Question : मैक्स वेबर के मतानुसार समाजशास्त्र की विषय वस्तु क्या है? सामाजिक विज्ञान के अनुसंधान के लिए उन्होंने किन-किन प्रमुख पद्धतियों का सुझाव दिया है? उनके समाजशास्त्रीय योगदानों की मदद से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
(2007)
Answer : वेबर के मतानुसार समाजशास्त्र एक विज्ञान है, जो सामाजिक क्रियाओं के व्याख्यात्मक बोध का प्रयास करता है, ताकि इनके घटनाक्रम एवं कार्य-कारण के सम्बन्धों का विश्लेषण किया जा सके। वेबर की इस परिभाषा में समाजशास्त्र की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत किया गया हैः
Question : पूंजीवादी उत्पादन रीति और वर्ग संघर्ष के बारे में कार्ल-मार्क्स का विश्लेषण समझाइये। उनके विचारों के प्रति क्या बैद्धिक प्रतिक्रियाएं हुई है?
(2007)
Answer : मार्क्स के अनुसार पूंजीपति वह नहीं है जिसके पास अधिक धन होता है, अधिक पूंजी होती है। पूंजीपति वह है जो उत्पादन के साधन अपने हाथ में रखता है। पूंजीपति अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है। मार्क्स के अनुसार पूंजीपति द्वारा लाभ कमाने का पहला तरीका मजदूरों को कम से कम वेतन देना है। वह मजदूरों से अधिक समय तक काम लेता है ऐसा करने से वह उत्पादन तो अधिक कर लेता है, किन्तु ....
Question : मेरटॉन के प्रकट एवं प्रच्छन्न प्रकार्यों पर विचार
(2007)
Answer : प्रकट प्रकार्य व दृष्टिगोचर परिणाम हैं, जो व्यवस्था में अनुकूलन या सामंजस्य बनाये रखते हैं तथा व्यवस्था में सहयोग देने वालों के द्वारा वह प्रकार्य मान्य तथा अभिष्ट होता है। अप्रकट या प्रच्छन्न प्रकार्य वे हैं, जो न तो मान्य होते हैं और न ही अभीष्ट। प्रच्छन्न प्रकार्यों में प्रेरणा, परिस्थिति एवं परिणाम की जानकारी कर्त्ता को पहले से नहीं होती है। प्रच्छन्न प्रकार्य के परिणाम बहुत दूरगामी होते हैं।
वस्तुतः प्रच्छन्न प्रकार्य कोई न ....
Question : टालकट पारसंस की सामाजिक व्यवस्था की संकल्पना
(2007)
Answer : सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी परिस्थिति में, जिसका कि कम से कम एक भौतिक या वातावरण सम्बन्धी पहलू हो, अपनी इच्छाओं या आवश्यकताओं की आदर्श पूर्ति की प्रकृति से प्रेरित एक या एक से अधिक वैयक्तिक कर्ताओं की एक-दूसरे के साथ अन्तः क्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।
पारसंस ने सामाजिक व्यवस्था की व्याख्या करते हुए लिखा है कि इसका विकास तब होता है, जब एक भौतिक पक्षवादी सामाजिक परिस्थिति तथा समाज द्वारा स्वीकृत सांस्कृतिक प्रतीकों की ....
Question : सामाजिक नृशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित प्रकार्यवाद के प्रति राबर्ट मर्टन की प्रतिक्रियायें क्या हैं? उनके अप्रकट प्रकार्यों की विभावना की मर्यादा दर्शाइये।
(2006)
Answer : राबर्ट मर्टन ने प्रकार्यवाद के संबंध में अपने विचार व्यक्त किये हैं। उन्होंने लिखा है कि समस्याओं की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने की आधुनिक पद्धति के रूप में प्रकार्यवादी विश्लेषण एक सर्वाधिक आशाजनक, पर साथ ही सम्भवतः सबसे कम विधिबद्ध प्रणाली है। यह प्रकार्यवाद एक साथ अनेक क्षेत्रों में विकसित हो गया है जिसके फलस्वरूप इसका खण्ड विस्तार तो हुआ है, पर गहन-विस्तार नहीं हो पाया है। परंतु जिस रूप में अब तक इसका विस्तार हुआ ....
