जीवन की जीवंतता, संघर्ष की पटकथा - डॉ. श्याम सुन्दर पाठक ‘अनन्त’

जीवन की जीवंतता, संघर्ष की पटकथा - डॉ. श्याम सुन्दर पाठक ‘अनन्त’

(AIR)

जीवन एक पहेली की तरह है, जिसका हल इससे बचने में नहीं, बल्कि इससे लड़कर ही निकाला जा सकता है। जिस प्रकार एक जहाज, बन्दरगाह के भीतर सुरक्षित तो होता है, परन्तु उसका उद्देश्य वह नहीं होता, उसी प्रकार जीवन भी एक जहाज की ही तरह है, इसमें संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना एवं अपने लक्ष्य को प्राप्त करना आवश्यक है।

  • अस्तित्ववादी दार्शनिक ‘सार्त्र’ के अनुसार "प्रत्येक व्यक्ति, अपने निर्णय का ही प्रतिफल है"। यानी व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णय ही उसका भविष्य निर्धारित करते हैं। प्रत्येक निर्णय अपने साथ कुछ चुनौतियां लेकर आता है। परन्तु, हम किसी चुनौती से सिर्फ इसलिए दूर भाग नहीं सकते कि कहीं उसके जोखिम का सामना न करना पड़े। संघर्ष का जोखिम तो लेना ही पड़ेगा।

"गिरते हैं शहसवार ही, मैदान-ए-जंग में,

वो तिफ्रल क्या गिरेंगे, जो घुटनों के बल चले ।।"

(तिफ्ल- शिशु; शहसवार- घुड़सवार)

  • हम अक्सर देखते हैं कि बच्चे कई प्रकार की गलतियां करते हैं। कभी-कभी तो हमारे लाख टोंकने के बावजूद भी वे नहीं रुकते, लेकिन एक गलती वह कभी नहीं करते; जानते हैं क्या? वह कितनी बार भी गिरें, कितनी भी बार चोटिल हों, लेकिन कभी चलना नहीं छोड़ते।
  • हम कभी गिरें न, चोट न खाएं, कभी भटकें न; और इसके लिए हम घर से ही न निकलें, तो क्या हम कभी जीत पाएंगे? जिन्दगी के सच्चे अनुभव ले पाएंगे? उत्तर यही होगा- नहीं, कभी नहीं। तो फिर गिरने से डरना क्यों? किसी शायर ने सच ही कहा है-

"मंजिल मिल ही जाएगी, भटकते ही सही ।

गुमराह तो वो हैं, जो घर से निकले ही नहीं ।।"

  • यथार्थ जीवन जीने के लिए संघर्षों के रास्तों पर चलना पड़ता है। ख्वाब देखने पड़ते हैं; सपने बुनने पड़ते हैं। ये सपने ही हैं, जो मनुष्य को कर्मशील बनने हेतु प्रेरित करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के अनुसार-

"सपने वे नहीं, जो बन्द आंखों से देखे जाते हैं,

बल्कि वे हैं, जो सोने ही न दें।"

  • लेकिन सपने तो टूट भी सकते हैं; इसका अर्थ यह नहीं कि हम सपने देखना ही छोड़ दें। कुछ सपने टूट जाने से जिन्दगी समाप्त नहीं हो जाती। मनुष्य अपने सपनों के माध्यम से ही अपनी आकांक्षाओं को पंख दे पाता है। सपनों को पूरा करने के लिये अपनी नींद, सुख-चैन आदि छोड़ना ही उन्हें पूरा करने का एकमात्र तरीका है।
  • समस्या यह नहीं कि जीवन में संघर्ष हैं, बल्कि संघर्ष-मुत्तफ़ जीवन की कल्पना करना ही बेईमानी है। जिसके जीवन में कष्ट नहीं, समस्याएं नहीं, परेशानियां नहीं, बाधाएं नहीं; वह व्यक्ति जीवन जी ही नहीं रहा; वह जान ही नहीं पाएगा कि जीवन है क्या? गोपाल दास नीरज जी लिखते हैं-

साथी! दुःख से घबराता है?

दुःख ही कठिन मुक्ति का बंधन, दुःख ही प्रबल परीक्षा का क्षण,

दुःख से हार गया जो मानव, वह क्या मानव कहलाता है?

  • जो रास्ते हमें आसान लगते हैं, वे बाद में मुश्किल भरे भी हो सकते हैं। मुश्किल रास्ते ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। अक्सर हमें डर लगता है- हारने से, असफलता से; और अपने इस डर के कारण हम चलना ही बन्द कर दें, लड़ना ही बन्द कर दें; यह उचित नहीं।
  • यही बात बच्चों की परवरिश पर भी लागू होती है। हमारी अति सुरक्षा वाली भावना अक्सर उन्हें कमजोर बना देती है। वे बने ही हैं, आसमानों की ऊंचाइयां छूने के लिए। यह ध्यान में रखना होगा कि कहीं हमारी अति सुरक्षा की भावना उन्हें ऐसा व्यक्ति न बना दे कि वे अपने जीवन में संघर्षों से ही भागते फिरें।
  • क्या आप जानते हैं, एक बाज अपने बच्चे की परवरिश किस प्रकार करती है? मादा बाज अपने बच्चे के जन्म के बाद उसे अपने पंजों से पकड़कर लगभग 12 किमी. की ऊंचाई पर पहुंच जाती है तथा वह उसे वहां से फेंक देती है। उसे एहसास कराया जाता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है?
  • गिरने के दौरान 2 किमी. तक उस बच्चे को यह एहसास ही नहीं होता कि हो क्या रहा है। 7 किमी. के बाद, उस चूजे के पंख खुलने लगते हैं, लगभग 9 किमी. तक आने के बाद उसके पंख पूरी तरह खुल चुके होते हैं, वह पहली बार अपने पंख फड़फड़ाता है। लेकिन वह अभी भी उड़ना नहीं सीख पाया है। जब दूरी धरती से महज 700-800 मीटर रह जाती है, उस चूजे के ठीक ऊपर उड़ रही मादा बाज अपने बच्चे को पंजे में दबाकर पुनः आसमानों की ऊंचाइयों में पहुंच जाती है और फिर यही प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है। यह ट्रेनिंग एक कमांडो की ट्रेनिंग से भी ज्यादा कठोर होती है और तब जाकर अपने से दस गुना वजनी प्राणी को लेकर उड़ सकने वाला बाज तैयार होता है।
  • वास्तव में जीवन में कष्टों से दूर भागना ही सबसे बड़ी मूखर्ता है। कष्टों से भागने से अच्छा है, उसको सहन करते हुए उसी में से कामयाबी का रास्ता खोजा जाए। दुःख, परेशानियां हमें ताकतवर बनाने आती हैं, न कि तोड़ने। महान और कामयाब लोगों की जीवनियां पढ़ लें; ये सभी, महान संघर्षों की गाथाएं हैं। तो फिर कष्टों से, संघर्षों से घबराना क्यों?

"इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रान्त भवन में टिक रहना ।

किन्तु पहुँचना उस सीमा तक, जिसके आगे राह नहीं ।।"