बाह्य ऋण प्रबंधन एवं सॉवरेन जोखिम संकेतक

भारत की बाह्य ऋण प्रबंधन रणनीति का केंद्रीय फोकस “सततता और विवेकशीलता” पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शेष विश्व के प्रति भारत की वित्तीय देनदारियां, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की तुलना में, निम्न और प्रबंधनीय स्तर पर बनी रहें। इस ढांचे में दीर्घकालिक परिपक्वता (Long-Term Maturity Profile) को प्राथमिकता दी गई है तथा संप्रभु यानी सरकारी ऋण हिस्सेदारी को सीमित रखा गया है, जिससे वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि और मुद्रा अस्थिरता जैसे बाह्य झटकों से अर्थव्यवस्था को प्रभावी संरक्षण मिलता है।

वैश्विक ऋणदाता एवं बाज़ार पर्यवेक्षक

  • सॉवरेन रेटिंग एजेंसियाँ: एसएंडपी, मूडीज़ और फिच जैसी ....
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