Question : न्यायिक सक्रियतावाद की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए और भारत में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संबंध पर उनके प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
(2007)
Answer : किसी भी लोकतंत्र या ‘कानून के शासन’ का मूल आधार स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं प्रभावी न्याय व्यवस्था होती है। ऐसी न्याय व्यवस्था अल्पव्ययी, सरल, बोधगम्य तथा शीघ्रगामी भी होनी चाहिए। बिलम्बकारी न्याय व्यवस्था अन्यायकारी तथा अव्यवस्था उत्पन्न करने वाली होती है। दुर्भाग्य से भारत को ऐसी ही दोषपूर्ण न्याय प्रणाली विरासत में मिली है। बहुत चाहने पर भी संविधान निर्माता इस व्यवस्था से छुटकारा नहीं पा सके।
उन्होंने वर्तमान सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के रूप में ....
Question : राज्य की नीति के निदेशक तत्व केवल पुनीत घोषणाएं नहीं हैं, वरन् वे राज्य नीति के मार्गदर्शन के लिए सुस्पष्ट निदेश हैं।
(2007)
Answer : संविधान के भाग प्ट में अनुच्छेद 36 से 51 तक निदेशक सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है। राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत देश की विभिन्न सरकारों और सरकारी अभिकरणों के नाम जारी किये गये निर्देश हैं, जो देश की शासन व्यवस्था में मौलिक तत्त्व हैं। दूसरे शब्दों में, ये सिद्धांत ऊंचे-ऊंचे आदर्शों की घोषणायें हैं, जो कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को दिये गये निदेश हैं। अक्सर इनकी यह कहकर आलोचना की जाती है कि निदेशक सिद्धांत ....
Question : न्यायिक सक्रियतावाद (200 शब्द)
(2006)
Answer : एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भय न्यायपालिका किसी भी लोकतंत्र के लिए गौरव का विषय होती है। इसलिए जब जनता को विधायिका तथा कार्यपालिका से अधिक निराशा हो जाती है, तब वह विवश होकर न्यायपालिका की ओर देखने लगती है। जब न्यायपालिका संवैधानिक परिधि के अंतर्गत ही जनता की पीड़ा और निराशा का निवारण करने का प्रयास करती है तो इसे न्यायिक सक्रियता की संज्ञा दी जाती है।
‘न्यायिक सक्रियता’ की कोई वैधानिक परिभाषा (Statutory definition) उपलब्ध ....