सामयिक खबरें राष्ट्रीय सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप

चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019


  • 28 नवंबर, 2019 को राज्यसभा ने चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक, 2019 को पारित किया, जिसका उद्देश्य चिट फंड पर अनुपालन भार को कम करना और ग्राहकों की रक्षा करना है जिसमें मुख्य रूप से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग शामिल हैं।
  • लोक सभा द्वारा 20 नवंबर, 2019 को विधेयक पारित किया गयाथा।
  • यह चिट फंड अधिनियम, 1982 में संशोधन करता है, जो चिट फंड को राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना बनाए जानेसे रोकता है।

उद्देश्य

  • चिट फंड क्षेत्र की क्रमिक वृद्धि और सामूहिक निवेश योजनाओं या चिट फंडों के संचालन को सुगम बनाना,
  • चिट फंड उद्योग द्वारा सामना की जा रही अड़चनों को दूर करना,
  • लोगों तक अधिक वित्तीय पहुंच को सक्षम करना |

विधेयक की जरूरत

  • निवेशक के हितों की रक्षा करना: भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में चिट फंड महत्वपूर्ण भूमिका निभाने है, यह लोगों को धन और निवेश के अवसरों तक पहुंच प्रदान करती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बैंकों और वित्तीय संस्थानों की उपस्थिति नहीं है। अतः ऐसेनिवेशक के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता थी |

विधेयक की मुख्य विशेषताएं

शब्दों का प्रतिस्थापन

  • विधेयक क्रमशः चिट राशि, लाभांश और पुरस्कार राशि को सकल चिट राशि, छूट का हिस्सा और शुद्ध चिट राशि के साथ स्थानापन्न करता है।
  • इस विधेयक में चिट फंड के लिए अनेक वैकल्पिक नामों के सुझाव दिये गए हैं जिससे इसके प्रति लोगों में एक नया भाव तथा विश्वास पैदा हो सके।
  • इसके अलावा, यह कुरी, बंधुत्व निधि, आवृति बचत, क्रेडिट संस्था सहित विभिन्न नामों के तहत चिट फंड को मान्यता देता है।

चिट की कुल मात्रा में वृद्धि

  • विधेयक में चिट फंड की अधिकतम राशि को बढ़ाने का प्रस्ताव है जो इसके द्वारा एकत्र किया जा सकता है:
  • व्यक्ति:1 लाख रुपए से 3 लाख रुपए
  • फर्म: 6 लाख रुपए से 18 लाख रुपए तक।

वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये ग्राहकों की उपस्थिति

  • विधेयक यह बताता है कि जब कोई चिट निकाली जाती है तो कम से कम दो ग्राहकों को शारीरिक रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित होना चाहिए।

फोरमैन का कमीशन

  • इसमें एक फोरमैन के अधिकतम कमीशन को चिट राशि के 5% से बढ़ाकर 7% करने का प्रस्ताव है। फोरमैन चिट फंड का केवल प्रबंधक होता है।

प्रयोज्यता

  • मुख्य अधिनियम लागू होने से पहले प्रारंभ की गयी किसी भी चिट फण्ड पर जहां राशि 100 रुपये से कम हो, लागू नहीं होता है।
  • विधेयक 100 रुपये की सीमा को हटाने का प्रयास करता है, और राज्य सरकारों को उस आधार राशि को निर्दिष्ट करने की अनुमति देता है जिस पर अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे।

प्रभाव

  • जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ग्राहकों को पेश करने की अनुमति देने के विधेयक में प्रावधान से चिट फंड के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
  • निवेशक फ्रेंडली चिट फंड बनाना: चिट फंड ऑपरेटर को स्कीम के आकार के अनुसार सुरक्षित डिपॉजिट देने का प्रावधान करती है जिससे इसमें निवेश करने वाले लोगों के हितों की सुरक्षा करने में मदद मिलेगी | इस कदम से चिट फंड को निवेशक के अनुकूल बनाया जा सकेगा।

चिटफंड

  • चिट फंड भारत में प्रचलित एक पारंपरिक वित्तपोषण प्रणाली है जिसमें कुछ लोग (सदस्यों या ग्राहकों के रूप में जाने जाते हैं) एक साथ आते हैं और एक निश्चित अवधि के लिए हर महीने एक निश्चित राशि का निवेश करते हैं।
  • यह उन लोगों को सहायता प्रदान करता है जो धन उधार पाने के वैकल्पिक श्रोत की तलाश कर रहे होते है |
  • संग्रह की प्रक्रिया के दौरान, कोई भी सदस्य लकी ड्रॉ, नीलामी या अन्य माध्यम से एकमुश्त राशि निकाल सकता है एवं इसकी एक भुगतान तिथि तय होती है।
  • हालांकि यह प्रणाली घूर्णन बचत और क्रेडिट एसोसिएशन (ROSCA) नाम से विश्व के अन्य हिस्सों में मौजूद है, भारत एकमात्र देश है जहां इसका संचालन विधानों द्वारा शासित हैं।