Question : एमिल दुर्खिम के मतानुसार व्यक्ति एवं समाज में संबंध की क्या प्रकृति है? समाज में श्रम विभाजन के उनके विश्लेषण की मदद से इसे समझाइये।
(2006)
Answer : दुर्खीम ने अपनी पुस्तक Social Division of Labour में सामाजिक एकता एवं समाजिक श्रम विभाजन का विश्लेषण किया है। इसी पुस्तक से व्यक्ति एवं समाज के मध्य के संबंधों की प्रकृति का भी पता चलता है। दुर्खीम के अनुसार, सबसे प्राचीन समाजों में श्रम-विभाजन स्त्री-पुरुष के भेद पर आधारित था। इस समाज में यांत्रिक एकता की विद्यमानता थी। यांत्रिक एकता तभी सम्भव होती है, जब व्यक्ति का व्यक्तित्व सामूहिक व्यक्तित्व में विलीन ....
Question : मार्क्स के सामाजिक परिर्वतन के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए। उसके विचारों के प्रति प्रकार्यवादियों की क्या प्रतिक्रियायें रहीं?
(2006)
Answer : मार्क्स के अनुसार, इतिहास के सभी परिवर्तन उत्पादन की प्रणाली में परिवर्तन के फलस्वरूप ही घटित होते हैं। भौगोलिक परिस्थितियां, जनसंख्या की वृद्धि आदि कारकों का प्रभाव मानव जीवन पर अवश्य ही पड़ता है, परंतु ये सब सामाजिक परिवर्तन के निर्णायक कारण नहीं हैं। जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक भौतिक मूल्यों की उत्पादन प्रणाली ही सामाजिक परिवर्तन की निर्णायक शक्ति है।
उत्पादन की प्रणाली उत्पादन के कुछ निश्चित संबंधों को उत्पन्न करती है। ये ....
Question : आदर्श-प्रारूप की विभावना एवं इसकी मर्यादाएं
(2006)
Answer : मैक्स वेबर का मत है कि तर्कसंगत रीति से सामाजिक घटनाओं के कार्य-कारण संबंधों को तब तक स्पष्ट नहीं किया जा सकता है, जब तक उन घटनाओं को पहले समानताओं के आधार पर कुछ सैद्धांतिक श्रेणियों में बांट न लिया जाए। इस दृष्टिकोण से सामाजिक घटनाओं की तार्किक-संरचना में बुनियादी पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। पुनर्निर्माण के इस कार्य में मैक्स वेबर ने अपने आदर्श-प्रारूप के सिद्धांत को विकसित किया।
मैक्स वेबर ने इस बात पर ....
Question : मैक्स वेबर के आदर्श प्रकारों और अधिकारी तंत्र में प्राधिकार की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
(2005)
Answer : मैक्स वेबर का आदर्श प्रारूप के सिद्धान्त के प्रतिपादन का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों के बीच पाये जाने वाले अंतर को समाप्त कर एक ऐसी समाजशास्त्रीय प्रणाली का विकास करना था, जिसकी सहायता से समाजशास्त्र को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया जा सके। वेबर ने सामाजिक और प्राकृतिक विज्ञानों में पाये जाने वाले इस अंतर को समाप्त किया और इन दोनों विज्ञानों का समन्वय करके समाजशास्त्र में एक ऐसी नवीन पद्धति को विकसित किया ....
Question : वर्ग संघर्ष कार्ल मार्क्स की संकल्पना के अनुसार
(2005)
Answer : मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त को समाजशास्त्र में सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। वर्ग संघर्ष द्वारा ही सामाजिक परिवर्तन होता है। वास्तव में समाज में दो वर्गों के बीच अपनी आकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्तियों के बीच संघर्ष चलते रहता है। इन वर्गों में स्वार्थ भेद के कारण निरन्तर संघर्ष होते रहे हैं। इन संघर्षों को समाप्त करने के लिए मार्क्स ने वर्गहीन समाज की कल्पना की है। उनका कहना ....
