Question : धारणीय विकास
(2005)
Answer : धारणीय विकासः औद्योगीकरण और उपभोक्तावाद के कारण प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन पूरे विश्व में हो रहा है। आज का आधुनिक औद्योगिक समाज प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन पर आश्रित है। इससे विश्व के प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ता है। मनुष्य भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकृति से न केवल दूर हो गया बल्कि वह उसे दूषित करने लगा है। ये प्रवृत्तियां पूरे मानवता के लिए घातक एवं विनाशकारी है। अतः प्राकृतिक संसाधनों को ....
Question : स्त्री-पुरुष न्याय के लिए आंदोलनों में आधारित मुद्दे
(2005)
Answer : स्त्री-पुरुष न्याय के लिए आंदोलनों में आधारित मुद्देः स्त्री-पुरुष न्याय के लिए आंदोलन 20वीं शताब्दी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस काल में कई भागों में महिला आंदोलनों का उदय हुआ। इन आंदोलन के माध्यम से महिलाओं ने असमानता, पितृसत्तात्मक मूल्यों एवं समाजिक संरचनाओं में असमानता के विरुद्ध आवाज उठाई। भारत में उन्नीसवीं शताब्दी में समाज सुधारकों ने बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह की मनाही, पर्दा प्रथा, महिलाओं को शिक्षा जैसे मुद्दों पर बहस की शुरुआत ....
Question : शीत युद्धोत्तर काल में गुटनिरपेक्षता की सार्थकता
(2005)
Answer : शीत युद्धोत्तर काल में गुटनिरपेक्षता की सार्थकताः गुटनिरपेक्षता शीतयुद्ध के विरुद्ध एक सकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हुई और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के एक सिद्धांत के रूप को ग्रहण किया और विश्वव्यापी आंदोलन का आधार बन गया। ऐसा दृष्टिकोण संकीर्ण है कि शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन महत्वहीन हो गया है। गुटनिरपेक्षता की राजनीतिक संगति चाहे समाप्त हो गयी हो, फिर भी नव-उपनिवेशवाद के इस युग में आर्थिक न्याय की प्राप्ति के ....
Question : विश्वव्यापी न्याय के लिए तीसरी दुनिया आंदोलन के बुनियादी लक्ष्यों का विश्लेषण कीजिए। उनको प्राप्त करने के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग का क्या महत्व है?
(2005)
Answer : तीसरी दुनिया में निर्धन, अल्प विकसित तथा विकासशील देश शामिल हैं, जो शीघ्र बहुमुखी विकास करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। इनकी अर्थव्यवस्था कमजोर है। इन देशों की आर्थिक विकास दर तथा विकास का स्तर कम है। इन देशों में औद्योगीकरण तथा विकास के लिए आवश्यक भौतिक सुविधाओं की कमी है। विकसित देश जो मूलतः उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित हैं, जिनकी जनसंख्या समस्त जनसंख्या की करीब तीस प्रतिशत से भी कम है। परंतु ....
Question : विकास के पूंजीवादी मॉडल की प्रकृति और विकासशील देशों के लिए उस मॉडल की उपयोगिता और परिसीमाओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(2005)
Answer : विश्व में विकास के पूंजीवादी मॉडल को अनेक प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रणालियां इसे समाप्त करके इसकी जगह लेने आती रहीं किन्तु कोई भी प्रणाली इतनी उत्पादनशील सिद्ध नहीं हुई जितना कि पूंजीवादी प्रणाली। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों ने पूंजीवाद के विरूद्ध एक बेहतर आर्थिक तंत्र के आधार पर साम्यवादी व्यवस्था के निर्माण का प्रयास किया, किन्तु उनका प्रयत्न असफल रहा। आज त्वरित आर्थिक विकास के लिए दुनिया के अधिकांश देशों ने पूंजीवादी मॉडल को ....
Question : किसी देश की विदेश नीति के निर्धारण में भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक कारकों की भूमिका और महत्व का वर्णन एवं आकलन कीजिए।
(2005)
Answer : किसी देश की विदेश नीति उस देश के गतिविधियों का एक व्यवस्थित रूप है जिनका दीर्घकालीन अनुभव के आधार पर राज्य द्वारा किया जाता है और जिसका उद्देश्य दूसरे राज्यों के व्यवहार अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप परिवर्तित करना है तथा इसके साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का आकलन करते हुए स्वयं अपने व्यवहार में ऐसा परिर्वतन लाना है जिससे अन्य राज्यों के व्यवहार अथवा क्रियाकलापों के साथ तालमेल बैठ सके। कोई भी देश अपनी विदेश नीति ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के लिए खेल थियोरी और उसकी परिसीमाएं
(2005)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के लिए खेल थियोरी और उसकी परिसीमाएं: खेल सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को एक क्रीड़ास्थली मानता है जहां राष्ट्र और राज्य अपनी व्यूह रचना कर रहे हैं। इस सिद्धांत में अनेक समानताओं के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को एक खेल मान लिया जाता है और उसके अध्ययन के लिए खेल जैसा एक प्रतिरूप या नमूना (Pattern) बनाकर अतंर्राष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इस मॉडल या नमूना में शक्ति (Power), निर्णय ....
Question : दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के संबंध की संभावनाएं एवं समस्या।
(2004)
Answer : दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत के संबंध की संभावनाएं एवं समस्याः भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया, जिसमें 10 देश शामिल हैं, के साथ सम्बन्धों में मजबूती के अनेक प्रयास किये हैं। भारत की भौगोलिक एवं राजनीतिक परिदृश्य में उसे दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ सम्बन्धों के प्रति सकारात्मक खि्ांचाव लाया है। सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने पड़ोसी देशों के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया। भारत दक्षिण-पूर्व एशिया का संगठन ‘आसियान’का पूर्ण ....
Question : यूरोपीय संघ का प्रादेशिक संगठन के एक सफल मामले के रूप में किस प्रकार उदय हुआ था? क्या अन्य प्रदेशों में भी उसकी प्रतिकृति की जा सकती है?
(2004)
Answer : यूरोपीय संघ (European union) 25 सदस्य देशों का अत्यंत प्रभावी क्षेत्रीय संगठन है। इस संगठन को क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का मार्गदर्शक माना जाता है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक एकीकरण है। जिसमें सदस्य देशों के साथ आर्थिक सहयोग एवं मुक्त व्यापार शामिल है। यूरोपीय संघ राजनीतिक-आर्थिक एकीकरण की दिशा में में कार्यरत है। हालांकि अभी हाल में यूरोपीय एकीकरण की दिशा में तैयार किये संविधान को फिलहाल स्थगित कर दिया है।
यूरोप की एकता का ....
Question : शीत युद्ध अवधि के दौरान परम शक्ति संबंधों के एक उदाहरण के रूप में, 1962 के क्यूबाई मिसाइल संकट का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(2004)
Answer : शीत युद्ध का प्रयोग तनाव की उस ‘अभूतपूर्व स्थिति के लिए किया गया जो कि दो पूर्व मित्रों, संयुक्त राज्य अमरीका तथा सोवियत संघ के मध्य अचानक विकसित हो गई। इस संघर्ष का एक लंबा इतिहास है। यह अंतर्राष्ट्रीय साम्यवाद और अमेरिकी पूंजीवादी के मध्य लंबे समय तक चला संघर्ष था। जिसका अंत सोवियत संघ के विघटन के बाद हो गया।
शीत युद्ध की राजनीति में बर्लिन में सोवियत संघ की सफलता को मात्र ‘छिछली विजय’ ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन के तंत्र उपागम पर चर्चा कीजिए।
(2004)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में व्यवस्था सिद्धांत व्यवहारिक क्रांति की देन है। इस दृष्टिकोण के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में ‘एक व्यवस्था’ विद्यमान है जिसके विभिन्न अंग पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं द्वारा परस्पर संबंध स्थापित रखते हैं। विश्व की सभी राजनीतिक गतिविधियां इस सुव्यवस्थित ढांचे के अंगों की इन्हीं आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मत है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का वैज्ञानिक अध्ययन तभी किया जा सकता है, जबकि इसे एक ‘व्यवस्था’ के परिप्रेक्ष्य में देखा ....
