Question : क्या कारण है कि कृषि और सामाजिक वानिकी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल नहीं हो पाई है?
(2015)
Answer : सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य-बंजर भूमि में वृक्षारोपण, वनों का विस्तार एवं वन संरक्षण है। ग्रामीणों को जलाऊ लकड़ी, आवासीय लकड़ी, जानवरों के लिए हरा चारा प्रदान करते है एवं भूमि के अनुपजाऊपन को कम करने, बाढ़ एवं मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं। भारत एक विकासशील देश है, जिसकी ज्यादातर आबादी ग्रामीण है जो अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों पर आश्रित है। अत्यधिक जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति हेतु ....
Question : स्पष्ट कीजिए की भूमि उपयोग में परिवर्तन किस प्रकार देश में विभिन्न स्तरों पर पारिस्थितिक विकास को प्रोन्नत कर सकता है?
(2015)
Answer : भूमि उपयोग एवं पारिस्थितिकीय विकास में गहरा संबंध है। भिन्न-भिन्न स्थानों की पारिस्थितिकी अपने वातावरण के अनुसार होती हैं। अतः भूमि का उपयोग भी पारिस्थितिकी के अनुसार आवश्यक है।
भारत का उत्तरी मैदान गहन कृषि वाला क्षेत्र है। यहाँ चावल, गेहूँ, गन्ना जैसे फसलों की प्रधानता है। इन क्षेत्रें में परंपरागत फसलों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाकर अन्य फसलों जैसे- बागवानी, दलहन, तिलहन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
अतः फसल विविधिकरण से जैवविविधता एवं पारिस्थितिकीय संतुलन ....
Question : भारत में ‘श्वेत क्रांति’ की पुनरावृत्ति की गुंजाइश की विवेचना कीजिए।
(2015)
Answer : भारत में श्वेत क्रांति की शुरूआत 1965 में NDDB की स्थापना से शुरू हुई। इसके द्वारा डेयरी विकास, सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किया गया। इसके अंतर्गत उत्पादन, स्टोरेज, विपणन, नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भान कार्यक्रम चलाया गया। भारत में प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता, जो 1950-51 में 124 ग्राम/व्यक्ति था, वर्तमान में बढ़कर लगभग 300 ग्राम हो गई है।
श्वेत क्रांति मुख्यतः गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में सफल रही, जबकि पूर्वी राज्य बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, ....
Question : मानचित्र की सहायता से देश के प्रमुख वर्षाधीन कृषि क्षेत्रें को इंगित कीजिए तथा मुख्यतः इन्हीं क्षेत्रें में कृषकों द्वारा आत्महत्या के कारण बताइए।
(2015)
Answer : वर्षाधीन कृषि से तात्पर्य उन कृषि प्रणालियों एवं प्रदेशों से है जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है तथा कृषि वर्षा पर आधारित है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का एक-तिहाई भाग आर्द्र मॉनसूनी जलवायु के अंतर्गत आता है, जो देश के 40 प्रतिशत जनसंख्या का पोषण करता है।
शेष दो-तिहाई भाग उपार्द्र एवं अर्द्रशुष्क जलवायु के अंतर्गत आता है तथा यह 60 प्रतिशत जनसंख्या का पोषण करता है। देश के इस भाग में सिंचाई का ....
Question : ‘कृषि उत्पादकता’ एवं ‘कृषि दक्षता’ में अंतर स्पष्ट कीजिए तथा कृषि दक्षता के प्रादेशिक वितरण में असमता पर प्रकाश डालिए।
(2015)
Answer : कृषि उत्पादकता का सामान्य अर्थ प्रति ईकाई क्षेत्रफल में प्राप्त की गई उपज से है। परंतु यह उत्पादकता के सम्पूर्ण अर्थ को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है।
भूमि की उर्वरता, फसलों के प्रकार, बीजों की उपलब्धता, संस्थागत कारक, कृषि संस्कृति से संबंधित अन्य कारक कृषि उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने उत्पादकता के मापन के लिए अलग-अलग प्रतिमान स्थापित किए हैं। भारत में कृषि उत्पादकता के मापन के लिए केंडाल का विचरण गुणांक विधि प्रयोग ....
