ईरान प्रतिबंध और भारतीय दुविधा
क्या भारत आने वाले समय में अमेरिकी प्रतिबंधों और इस क्षेत्र में उभरती
भौगोलिक स्थिति के साथ नयी चुनौतियों का सामना कर पायेगा?
- ईरान परमाणु समझौते को औपचारिक रूप से जॉइंट कम्प्रेहिन्सिव प्लान ऑफ एक्शन (Joint Comprehensive Plan of Action) के रूप में जाना जाता है। इस समझौते के तहत ईरान को परमाणु विकास कार्यक्रम को रोकने के लिए सहमत होने के बदले अरबों डॉलर के प्रतिबंधों से मुक्त होनेे की पेशकश की गई थी।
- यह समझौता 14 जुलाई, 2015 को सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन, रूस तथा जर्मनी और ईरान ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 अमेरिका–ईरान इस्लामाबाद समझौता: पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक शुरुआत
- 2 अल नीनो : भारत के लिए एक गंभीर विकासात्मक चुनौती क्यों?
- 3 भारत का अप्रत्याशित 'बेबी बस्ट': विश्व के लिए एक जनसांख्यिकीय चेतावनी
- 4 भारत में रोजगार योग्यता संकट: डिग्री और कौशल के बीच बढ़ती खाई
- 5 16वाँ वित्त आयोग: कर-वितरण, उपकर और संघीय संतुलन का प्रश्न
- 6 भारत में ध्वनि प्रदूषण : पर्यावरणीय न्याय की नई चुनौती
- 7 एक्स्ट्रागैलेक्टिक जेट्स: ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली लेज़र बीम
- 8 भारत–यूएई संबंध : ऊर्जा सुरक्षा से व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक
- 9 भारत में जैव-ऊर्जा की संभावनाएं हरित ऊर्जा संक्रमण का आधार - आलोक सिंह
- 10 पश्चिम एशियाई संकट : भू-राजनीतिक द्वंद्व, ऊर्जा सुरक्षा और भारत के रणनीतिक सरोकार - आलोक सिंह