Question : सोवियत संघ के निपात का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव।
(2004)
Answer : सोवियत संघ के निपात का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभावः सोवियत संघ का विघटन एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय घटना थी कि संसार का कोई भी देश इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह सका। लगभग सभी देशों को चाहे वे सोवियत संघ के मित्र थे अथवा शत्रु अथवा निर्गुट, अपनी विदेश नीतियों में कुछ न कुछ परिवर्तन करना पड़ा।
सोवियत संघ के विघटन के बाद पूरा विश्व सैन्य दृष्टि से एक ध्रुवीय बन गया। संयुक्त राज्य सत्ता का केंद्र ....
Question : राजकीय अर्थशास्त्र उपागम का महत्व और परिसीमाएं।
(2004)
Answer : राजकीय अर्थशास्त्र उपागम का महत्व और परिसीमाएं: राजकीय अर्थशास्त्र (Political Economy) अध्ययन की वह शाखा जहां राजनीति विश्लेषण के आर्थिक तत्व की मदद ली जाती है। यह एक सच्चाई है कि आर्थिक संबंध व संस्थाएं राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। आर्थिक पक्ष की देखभाल राज्य और सरकार का मूल कर्तव्य है, क्योंकि समाज कल्याण के लिए आर्थिक विकास महत्वपूर्ण है। राजकीय अर्थशास्त्र उपागम के अध्ययन में आर्थिक प्रतिरूपों का प्रयोग करते हुए आर्थिक जीवन ....
Question : राष्ट्रीय हित की यथार्थवादी दृष्टि।
(2004)
Answer : राष्ट्रीय हित का यथार्थवादी दृष्टिः ‘राष्ट्रीय हित’ की यथार्थवादी दृष्टिकोण विश्व राजनीति को शक्ति प्राप्त करने के लिए किया जा रहा संघर्ष समझता है। यथार्थवादी पक्ष उन लोगों का है जो स्थूल और स्वार्थसाधक राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हैं। यह कहना अधिक उचित होगा कि यथार्थवाद विचारों का वह समूह है जो सुरक्षा एवं शक्ति के घटकों के ध्वनितार्थों को अपनी चिंतन सामग्री मानता है।
यथार्थवादी दृष्टिकोण के तह में बुनियादी मान्यता यह है कि ....
Question : पारिस्थितिक सारोकारों के प्रति साझे वैश्विक उपागम की आवश्यकता और उसके विकास में प्रतिबाधाएं।
(2004)
Answer : पारिस्थितिक सारोकारों के प्रति साझे वैश्विक उपागम की आवश्यकता और उसके विकास में प्रतिबाधाएं: पर्यावरणीय चिंताएं यदा-कदा ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जाती थीं परंतु आजकल पर्यावरण को समर्थन देने तथा इसके संतुलन के लिए विश्व के सभी राष्ट्र एकजुट हैं तथा संयुक्त राष्ट्र भी इस ओर प्रयासरत है। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि मानव गतिविधियां वायुमंडल में ‘ग्रीन हाऊस’ गैसों की रचना में योगदान करती हैं, जिसके फलस्वरूप वैश्विक तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि हो ....
Question : पारंपरिक उपागम और उसका महत्व
(2003)
Answer : तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन के परंपरागत उपागमों का संबंध मुख्यतः इतिहास, नीतिशास्त्र, दर्शन एवं कानून से रहा। प्रारंभ में परंपरागत उपागमों में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के औपचारिक अध्ययन पर बल दिया गया। बाद में ऐतिहासिक कानूनी पद्धतियों की प्रतिक्रियास्वरूप संरुपण पद्धति को अपनाया गया। परंपरागत उपागमों में संस्थाओं पर विशेष बल दिया गया। उन्हीं के फलस्वरूप इस उपागम में समाहित ऐतिहासिक, कानूनी, संस्थागत उपागमों का विस्तृत वर्णन किया गया।
ऐतिहासिक उपागम के अंतर्गत भिन्न-भिन्न राज्यों में ....
Question : संयुक्त राष्ट्र तंत्र के अधीन मानवाधिकारों के संरक्षण एवं प्रवर्तन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2003)
Answer : साधारणतः अधिकारों को व्यक्ति का ऐसा दावा कहा जाता है जो समाज द्वारा स्वीकृत हो तथा राज्य द्वारा लागू किया जा रहा हो। ये अधिकार व्यक्ति के लिए इतने महत्वपूर्ण माने जाते हैं कि इनकी अनुपस्थिति में कोई भी व्यक्ति अपने श्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता। रैण्डम हाउस एनसाइक्लोपीडिया में लिखा है कि मानव अधिकार ‘एक मनुष्य होने के नाते ही एक व्यक्ति की शक्तियों, अस्तित्व की शर्तों तथा प्राप्तियों के दावे होते ....
Question : क्या आपके विचार में सोवियत संघ के विघटन के बाद अब भी शीत युद्ध विद्यमान है?
(2003)
Answer : सोवियत संघ के विघटन को 20वीं शताब्दी की एक आश्चर्यजनक घटना कहा जा सकता है। जिस प्रकार 1917 में आयी समाजवादी क्रांति के बाद सोवियत संघ के उद्भव ने 20वीं शताब्दी के आरंभ में विश्व राजनीति को गहरे रूप में प्रभावित किया था, उसी तरह 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में सोवियत संघ का विघटन भी विश्व राजनीति में परिवर्तन का एक महान स्वप्नद्रष्टा बना।
74 वर्षों तक एक महाशक्ति के रूप में विश्व राजनीति को ....
Question : सार्क देशों के सुचारु प्रचालन के रास्ते में रुकावटें
(2003)
Answer : सार्क की स्थापना 1985 में की गयी। क्षेत्रीय सहयोग की भावना से गठित राष्ट्रपति जियाउर्रहमान का सपना और सात देशों की भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक धार्मिक एकता का प्रतीक अपने 20 वर्ष पश्चात की सहयोग की भावना को सफल नहीं बना सकी। लेकिन यह क्रियाशील रहा और जिस गति से इसको आगे बढ़ना चाहिए था, वैसा यह गति नहीं ले पाया। यह सच है कि इसने क्षेत्रीय राष्ट्रों के बीच अंतःसहयोग को बढ़ावा दिया और ....
Question : शक्ति संतुलन तथा विश्व राजनीति पर उसका प्रभाव
(2003)
Answer : राष्ट्रों के बीच शक्ति के सामान्य वितरण को शक्ति संतुलन माना जाता है। विशेष स्थिति में इसका अर्थ यह माना जाता है कि स्वतंत्र एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर छा जाना।
मार्गेन्थाऊ इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए मानते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र यथास्थिति को बनाए रखने अथवा बदलने के लिए दूसरे राष्ट्रों की अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त करने की उम्मीद रखता है।
कई लेखक शक्ति संतुलन को नीति के रूप में देखते हैं। जैसे- विंस्टन ....