Question : जाति के बीच वर्ग और वर्ग के बीच जाति।
(2004)
Answer : जाति एवं वर्ग सामाजिक संस्तरण को प्रमुख आधार के रूप में देखा जाता है। परंतु इस तथ्य से अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि दोनों में भिन्नता होने के बावजूद वह एक-दूसरे से पूर्णतया मिला हुआ है। मजूमदार ने जाति को ‘बंद’ एवं वर्ग को ‘खुली’ व्यवस्था के रूप में पारिभाषित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि जाति प्रदत्त एवं वर्ग अर्जित प्रस्थिति को मान्यता देती है। परंतु साथ ही, एक जाति में ....
Question : ईमाइल दुर्खीम की धर्म और समाज पर थ्योरी की समालोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत कीजिए। एशिया में समकालीन परिदृश्य को यह थ्योरी किस सीमा तक स्पष्ट करती है?
(2004)
Answer : ईमाइल दुर्खीम ने धर्म और समाज के बीच संबंधों का उद्घाटन धर्म के समाजशास्त्र या धर्म के सामाजिक सिद्धांत के अंतर्गत किया है। इस संबंध में उसकी पुस्तक धार्मिक जीवन के प्रारंभिक रूप (The Elementary farms of Religious life) अत्यंत महत्पूर्ण है। दुर्खीम ने अपने धर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन आस्ट्रेलिया की जनजाति की धार्मिक संस्था के अध्ययन के आधार पर प्रतिपादित किया था। उसका विचार है कि समाज में पायी जाने वाली प्रत्येक संस्था ....
Question : प्राधिकार और औचित्यपूर्णता।
(2004)
Answer : मैक्स वेबर ने अपने प्रमुख सिद्धांतों के अंतर्गत शक्ति प्राधिकार और औचित्यपूर्णता की अवधारणा का प्रतिपादन किया है। दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों को व्यवस्थित करने तथा उनके संबंध में निर्णय लेने के प्रस्थापित अधिकार को प्राधिकार कहते हैं। यह प्राधिकार के प्रयोग के प्रमुख रूपों में से एक है जिसमें अनेक व्यक्तिगत मानवीय कर्ताओं की क्रियाओं को आदेशात्मक तरीके से निर्देशित किया जाता है ताकि किसी विशिष्ट लक्ष्य अथवा सामान्य लक्ष्यों की प्राप्ति हो सके। ....
Question : प्राथमिक और संदर्भ समूह।
(2003)
Answer : प्राथमिक समूह की अवधारणा का सर्वप्रथम प्रयोग सी.एच. कूले ने अपनी पुस्तक 'Social organisation' में किया है। उनके अनुसार, ‘प्राथमिक समूहों से हमारा तात्पर्य उन समूहों से है, जिनमें सदस्यों के बीच आमने-सामने के धनिष्ठ संबंध एवं पारस्परिक सहयोग की विशेषता होती है। ऐसे समूह अनेक अर्थों में प्राथमिक होते हैं, लेकिन विशेष रूप से इस अर्थ में कि ये व्यक्ति के सामाजिक स्वभाव और विचार के निर्माण में बुनियादी योगदान देते हैं, ‘प्राथमिक समूह ....
Question : सामाजिक तंत्र एवं पैटर्न परिवर्तन।
(2003)
Answer : टालकट पारसंस, आर.के.मर्टन, डेविस, स्मेलसर इत्यादि प्रकार्यवादियों ने सामाजिक व्यवस्था को दो स्तरों पर देखने का प्रयास किया है - एक संरचना के स्तर पर और दूसरा प्रकार्य के स्तर पर। सामान्यतः सामाजिक व्यवस्था से तात्पर्य किसी बहुत बड़े सामाजिक समूह की बात करते है। पारसंस ने समस्त समाज को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखने का प्रयास किया है।
टी. पारसंस एवं एडवर्ड शील्स ने मानदंडों एवं मूल्यों को दो भागों में बांटकर देखने ....
Question : स्वयं में वर्ग और स्वयं के लिए वर्ग।
(2003)
Answer : मार्क्स द्वारा प्रतिस्थापित ये दो अवधारणा मुख्यतः वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत की परिस्थितियों को उजागर करने के लिए किया है। मार्क्स ने प्रथम स्थिति में माना है कि व्यक्ति सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित रहते हैं परंतु जब ये आवश्यकताएं पूरे वर्ग में एक जैसी हो जाती है तो उन लोगों के बीच वर्ग-चेतना का उदय होता है और यही वर्ग चेतना वर्ग-संघर्ष की स्थिति को जन्म देती है। स्वयं में वर्ग के ....
