Question : ‘‘तुलनात्मक निष्पादन मापन (सी.पी.एम.) दैनिक कार्य अनुभव और तुलनात्मकता (कम्पैरेटिविज्म) के अधिक व्यापक क्षितिज के बीच सेतु का कार्य करता है।’’ स्पष्ट कीजिए।
(2015)
Answer : तुलनात्मक निष्पादन मापन (सी.पी.एम.) परियोजनाओं के नियोजन तथा सारणीयन की एक आरेखीय तकनीकि है, जो समय तथा लागत में समन्वय स्थापित करती है।
तर्क विश्लेषण की यह तकनीकि चरम या क्रांतिक पथ अर्थात सबसे लम्बे समय वाले मार्ग को ढूंढ़ती है। चरम पथ पद्धति का आशय यह होता है कि चरम पथ से आने वाली गतिविधियों को शीघ्रता से पूरा करना चाहिए।
चरम पथ की गतिविधियों में देरी का तात्पर्य संपूर्ण परियोजना में देरी करना है। ....
Question : “आत्मनिर्भरता समूहों ने न केवल महिलाओं को शक्ति प्रदान की है, बल्कि महिला विकास के प्रति रुचि रखने वाले सभी व्यक्तियों (स्टेकहोल्डर्स) में एक अभिवृत्तिक परिवर्तन भी ला दिया है।” चर्चा कीजिए।
(2014)
Answer : भारतीय संविधान इस बात की गांरटी देता है कि लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं किया जाएगा किंतु व्यवहार में ऐसा नहीं दिखाई देता। यदि वास्तव में ऐसा होता है तो सरकार को इनके विकास के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ते। साथ ही आत्मनिर्भरता समूह भी इस बात का सबूत है। आत्मनिर्भरता समूह सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति वाले लोगों का एक ऐसा समूह है जो अपने सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को ....
Question : ‘‘तुलनात्मक लोक प्रशासन आधुनिक संगठन सिद्धान्त के समान और भिन्न दोनों है।’’ सविस्तार स्पष्ट कीजिये।
(2013)
Answer : तुलनात्मक लोक प्रशासन में विविध समाजों की संस्कृतियों में कार्यरत विभिन्न राज्यों या सरकारों की सार्वजनिक प्रशासनिक संस्थाओं का तुलनात्मक दृष्टि से विवेचन किया जाता है।
तुलनात्मक लोक प्रशासन तुलना के आधार पर लोक प्रशासन का नूतन अध्ययन है। आधुनिक संगठन सिद्धांत भी सभी तत्वों, संगठन तथा उसके संघटक भागों पर विचार करता है। यह बहुस्तरीय, बहुपक्षीय, बहुशास्त्रीय, वर्णनात्मक है। इसका विकास भी लोक प्रशासन में तुलनात्मक लोक प्रशासन के उदय के समय ही हुआ है। ....
Question : तुलनात्मक लोक प्रशासन में सार्वत्रिक थियोरी के दुर्ग्राह्य बने रहने के कारणों पर टिप्पणी कीजिए।
(2012)
Answer : तुलनात्मक लोक प्रशासन दो देशों के प्रशासन तंत्रें की तुलना करने से सम्बन्धित है, जबकि अन्तरराष्ट्रीय प्रशासन अन्तरराष्ट्रीय प्रशासन, अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे- संयुक्त राष्ट्र संघ व इसके अन्य संस्थाओं की प्रशासन-तंत्र के अध्ययन से सम्बन्धित है। फिर भी दोनों में कई दृष्टियों से समीपता आवश्यक मानी जाती है। इन कारणों में शामिल हैं:
तुलनात्मक अध्ययनों द्वारा विभिन्न देशों में कार्यरत लोक प्रशासन तंत्रें की सक्षमता व कमजोरी को पहचाना जा सकता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय प्रशासन ....