Question : भारत में कृषि का आधुनिकीकरण किस प्रकार प्रतिकूल संस्थागत कारकों से प्रभावित हो रहा है, उपयुक्त उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
(2015)
Answer : भारत में कृषि का विकास स्वतंत्रता के बाद प्रारंभ हुआ। हरित क्रांति की सफलता में आधुनिक कृषि का मुख्य योगदान रहा। आधुनिक कृषि मुख्यतः तकनीकी सुधार से संबंधित है। इसमें उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, उन्नत मशीनरी, उपयुक्त सिंचाई व्यवस्था, बड़े आकार के जोत अनिवार्य शर्त के रूप में विद्यमान है। इसके अतिरिक्त पर्याप्त मात्र में पूँजी एवं बाजार-प्रणाली से जुड़ाव भी आवश्यक है।
लेकिन भारत में कृषि आधुनिकीकरण के मार्ग में संस्थागत कारक बाधा उत्पन्न करते ....
Question : प्राकृतिक वनस्पति किस प्रकार स्वस्थाने मृदाओं के निर्माण को प्रभावित करती है?
(2015)
Answer : वस्तुतः प्राकृतिक वनस्पति किसी स्थान विशेष के जलवायु एवं स्थलाकृति को प्रदर्शित करती है। जलवायु और स्थलाकृति मिलकर ही वनस्पतियों की उत्पत्ति करते हैं, जो अंततः मृदा निर्माण को प्रभावित करती है।
वनस्पतियाँ अपनी जलवायु के अंतर्गत एवं समयावधिक में मृदा के ऊपरी स्तर को प्रभावित करती हैं एवं इनकी जड़े ढ़ीले पदार्थों (रेगोलिय) में प्रविष्ट होकर मिट्यिों के गुणों को प्रभावित करती है। सदाहरित वनों वाले प्रदेशों में ऊपरी वितान घना होता है, जिससे सौर्यिक ....
Question : ‘हरित क्रांति के विभिन्न नकारात्मक प्रभावों के बावजूद, नई हरित क्रांति के लिए मांग हो रही है।’ स्पष्ट कीजिए।
(2014)
Answer : 60 के दशक में शुरू की गयी हरित क्रान्ति के नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इसी की बदौलत भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है। लगातार बढ़ती जरूरतों तथा जोतों के क्षेत्रफल तथा आकार मेंलगातार होती कमी के कारण द्वितीय हरित क्रान्ति की मांग हो रही है।
हरित क्रान्ति के प्रसार में पूंजीवादी कृषि की सम्भावना अधिक है, जो छोटे किसानों के लिए अहितकर हैं इससे आय में असमानता ....
Question : भारत में लैटेराइट मिट्टी के वितरण पर और कृषि के लिए इसके विशिष्ट उपयोग पर प्रकाश डालिए।
(2014)
Answer : लैटेराइट मृदा का निर्माण मानसूनी जलवायु की आर्द्रता एवं शुष्कता में क्रमिक परिवर्तनशीलता के फलस्वरूप उत्पन्न परिस्थितियों में होता हैं। भारत में लैटेराइट मिट्टी का विस्तार लगभग 1-26 लाख वर्ग किमी. क्षेत्रफल पर है। देश में इस मृदा का वितरण केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, असम, ओडिशा, प- बंगाल, मेघालय, झारखण्ड में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त मिट्टी सहयाद्रि, राजमहल, पूर्वी घाट, सतपुड़ा, विन्ध्य, असम तथा मेघालय की पहाडि़यों पर पायी जाती हैं।
लैटेराइट मिट्टी उन ....
Question : भारत के संदर्भ में फसल-संघ क्षेत्रें को चिह्नित करने की प्रणाली को विस्तार से समझाएं।
(2013)
Answer : अत्यधिक गर्म या ठण्डे प्रदेश को छोड़कर बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई फसल अकेले उपजायी जाये। प्रायः किसी प्रदेश में अनेक फसलों का उत्पादन होता है।
इसे समझने के लिए ही कृषि वैज्ञानिकों ने फसल संघ क्षेत्रें की पहचान करने की प्रणाली निकाली। इसके लिए प्रायः दो प्रकार की प्रणालियां प्रयोग में लायी जाती हैं।
कृषि में मानक विचलन ....