Question : विश्व व्यापार संगठन के मुख्य अभिलक्षण
(2003)
Answer : यह संगठन उरुग्वे दौर की बहुपक्षीय वार्ता के अंतिम चरण के पश्चात 1 जनवरी, 1995 को अस्तित्व में आया। ‘गैट’ (GATT) का इस संस्था के अंतर्गत विलय हो गया तथा गैट की उरुग्वे वार्ता के सभी प्रावधान 1 दिसंबर, 2004 तक विश्व व्यापार नियमावली के अंग बन जायेंगे। भारत इसके संस्थापक सदस्यों में है। विश्व व्यापार संगठन का मुख्य उद्देश्य विश्व व्यापार का उदारीकरण करना है। संगठन के सदस्यों के लिए आवश्यक है कि वे ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में यर्थाथवादी सिद्धांत को स्पष्टतया समझाइये।
(2003)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक यथार्थवाद के मुख्य प्रवर्तक जे. मार्गेन्थाऊ रहे हैं। यह सिद्धांत राष्ट्रों के मध्य शक्ति के लिये संघर्ष के सभी पहलुओं का वर्णन करता है। इस सिद्धान्त का विस्तृत रूप 1945 के बाद देखने को मिलता है।
मार्गेन्थाऊ के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति प्रायः सभी राजनीतियों की तरह राष्ट्रों के मध्य संघर्ष है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अंतिम उद्देश्य चाहे कुछ भी रहा हो, इसका तत्कालीन उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना होता है।
प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का मार्क्सवादी उपागम
(2002)
Answer : मार्क्सवादी उपागम का हम पूर्णतः अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के धरातल पर अनुप्रयोग करते आये हैं। मार्क्स ने दुनिया के मजदूरों को एकीकृत होने का आह्नान किया। मार्क्सवाद के अनुसार सारी दुनिया के देशों को एक प्रगतिशील सामाजिक-राजनैतिक विचार पर बात कर उसे अपने सही धरातल पर उतारने की बात करते हैं। इसलिए मार्क्सवादी वैज्ञानिक साम्यवादी व्यवस्था पर विश्वास करते हैं।
यद्यपि मार्क्सवादी उपागम का महत्व एवं व्याख्या सभी बिंदुओं जैसे सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक आधार पर की ....
Question : क्यूबा प्रक्षेपास्त्र एक Factor के रूप में अमेरिका का संबंध U.S.S.R. के साथ)।
(2002)
Answer : पेरिस शिखर सम्मेलन की असफलता से संपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समाज में गहरी निराशा छा गयी। इसी के मद्देनजर उन्होंने सुलह की पहल की। ख्रुश्चेव ने 10 दिसंबर, 1960 को वक्तव्य जारी कर कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में सब प्रकार के तनाव उत्पन्न होते हैं। किन्तु समय बीतने के साथ ऐसे संबंधों की कटुता दूर हो जाती है। उधर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में जॉन एफ. केनेडी के विजयी होने पर एक नयी आशा का संचार हुआ। ....
Question : वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था विकासशील देशों के प्रति किस सीमा तक अन्यायपूर्ण और आधिपत्यपूर्ण है?
(2002)
Answer : 1950 व 1960 के दशक में जहां अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र बिन्दु उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद व नवराष्ट्रों की स्वतंत्रता रही है तो 1970 से 1990 का दशक में मूल रूप से विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहा। 1970 के दशक से ही तीसरी दुनिया के देशों का इस संदर्भ में प्रमुख कार्य ‘नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मांग रहा है। इसके माध्यम से भारत व अन्य तीसरी दुनिया के देश अपनी आर्थिक प्रभुसत्ता, समानता व न्याय पर ....
Question : राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों एवं परिसीमाओं की विवेचना कीजिए।
(2002)
Answer : अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र मे किसी की राष्ट्रीय शक्ति राष्ट्र की वह शक्ति है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति दूसरे राष्ट्रों के कार्यों, व्यवहारों और नीतियों पर प्रभाव तथा नियंत्रण रखने की चेष्टा करता है। यह राष्ट्र की वह क्षमता है जिसके बल पर वह दूसरों राष्ट्रों से अपनी इच्छा के अनुरूप कोई कमी करा लेता है।
वास्तव में राष्ट्रीय-शक्ति मूल रूप से सैनिक शक्ति ही है, किन्तु इस शक्ति की रचना में अनेक तत्व कार्य ....
Question : क्षेत्रीय सहयोग के तृतीय संसार प्रतिमान के रूप में आसियान
(2002)
Answer : क्षेत्रीय सहयोग के तृतीय संसार प्रतिमान के रूप में आसियानः दक्षिण-पूर्व एशियाई सन्धि संगठन यानि आसियान की स्थापना बैंकाक घोषणा के दौरान 1967 में की गयी थी। अभी वर्तमान में आसियान के देशों की कुल संख्या 9 है। आसियान के प्रमुख उद्देश्यों में क्षेत्र में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति तथा सांस्कृतिक विकास में गति लाना, क्षेत्रीय सहयोग तथा स्थिरता में वृद्धि करना, वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास, शैक्षणिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग एवं सहायता प्रदान ....
Question : राष्ट्रीय सुरक्षा की बदलती प्रकृति तथा गतिकी
(2002)
Answer : वर्तमान समय में राष्ट्रीय सुरक्षा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह किसी देश के भी राष्ट्रीय महत्व के क्रियान्वित एवं विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। पहले राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा वस्तुतः आंतरिक एवं बाहरी कारणों के सापेक्ष में लिया जाता था। जिसमें अंतर्राष्ट्रीय सीमा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था, साथ ही यह भी सत्य है कि राष्ट्रीय सुरक्षा न केवल देश या राज्य की सम्पति, क्षेत्र या व्यक्ति ....
Question : मानव अधिकार और लोकोपकारी मध्यक्षेप
(2002)
Answer : मानव अधिकार और लोकोपकारी मध्यक्षेप: मानव अधिकार किसी व्यक्ति के जीवन, समानता एवं गरिमा को कायम रखने से संबंधित हैं। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर 1 में यह वर्णित है कि संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य मानव अधिकार, जाति, लिंग, भाषा तथा धर्म के भेदभाव किये बिना अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्राप्त करना है। जहां तक मानव अधिकार की बात यह कि व्यक्ति को जीवन, सुरक्षा, स्वतंत्रता प्रदान करता है एवं किसी भी प्रकार का अमानवीय व्यवहार के ....
Question : अफगान गृह-युद्ध के मूल कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस युद्ध में सोवियत संघ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्या भूमिका निभायी थी?
(2002)
Answer : अफगानिस्तान भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद अफगानिस्तान के महत्व में काफी वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि एक तरफ तो ईरान का महत्व बढ़ रहा था तथा दूसरी तरफ सोवियत संघ के दक्षिण में स्थित मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले प्रदेशों का महत्व था। बीसवीं सदी में ब्रिटेन तथा सोवियत संघ के मध्य हुए 1907 के समझौते के अंतर्गत अफगानिस्तान अपनी स्वतंत्रता को कायम रख सका था। 1919 में ब्रिटेन ....
