उभरते सुरक्षा खतरे एवं कानूनी अंतराल: अद्यतन ढाँचों की आवश्यकता

राजकीय एवं गैर-राजकीय कर्ताओं से उत्पन्न होने वाले उभरते सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए भारत को अपनी भूमि-आधारित खतरों पर केंद्रित पारंपरिक सोच से आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए विधायी परिवर्तनों के माध्यम से “अदृश्य युद्धक्षेत्रों” को संबोधित करने की आवश्यकता है।

कानूनी अंतराल की स्थिति

  • कानूनी अंतराल तब उत्पन्न होते हैं, जब तकनीकी एवं सामरिक नवाचार की गति विधायी प्रक्रिया से अधिक हो जाती है।
  • सुरक्षा एजेंसियां अक्सर आईटी अधिनियम (2000) या भारतीय न्याय संहिता (BNS, 2023) पर निर्भर रहती हैं, जिनमें “ड्रोन-स्वार्म”, “एल्गोरिथमिक युद्ध” या “सिंथेटिक बायो-टेररिज्म” जैसे असममित खतरों के लिए विशिष्ट प्रावधानों का अभाव है।

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