आरक्षित निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट के नए दिशा-निर्देश
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सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में सभी उच्च न्यायालयों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि आरक्षित निर्णय (Reserved Judgment) तीन माह के भीतर सुनाए जाएँ तथा जमानत (Bail) संबंधी आदेश उसी दिन या अगले कार्यदिवस तक अपलोड किए जाएँ। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्णय में अनावश्यक विलंब संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
आरक्षित निर्णय क्या है?
जब न्यायालय किसी मामले की सुनवाई पूरी कर लेता है, लेकिन तत्काल फैसला सुनाने के बजाय बाद में निर्णय देने के लिए सुरक्षित रखता है, तो उसे ....
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नियमित स्तंभ
- 1 राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का हालिया स्पष्टीकरण
- 2 भारत में मानव तस्करी के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़्रेमवर्क
- 3 अनुसूचित जनजाति ‘डीलिस्टिंग’ विवाद
- 4 पितृत्व विवाद में डीएनए परीक्षण: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
- 5 न्यायपालिका में AI का उपयोग: सुप्रीम कोर्ट के मसौदा नियम
- 6 चेक बाउंस बनाम दिवाला कार्यवाही
- 7 मानव तस्करी पीड़ितों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई संरक्षण एवं पुनर्वास योजना
- 8 सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के श्रम को दी पहचान
- 9 अनुच्छेद 21 और प्रजनन स्वायत्तता
- 10 राज्यसभा दलबदल और कानूनी अस्पष्टताएँ
- 11 इलाहाबाद उच्च न्यायालय और FRA, 2006 : जनजातीय अधिकारों की न्यायिक पुनर्पुष्टि
- 12 चुनावी पराजय के बाद मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का प्रश्न
- 13 सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया : तमिलनाडु प्रकरण और न्यायिक दृष्टिकोण
- 14 निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर संवैधानिक बहस
- 15 सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या वृद्धि
- 16 UAPA, जमानत और अनुच्छेद 21
- 17 अनुच्छेद 19(1) (a) की नई संवैधानिक व्याख्या