Question : भारत में कृषि पैटर्न को आकार देने में संस्थागत कारकों की भूमिका की विवेचना करें।
(2013)
Answer : भारतीय कृषि को आकार प्रदान करने में संस्थागत कारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन संस्थागत कारकों ने कृषि से संबंधित लगभग सारे क्षेत्रें को प्रभावित किया है। इसने न सिर्फ जोतों के आकार उसकी आकृति आदि को प्रभावित किया है, बल्कि भूमि उपयोग, कृषि के प्रकार तथा फसलों की उत्पादकता भी इससे प्रभावित हुई है।
कृषि को प्रभावित करने वाले प्रमुख संस्थागत कारक निम्न हैं-
भारत में अत्यधिक जनसंख्या ....
Question : कृषि उत्पादकता को परिभाषित करें। उसकी माप की प्रणाली बताएं और उसके क्षेत्रीय वितरण की असमताओं को इंगित करें।
(2013)
Answer : खेती की गयी प्रति इकाई भूमि से उत्पादित फसल की मात्र (भूमि उत्पादकता) या प्रति इकाई प्रयुक्त श्रम से उत्पादित फसल की मात्र (श्रम उत्पादकता) या प्रति इकाई प्रयुक्त धन से उत्पादित फसल की मात्र (पूंजी उत्पादकता) को कृषि उत्पादकता कहा जाता है।
किसी क्षेत्र विशेष की कृषि उत्पादकता अनेक कारकों से प्रभावित होती है, जिनमें से जलवायु, मिट्टी, जल, सामाजिक-आर्थिक वातावरण, उच्चावच, अवसंरचना, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक कारक प्रमुख हैं। कृषि उत्पादकता के मापन के लिए ....
Question : भारत को कृषि प्रदेशों में विभाजित कीजिए। किसी एक कृषि प्रदेश में कृषि अर्थ तंत्र के रुपांतरण के लिए उत्तरदायी पारिस्थिति की एवं मानवीय कारकों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2012)
Answer : कृषि प्रदेश ऐसा क्षेत्र है, जिसके कृषि भूमि उपयोग एवं शस्य प्रतिरूप में एकरुपता पायी जाती है। सामान्यतः इसमें उगायी जाने वाली फसलों की प्रकृति, उनके संयोजन प्रतिरूप, उत्पादन विधि, औसत आदानों एवं कृषि क्रियाओं के अभिविन्यास में समानता मिलती है। यह साम्यता भौतिक तथा कृषि जलवायु दशाओं तथा सामाजिक सांस्कृतिक विशेषताओं में एकरूपता के कारण उत्पन्न होती है। कृषि प्रदेशों के सीमांकन में भौतिक पर्यावरण की अहम भूमिका होती है। इसी प्रकार कृषि से ....
Question : भारत के सुरक्षित जैव मंडलों की पहचान कीजिए तथा वन एवं वनीय जीवन के संरक्षण में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए?
(2011)
Answer : भारत में विविध प्रकार की पारिस्थितिक और भौगोलिक दशाएं पाई जाती हैं। इस कारण यहां विविध प्रकार के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं। संसार में पौधों की 2,50,000 ज्ञात प्रजातियों में से 15000 प्रजातियां भारत में मिलती हैं।
इसी प्रकार संसार के जीव-जंतुओं की कुल 15 लाख प्रजातियां हैं, जिनमें से केवल भारत में 75000 प्रजातियां मिलती हैं। स्पष्ट है भारत में विविध प्रकार के जीव जंतु एवं वनस्पति पाए जाते हैं। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रें ....