चिट फंड के प्रकार

भारत में तीन प्रकार के चिट फंड हैं, अर्थात्:

  1. राज्य सरकारों द्वारा चलाया जाता है;
  2. निजी पंजीकृत चिट फंड; तथा
  3. अपंजीकृत चिट फंड।

चिट फंड के प्रकार

राज्य सरकार द्वारा संचालित चिट फंड

कुछ चिट फंड राज्य सरकार द्वारा चलाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, केरल राज्य वित्तीय उद्यम (KSFE) और मैसूर सेल्स इंटरनेशनल लिमिटेड (MSIL) सार्वजनिक उपक्रम हैं जो चिट फंड के कारोबार को साफ और पारदर्शी तरीके से चलाते हैं।

निजी पंजीकृत

कई पंजीकृत चिट फंड हैं, कुछ प्रमुख व्यापारिक घरानों द्वारा संचालित हैं, जैसे कि हैदराबाद आधारित मारगार्डी चिट फंड, रामोजी राव ग्रुप का हिस्सा, या श्रीराम समूह। कुछ सहकारी समितियां भी चिट चलाती हैं।

अपंजीकृत

कई अपंजीकृत चिट फंड हैं परन्तु इनसे सम्बंधित कानूनी नहीं है। इनसे बचा जाना चाहिए क्योंकि विवाद की स्थिति में सदस्य के लिए कोई सहारा नहीं होता है। ऐसे चिट फंड में आमतौर पर करीबी दोस्त, सहकर्मी या पड़ोसी शामिल होते हैं।

 

चिट फंड और पोंजी स्कीम्स के बीच अंतर

  • चिट फंड एक तरह की बचत जमा है जो लोगों के समूह द्वारा की जाती है। यह अवधारणा बहुत कुछ किट्टी पार्टियों के समान है जो किसी विशेष परियोजना के लिए कुछ पैसे बचाने के लिए महिलाओं द्वारा गठित की जाती हैं। ये चिट फंड पंजीकृत कंपनियों द्वारा प्रबंधित किए जा सकते हैं या परिवार और दोस्तों जैसे लोगों के समूह द्वारा भी प्रबंधित किया जा सकता है। सभी चिट फंड गतिविधियों को चिट फंड अधिनियम, 1982 द्वारा विनियमित किया जाता है।
  • पोंजी योजनाएं एक तरह की पिरामिड स्कीम हैं, जो निवेशकों को कम जोखिम के साथ वापसी की उच्च दर का वादा करता है |जो वास्तव में, एक प्रकार का धोखाधड़ी या निवेश घोटाला है।
  • पोंजी स्कीम्स को मूल रूप से इस तरह से बनाया गया है कि निवेशकों से लिया गया पैसा सर्किलचलता है। मूल रूप से इसका मतलब है कि, निवेशकों से एकत्रित धन का उपयोग पुराने निवेशकों को भुगतान करने के लिए किया जाता है।
  • ये योजनाएं मूल रूप से तब तक कार्य करती हैं जब तक कि नए निवेश से आने वाली धनराशि पुराने निवेशकों को भुगतान करने के लिए धन से अधिक हो। जिस दिन श्रृंखला उलट जाती है उस दिन यह ठप्प हो जाता है। उदहारण के तौर पर पश्चिम बंगाल का सारदा घोटाला पोंजी स्कीम घोटाला था, न कि चिट फंड घोटाला जिसे मीडिया ने लोकप्रिय बनाया।

लाभ

  • उधार लेने और बचाने के लिए लचीलापन साधन प्रदान करता है। किसी को केवल पहली मासिक किस्त अदा करके धन उधार लेने का मौका मिलता है।
  • किसी भी दस्तावेज जैसे आईटी रिटर्न, पैन कार्ड आदि के बिना जरूरतमंद लोगों के लिए वित्त का सबसे अच्छा विकल्प है।
  • चिट फंड एक अच्छा बचत साधन है और यह आपात स्थिति में धन का एक विश्वसनीय स्रोत हो सकता है।
  • अन्य साधनों की तुलना में मध्यस्थता लागत सबसे कम है।

नुकसान

  • चिट-फंड किसी भी पूर्व-निर्धारित या निश्चित रिटर्न की पेशकश नहीं करते हैं।
  • फोरमैन के समग्र धनराशि के साथ भागने जैसे धोखाधड़ी की संभावना उच्च होती है।
  • पहली बोली जीतने के बाद विजेता ग्राहक गायब हो सकता है।
  • ग्राहक अगली किश्तों का भुगतान करने के लिए तैयार नहीं हो सकता है।
  • बहुत कम सुरक्षा के साथ जोखिम का उच्च स्तर।