Question : असंबंधिता की संकल्पना का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। उपयुक्त उदाहरण देते हुए, असंबंधिता की प्रकृति और सामाजिक विचलनों के प्रकारों के बीच सैद्धांतिक संबंध का जैसा कि आर. के. मर्टन ने प्रतिपादित किया है, सविस्तार विवेचन कीजिए।
(2003)
Answer : एनोमी या नियमहीनता या असंबंधिता को सामाजिक सरंचना द्वारा जनित एवं सामाजिक संरचना में निहित तथ्य माना गया है नियमहीनता की स्थिति में व्यक्ति सामाजिक नियमों की परवाह किये बिना मनमाना आचरण करने लगता है इससे समाज में विचलित व्यवहार उत्पन्न होता है।
एनोमी को परिभाषित करते हुए दुर्खीम लिखते हैं, ‘नियम हीनता वह सामाजिक दशा है जिसमें आदर्श प्रतिमानों का अभाव या आदर्शात्मक संरचना की अव्यवस्था पायी जाती है अर्थात् यह उत्कट अभिलाषा, लालच और ....
Question : वेबर की प्रोटेस्टेंट आचार-संहिता और पूंजीवादी भावना के सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2002)
Answer : मैक्स वेबर प्रकृति से व्यक्तिनिष्ठ अध्ययन पर जोर देते हैं परंतु इन्होंने अपनी रचनाओं एवं कार्यों में तार्किकता का काफी परिचय दिया है। मैक्स वेबर का यह सिद्धान्त उसकी प्रमुख रचना ‘The Protestant Ethic and the spirit of capitalism’वर्णित है। इस सिद्धान्त के आधार पर मैक्स वेबर ने धार्मिक जीवन और आर्थिक घटनाओं के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश की है। उसके अनुसार धार्मिक परिस्थितियां एवं आर्थिक परिस्थितियां अन्तःसम्बन्धित हैं। तुलनात्मक दृष्टि से ....
Question : दुर्खीम द्वारा ग्रहण किए गए सामाजिक तथ्यों की प्रकृति का परीक्षण कीजिए।
(2002)
Answer : दुर्खीम के प्रमुख अवधारणात्मक सिद्धान्तों में सामाजिक तथ्य का स्थान सर्वोपरि है। दुर्खीम ने समाजशास्त्र की अध्ययन सामग्री/विषय-वस्तु को ‘सामाजिक तथ्य’ के रूप में स्वीकार किया है। इसने सामाजिक अध्ययन में समाज के विभिन्न पहलुओं को विशेष महत्व दिया है जिसमें व्यक्तिगत भावनाओं को पूर्णतः अस्वीकार किया किया गया है। इससे दुर्खीम का प्रमुख तथ्य 'Senigeris' की व्याख्या से पता चलता है। दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य, वास्तव में समाजशास्त्र की विषय वस्तु है। परंतु ....
Question : पवित्र तथा अपवित्र।
(2002)
Answer : पवित्र एवं अपवित्र की अवधारणा दुर्खीम के धर्म का समाजशास्त्र का एक मुख्य हिस्सा है। दुर्खीम ने आस्ट्रेलिया की अरूंटा जनजाति का अध्ययन कर ‘द एलिमेंटरी फार्म्स ऑफ रिलिजियस लाइफ’ पुस्तक लिखी। जिसमें दुर्खीम ने यह दिखाने की कोशिश की धर्म वह है, जो पवित्र वस्तुओं से संबेधित हो। पवित्रता को उसने एक सामूहिक क्रिया माना, जो सभी समाज के व्यक्तियों द्वारा मान्य है, परंतु अपवित्र एक व्यक्तिगत क्रिया है जिसे समाज की मान्यता प्राप्त ....