Question : भारत में सतरंगी क्रांति की संभावना
(2011)
Answer : जुलाई 2000 भारत सरकार के कृषि मंत्रलय एवं योजना आयोग ने एक नई कृषि नीति की घोषणा की, जिसमें कृषि में प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत में सतरंगी क्रांति की शुरूआत की गई।
सतरंगी क्रांति में बहुत सारे पूर्व में चालित खाद्यान्न सम्बन्धित क्रांतियों को शामिल किया गया है। इसमें खाद्यान्न उत्पादन सम्बन्धित हरित क्रांति, मत्स्यन सम्बन्धित नीली क्रांति, आलू ....
Question : करेवा निक्षेप तथा उसका आर्थिक महत्व
(2011)
Answer : करेवा कश्मीर घाटी में है, जिसका निर्माण प्लीस्टोसीन काल में हुआ था। एक समय यहां एक विशाल सरोवर था और इस सरोवर में जिन चट्टानों का निर्माण हुआ उन्हें करेवां राशि कहते हैं। यह राशि झेलम की घाटी और पीरपंजाल के किनारे पर चपटे उत्तलों को बनाती है। ये श्रीनगर एवं गुलमर्ग के बीच पाए जाते हैं।
इस राशि में बालू, चीका, दोमट और गोलाश्म मिलते हैं। कारेवां चट्टानें लगभग 7500 वर्ग किलोमीटर में फैली है, ....
Question : भारत में भू-धारणा का कृषि उत्पादकता पर प्रभाव
(2011)
Answer : कृषि में भू-धारणा प्रणाली का सम्बन्ध कृषि के संस्थागत विकास से है। भू-सुधार कार्यक्रम के तहत सरकार ने तीन पहलुओं पर ध्यान दिया ताकि कृषि में संस्थागत सुधार को बढ़ावा देते हुए कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जाए।
भू-धारणा कार्यक्रम के इन तीन पहलुओं में भू-धारणा प्रणाली, भूमि की सीमाबंदी एवं जोत की चकबंदी है। भारत में भू-धारणा प्रणाली ने कृषि उत्पादकता एवं कृषि विकास को सीधा प्रभावित किया है। भू-धारण प्रणाली के अंतर्गत जमींदारी प्रणाली ....
Question : भारत में कृषि वानिकी
(2011)
Answer : ग्रामीण क्षेत्रें में कृषकों द्वारा अपने कृषि भूमि पर लगाए गए वन को कृषि वानिकी कहते हैं। कृषि वानिकी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1968 में वेस्टेनी द्वारा राष्ट्रमंडल देशों के वानिकी सम्मेलन में किया गया। परंतु भारत में कृषि वानिकी कार्यक्रम 1983 से प्रारंभ हुआ। यह कार्यक्रम सामाजिक वानिकी का ही एक अंग है। भारत में कृषि वानिकी कार्यक्रम तीन प्रकार के कृषि भूमि पर चलाए जा रहे हैं:
Question : बिहार में कृषि आधारित उद्योगों की समस्याओं और संभावनाओं का परीक्षण कीजिए।
(2010)
Answer : हिमालय की तलहटी में बसा बिहार उपजाऊ प्रदेश रहा है। परंपरागत रूप से गुड़, चीनी व खाण्डसारी उद्योग, केले की बागानी कृषि, तम्बाकु, प्रसंस्करण, आम-जामुन, रेशम उत्पादन और तिलहन उद्योग उन्नत अवस्था में रहा है। परंतु अनेक प्राकृतिक, आर्थिक-सामाजिक, राजनैतिक समस्याओं के कारण बिहार के कृषि आधारित उद्योग भी अन्य उद्योगों की भांति या तो पतन की अवस्था में चले गए(जैसे चीनी उद्योग) या सीमित प्रगति ही कर पाये।
बिहार में कृषि आधारित उद्योगों की सीमित ....