Question : राष्ट्रीय हित एवं राष्ट्रीय लक्षणः विदेश नीति का मार्गदर्शन
(2001)
Answer : ‘अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक व्यवहार के सभी साधनों और तकनीकों का मैत्रीपूर्ण संबंधों शांति एवं युद्ध दोनों ही कामों में प्रयोग किया जा सकता है। यद्यपि इतना अवश्य है कि इनमें से कुछ की प्रकृति अधिकतर समझानें बुझाने की तो दूसरों की दबावकारी की है।’
राष्ट्रीय हित और संघर्ष अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के दो बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व हैं और दोनों के बीच संबंधों की महत्ता उस तथ्य से प्रकट होती है कि एक राष्ट्र का हित सदैव दूसरे ....
Question : आज का नैतिक दावा कल का मानवीय अधिकार होता जा रहा है। बीसवीं शताब्दी में मानवीय अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा देने का प्रयास का मूल्यांकन करें।
(2001)
Answer : संयुक्त राष्ट्र की एक बड़ी उपलब्धि है। मानवाधिकार कानून की व्यापक संस्था का निर्माण करते हुए इतिहास में पहली बार मानवाधिकारों की वैश्विक और अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण प्राप्त उपलब्ध करना है। इस संस्था का आधार 1948 में महासभा द्वारा पारित संयुक्त राष्ट्र चार्टर और मानवाधिकारों की वैश्विक घोषणा है। उसके बाद से संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकार कानूनों का धीरे-धीरे विस्तार किया ताकि महिलाओं, बच्चों, विकलांग व्यक्तियों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी श्रमिकों और अन्य कमजोर वर्गों के विशेष वर्गों ....
Question : अरब-इजराइल संघर्ष वास्तव में दो उभरते राष्ट्रवाद के बीच का संघर्ष है।
(2001)
Answer : पश्चिम एशिया में अरब-इजराइल की संघर्ष सम्पूर्ण शताब्दी की एक बहुत बड़ी समस्या है। अरब-इजरायल संघर्ष का मूल कारण हैं। इस क्षेत्र में प्रचलित धर्म पर आधारित दो विचारधाराएं, जिन्हें अरबवाद तथा यहूदीवाद कहा जाता है। 14 मई, 1948 को ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर से अपना मेन्डेट समाप्त कर दिया तथा उसी दिन इजराइल ने यहूदी राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी। फिलिस्तीन में इजराइल की स्थापना पश्चिमी राष्ट्रों के समर्थन से हुई थी। ....
Question : अनिवार्य क्षेत्रधिकार वर्ग अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थिति को स्पष्ट करता है।
(2001)
Answer : द हेग, नीदरलैंड्स में स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस संयुक्त राष्ट्र का मुख्य न्यायिक अंग है। यह राज्यों के मध्य कानूनी विवादों को निपटाता है और संयुक्त राष्ट्र एवं उसकी विशेषज्ञ एजेंसियों को परामर्शपूर्ण राय प्रदान करता है। उसकी संविधि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अभिन्न अंग है। संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य संस्थाएं भी किसी कानूनी प्रश्न पर न्यायालय से परामर्श ले सकती हैं। व्यक्तिगत झगड़े इस अदालत में पेश नहीं किये जा सकते हैं। ....
Question : तृतीय विश्व में राजनीतिक प्रक्रिया का स्वरूप
(2001)
Answer : उत्तर तथा दक्षिण के बीच टकराव है जबकि अब अमेरिका और रूस की कटुता कम हुई है। यहां विकसित देशों के बीच कटुता घट रही है। वहीं विकसित एवं विकासशील देशों के बीच टकराव की स्थिति बढ़ती जा रही है। जबकि विकसित राष्ट्र और तीसरी दुनिया के विकासशील राष्ट्रों के बीच टकराव स्पष्ट तौर पर पाया जाता है।
उत्तर-दक्षिण संघर्ष को सुलझाने के लिए कुछ वर्ष पूर्व मनीला में आयोजित अंकटाड सम्मेलन का उल्लेख करना वांछनीय ....
Question : उत्तर-दक्षिण देशों के चुनौतीपूर्ण प्रमुख मुद्दे को रेखांकित करें।
(2001)
Answer : उत्तर शब्द का प्रयोग विश्व के समृद्धिशाली औद्योगीकृत तथा गैर साम्यवादी देशों के लिए किया जाता है। जैसे- अमेरिका, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा पश्चिम यूरोप के देश। इसमें से अधिकांश देशों की व्यक्तिगत आय बहुत उंची है तथा ये देश अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के भी सदस्य हैं। उत्तर के विपरीत दक्षिण के राज्य तृतीय विश्व के विकासशील राज्य हैं तथा इनमें से अधिकांश की प्रति व्यक्ति आय बहुम कम है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इन ....
Question : सूचना प्रौद्योगिकी - राष्ट्रीय शक्ति का एक तत्व
(2000)
Answer : सूचना प्रौद्योगिकी वास्तव में राष्ट्रीय शक्ति का एक तत्व है, जो पारदर्शिता के साथ दिखता है। सूचना प्रौद्योगिकी के कारण लोगों में नये-नये अवसर प्राप्त होते हैं। खासकर भारत जैसे देश जहां बेरोजगारी अपनी चरम सीमा पर है। सूचना प्रौद्योगिकी ने बहुत लोगों को रोजगार दिया है। जिसने हमारे समाज में असंतोष की भावना को रोका है। आज टेलीफोन और मोबाइल का हमारे देश में जाल बिछा हुआ है। इससे राष्ट्र को एक बहुत बड़ा ....
Question : विकासशील देश उदारीकरण और भूमंडलीकरण से विकसित देशों के ट्रोजन डार्स के रूप में भयभीत है। सविस्तार चर्चा कीजिए।
(2000)
Answer : भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर में विकसित देशों द्वारा विकासशील देश पर ट्रोजन डार्स के रूप में भयभीत हैं। मेकलडान ने भूमंडलीकरण के अंतर्गत, जो दुनिया को एक छत के नीचे लाने का सपना देखा था, वो बिल्कुल अधूरा सा लगता है। आज उदारीकरण के नीति के कारण विकासशील देश विकसित देशों का मुखौटा बनकर रह गये हैं। जो देश 70-80 के दशक में आजादी पायी, उसकी हालत तो पहले से जर्जर है। उनके उद्योग ....
Question : क्या आप इस मत से सहमत है कि निर्गुट आंदोलन के पुनराविष्कार की जरूरत है?
(2000)
Answer : गुटनिरपेक्ष आंदोलन उन देशों से व्यापक अनुभव तथा आकांक्षाओं का परिणाम था, जिन्हें एक लंबे समय के बाद गुलामी से मुक्ति प्राप्त हुई थी। अपनी पराधीनता के दौरान उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध अनेक युद्धों में सम्मिलित होना पड़ा था। अतः वे किसी भी कीमत पर अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहते थे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन से जहां बहुत सफलता मिली है। वहीं उसमें बहुत सी खामियां भी देखने को मिलती हैं। उन खामियों को देखने के ....
Question : संयुक्त राष्ट्र महासभा सहस्राब्दि शिखर सम्मेलन
(2000)
Answer : 6 और 8 सितंबर, 2000 को संयुक्त राष्ट्र संघ के हेडक्वाटर न्यूयार्क में शिखर सम्मेलन हुआ। जिसका मूल उद्देश्य मानव, एकता, सम्मान और समानता भूमंडलीय स्तर पर लाने के लिए किया गया था। संयुक्त राष्ट्र पूरे विश्व में शांति की स्थापना करना चाहता है ताकि विश्व समाज में किसी तरह अशांति या युद्ध की संभावना को रोका जा सके। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय और कानून उपनिवेशवाद और आंतरिक मामले में हस्तक्षेप पर भी प्रकाश डाला है। भूमंडलीकरण ....