Question : व्यक्तित्व के विकास के लिए समाजीकरण की प्रक्रिया किस प्रकार उपयोगी है? उपयुक्त उदाहरणें सहित समझाइए।
(2002)
Answer : समाजीकरण की प्रक्रिया किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में उतना ही उपयोगी है, जितना कि एक स्कूल अध्यापक की भूमिका छात्रों की शिक्षा के क्षेत्र में होती है। यह इस तथ्य से पता चलता है कि बच्चा एक जैविकीय अवयव के रूप में पैदा होता है एवं किस प्रकार विभिन्न प्रकार की एजेंसियों के द्वारा प्रशिक्षित होकर एक जिम्मेदार व्यक्ति बनता है। अतः समाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति/बच्चा समाज के ....
Question : शक्ति की समाज स्वीकृति के स्रोत।
(2001)
Answer : मैक्स वेबर के अनुसार शक्ति के समाज स्वीकृति के मुख्यतः तीन स्रोत हैं। ये हैं पारंपरिक, चमत्कारिक और विधिपूर्ण तर्कसंगत। पारंपरिक प्राधिकार की स्वीकृति रिवाज और प्रथा के आधार पर मिलती है। यह प्राधिकार आरंभ से ही था और अभी तक किसी ने इसे चुनौती नहीं दी है। बच्चों के ऊपर माता-पिता का प्राधिकार और प्रजा के ऊपर राजा का प्राधिकार ऐसे ही दावों पर टिका रहा है।
चमत्कारिक प्राधिकार कुछ नेताओं की अपने अनुयायियों को ....
Question : कार्ल मार्क्स की वर्ग-वैमनस्यता की धारणा को समझाइए। उनके विचारों के प्रति प्रकार्यवादियों की क्या प्रतिक्रियाएं रही हैं
(2001)
Answer : मार्क्स ने मानव समाज की ऐतिहासिक विवेचना करते हुए लिखा है कि ‘आजकल प्रत्येक समाज शोषक और शोषित वर्गों के विरोध पर आधारित रहा है। ‘इससे स्पष्ट होता है कि मार्क्स वर्ग संघर्ष को अनिवार्य मानता है। उनके अनुसार वर्ग वैमनस्यता की स्थिति की शुरुआत सामंतवादी युग में हुई, परंतु यह संघर्ष पूंजीवादी व्यवस्था और भी स्पष्ट होकर सामने आया। मार्क्स के शब्दों में ‘अभी तक के सभी स्थापित समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का ....
Question : इमाइल दुर्खीम के प्रदानों में समाजशास्त्रीय विश्लेषण का केंद्र बिंदु क्या है? उनके प्रदानों में से किसी एक की मदद से अपना उत्तर दीजिए।
(2001)
Answer : इमाइल दुर्खीम के प्रदानों में समाजशास्त्रीय विश्लेषण का केंद्र बिंदु सामाजिक यर्थाथता एवं सामूहिकता रहा है। उन्होंने समाजशास्त्रीय विश्लेषण की व्याख्या प्रत्यक्षवादी पद्धति के आधार पर किया है। इमाइल दुर्खीम के प्रमुख सिद्धांतों में सामाजिक तथ्य की झलक मिलती है। इमाइल दुर्खीम के प्रदानों में निम्नलिखित प्रमुख हैं:
इमाइल दुर्खीम ने सभी समाज शास्त्रीय सिद्धांतों की व्याख्या के लिए सामूहिक प्रतिनिधित्व ....
Question : एक आदर्श प्रारूप का अर्थ और लक्षण दर्शाइए। मैक्स वेबर के मतानुसार सामाजिक विज्ञान के अनुसंधान में ‘आदर्श प्रारूप’ का क्या उपयोग और महत्ता है?
(2001)
Answer : मैक्स वेबर ने सामाजिक घटनाओं को समझने की दृष्टि से 1904 में सर्वप्रथम आदर्श-प्रारूप की अवधारणा का प्रयोग किया। वेबर के पद्धतिशास्त्र में आदर्श-प्रारूप की अवधारणा का विशेष महत्व है। इसने सामाजिक वास्तविकता को समझने के लिए तथा उसके बारे में सामान्य नियमों को जानने के लिए इस अवधारणा का प्रयोग किया। वेबर आदर्श-प्रारूप को अन्वेषणकर्ता के अध्ययन का एक यंत्र मानते हैं, जिसका प्रयोग वह घटनाओं की समानताओं और असमानताओं को ज्ञात करने के ....