Question : ‘विकास-रोधी अभिधारणा विकास का दर्जा घटा कर उसको इतिहास-विहीन, परिवर्तन के ‘प्रति अप्रभावनीय विचार बना देती है’ लेकिन ‘इस तथ्य को जहन में लाने में विफल हो जाती है कि अपनी सभी खामियों के बावजूद विकास सशक्तिकारी हो सकता है।’ चर्चा कीजिए।
(2012)
Answer : समकालीन विकास की प्रक्रिया को कई विद्वानों ने एक प्रतिगामी प्रक्रिया का संज्ञा दी है। जिसमें दीर्घकालिक हितों की व्यापक अनदेखी की गयी है और जिसके व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी व पर्यावरणीय प्रभाव हैं। इस विकास प्रक्रिया ने व्यापक सामाजिक असमानता को जन्म दिया और इससे समग्र मानवीय विकास का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पा रहा है।
विकास के समकालीन प्रतिमान की सबसे महत्वपूर्ण आलोचना है कि इसमें पर्याप्त सम्पन्नता व प्रचुरता के बावजूद भी ....
Question : “रिग्स का प्रिज्मीय मॉडल विकासशील और विकसित समाजों पर बराबर-बराबर लागू होता है।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2010)
Answer : एफ. डब्ल्यू. रिग्स ने समाज के तीन आधार बताए एवं इन आधारों पर तीन मॉडल विकसित किए जो हैं:
प्रिज्मीय समाज को रिग्स ने ऐसे समाज के रूप में पारिभाषित किया है, जिसमें विशिष्टीकरण का वह स्तर है कि आधुनिक तकनीक को प्रयुक्त किया जा सकता है, पर उसे एकीकृत करने में समाज असफल रहा है।
रिग्स ने प्रिज्मीय मॉडल को विकासशील देशों का मॉडल बताया है, जिसकी विशेषताएं हैं-विजातीयता, प्रारूपवाद, परस्पर व्यापिता ....
Question : सही अर्थों में तुलनात्मक प्रशासनिक अध्ययन आनुभविक, नियमान्वेषी और परिस्थितिक होते हैं। (रिग्स) इस परिप्रेक्ष्य में, तुलनात्मक लोक प्रशासन की वर्तमान प्रास्थिति का परीक्षण कीजिए।
(2008)
Answer : तुलनात्मक लोक प्रशासन के तहत विभिन्न संस्कृतियों में कार्यरत विभिन्न राज्यों की सार्वजनिक प्रशासनिक संस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।
लोक प्रशासन में तुलना संबंधी दृष्टिकोणों को दो वर्गों में रखा जा सकता है- व्यापक दृष्टिकोण, इसमें विभिन्न संस्थानों के परिवेशों में सरकारी अभिकरणों, व्यापारिक निगमों आदि का अध्ययन किया जाता है। इसमें प्रशासन को सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है।
द्वितीय रिग्स तुलनात्मक शब्द को प्रतिबंधित करके उसे आनुभविक तथा सिद्धान्त परक अध्ययनों तक सीमित ....
Question : "तुलनात्मक न होना सहज-रूप में संकीर्ण होता है" (रिग्स) टिप्पणी कीजिए?
(2007)
Answer : सामाजिक विषयों में तुलनात्मकता का विशिष्ट स्थान है। तुलनात्मक लोक प्रशासन आधुनिक युग में अग्रगण्य धारित करता है। तुलनात्मक प्रशासन एवं तुलनात्मक राजनीति सम्यक् रूप नूतन व्यावहारिक राजनैतिक पक्ष के स्थायी भाग है। अपनी सम्यक् अर्थपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण से युक्तिसंगत विवेचन प्रणाली की दृष्टि से पुष्ट सिद्धांतों अवधारणाओं को वर्तमान समय में व्यवाहारिक राजनैतिक पक्ष सम्पुष्टता तुलनात्मकता के आधार पर ही प्रदान कर रहा है। तुलनात्मक लोक प्रशासन का मूलभूत लक्ष्य लोक प्रशासन को प्राचीन ....