Question : प्रभुता संपन्न राज्य पर पुनर्विचार
(2000)
Answer : राजनीति विज्ञान तथा न्यायशास्त्र के शब्दों में संप्रभुता को राज्य का एक अनिवार्य गुण माना जाता है तथा यह एक ऐसी परिशुद्ध तथा सर्वोच्च सत्ता की द्योतक है, जिस पर आंतरिक या बाह्य सत्ता का कोई नियंत्रण नहीं होता। संप्रभुता के इस पारंपरिक अर्थ में आज के किसी भी राज्य को पूरी तरह संपन्न नहीं कहा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय आर्थिक समिति आदि अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता और अंतर्राष्ट्रीय संधियां, समझौते, अभिसमय आदि उस ....
Question : सर्व-अमेरिकावाद
(2000)
Answer : विश्व के मानचित्र में अमेरिका एक चमकता हुआ सितारा है, जो अपने विकास के चरम सीमा पर खड़ा हुआ दिखता है। इसी कारण आज विश्व के अधिकांश देशों पर इसका प्रभाव और वर्चस्व साफ दिखता है और संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् स्थायी सदस्यता ने तो इसे मनमानी करने का अधिकार ही दे रखा है। संयुक्त राष्ट्र संघ पर यह अपना दबदबा बनाये हुए है। खासकर तीसरी दुनिया को अमेरिका अभिशाप दिखता है। बहुत ....
Question : ‘सभी राजनीतियों की भांति अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भी शक्ति के लिए एक संघर्ष है’ टिप्पणी कीजिए।
(2000)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषण से जुड़े हुए यर्थाथवादी सिद्धांत की अन्य अनेक प्रतिस्पर्द्धी सिद्धांतों को चुनौती का सामना करना पड़ा। यह सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में प्रस्तुत किया गया था। बीसवीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में इस सिद्धांत को दोहराया गया। इस सिद्धांत के मूल प्रवर्तकों- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट मैनीफिस्टो’ के अंतर्गत तर्क दिया था कि पूंजीवाद के विस्तार के साथ विश्व संप्रभुतासंपन्न राष्ट्र राज्यों में विभाजित नहीं ....
Question : राष्ट्रीय हित एवं विचारधारा
(1999)
Answer : राष्ट्रीय हित, संघर्ष या विरोध और विचारधारा इन तीनों में परस्पर निकटतम संबंध है। पर एक परस्पर संबंध मुख्यतः परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रधान विशेषता रही है। स्थिति यहां तक है कि यह बात स्वतः सिद्ध मानी जाती है कि प्रत्येक राष्ट्र की राष्ट्रीय हित के संरक्षण की अभिलाषा से विरोध अवश्य ही पैदा होता है और राष्ट्र अपने दृष्टिकोण के लिए समर्थन किसी न किसी विचारधारा के आधार पर पाने का सदा प्रयत्न करता ....
Question : विश्व व्यापार संगठन के कार्यों से संबंधित विभिन्न विवादास्पद मुद्दों का आलोचनात्मक परीक्षण विकासशील देशों के विचार से एवं भारत के संदर्भ में करें।
(1999)
Answer : 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन की औपचारिक स्थापना हुई। इसकी स्थापना दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की दिशा में निर्णायक कदम है। आठवें व्यापार और तटकर संबंधी आम समझौता (गैट) की कोख से उपजा ये अंतर्राष्ट्रीय संगठन गैट की जगह लेकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की निगरानी करने लगा है। लेकिन उरुग्वे दौर की वार्ता के बाद बने डंकल दस्तावेज पर दस्तखत न कर पाने वाले देशों की सहूलियत के लिए फिलहाल ....
Question : एकध्रुवीय विश्व में निर्गुट आंदोलन अपना महत्व खो चुका है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? इस कथन के समर्थन में अपना उत्तर दीजिए।
(1999)
Answer : कुछ विचारक शीतयुद्ध को ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उदय का एकमात्र कारण मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार द्वितीय विश्व युद्धोत्तर काल में दोनों महाशक्तियों के मध्य यूरोप को लेकर ही तनाव था और यूरोप के देश अपनी भू-राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति के कारण दोनों महाशक्तियों में से किसी एक ओर से शीतयुद्ध में सम्मिलित होने के लिए बाध्य थे। किंतु एशिया तथा अफ्रीका के दशों पर इस तरह की कोई बाध्यता नहीं थी। अतः ....
Question : आण्विक युग में राजनय का महत्व
(1999)
Answer : वर्तमान समय में राजनय का कार्य, परमाणु युद्ध की संभावना को देखते हुए पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में मॉरगनेग्यू ने सच ही कहा है कि युद्ध आत्मघाती निराशा का एक साधन बन गया है। परिणामतः राष्ट्रों को युद्धों की विकल्पों की बात सोचनी पड़ती है। किसी सीमित युद्ध के व्यापक गुट में बदल जाने का खतरा रहता है। यदि हम भूतकाल को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है ....
Question : एजेंडा और उसके बाद
(1999)
Answer : एजेंडा 21 को पृथ्वी शिखर सम्मेलन में स्वीकार किया गया। यह टिकाऊ विकास के सभी क्षेत्रों में वैश्विक कार्य की एक व्यापक योजना है। इसमें सरकारों ने कारवाई के ऐसे विस्तृत ब्लूप्रिंट की रूपरेखा पेश की जो विश्व को उसकी आर्थिक वृद्धि के मौजूदा गैर-टिकाऊ माहौल से अलग हटाकर ऐसी गतिविधियों की ओर ले जा सकती है, जो उन पर्यावरणीय साधनों को सुरक्षित और नवीकृत करेगी। जिन क्षेत्रों में कार्रवाई की जरूरत है, उनमें शामिल ....
Question : ‘निर्णय-परक सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में केवल एक आंशिक सिद्धांत है।’ इस कथन की आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(1999)
Answer : निर्णयकारिता अथवा निर्णयपरक सिद्धांत के बौद्धिक बीज अठारहवीं सदी से भी पहले दिखायी देते हैं। बीसवीं शताब्दी में उस सिद्धांत की प्रेरणा वॉन-न्यूमैन तथा ऑस्कर मॉर्गन्सटर्न द्वारा बनाये गये खेलों के सिद्धांतों के स्वरूप निरुपणों से मिली। 1957 में उसने सरकारी निर्णयकारिता के स्वरूप आर्थिक सिद्धांतों के रूप में पेश किये गये। इसके अतिरिक्त विलियम राइकर, जेम्स रोबिन्सन और हरबर्ट साइमन आदि कई लेखकों ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन में निर्णयकारी दृष्टिकोण को समृद्ध किया।
निर्णयकारी ....
Question : यूरोपियन संघ
(1999)
Answer : यूरोपियन संघ कई नामों से जाना जाता है। परंतु यह यूरोपीय आर्थिक समुदाय के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसको यूरोपीय आर्थिक समुदाय इसलिए कहना उचित होगा क्योंकि, यही इसका अधिकृत शीर्षक है। 1 जनवरी, 1958 को एक संधि द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना हुई। प्रारंभ में इसके छः राष्ट्र- फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्जमबर्ग, जर्मन संघीय गणराज्य व इटली सदस्य थे। बाद में ब्रिटेन, आयरलैंड, डेनमार्क और नार्वे भी इस संधि में शामिल ....
