे पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या लगभग 30-40 होती थी। किंतु समय के साथ करंट अफेयर्स से प्रत्यक्ष रुप से पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या में कमी आई है तथा प्रश्नों की प्रकृति में व्यापक बदलाव हुआ है। अब यह देखा जा रहा है कि अधिकांश प्रश्न करंट अफेयर्स अथवा समसामयिक घटनाओं से संबंधित होते हैं किंतु वह प्रत्यक्ष रूप से करंट अफेयर्स पर आधारित नहीं होते हैं।
  • अभ्यर्थी के लिए एक बात यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि, पाठ्यक्रम में बदलाव के पश्चात प्रत्येक वर्ष संघ लोक सेवा आयोग ने प्रश्नों की प्रकृति में बदलाव किया है। यदि अभ्यर्थी वर्तमान वर्ष में तैयारी आरंभ कर रहा है और 2 से 3 वर्षों के पश्चात उसे परीक्षा में बैठना है तो उसे अपनी तैयारी किस प्रकार से करनी होगी कि आने वाले समय में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति में बदलाव होगा तथा अभी से उसे इस हेतु तैयार रहना होगा।
  • क्रॉनिकल पब्लिकेशन ने अपनी ‘टू द पॉइंट सीरीज’ में प्रारंभिक परीक्षा को ध्यान में रखते हुए पुस्तकों का प्रकाशन किया है। इसमें विभिन्न विषयों की तथ्यात्मक सामग्री को व्यापक रूप से संकलित किया गया है। यह संकलन IAS, PCS तथा अनेक अन्य परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए किया गया है। अभ्यर्थी अपनी तैयारी में इसे अध्ययन सामग्री के रूप में शामिल कर सकता है तथा अपनी तैयारी को एक उच्च स्तर पर ले जा सकता है।

क्या आपको प्रारंभिक परीक्षा के पश्चात में कट-ऑफ़ के बारे में चिंता करनी चाहिए?

यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि प्रारंभिक परीक्षा के पश्चात अनेक परीक्षार्थी अपना बहुमूल्य समय इस परीक्षा के कट-ऑफ की चर्चा करने में व्यतीत कर देते हैं। ऐसी स्थिति में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक हैः

  • यदि अभ्यर्थी ने उपर्युक्त बताए हुए प्रश्नों की संख्या (60-65) के बराबर प्रश्न सही सही हल किए हो अथवा उसके आसपास हो तो अभ्यर्थी को बिना समय वितरित किए मुख्य परीक्षा की तैयारी में लग जाना चाहिए क्योंकि प्राथमिक परीक्षा के पश्चात केवल 3 महीने का ही समय मुख्य परीक्षा की तैयारी हेतु प्राप्त होता है।
  • ऐसे अभ्यर्थी जो अपेक्षित मात्र में प्रश्नों को सही नहीं कर सके हैं, उन्हें भी अपनी तैयारी मुख्य परीक्षा से आरंभ कर देनी चाहिए। क्योंकि, यदि वे प्रारंभिक परीक्षा को पास करते हैं तो उन्हें ऐसा करने से मुख्य परीक्षा की तैयारी में मदद मिलेगी। एक संभावना यह हो सकती है कि ऐसे परीक्षार्थी प्रारंभिक परीक्षा पास नहीं कर पाते हैं तो उन्हें अगले वर्ष हेतु अपनी तैयारी आरंभ करने में अधिक समय नहीं लगाना पड़ेगा।
  • कहने का अर्थ यह है कि, परीक्षार्थियों को प्रारंभिक परीक्षा देने के पश्चात अपना संपूर्ण समय मुख्य परीक्षा की तैयारी में लगाना चाहिए तथा कट-ऑफ की चिंता किए बिना अपनी तैयारी को सतत रूप से जारी रखना चाहिए।

प्रारंभिक परीक्षा में CSAT का क्या महत्व है?

प्रारंभिक परीक्षा में द्वितीय प्रश्न पत्र के रूप में CSAT को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य अभ्यर्थी की मौलिक गणितीय एवं विश्लेषणात्मक क्षमता की जांच करनी है। इस प्रश्न पत्र में सामान्य रूप से दसवीं कक्षा तक की गणित तथा रीजनिंग के प्रश्न पूछे जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि अभ्यर्थी ने स्कूल के समय गणित तथा रिजनिंग को अच्छे से पढ़ा है तो इस प्रश्न पत्र को हल करने में उसे कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता है।

