राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता की बढ़ती मांगें
भारत में राज्य लगातार अधिक वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) की आवश्यकता रेखांकित कर रहे हैं। इसका तात्पर्य अत्यधिक केंद्रीय हस्तक्षेप के बिना संसाधनों को स्वतंत्र रूप से जुटाने, आवंटित करने और खर्च करने की स्वतंत्रता से है। संवर्धित वित्तीय अधिकारों को विविध क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए आवश्यक माना जाता है।
हालिया विकास
- केरल, तमिलनाडु, पंजाब और तेलंगाना जैसे राज्यों ने हाल ही में उधारी पर लगाए गए कठोर प्रतिबंधों, GST मुआवजे में देरी और केंद्र के कर राजस्व में घटती हिस्सेदारी पर चिंता जताई है।
- कई राज्यों ने केंद्रीय विभाज्य पूल (Central Divisible Pool) से ....
क्या आप और अधिक पढ़ना चाहते हैं?
तो सदस्यता ग्रहण करें
इस अंक की सभी सामग्रियों को विस्तार से पढ़ने के लिए खरीदें |
पूर्व सदस्य? लॉग इन करें
वार्षिक सदस्यता लें
सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल के वार्षिक सदस्य पत्रिका की मासिक सामग्री के साथ-साथ क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स पढ़ सकते हैं |
पाठक क्रॉनिकल पत्रिका आर्काइव्स के रूप में सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल मासिक अंक के विगत 6 माह से पूर्व की सभी सामग्रियों का विषयवार अध्ययन कर सकते हैं |
संबंधित सामग्री
- 1 NCERT MCQ अर्थशास्त्र
- 2 NCERT MCQ भूगोल
- 3 NCERT MCQ इतिहास
- 4 सामान्य अध्ययन मॉडल प्रश्न 2027
- 5 इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0
- 6 एआई इम्पैक्ट समिट, 2026
- 7 राष्ट्रीय शून्य खसरा–रूबेला उन्मूलन अभियान
- 8 नैफिथ्रोमाइसिन : भारत का पहला स्वदेशी एंटीबायोटिक
- 9 ज़ॉम्बी डियर रोग/क्रॉनिक वेस्टिंग डिज़ीज़
- 10 टीबी उन्मूलन की ओर भारत की तेज प्रगति