Question : परंपरागत शस्त्र व्यापार
(1998)
Answer : सामान्यतः विश्व शस्त्र व्यापार में व्यापार योग्य शस्त्रों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है। प्रथम श्रेणी है, परम्परागत शस्त्रों का, जिसमें परम्परागत सैन्य साजो-सामान, बन्दूकें, बमों, तोपों, बख्तरबन्द गाडि़यों, हवाई जहाजों, शस्त्रयुक्त नौ जहाजों आदि को शामिल किया जाता है। दूसरी श्रेणी है, विशिष्ट या आधुनिक शस्त्रों का, जिसमें आधुनिक एवं विकसित तथा बेहद ही खतरनाक शस्त्रों को शमिल किया जाता है। इसमें प्रक्षेपास्त्रों, परमाणु हथियारों, विकसित हवाई जहाजों, परमाणु शस्त्रों से युक्त पनडुब्बियों, ....
Question : जनसाधारण पर्यावरण के निम्नीकरण तथा उससे जुड़ी हुई समस्याओं से चिन्तित हैं। इस संबंध में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की विवेचना कीजिये।
(1998)
Answer : जब मानव का इस पृथ्वी पर आविर्भाव हुआ, तो अनेक वर्षों तक इसकी नैसर्गिकता में कोई अंतर नहीं आया। लेकिन ज्यों-ज्यों वह विकास की ओर अग्रसर होता गया और मशीनों का सहारा लेता गया, त्यों-त्यों प्रकृति में विविध प्रकार के असंतुलन की स्थिति पनपती गयी। वस्तुतः उद्योग ही प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। चाहे चिमनियों से निकला धुंआ हो, जिसमें कार्बन के कण, कार्बन डाइऑक्साइड व कार्बन डाइसल्फाइड सरीखी जहरीली गैसें होती हैं अथवा उद्योगों ....
Question : संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विश्व राज्य बनने में आने वाली चुनौतियों तथा संभावनाओं का विश्लेषण कीजिये।
(1998)
Answer : विश्व युद्धों के रक्तरंजित इतिहास के पुनरावर्तन से विश्व को बचाने के लिए विश्व की तत्कालीन महाशक्तियों ने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पूर्व ही अथक प्रयास शुरू कर दिये थे। 26 जनू, 1945 को 51 राष्ट्रों के लगभग पौने दो अरब निवासियों के प्रतिनिधियों ने अमेरिका के सैन फ्रांसिस्कों नगर में अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के लिए एक नया अधिकार-पत्र स्वीकार किया, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ का ‘चार्टर’ कहा जाता है। 24 अक्टूबर, ....
Question : शस्त्र नियंत्रण में अवरोधकों का विश्लेषण कीजिये।
(1998)
Answer : ‘शस्त्र होड़’ का अर्थ है अधिक से अधिक मात्र में प्रत्येक देश द्वारा खतरनाक शस्त्रों को जमा करने में लगे रहने की प्रवृत्ति वैसे तो शस्त्रों के होड़ के बारे में साक्ष्य मध्यकालीन राज्यों के समय से ही मिलते है, मगर शस्त्र होड़ की विधिवत शुरुआत बिस्मार्क ने जर्मनी को एक विश्व शक्ति बनाने के लिए किया था। इसी शस्त्र होड़ की गर्भ से प्रथम विश्व युद्ध एवं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से 1990 ....
Question : नव-उपनिवेशवाद
(1998)
Answer : नव-उपनिवेशवाद, उपनिवेश- वाद का आधुनिक रूप है। राजनीतिक उपनिवेशवाद तो प्रायः समाप्त हो गया है, परन्तु आर्थिक उपनिवेशवाद का युग प्रारम्भ हो गया है। यह आर्थिक उपनिवेशवाद ही नव-उपनिवेशवाद है। इसका अर्थ आर्थिक परतन्त्रता से है, जो धनी व शक्तिशाली राष्ट्र, अर्द्ध विकसित देशों को आर्थिक सहायता देकर तथा उन पर राजनीतिक दबाव डाल कर अपने प्रभाव द्वारा पैदा की जाती है। दूसरे देश की आंतरिक व बाह्य नीति को प्रभावित करना भी नव-साम्राज्यवाद का ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के तथ्य को आधुनिक संदर्भ में समझाने में कैप्लान के व्यवस्था सिद्धांत की व्याख्यात्मक संभावना का परीक्षण कीजिये।
(1998)
Answer : व्यवस्था सिद्धान्त, समाज विज्ञान में व्यावहारवादी क्रान्ति का परिणाम है। मॉर्टन कैप्लान व्यवस्था उपागम के सबसे प्रधान व्याख्याताओं में से एक हैं। उनका विचार था कि अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में कुछ न कुछ सहयोग, निरंतरता और व्यवस्था है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं राजनीति में वे दो बातों को शामिल करते हैं- ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था’ और ‘राष्ट्रीय राज्य व्यवस्था’। कैप्लान के अनुसार, राष्ट्रीय राज्य व्यवस्था सही मायने में राजनीतिक व्यवस्था है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सही मायने में एक राजनीतिक ....
Question : मैत्री संधि
(1998)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मैत्री संधि को अपनी विदेश नीति का आधार बनाने की शुरुआत आधुनिक काल में साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा की गयी। बहुराष्ट्र व्यवस्था में शक्ति संतुलन बनाये रखने और अपने राष्ट्रीय हित की वृद्धि के लिए विदेश नीति में मैत्री संधि का इस्तेमाल एक उपकरण के रूप में किया जाता है। सामान्यतः कोई भी राष्ट्र मैत्री संधि का इस्तेमाल अपनी जरूरतों के अनुसार ही करता है। अगर कोई राष्ट्र बहुत ही ताकतवर है, तो ....
Question : अणु शक्ति के उपयोग
(1998)
Answer : अणु शक्ति ऊर्जा का प्राचीनतम एवं नवीनतम स्रोत है। प्राचीनतम इसलिए, क्योंकि अपने प्राकृतिक रूप में इसकी खोज बहुत पहले ही की गयी थी और नवीनतम इसलिए कि ऊर्जा उत्पादन के लिए इसका प्रयोग 1940 में ‘मैनहट्टन परियोजना’ में पहली बार किया गया। तारों की ऊर्जा का स्रोत आणविक ऊर्जा ही है। जाहिर है, सूर्य का स्रोत भी आणविक ऊर्जा ही है। इस प्रकार, ब्रह्माण्ड में सारी ऊर्जा एवं जीवन का मूल कहीं न कहीं ....
Question : ‘शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा के सम्बन्ध एक साथ ही परस्पर पूरक और परस्पर विरोधी रहे हैं।’ वक्तव्य पर सुविस्तृत प्रकाश डालिए।
(1997)
Answer : अक्सर सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था को एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के प्रारूप के रूप में चित्रित किया जाता है, जो शक्ति-संतुलन की धारणा को नकारती है और इस तरह विश्व समाज की प्रकृति और धारणा को मजबूती प्रदान करती है। जब राष्ट्र एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन या संस्था द्वारा परस्पर जुड़ते हैं, और जब वे शांति स्थापना के लिए सही मायने में सहयोग करते हैं, तब गुटबन्दी, अस्त्रों के भंडार, छुपे हुए क्षेत्रीय समझौते, राजनीतिक चालबाजियां ....