  • CSAT प्रश्न पत्र में प्रश्नों की संख्या 80 (सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्र में 100 प्रश्न आते हैं) होती है जिन्हें हल करने के लिए प्रथम प्रश्न पत्र के बराबर ही समय वितरित किया गया है। यह प्रश्न पत्र क्वालीफाइंग नेचर का है तथा अभ्यर्थी को केवल एक तिहाई अंक प्राप्त करके इस प्रश्न पत्र में पास होना आवश्यक होता है।
  • CSAT का प्रश्न पत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अभ्यर्थी इस प्रश्न पत्र को पास नहीं कर पाता है तो वह मुख्य परीक्षा हेतु क्वालीफाई नहीं माना जाएगा। अनेक अभ्यर्थी प्रथम प्रश्न पत्र में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद CSAT के प्रश्नपत्र में एक तिहाई अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं और वह प्रारंभिक परीक्षा से ही बाहर हो जाते हैं।
  • अतः, CSAT के अंक प्रारंभिक परीक्षा को पास करने में नहीं जोड़े जाने के बावजूद अभ्यर्थियों को इस प्रश्न पत्र की तैयारी गंभीरतापूर्वक करनी चाहिए। पिछले वर्षों के प्रश्नों की की प्रकृति को देखते हुए यह अनिवार्य रूप से कहा जा सकता है कि बिना तैयारी के परीक्षा देने अथवा इस प्रश्न पत्र को गंभीरता से न लेने का जोखिम व्यापक रूप से अभ्यर्थियों को उठाना पड़ सकता है।

CSAT की तैयारी कैसे शुरू करें?

CSAT परीक्षा के पाठ्यक्रम में संघ लोक सेवा आयोग ने स्पष्ट रूप से यह लिखा है कि इस प्रश्न पत्र में आने वाले प्रश्नों की प्रकृति 10वीं स्तर के गणित तथा रिजनिंग की होगी। अतः यदि अभ्यर्थी को 10वीं स्तर के गणित तथा रिजनिंग कि एक सामान्य समझ है तो उसे पूर्वर्ती प्रश्नपत्रों तथा कोचिंग संस्थानों की टेस्ट सीरीज के आधार पर प्रैक्टिस आरंभ करनी चाहिए।

  • इन प्रश्न पत्रों की प्रैक्टिस इसलिए अनिवार्य है क्योंकि वर्तमान समय में परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों का स्तर थोड़ा कठिन हुआ है। ऐसी स्थिति में बिना तैयारी है तथा प्रैक्टिस के अभ्यर्थी को इन प्रश्नों को हल करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
  • CSAT के प्रश्न पत्र में कंप्रीहेंशन के प्रश्न पूछे जाते हैं और इन्हें भी बेहतर प्रैक्टिस के द्वारा ही हल किया जा सकता है। कंप्रीहेंशन की तैयारी के लिए अभ्यर्थी को वाक्य रचना तथा शब्दों का बेहतर ज्ञान होना चाहिए क्योंकि वर्तमान समय में बनाए जाने वाले प्रश्न तो अपेक्षाकृत सरल होते हैं किंतु उनकी वाक्य रचना एवं शब्द जाल कठिन होने के कारण इन्हें हल करने में मुश्किलें आती हैं।
  • कंप्रीहेंशन के प्रश्नों को हल करने के लिए अभ्यर्थी में किसी भी विषय को तीव्र गति से पढ़ने तथा उसे समझने की क्षमता होनी चाहिए। बिना प्रैक्टिस अथवा कम तैयारी के साथ जाने वाले परीक्षार्थियों के साथ यह समस्या आती है कि उन्हें किसी भी कंप्रीहेंशन को 2-3 बार पढ़ना पड़ता है तथा सामान्य प्रश्नों को हल करने में भी उनका अधिक समय खर्च हो जाता है।
  • लोक सेवा आयोग ने CSAT के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से बोधगम्यता, संचार कौशल सहित अंतर-वैयक्तिक कौशल, तार्किक कौशल एवं विश्लेषणात्मक क्षमता, निर्णय लेना एवं समस्या समाधान, सामान्य मानसिक योग्यता तथा आधारभूत गणित से संबंधित खंडों को शामिल किया है। अपनी तैयारी के दौरान अभ्यर्थियों को प्रत्येक खंड को समान महत्व देना चाहिए।
  • प्रत्येक वर्ष यह देखा जाता है कि इस प्रश्न पत्र में यदि गणित के प्रश्न अधिक कठिन बनाए जाते हैं तो कंप्रीहेंशन के प्रश्नों को सरल बनाया जाता है। इसी प्रकार, प्रत्येक वर्ष किसी विशिष्ट खंड से अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं तथा दूसरे खंडों से आने वाले प्रश्नों की संख्या में कमी कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में अभ्यर्थी इस पाठ्यक्रम के किसी भी खंड को छोड़कर अन्य खंडों की तैयारी नहीं करनी चाहिए तथा सभी को समान रूप से तैयार करना चाहिए।
  • हाल की कुछ प्रवृत्तियों से यह भी देखा गया है कि इंजीनियरिंग तथा गणित बैकग्राउंड वाले अभ्यर्थी भी CSAT की परीक्षा को पास नहीं कर सके हैं। अतः प्रत्येक अभ्यर्थी को चाहिए कि वह इस प्रश्न पत्र को हल करने के लिए अधिक से अधिक प्रश्न पत्रों की प्रैक्टिस करे। अभ्यर्थी इस प्रश्न पत्र की समझ के विकास हेतु 10 वीं स्तर की गणित की पुस्तकों अथवा किसी अन्य मानक पुस्तक की सहायता ले सकता है। इससे, निश्चित समय में वह पास करने के लिए आवश्यक प्रश्नों को हल कर सकता है।
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