Question : पूरी तरह स्पष्ट कीजिए कि भारत के सार्वजनिक उद्यमों की स्वायत्तता और जवाबदेयता में संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है।
(2015)
Answer : भारत में सार्वजनिक उपक्रमों को सदैव न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करने का उद्देश्य निर्धारित करना चाहिए। सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना के लिए संगठन प्रारुप का चुनाव व्यावसायिक आधार पर किया जाना चाहिए। सार्वजनिक उपक्रमों में कुशलता लाने के लिए प्रबंधकीय स्वायत्तता अत्यावश्यक होती है। प्रबंधकों को व्यावसायिक मामलों पर निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
सावजनिक उपक्रमों को अपनी कुशलता प्राप्त करने के लिए कर्मचारियों को प्रेरणा देनी चाहिए जैसे- समान कार्य ....
Question : भारत में मरणासन्न सार्वजनिक क्षेत्रक के वर्धन के लिए भारतीय लोक उद्यम तथा औद्योगिक सेवा के सृजन के पक्ष व विपक्ष के मुद्दे पर तर्क दीजिए।
(2015)
Answer : लोक उपक्रम का आशय ऐसे औद्योगिक एवं व्यापारिक उद्योगों या सेवाओं से है जिनका स्वामित्व व्यवस्था एवं नियंत्रण केंद्र राज्य अथवा स्थानीय सरकार या किसी सार्वजनिक संस्था के हाथ में हो भारत में मरणासन्न सार्वजनिक क्षेत्र की वृद्धि के लिए भारतीय लोक उद्यम तथा औद्योगिक सेवा के संबंध में निम्न तर्क दिए जा सकते हैं-
Question : “सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रमों के लिए, सरकार के आश्वासित बजटीय समर्थन के बिना जीवित रहने को और उद्यमशील बने रहने को सीख लेना आवश्यक है।” इस कथन के प्रकाश में, उनकी स्वायत्तता को सबल बनाने और अस्वस्थ सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रमों के स्वास्थ्य को पुनरुज्जीवित करने के लिए अपने सुझाव दीजिए।
(2014)
Answer : सार्वजनिक उद्यमों में वे उपक्रम, निगम और कंपनियां आती हैं जिसका स्वामित्व पूर्णतः या अंशतः केन्द्र सरकार या राज्य सरकार या संयुक्त रूप से केंद्र व राज्य सरकार के अधीन होता है। इनका अपना प्रबंध तंत्र होता है। सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रमों को अब सरकारी बजट से पोषित करने की प्रथा के बजाय उनसे पूरी फ्स्वायत्तता के साथ जवाबदेयताय् का संबंध स्थापित करना चाहिए। इनको स्वायत्त बनाने के लिए निम्न कदम उठाए जा सकते हैं-
Question : ‘‘लोक क्षेत्र उद्यमों के लिए स्वायत्तता एक काल्पनिक कथा है।’’ राजनीतिज्ञों द्वारा, जो सरकार को विभिन्न स्तरों पर नियंत्रित करता है, सरकारी खर्चे के व्यवहार के संदर्भ में विश्लेषण करें।
(2013)
Answer : लोक क्षेत्र उद्यमों की निरंतर बढ़ती हुई संख्या, शक्ति, आकार आदि ने उत्तरदायित्व और स्वायत्तता की समस्या को जन्म दिया है। पर्याप्त स्वायत्तता के अभाव में लोक क्षेत्र उद्यमों से अपेक्षित सफलताओं की आशा नहीं की जा सकती है। पर्याप्त स्वायत्तता के अभाव में यह केवल विभागीय संगठन बनकर रह जायेंगे। किसी भी उपक्रम के लिए ‘शीघ्र निर्णय लेना’ एक आवश्यक प्रक्रिया है। इसके अभाव में निर्णय में विलंब होगा जिससे उद्यमों की कार्यकुशलता और ....
Question : ‘सरकार और सार्वजनिक उद्यमों के बीच ‘सहमति ज्ञापन’ योजना ने सार्वजनिक उपक्रमों को अपने समग्र निष्पादन को सुधारने के लिए मजबूर कर दिया है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
(2012)
Answer : अर्जुन सेन गुप्ता की अनुशंसा पर सरकार और सार्वजनिक उद्यमों के बीच समझौता ज्ञापन पद्धति (MOU) (1987) लाया गया, जिसका उद्देश्य एक समय के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को उपयुक्त स्वायत्ता देना व अच्छा निष्पादन सुनिश्चित करना है।
यह समझौता सार्वजनिक उपक्रमों को अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में अधिक सक्रियात्मक स्वायत्तता प्रदान करता है तथा इस दिशा में सफलता के संकेत दिखाई पड़ रहे हैं। सरकार ने उदारीकरण के अन्तर्गत सार्वजनिक ....