Question : ‘एशिया और अफ्रीका के लोगों की स्थिति में तथा यूरोप के साथ उनके सम्बन्धों में जो परिवर्तन आया, वह निश्चय ही नये युग के सूत्रपात का संकेत था।’ इस कथन की विवेचना कीजिये।
(1997)
Answer : मध्य 20वीं शताब्दी की महानतम एवं सर्वाधिक उल्लेखनीय घटनाएं, एशिया और अफ्रीका का उदय रहीं। इन दोनों महाद्वीपों के लोग, विदेशी सत्ता द्वारा लगाये गये बंधनों एवं गुलामी के जंजीरों को तोड़कर बाहर निकले। 1945 और 1960 के बीच दोनों महाद्वीपों में रहने वाले विश्व के एक चौथाई लोगों ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। उपनिवेशवाद के पतन ने एक नये युग के शुरुआत की उद्घोषणा की इस पर विचार व्यक्त करते हुए विद्वानों ने कहा, ....
Question : साप्टा (SAPTA) और साफ्टा (SAFTA)
(1997)
Answer : दक्षेस वरीयता व्यापार व्यवस्था या साप्टा की रूप-रचना पर एक समझौता, अप्रैल 1993 में ढाका में सम्पन्न हुए दक्षेस के सातवें शिखर सम्मेलन के दौरान हुआ था। सभी सदस्य देशों को 7 नवम्बर, 1995 तक इस समझौते को अपनी संसद द्वारा स्वीकृत कराना और इस समझौते को 7 दिसम्बर, 1995 से प्रभावी करने का निर्णय लिया गया था। मई 1995 में हुए आठवें दक्षेस शिखर सम्मेलन में साप्टा से सम्बन्धित बाकी के अन्य सभी बातों ....
Question : प्रभावी सरकार: राष्ट्र शक्ति का एक स्रोत
(1997)
Answer : सिर्फ खनिज एवं मानव संसाधनों की उपस्थिति से राष्ट्र शक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती, जब तक कि ऐसी कोई सत्ता या संस्था न हो, जो मानव प्रयत्नों को सही दिशा में संचालित एवं समन्वय करे। ऐसी संस्था किसी देश की सरकार होती है। अगर सरकार उचित प्रकार से संगठित, कार्यकुशल और प्रभावी न हो, तो राष्ट्र शक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। यह सरकार का कार्य होता है कि वह व्यक्तियों और खनिज ....
Question : ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ पर टिप्पणी लिखिये। टिप्पणी लगभग 200 शब्दों से अधिक न हो।
(1997)
Answer : सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से अभिप्राय सामान्यतया एक ऐसी अवधारणा से है जिसमें एक देश द्वारा दूसरे देश पर उसके सांस्कृतिक मूल्य थोपे जाते हैं। जाहिर है कि ऐसा तभी हो सकता है, जब किसी देश का दूसरे देश पर आधिपत्य हो। प्रत्येक विकसित देश की यह आकांक्षा होती है कि विश्व में उसके अधीनस्थ देशों में उसके सांस्कृतिक मूल्यों का आदर किया जाये। आज के बढ़ते हुए प्रौद्योगिक युग में, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के माध्यम से जितनी ....
Question : अंतर्राष्ट्रीयवाद और वैश्वीकरण के पारस्परिक व्याघात का प्रतिपादन कीजिये।
(1997)
Answer : अक्सर ‘अंतर्राष्ट्रीयवाद’ और ‘वैश्वीकरण’ शब्दों को एक-दूसरे के बदले प्रयोग में लाया जाता है, या कम-से-कम इन दोनों शब्दों को एक ही सिक्के के दो पहलू समझा जाता है। लेकिन राजनीतिक विचारकों का मानना है कि अन्तर्राष्ट्रीयवाद और वैश्वीकरण में काफी अंतर है और इन दोनों को एक-दूसरे के लिए प्रयोग में लाना गलत है।
राजनीतिक विचारकों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय- वाद बहुत हद तक एक राजनीतिक विचार है, जबकि वैश्वीकरण मूलतः एक आर्थिक विचार है। अन्तर्राष्ट्रीयवाद ....
Question : मॉस्ट्रिश संधि
(1997)
Answer : मॉस्ट्रिश संधि, यूरोपीय आर्थिक समुदाय (जिसे अब यूरोपीय संघ कहा जाता है) के 12 सदस्यों के बीच 11 दिसंबर, 1991 को हस्ताक्षरित किया गया था, जिसने यूरोपियन यूनियन (संघ) को एक वास्तविकता बना दिया। मॉस्ट्रिश संधि के निम्नलिखित मुख्य प्रावधान हैंः
Question : विदेश नीति में प्रकृति विशिष्ट तत्त्वों की भूमिका
(1996)
Answer : विदेश नीति में प्रकृति विशिष्ट तत्त्वों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण होती है। प्रकृति-विशिष्ट तत्त्वों में देश की उपज क्षमता, जलवायु, अन्य देशों से अवस्थिति और जल-मार्गे आदि आते हैं। उपर्युक्त सभी तत्त्व एक देश के स्व-निर्भरता के निर्धारक कारक होते हैं। साधारणतः भू-बद्ध देशों, शीतोष्ण क्षेत्रों के देशों और एक शक्ति संपन्न देश की सीमा पर अवस्थित देशों की अपेक्षा ऐसे देश जिनकी पहुंच गर्म-जल बन्दरगाहों तक होती है या उष्णीय जलवायु क्षेत्र में अवस्थित ....
Question : अतीतकाल को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र तृतीय विश्व को नव-साम्राज्यवाद से मुक्त करवा सकेगा, इसके प्रति अधिक आशावान नहीं हुआ जा सकता। व्याख्या कीजिये।
(1996)
Answer : वारसा गुट (साम्यवादी देशों का गुट) की समाप्ति के पश्चात् 1989-90 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने बदले विश्व राजनीतिक परीदृश्य को बड़ी चतुराई से ‘नयी विश्व व्यवस्था’ का नाम दिया और स्वतः अगुआ बनते हुए विश्व का आह्नान किया कि लोकतन्त्र, मानवाधिकार रक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, स्वतंत्र विश्व व्यापार और परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे मूल्यों तथा नीतियों की स्थापना के लिए वह अमेरिका का साथ दे। यह ‘नयी विश्व व्यवस्था’ मात्र इस बात का संकेत ....
Question : ‘प्रौद्योगिकी एवं जल ड्डोतों पर राज्य-प्रभुसत्ता’ पर लगभग 200 शब्दों में टिप्पणी लिखिए।
(1996)
Answer : अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार प्रत्येक राज्य को उसके जल स्रोतों पर प्रभुसत्ता प्राप्त है। इन जल स्रोतों का वह राज्य अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग कर सकता है। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों ने इस बात का भी प्रबन्ध किया है कि कोई देश ऐसे जल स्रोतों को, जो उसके राज्य-क्षेत्र से उद्गमित होकर अन्य देशों को जाता हो को अवरुद्ध नहीं कर सकता है। वैसे अंतर्राष्ट्रीय कानून जल स्रोतों के उद्गम-स्थलों वाले देशों को उन ....
Question : ''यथार्थवाद उपागम, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राज्य क्यों एक दूसरे के साथ युद्ध करते हैं अथवा एक-दूसरे को धमकाते हैं, स्पष्ट करने में तो सहायक है, लेकिन यह उनके सहकारिता के व्यवहार जो कि देखने में आता है, को दर्शाने में कम प्रभावशील है------------।'' इस पर विचार विमर्श कीजिये।
(1996)
Answer : अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों की व्याख्या से सम्बन्धित परम्परागत उपागम के दो रूप है, यथार्थवाद उपागम एवं आदर्शवाद उपागम। यथार्थवाद उपागम अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के निर्धारण में सुरक्षा और शक्ति कारकों पर अधिक बल देता है। यह विचार व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से उत्पन्न हुआ है जिसके अनुसार, अन्य लोग उसे विध्वंस करने के प्रयास में निरंतर लगे हुए हैं और इसलिए उसे अन्य लोगों को विध्वंस करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए, जब भी उसे खुद की सुरक्षा ....