Question : कृषि जलवायवी अनुक्षेत्रें की पहचान करने के आधारों पर चर्चा कीजिए और कृषि विकास के लिए क्रोड रणनीतियां स्पष्ट कीजिए।
(2008)
Answer : भारत भौगोलिक विविधताओं से युक्त देश है। यहां स्थलाकृति, जलवायु, मिट्टी आदि में भिन्नताएं मिलती हैं, जिसके कारण देश के विभिन्न भागों में कई प्रकार की फसलें उत्पन्न की जाती हैं। भारतीय कृषि की विशेषताओं को सबसे अधिक जलवायवी तत्वों विशेषकर वर्षा एवं तापमान ने प्रभावित किया है।
भारतीय कृषकों में विभिन्न फसलों के उत्पादन के लिए अपरिहार्य दशाओं तथा मौसम तत्वों की सम्यक् जानकारी कराकर दोनों में अच्छी पैदावार के लिए समन्वय स्थापित करना ही ....
Question : "भारतीय कृषि में संस्थागत कारकों की शास्त्र प्रतिरूप एवं शस्त्र उत्पादकता पर जकड़ है" इसको तर्क द्वारा सही साबित कीजिए।
(2007)
Answer : संस्थागत कारक शब्द से उस विशेष व्यवस्था का बोध होता है, जिसके अंतर्गत स्वामित्व एवं प्रबंधन किया जाता है। स्वामित्व और प्रबंधन द्वारा कृषि उत्पादकता एवं शस्त्र प्रतिरूप पर सीधा प्रभाव डाला जाता है। कृषि उत्पादकता का अर्थ है- प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन। इसी प्रकार सभी फसलों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है। खाद्य फसलें और-गैर खाद्य फसलें। गैर खाद्य फसलों में तिलहन, रेशेदार फसलें, अनेक रोपण फसलें तथा चारे की फसलें प्रमुख ....
Question : भारत में शुष्क कटिबंधीय कृषि की समस्याओं एवं संभावनाओं की विवेचना कीजिए तथा इसके विकास की रणनीतियों एवं योजनाओं पर प्रकाश डालिए।
(2006)
Answer : सामान्यतः 75 सेंमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के की जाने वाली कृषि शुष्क कृषि कहलाती है। 75 सेमी. से अधिक वर्षा वाले भी शुष्क ऋतु में शुष्क कृषि की जाती है। इस कृषि की प्रमुख विशेषता है कि यह कृषि मिट्टी में उपलब्ध नमी की सहायता से की जाती है। मानसूनी वर्षा काफी अनिश्चित एवं अनियमित होती है। वर्षा ऋतु में भी शुष्कता के दौर आते हैं। भारत का लगभग 60 ....
Question : भारत में श्वेत क्रांति की सफलता एवं बाध्यताओं का एक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
(2005)
Answer : भारत में पशु उत्पाद के रूप में दुग्ध उत्पाद को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है। यह भारतीय कृषि का परंपरागत उत्पाद है तथा भारत में परंपरागत दुग्ध उत्पाद जीवन निर्वाह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अंग था। भारत में बढ़ती जनसंख्या, उसके कुपोषण की समस्या और नगरीय क्षेत्रों में दुग्ध की भारी कमी को ध्यान में रखकर दुग्ध उत्पाद के वाणिज्यिक विकास की प्रक्रिया जब आरंभ की गई तो भारत शीघ्र ही विश्व के अतिविकसित दुग्ध उत्पादक देशों ....
Question : भारत में शुष्क क्षेत्रों के विकास के कार्यक्रमों एवं नीति पर चर्चा कीजिए।
(2003)
Answer : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार 110 सेमी. की वर्षा रेखा शुष्क क्षेत्र एवं नम क्षेत्र को विभाजित करती है। इन क्षेत्रों में पं. राजस्थान कच्चा का रण, उड़ीसा, झारखंड, लद्दाख का पठार,
द. भारत का प्रायद्वीपीय पठार एवं महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्र शामिल हैं। ये सभी क्षेत्र 110 सेमी. की वर्षा रेखा के द्वारा सीमांकित किए जाते हैं। इन क्षेत्रों की मूल समस्या मौसमी सूखा एवं जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था का स्वरूप है। भारत के लगभग ....