Question : सरकारी कर्मचारियों और उनके मुकाबले में लोक क्षेत्रक निगमों और निजी क्षेत्रक कर्मचारियों की परिलब्धियों में चौड़ी होती हुई खाई का अभिप्रेरण और कार्य करने की योग्यता के साथ मजबूत सम्बन्ध है। टिप्पणी कीजिए।
(2007)
Answer : सरकारी कर्मचारियों और लोक क्षेत्रक निगमों और निजी क्षेत्रक कर्मचारियों के निष्पादन में काफी अन्तर पाया जाता है।
सरकारी कर्मचारियों की कार्य संस्कृति और निगमों व निजी क्षेत्र के कार्मिकों की कार्य संस्कृति भिन्न होती है। इसके अतिरिक्त सरकारी कर्मचारी राजनीतिक परिवेश में कार्य करते हैं। जबकि निगम व निजी क्षेत्र के कार्मिकों के लिए ऐसा नहीं होता। सरकारी कार्य की प्रक्रिया सुनिश्चित होती है। उसी प्रक्रिया के अनुसार उसे कार्य करना पड़ता है, इससे प्रशासन ....
Question : तुलनात्मक लोक प्रशासन के अर्थ, सार्थकता और मॉडलों को समझाइए।
(2004)
Answer : तुलनात्मक लोक प्रशासन आधुनिक व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान के स्थायी अनुदाय है। लोक प्रशासन के अध्ययन में तुलनात्मक लोक प्रशासन एक नवीन अवधारणा है। तुलनात्मक लोक प्रशासन से तात्पर्य एक ऐसे विषय से है जिसके अन्तर्गत सामान्यतः दो या दो से अधिक प्रशासनिक इकाइयों या अभिकरणों की संरचना एवं कार्यात्मकता की तुलना की जाती है। तुलनात्मक लोक प्रशासन, तुलनात्मक आधार पर लोक प्रशासन का अध्ययन है। विभिन्न संस्कृतियों एवं राष्ट्रीय विन्यासों में प्रयुक्त हुए लोक प्रशासन ....
Question : फ्रैंड डब्ल्यू. रिग्स प्रशासनिक तन्त्रें और उनके परिवेश के बीच अन्योन्यक्रियाओं का किस प्रकार संकल्पनाकरण किया था।
(2002)
Answer : फ्रैड डब्ल्यू रिग्स प्रशासनिक प्रक्रिया को एक व्यवस्था मानते हैं, जिसका परिवेश होता है, जिसमें यह कार्य करता है और जिसके साथ यह परस्पर क्रिया करता है। किसी भी प्रशासनिक संरचना का महत्व उसकी स्थिति के अन्तर्गत होता है। रिग्स ने सांस्कृतिक विविधताओं के आधार पर प्रारंभ में समाज सम्बन्धी दो प्रकार के प्रतिमान प्रस्तुत किए प्रधानतः औद्योगिक और प्रधानतः कृषि सम्पन्न ये दोनों विपरीत मॉडल है। दोनों समाजों के परिवेश में भिन्नता होने के ....
Question : विकासशील समाज के प्रशासन में ‘रिग्जियन प्रिज्मैटिक साला माडल पर आलोचनात्मक टिप्पणी लिखिए। भारतीय प्रशासनिक प्रणाली किस सीमा तक प्रिज्सीय लक्षणों से अभिव्यक्त करती है।
(2001)
Answer : फ्रैड डब्ल्यू रिग्स ने लोक प्रशासन में रिग्जयन प्रिज्मैटिक साला मॉडल के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया है। प्रिज्मैटिक समाज में सामाजिक संरचनाओं के महत्वपूर्ण तत्वों और इस समाज के प्रशासनिक उपतंत्र का अध्ययन किया। रिग्स ने समपार्श्वीय समाज की नौकरशाही के लिए साला शब्द का प्रयोग किया। साला मॉडल प्रशासन व्यवस्थाओं का आदर्श प्रकार प्रस्तुत करता है। इसमें आदि काल से आधुनिक काल तक के प्रशासन की विशेषता पायी जाती है। वर्तमान ....
Question : फ्रैंड डब्ल्यू. रिग्स द्वारा प्रिज्मीय और साला समाजों के अपने अध्ययन में अपनाए गए उपागम और क्रिया पद्धति की समीक्षा कीजिए। अपवर्तन की राजकृष्ण की आलोचना की वैध अंतर्वस्तु क्या है?