Question : संयुक्त राज्य अमेरिका की अमेरिकी राज्य संगठन (ओ.ए.एस.) में भूमिका।
(1996)
Answer : अमेरिकी राज्य संगठन (OAS) विश्व का सबसे पुराना क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना अमेरिकी गोलार्द्ध के देशों द्वारा आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए 1948 में की गयी थी। अमेरिकी देशों में सबसे समृद्ध, विशाल, विकसित एवं शक्तिशाली होने के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का ओ.ए.एस. की स्थापना से लेकर अब तक के कार्यों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ओ.ए.एस. का इस्तेमाल इस क्षेत्र में साम्यवादी विचारधारा के प्रभाव को नहीं ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अंतर्राष्ट्रीय विधि की भूमिका
(1995)
Answer : वर्तमान युग अंतर्राष्ट्रीयवाद का एक युग है, जिसमें विभिन्न देश एक-दूसरे से निरंतर परस्पर संबंध के दायरे में बंधते हैं। राष्ट्रों के बीच के सम्बन्धों को नियंत्रित करने के लिए, चाहे शान्ति का समय हो या युद्ध का काल, पिछले कुछ शताब्दियों से कुछ नियम और नियंत्रण विकसित किये गये हैं, जिन्हें सामान्य रूप से ‘अंतर्राष्ट्रीय विधि’ कहा जाता है। ये नियम विविध राष्ट्रों के बीच के सम्बन्धों को नियंत्रित करने के साथ-साथ इन संबंधों ....
Question : ‘आरंभ से ही संयुक्त राष्ट्र विश्व राजनीति का एक सूक्ष्म जगत रहा है। इस संस्था के आन्तरिक घटनाक्रम इसके बाहर होने वाली घटनाओं और वातावरण को ही प्रतिबिंबित करते हैं।’ चर्चा कीजिये।
(1995)
Answer : वर्तमान, भविष्य एवं अतीत की समस्याओं एवं मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं, ऐसी संस्था के रूप में स्थापित संयुक्त राष्ट्र के आन्तरिक घटनाक्रम विश्व में घटने वाली घटनाओं से अछूते कैसे रह सकते थे या रह सकते हैं? आरम्भ से ही संयुक्त राष्ट्र के सभी आन्तरिक घटनाक्रम बाहर की घटनाओं और वातावरण को प्रतिबिंबित करते रहे हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र के अभी तक के कार्यकलापों को देखा जाये तो यह सरलतापूर्वक कहा जा सकता है ....
Question : गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सम्मुख कार्यावली
(1995)
Answer : छठें दशक में विश्व राजनीति की उपज गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना के समय जो प्राथमिकताएं थीं, उनकी उपादेयता आज भी मानी जा सकती है। भले ही आज विश्व दो सैनिक गुटों में न विभाजित हो, परन्तु सह-अस्तित्व, विश्वशांति, निरस्त्रीकरण, समान विश्व अर्थव्यवस्था और त्रस्त तथा शोषित मानवता के लिए संघर्ष की अपेक्षाएं आज भी विद्यमान हैं। इनके लिए संर्घषरत रह कर एक नये विश्व परिवेश की स्थापना करना, जिससे मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ....
Question : ओ.ए.यू. एवं अफ्रीका में संघर्ष
(1995)
Answer : स्वतंत्र अफ्रीकी राष्ट्रों द्वारा ओ.ए.यू. (ऑर्गेनाइजेशन ऑफ अफ्रीकन यूनियन) की स्थापना मई 1963 में अफ्रीकी राष्ट्रों के बीच चल रहे आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं से उत्पन्न संघर्षों को हल करने के लिए किया गया था। आरंभ में इस संगठन में 32 सदस्य राष्ट्र थे, जो बढ़ कर अब 51 हो गये हैं। रंगभेदी व्यवस्था से मुक्त होने के बाद दक्षिण अफ्रीका भी इस संगठन का सदस्य बन गया है। संगठन के मुख्य उद्देश्यों को संगठन ....
Question : ‘एक दूसरे पर बढ़ती हुई निर्भरता की यथार्थता, परम्परागत प्रभुसत्ता के सिद्धांत, जो कि सभी राज्यों की विदेश नीतियों में मुख्य भूमिका निभाता है, को अब अधिकतर निष्फल कर रही है----।’ विचार विमर्श कीजिये।
(1995)
Answer : प्रभुसत्ता की संकल्पना का आविर्भाव आधुनिक राज्य के सिद्धान्त को पूर्णता प्रदान करने के लिए हुआ। इस संकल्पना ने आधुनिक राज्यों को अन्य सामाजिक संस्थाओं, विशेषकर सामन्तों एवं अन्य शक्तिशाली संस्थाओं के प्रति बाध्यता से मुक्ति प्रदान की और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राज्यों को सम्मान प्रदान करने का प्रयास किया। अतः प्रभुसत्ता के सिद्धान्त ने जन नीति और नागरिकों पर बाध्य विधियों के निर्माण करने का एकाधिकार राज्यों को प्रदान किया। इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ....
Question : वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के अन्यायपूर्वक और प्रमुख (Hege-monic) पक्षों, और उन तत्त्वों का जो इनका स्थायीकरण करते हैं, का विश्लेषण कीजिये।
(1995)
Answer : नयी विश्व अर्थव्यवस्था के माध्यम से विकसित देशों ने विश्व व्यापार संगठन की स्थापना करबाकर सौदेबाजी और कूटनीति का एक नया मंच स्थापित कर लिया है। पश्चिमी यूरोप के सभी देशों तथा अमेरिका में उद्योग बंद हो रहे हैं। शीत युद्ध के समाप्त होने से हथियारों की बिक्री घटी है और बेरोजगारी बढ़ने से वहां मांग और खपत में कमी हुई है। अधिसंख्य देशों के बजट वर्षों से घाटे में चल रहे हैं। अतः वहां ....
Question : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में विचारधारा की भूमिका
(1995)
Answer : 20वीं शताब्दी में विविध विचारधाराओं, यथा-नाजीवाद, फासीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, उपनिवेशवाद-विरोधी एवं पूंजीवाद आदि ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को निर्धारित करने में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। वैसे अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विद्वानों के बीच अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में विचारधारा की भूमिका को लेकर काफी मतभेद रहे हैं। प्रो. नार्मेन हिल के अनुसार, कोई भी विचारधारा एक रेडिमेड (Readymade) पैकेज उपलब्ध कराती है। साम्यवादी देश का नागरिक साम्यवादी विचारधारा को ग्रहण करता है, तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था वाले देश में हर ....
Question : एन.पी.टी. के नवीकरण के संदर्भ में इसके पक्ष समर्थकों और आलोचकों दोनों द्वारा उठाये गये विवाद विषयों की जांच कीजिये।
(1995)
Answer : परमाणु अप्रसार संधि (एन.पी.टी.) के नवीकरण पर विचार करने के लिए एक सम्मेलन 17 अप्रैल से 12 मई, 1995 तक न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र के प्रागंण में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन का उद्देश्य एन.पी.टी. की पुनर्समीक्षा करने के साथ-साथ यह निश्चित करना था कि क्या इस संधि को अनिश्चित अवधि के लिए स्वीकार कर लिया जाये या सिर्फ किसी निश्चित अवधि के लिए ही। सम्मेलन में इस संधि को अनिश्चित अवधि के लिए ....