Question : क्या नियंत्रित कंपनी की संरचना दक्षता में वृद्धि करने के लिए एक संस्थागत परिवर्तन के रूप में कार्य कर सकती है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ अपना उत्तर दीजिए।
(2011)
Answer : भारतीय कंपनी अधिनियम 1956 के अनुसार सरकारी या नियंत्रित कंपनी से आशय एक ऐसी संरचना से है, जिसकी प्रदत्त पूंजी का कम-से-कम 51 प्रतिशत भाग केन्द्र या राज्य सरकारों या आंशिक रूप से केन्द्रीय या एक या अधिक राज्यों के पास हो। कंपनी पर नियंत्रण एवं उनकी संरचना से उसकी निष्पादन एवं दक्षता निश्चित रूप से प्रभावित होती है।
सामान्यतः ऐसा देखा गया है कि सरकारी कंपनी की अपेक्षा एक निजी कंपनी का निष्पादन अच्छा रहा ....
Question : क्या यह कहना सही होगा कि ‘अनेक - - - - - - - सार्वजनिक क्षेत्रक उद्यमों की विफलता के प्रमुख कारणों में से एक कारण स्वायत्तता की मूल संकल्पना से हट जाना था?”
(2010)
Answer : सार्वजनिक क्षेत्रक उद्यमों से तात्पर्य ऐसे उद्योगों से है, जिनमें सकल निवेश सरकार द्वारा किया जाता है। किसी निजी पार्टी को इसमें निवेश करने की अनुमति नहीं होती। इन उद्यमों का वित्त पोषण सरकारी खजाने से विनियोजन के आधार पर होता है। साथ ही इनसे प्राप्त राजस्व का पूरा या अधिकांश भाग सरकारी खजाने में जाता है। इन उद्यमों का आधार बजट, लेखा एवं लेखा परीक्षण नियंत्रण होता है। इनके स्थायी कर्मचारी लोकसेवक होते हैं। ....
Question : उदारीकरण के परिणामस्वरूप नव-विनियामक एजेंसियों की रचना के साथ अतिव्यापी अधिकारिताएं और टकराव एक नई पृवत्ति बन गई। क्या किसी एक सुपर-विनियामक या एकीकृत विनियामक के निर्माण की आवश्यकता है?
(2010)
Answer : उदारीकरण से तात्पर्य है व्यापार के लिए कानूनी प्रतिबंधों में ढील देते हुए आयात व निर्यात को आसान बनाना। इसके अन्तर्गत व्यापार, उद्योग एवं निवेश पर लगे ऐसे प्रतिबंधों को समाप्त किया जाता है, जिनसे व्यापार, उद्योग एवं निवेश के स्वतंत्र प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो रही हो।
प्रतिबंधों को समाप्त करने के अतिरिक्त विभिन्न करों में रियायत, सीमा शुल्कों में कटौती तथा मात्रत्मक प्रतिबंधों को समाप्त करने जैसे उपाय भी किये जाते हैं। विदेशी निवेशकों ....
Question : "हमारे लोक क्षेत्र के घटिया निष्पादन के लिए दोष उस ढंग पर मढ़ा जा सकता है, जिस ढंग से हमारा अधिकारी तंत्र संरचित है।" विश्लेषण कीजिए।
(2007)
Answer : हमारे देश में लोक क्षेत्र के घटिया निष्पादन का प्रमुख कारण नौकरशाही के कार्य करने का तरीका है। ब्यूरोक्रेसी अथवा नौकरशाही का शाब्दिक अर्थ डेस्क सरकार अथवा ब्यूरो द्वारा सरकार से भी लिया जाता है। मार्कस ने नौकरशाही का अर्थ विभिन्न प्रकार से व्यक्त किया हैः
नौकरशाही की एक विशेषता उसमें लालफीताशाही को ....
Question : "सरकार और लोक उद्यम के बीच ‘समझौता ज्ञापन योजना’ ने लोक उपक्रमों को अपने समग्र निष्पादन को सुधारने को मजबूर कर दिया है।" टिप्पणी कीजिए।
(2007)
Answer : भारत की आर्थिक व्यवस्था में लोक उपक्रमों की श्लाघनीय भूमिका रही है। स्वतंत्रता के नवी परिदृश्य में सार्वजनिक क्षेत्र ने त्वरित विकास किया है। लोक उपक्रम या लोक उद्यम से तात्पर्य उन उत्पादन की औद्योगिक संस्थाओं से है, जिन पर राज्य का स्वामित्व एवं नियंत्रण होता है एवं जिनकी व्यवस्था तथा प्रबंध-संचालन का पूर्ण दायित्व राज्य के प्रशासन द्वारा परिचालित किया जाता है।
लोक उपक्रम का अधीक्षण, प्रबन्ध एवं परिचालन राज्य या कोई अन्य राज्याधीन संस्था ....