Question : नीली क्रांति की सफलता एवं संभावनाओं का एक विवरण प्रस्तुत कीजिए और साथ ही भारत ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभावों पर भी टिप्पणी कीजिए।
(2003)
Answer : भारत के संसाधानात्मक विकास की दिशा में किये गये कार्यों में तीन कार्यों को क्रांतिकारी कार्य माना गया है। अतः इसका विकास कार्य गब्यात्मक है। इसके विकास के लिए विशेष विशेष कार्यक्रम चलाये गये थे। ये हैं हरित क्रांति, श्वेत क्रांति (1970 ई. में) तथा नीली क्रांति।
भारत में नीली क्रांति की शुरुआत 7वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारंभ में किया गया था। भारत विश्व के उन कुछ देशों में से है जहां मत्स्य उत्पादन की असीम ....
Question : भारत में हरित क्रांति के पड़ने वाले प्रभावों की समीक्षा करें।
(2002)
Answer : हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम W.S. Gaud ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूं के भ्ल्ट प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देश में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यंत मददगार रहा।
उन्नत किस्म की बीज के अलावे अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य ....
Question : भारत के कृषि जलवायु आयोजन क्षेत्रों के भौगोलिक आधार का परीक्षण कीजिये।
(2001)
Answer : भारत में स्थलाकृति एवं जलवायु की दृष्टि से अत्यधिक विविधता पायी जाती है। इस विविधता का प्रभाव यहां की कृषि पर भी पड़ा है। अतः कृषि के नियोजित विकास हेतु योजना आयोग एवं राष्ट्रीय दूर-संवेदन एजेंसी ने विभिन्न भौगोलिक एवं सामाजिक-आर्थिक आधारों का प्रयोग करते हुए देश को 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया है, जो निम्नलिखित हैं-
Question : भारतीय कृषि के अभिनव रूपांतरण में अधःसंरचनात्मक एवं संस्थागत कारकों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(1999)
Answer : कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की नींव है। न सिर्फ राष्ट्र के घरेलू उत्पादन का लगभग 28.5% कृषि और इससे संबद्ध क्षेत्रों से प्राप्त होता है, बल्कि इससे हमारी जनसंख्या के अधिकांश भाग (65%) को रोजगार भी उपलब्ध होता है। कृषि के विकास को अधःसंरचनात्मक एवं संस्थागत कारक मुख्य रूप से प्रभावित करते हैं। अधःसंरचनात्मक कारणों के अन्तर्गत भूमि एवं मृदा, सिंचाई, ऊर्जा, उर्वरक एवं बीज आदि को शामिल किया जाता है, जबकि संस्थागत कारकों में जोतों ....
Question : भारत के विभिन्न कृषि प्रदेशों में शस्यक्रम (शस्य-स्वरूप) पर चर्चा कीजिये?
(1998)
Answer : शस्यक्रम का अभिप्राय, एक निश्चित समय में, किसी क्षेत्र विशेष में विभिन्न फसलों को उगाना है। शस्यक्रम को प्रभावित करने वाले कारकों में भौगोलिक व अन्य कारकों को शामिल किया जाता है। भौगोलिक कारकों में मृदा, जलवायु, पानी की उपलब्धता आदि प्रमुख हैं। अन्य कारकों में कृषि उत्पादन का लक्ष्य, उत्पादन मात्र, कृषि भूमि का आकार, कृषि पद्धति, बाजार मूल्य, सरकारी नीति आदि को शामिल किया जाता है। भारत की भौगोलिक विविधता तथा अन्य कारकों ....
Question : भारत में कृषि की दक्षता और उत्पादकता में संस्थागत कारकों की भूमिका पर चर्चा कीजिये।
(1998)
Answer : संस्थागत कारकों का तात्पर्य उस प्रणाली से होता है, जिसके अंतर्गत भूमि का स्वामित्व व प्रबंधन होता है। इस संदर्भ में भूमि सुधार व अन्य संस्थागत कारक कृषि की उत्पादकता व दक्षता को संरचनात्मक कारकों की तरह ही प्रभावित करते हैं। भारत में कृषि दक्षता निम्न है, जिसके फलस्वरूप उत्पादकता भी निम्न है।
भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों का कानूनी व प्रशासनिक दोषों के कारण उचित ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। बड़ी भूमि के ....