(2000)
Answer : रिग्स ने सांस्कृतिक विविधताओं के आधार पर समाज से संबंधी दो प्रकार के प्रतिमान को प्रस्तुत किया- प्रधानतः औद्योगिक और प्रधानतः कृषि संपन्न। इन समाजों के मॉडल में कुछ कमी होने के कारण उन्होंने फिर बहुकार्यात्मक या संयोजित समाज एवं प्रिज्मीय या समपार्श्वीय समाज को मान्यता दी।
प्रिज्मीय समाज बहुकार्यात्मक समाज एवं अल्पकार्यात्मक समाज के बीच का समाज है। इस समाज में विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएं, व्यवहार, क्रियाएं तथा दृष्टिकोणों आदि की एक साथ उपस्थिति होती ....
Question : फ्राजनीतिक परिवेश प्रशासनिक तंत्र को अनुकूलित करता हैय्।
(2000)
Answer : प्रशासन एवं राजनीतिक परिवेश का बहुत ही करीबी व घनिष्ठ संबंध है। दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। वस्तुतः लोक प्रशासन उस राजनीतिक व्यवस्था की उपव्यवस्था है, जिसमें कि प्रशासन कार्य करता है। नौकरशाही तंत्र आर्थिक या सामाजिक-सांस्कृतिक प्रणालियों की अपेक्षा राजनीतिक व्यवस्था के साथ अधिक पारस्परिक क्रिया करता है। प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नौकरशाही की प्रकृति, कार्य एवं लक्ष्य मुख्य तथा उस राजनीतिक ढांचे द्वारा निरूपित होते हैं, जिसमे यह कार्य करता है। ....
Question : यू. एस. ए. में विकासशील पूंजीवादी तन्त्र के अनुक्रिया स्वरूप लोक प्रशासन के विषय की संवृद्धि का परीक्षण कीजिए।
(1999)
Answer : यू. एस. ए. विकसित देशों को प्रतिनिधि राष्ट्र है। विकासशील पूंजीवादी तन्त्र की अनुक्रिया स्वरूप यू. एस. ए. में उच्च दर्जें का कार्य विशेषीकरण होता है तथा समान सर्वव्यापी निश्चित तथा उपलब्ध नियमों की प्रबलता पाई जाती है। उच्च कोटि की सामाजिक गतिशीलता विकसित व्यावसायिक व्यवस्था तथा व्यावसायिक उपलब्धि के आधार पर खुली या परिवर्तन शील वर्ग व्यवस्था आदि विकासशील पूंजीवादी तन्त्र के अनुक्रिया स्वरूप विकसित हो सके हैं। इसके परिणामस्वरूप यू. एस. ए. में ....
Question : विकासशील देशों के सन्दर्भ में, प्रशासनिक सक्षमताओं के प्रकार्य पर समीक्षात्मक टिप्पणी कीजिए।
(1999)
Answer : विकासशील देशों की अल्पविकसित अथवा अविकसित देशों के नाम से जाना जाता है। विकासशील देशों में प्रशासनिक व्यवस्था में कार्य विशेषज्ञता की कम मात्र एक महत्वपूर्ण विशेषता है, लेकिन दूसरी ओर संसार के सभी विकसित देशों ने अपने प्रशासकीय ढांचे को मजबूत रखा। विकासशील देशों की प्रशासनिक व्यवस्था पाश्चात्य औपनिवेशिक देशों की नकल मात्र है। विकासशील देशों में प्रशासकीय कार्यों का भार कम होता है, क्योंकि ऐसे देशों में औद्योगिकरण तीव्र गति से नहीं होता ....
Question : जब तक लोक प्रशासन का अध्ययन तुलनात्मक नहीं बनता, तब तक ‘लोक प्रशासन का विज्ञान’ का दावा करना खोखला प्रतीत होता है। स्पष्ट कीजिए।
(1998)
Answer : तुलनात्मक लोक प्रशासन का अर्थ विश्व के विभिन्न देशों में कार्यरत सरकारी प्रशासनिक प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन है। तुलनात्मक लोक प्रशासन के अन्तर्गत दो या दो से अधिक प्रशासनिक इकाइयों की संरचना एवं कार्यात्मकता की तुलना की जाती है। तुलनात्मक लोक प्रशासन की प्रकृति में निरन्तर परिवर्तन आता रहता है। लोक प्रशासन को विज्ञान न मानने के पीछे कई कारण उत्तरदायी है यथा निश्चितता या पूर्णता का अभाव, सार्वभौमिक सिद्धान्तों का अभाव, पर्यवेक्षण तथा परीक्षण ....