Question : इमाइल दुर्खीम ने तर्क दिया था कि समाज में श्रम विभाजन का प्रकार्य सामाजिक सुदृढ़ता को बढ़ावा देने का है। इस कथन को सविस्तार प्रतिपादित कीजिए और उनके द्वारा चर्चित सुदृढ़ता के दो रूपों के बीच विभेदन का विश्लेषण कीजिए।
(2000)
Answer : इमाइल दुर्खीम का समाज में श्रम विभाजन के सिद्धांत का मूल तत्व सामाजिक एकता की अवधारणा की व्याख्या करना है। वास्तव में श्रम विभाजन सामाजिक एकता की प्रवृति को बढ़ावा देती है। अतः दुर्खीम द्वारा प्रस्तुत सामाजिक एकता और श्रम विभाजन के सिद्धांत दोनों अंतःसंबंधित हैं। इसका कारण यह है कि श्रम विभाजन आदिकालीन और सभ्य समाजों से संबंधित हैं। इस सिद्धांत का प्रतिपादन उसने अपनी महत्वपूर्ण कृति ‘De la division detawail social the Division ....
Question : अलगाव।
(2000)
Answer : अलगाव व्यक्ति की एक ऐसी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति अथवा दशा का परिचायक अवधारणा है जिसमें व्यक्ति का उसके सामाजिक अस्तित्व के मुख्य पक्षों से विरसन हो जाता है, अर्थात वह उनसे कट जाता है। इस अवधारणा का प्रयोग प्रजातिक पूर्वाग्रह, मानसिक बीमारी, वर्ग-चेतना, औद्योगिक तनाव, राजनैतिक उदासीनता, अतिवादिता, उग्रवादिता तथा आतंकवाद आदि अनेक समस्याओं की व्याख्या में किया गया है।
इस अवधारणा का सर्वप्रथम प्रयोग हीगल की कृतियों में देखने को मिलता है। किंतु कार्ल मार्क्स ने ....
Question : आपेक्षिक साधन वंचितता।
(2000)
Answer : शाब्दिक रूप में, वंचना से तात्पर्य किसी वस्तु के न होने या ले लिये जाने या अभाव की स्थिति से है। एक व्यक्ति को किन वस्तुओं काअभाव होता है, इस संबंध में भिन्नता होती है।
इस अवधारणा का सर्वप्रथम प्रयोग सेम्युअल स्टाऊफर ने अमेरिकी सिपाहियों के अपने अध्ययन में किया है। बाद में आर.के. मर्टन ने इसमें संशोधन कर इसे संदर्भ समूह के साथ जोड़ दिया। सापेक्षिक वंचन या हीनता एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति ....
Question : सामाजिक संरचना प्रतिमानहीनता और विसामान्य व्यवहार की ओर आयास को कैसे पैदा कर देती है? अध्ययन के इस क्षेत्र में राबर्ट के. मर्टन के अंशदान का हवाला देते हुए, इसका परीक्षण कीजिए।
(2000)
Answer : विसामान्य व्यवहार को कुछ समाजशास्त्रियों ने मानदंडहीनता का सिद्धांत के आधार पर समझने का प्रयास किया है। समाजशास्त्र में मानदंडहीनता का सिद्धांत फ्रांसीसी समाजशास्त्री ईमाइल दुर्खीम ने आत्महत्या के सिद्धांत के संदर्भ में दिया था। उनका कहना है कि विकास के कारण आधुनिक समाज में कुछ परंपरागत नियम-कानून टूट जाते हैं और उसकी जगह पर कोई वैकल्पिक नियम-कानून विकसित नहीं हो पाता है, तो वैसी स्थिति में मानदंडहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लोगों ....
