डेटा उपनिवेशवाद: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती
वर्तमान युग में डेटा एक “रणनीतिक संसाधन” बनकर उभरा है। वैश्विक तकनीकी दिग्गज कम्पनियों के हाथों में डेटा का केंद्रीकरण “डेटा उपनिवेशवाद” (Data Colonization) की चिंताओं को जन्म देता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ बाहरी संस्थाएँ किसी राष्ट्र के डेटा को नियंत्रित और संसाधित करती हैं और उससे मुनाफा कमाती हैं, जो अंततः उस राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा को प्रभावित करता है।
वैश्विक टेक प्लेटफॉर्मों का नियंत्रण
- दिग्गज कंपनियों का दबदबा: गूगल, मेटा, “X” (ट्विटर) और अमेज़न जैसे प्लेटफॉर्म भारतीय उपयोगकर्ताओं के विशाल डेटा को नियंत्रित करते हैं।
- डेटा स्वामित्व में असमानता: भारतीय उपयोगकर्ता डेटा तो उत्पन्न करते ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) का खतरा
- 2 उपग्रह युद्ध एवं GPS स्पूफिंग: नौवहन और रक्षा के लिए जोखिम
- 3 अंतरिक्ष शासन एवं वैश्विक मानदंड: संधि-विहीन क्षेत्र में भारत की भूमिका
- 4 उभरते सुरक्षा खतरे एवं कानूनी अंतराल: अद्यतन ढाँचों की आवश्यकता
- 5 राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति: एकीकृत एवं समन्वित सुरक्षा संरचना की अनिवार्यता
- 6 सुरक्षा ढांचे के रूप में IT मध्यवर्ती नियम: डिजिटल प्लेटफॉर्म का विनियमन
- 7 एन्क्रिप्टेड संचार एवं सुरक्षा
- 8 सोशल मीडिया एवं भ्रामक जानकारी
- 9 वन्यजीव एवं संसाधनों की तस्करी
- 10 मानव तस्करी के माध्यम से आतंकवादी नेटवर्क का विस्तार

