डिजिटल कट्टरपंथीकरण एवं युवा
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने कट्टरपंथीकरण (Radicalization) के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे चरमपंथी समूह अब दूर से ही युवाओं को निशाना बनाकर भर्ती कर सकते हैं। सोशल मीडिया तंत्र और वैचारिक भावना के इस सम्मिलन ने भारत के लिए एक गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती उत्पन्न कर दी है।
सोशल मीडिया की भूमिका
- एल्गोरिद्म-आधारित एक्सपोज़र: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अपने अनुशंसा तंत्र के माध्यम से ध्रुवीकरण और उग्रवादी सामग्री को बढ़ावा देते हैं, जिससे कट्टरपंथीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
- ऑनलाइन प्रचार नेटवर्क: आतंकी संगठन एन्क्रिप्टेड ऐप्स और ऑनलाइन मंचों का उपयोग कर विचारधारात्मक सामग्री, वीडियो और साहित्य का प्रसार ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) का खतरा
- 2 उपग्रह युद्ध एवं GPS स्पूफिंग: नौवहन और रक्षा के लिए जोखिम
- 3 अंतरिक्ष शासन एवं वैश्विक मानदंड: संधि-विहीन क्षेत्र में भारत की भूमिका
- 4 उभरते सुरक्षा खतरे एवं कानूनी अंतराल: अद्यतन ढाँचों की आवश्यकता
- 5 राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति: एकीकृत एवं समन्वित सुरक्षा संरचना की अनिवार्यता
- 6 सुरक्षा ढांचे के रूप में IT मध्यवर्ती नियम: डिजिटल प्लेटफॉर्म का विनियमन
- 7 एन्क्रिप्टेड संचार एवं सुरक्षा
- 8 सोशल मीडिया एवं भ्रामक जानकारी
- 9 वन्यजीव एवं संसाधनों की तस्करी
- 10 मानव तस्करी के माध्यम से आतंकवादी नेटवर्क का विस्तार