Question : भूमिका संघर्ष।
(2000)
Answer : दो या दो से अधिक ऐसी भूमिकाओं के बीच असंगतता अथवा विरोधाभास की स्थिति, जिनके संबंध में एक व्यक्ति से किसी विचाराधीन स्थिति में संपादन किये जाने की आशा की जाती है, भूमिका संघर्ष कहलाती है। इसमें एक भूमिका के संपादन द्वारा दूसरी भूमिका में व्यवधानअथवा विरोध की स्थिति उत्पन्न होती है। यह भूमिका संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब व्यक्ति विभिन्न प्रस्थितियों के धारण के कारण अपने जीवन में विरोधी अथवा असंगत भूमिका प्रत्याशाओं ....
Question : सामाजिक तंत्र की प्रकार्यात्मक समस्याएं।
(1999)
Answer : प्रत्येक समाज के अंतर्गत उसके सदस्यों की अपनी कुछ जरूरतें होती हैं। व्यक्ति इन जरूरतों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाते हैं जिससे कभी-कभी समस्याएं भी पैदा हो जाती है, पारसंस ने इसे प्रकार्यात्मक समस्याएं कहा है। इसकी निम्नांकित प्रकार से संक्षेप में चर्चा की जा सकती है-
(i)प्रतिरुप अनुरक्षण एवं तनाव प्रबंध (Pattern Maintenance and Tension Management): प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था की यही कोशिश रहती है कि उसका प्रारूप हमेश उसी रूप में बना ....
Question : सामाजिक संरचना और प्रतिमानहीनता।
(1999)
Answer : सामाजिक संरचना और प्रतिमानहीनता की अवधारणा वस्तुतः मर्टन के प्रतिमानहीनता के सिद्धांत से संबंधित है। आर.के. मर्टन ने इसका प्रयोग सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं से उत्पन्न विचलन व्यवहार को समझाने में किया। मर्टन के अनुसार मानक शून्यता की स्थिति में सामाजिक संरचना टूट जाती है और एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे समाज के स्वीकृत लक्ष्यों तथा उन्हें प्राप्त करने वाले साधनों के बीच आपसी तालमेल समाप्त हो जाता है, अर्थात् ऐसी स्थिति में ....
Question : विचलन के स्रोत के रूप में भूमिका द्वन्द्व।
(1999)
Answer : सामान्यतः विचलन को अनुरूपता के विपरीत माना जाता है। सभी मानव समाजों में व्यवहार के कुछ निश्चित प्रतिमान एवं सामाजिक मानदंड पाये जाते हैं। इन सामाजिक प्रतिमानों एवं मानदंडों के विपरीत आचरण करने को ही सामान्यतः विचलन माना जाता है।
विचलन के स्रोत के रूप में भूमिका द्वन्द्व को हम मर्टन, ब्रेडिमियर एवं स्टीफेन्सन के द्वारा दिये गये चार अवस्थाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जो निम्नलिखित हैं:
Question : ‘मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती है, बल्कि इसके विपरीत उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना का निर्धारण किया करता है।’ इस कथन के प्रकाश में उत्पादन विधि के संबंध में कार्ल मार्क्स की धारणा का परीक्षण कीजिए।
(1998)
Answer : कार्ल मार्क्स का विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति की कुछ न कुछ भौतिक आवश्यकताएं होती हैं। इन भौतिक आवश्यकताओंकी पूर्ति उस व्यक्ति के लिए आवश्यक है। यदि व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करेगा तो वह अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकेगा। इसलिए वह इन भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन करता है। मार्क्स का विचार है कि भौतिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए भौतिक शक्तियों का विकास अनिवार्य है। जब अनेक ....
Question : प्रतिरूप चर।
(1998)
Answer : सामाजिक संबंधों के द्विभाजन की एक विशिष्ट योजना ‘परिवर्ती प्रतिमान’ के नाम से जानी जाती हैं इस योजना के प्रस्थापक विद्वान टालकट पारसंस रहे हैं। मूलतः यह योजना कर्त्ताओं द्वारा सम्पन्न की जाने वाली अंतर्क्रियाओं के विभिन्न रूपों का अमूर्त प्रदर्शन है। इस योजना के अनुसार कर्त्ता के समक्ष क्रिया अथवा व्यवहार के कुछ वैकल्पिक जोड़े उपलब्ध होते हैं। किसी सामाजिक स्थिति में व्यवहार करने के पूर्व कर्त्ता इन जोड़ो में से किसी एक को ....