LGBTQIA+ समावेशन नीतियाँ एवं विधिक प्रगतियाँ
भारत में LGBTQIA+ समावेशन का आशय, विविध लैंगिक पहचानों और यौन अभिविन्यासों वाले व्यक्तियों को कानूनी मान्यता, अधिकार संरक्षण तथा नीति-आधारित सामाजिक समावेशन प्रदान करना है। यह प्रक्रिया भारतीय संविधान में निहित समानता, गरिमा, निजता और समावेशी विकास के मूल्यों को सुदृढ़ करती है।
लक्षित वर्ग
- लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीयर, इंटरसेक्स एवं एसेक्शुअल (LGBTQIA+) व्यक्ति
- ट्रांसजेंडर एवं जेंडर-विविध समुदाय
- औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत LGBTQIA+ व्यक्ति।
हालिया विधिक एवं नीतिगत विकास
- विवाह समानता समीक्षा (जनवरी 2025): सर्वोच्च न्यायालय ने सुप्रियो बनाम भारत संघ (2023) निर्णय के विरुद्ध दायर पुनर्विचार याचिकाएँ खारिज कर दीं और पुनः स्पष्ट किया कि समलैंगिक ....
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