भारत में जनजातीय समुदाय : प्रतिनिधित्व, भेद्यता एवं समावेशन
भारत, परचेजिंग पावर पैरिटी (Purchasing Power Parity) के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है। किन्तु अभी भी एक तबका है जो हाशिए पर जीवन यापन कर रहा है, जिसे हम आदिवासी, आदिम जाति, वनवासी आदि नामों से पुकारते हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्यों यह वर्ग समाज से जुड़ नहीं पाया तथा विकास से वंचित रह गया? इनकी समस्याएं क्या हैं तथा इनका समाधान क्या हो सकता है?
- नवीन चंदन
भारत, स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में है, जिसे आजादी के अमृतकाल की ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 भारत का विकासमान श्रम पारितंत्र सामाजिक सुरक्षा परिप्रेक्ष्य - नूपुर जोशी
- 2 वैश्विक जलवायु शासन का पुनर्मूल्यांकन कॉप-30 एवं सतत भविष्य की दिशा - आलोक सिंह
- 3 सतत भविष्य के लिए वन संतुलन, संरक्षण एवं समुचित प्रबंधन की अनिवार्यताएं - नूपुर जोशी
- 4 संयुक्त राष्ट्र @80 सुधार, प्रतिनिधित्व एवं बदलती विश्व-व्यवस्था की चुनौतियां - आलोक सिंह
- 5 भारत की पाण्डुलिपि धरोहर प्राचीन ज्ञान का अमूल्य भंडार - संपादकीय डेस्क
- 6 ब्लू इकॉनमी व सतत समुद्री प्रगति भारत का दृष्टिकोण एवं रणनीति - आलोक सिंह
- 7 सतत मृदा प्रबंधन खाद्य सुरक्षा, जलवायु और जीवन का आधार - आलोक सिंह
- 8 माइक्रोप्लास्टिक संकट : मानव स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिक तंत्र के लिए अदृश्य खतरा
- 9 भारत के परिवहन क्षेत्र का विकार्बनीकरण
- 10 ब्रिक्स एवं वैश्विक दक्षिण - आलोक सिंह
- 1 अर्थव्यवस्था का विकार्बनीकरण : महत्व, चुनौतियां एवं उपाय
- 2 I2U2 समूह तथा भारत : पश्चिम एशिया में आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग की पहल
- 3 भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की भूमिका : औचित्य, लाभ एवं चुनौतियां
- 4 दिव्यांग व्यक्तियों का सशक्तीकरण : सामाजिक भागीदारी के लिए समावेशी वातावरण का निर्माण आवश्यक