आगे की राह

  • चिट फंड कम आय वर्ग के लोगों में लोकप्रिय हैं क्योंकि यह उन्हें बचत करने और निवेश करने का अवसर प्रदान करता है। अगर इसे सही तरीके से उपयोग किया जाए तो यह वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने का एक उत्कृष्ट साधन है।
  • हालांकि, चिट फंड अधिनियम की धारा 16 के अनुसार "भौतिक उपस्थिति" की आवशकता ने चिट फंड उद्योग कोई-नीलामी एवं ई-भुगतान जैसी नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपनाना असंभव बना दिया है।
  • चिट फंड उद्योग के लिएयह महत्वपूर्ण समय है जब नीति निर्माताइस क्षेत्र की समस्याओं की समीक्षा करे और इससे सम्बंधित कानूनों को आधुनिक समय के साथ सांगत बनाये जो इस व्यापक वित्तीय अभ्यास को प्रभावी रूप से नियंत्रित कर सके है।

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सबरीमाला पुनर्विचार याचिका


  • हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मामले पर अपने फैसले के खिलाफ 49 पुनर्विचार याचिकाओं और सभी लंबित आवेदनों पर की सहमति व्यक्त की। ध्यान रहे कीसर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयु वर्गों की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी |
  • हालांकि, मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई, न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन, न्यायाधीशएएम खानविल्कर, न्यायाधीशडी वाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीशइंदु मल्होत्रा ​​सहित पांच-न्यायाधीशों की बेंच ने स्पष्ट किया कि 28 सितंबर, 2018 तक कोई रोक नहीं होगी।
  • याचिकाकर्ताओं ने हाल ही में दिए गए बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि और दूरसंचार राजस्व के फैसले की समीक्षा करने की भी पुनर्विचार याचिका दायर की है।

पुनर्विचार याचिका

  • पुनर्विचार याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले की समीक्षा कर सकता है। आम तौर पर स्पष्ट त्रुटि जैसे बहुत सीमित आधारों पर, इस तरह की पुनर्विचार याचिका अदालत के समक्ष दायर की जाती है।
  • न्यायालय आम तौर पर पुनर्विचार याचिका में निर्णय नहीं देते हैं, जब तक कि कोई मजबूत सबल मामला न हो।

संवैधानिक प्रावधान

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 137 सर्वोच्च न्यायालय को निर्णय या आदेश के सम्बन्ध में पुनर्विचार करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • यह शक्ति हालांकि अनुच्छेद 145 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है, साथ ही संसद द्वारा अधिनियमित किसी भी कानून के प्रावधानों के अधीन है।

पुनर्विचार की व्यापकता

  • न्यायालय के पास सर्वविदित त्रुटि (patent error) को ठीक करने के लिए अपने निर्णयों की समीक्षा करने की शक्ति है और असंगत या महत्त्व हीन छोटी गलतियों के लिए इस समीक्षा करने की शक्ति नहीं है।
  • पुनर्विचार की शक्ति का दायरा को न्यायालय द्वारा नौर्देर्ण इंडिया कैटरर्स (इंडिया) बनाम लेफ्टिनेंट गवर्नर ऑफ़ दिल्ली (1979) मामले में व्याख्या किया गया, जिसमें न्यायालय ने माना था कि केवल पुन: सुनवाई और मामले में नए सिरे से निर्णय लेने के उद्देश्य से पक्षकार इस न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की समीक्षा करने का हकदार नहीं है। यदि मूल सुनवाई के दौरान न्यायालय का ध्यान किसी वैधानिक प्रावधान की ओर नहीं जाता है तो न्यायालय अपने निर्णय की समीक्षा करेगा।
  • यदि न्यायालय ने गलत तरीके से निर्णय लिया है और पूर्ण और प्रभावी न्याय करने के लिए आदेश पारित करना आवश्यक है, तो न्यायालय अपने फैसले की समीक्षा कर सकता है।

पुनर्विचार याचिका की मांग का आधार

  • 2013 के एक फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले की समीक्षा करने के लिए तीन आधार निर्धारित किए, जो हैं-
    • नए और महत्वपूर्ण मामले या सबूत की खोज, जो प्राप्य अध्यवसाय के अभ्यास के बाद, याचिकाकर्ता के ज्ञान के अधीन नहीं था या उसके द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था।
    • रिकॉर्ड में त्रुटि अथवा अस्पष्टता रही हो।
    • कोई अन्य पर्याप्त कारण (ऐसा कारण है जो अन्य दो आधारों के अनुरूप है)।
  • 2013 में भारत के संघ बनाम सैंडूर मैंगनीज एंड आयरन ऑर्सेस लिमिटेड में अदालत ने नौ सिद्धांतों को रखा जब पुनर्विचारकी जाती है।

पुनर्विचार याचिका दायर करना

  • सिविल प्रक्रिया संहिता और सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो किसी फैसले से संतुष्ट नहीं है, पुनर्विचार याचिका दायरकर सकता है।
  • हालांकि, अदालत दायर की गई प्रत्येक पुनर्विचार याचिका पर विचार नहीं करता है। वह पुनर्विचार याचिका की अनुमति देने के लिए अपने विवेक का उपयोग करता है।

पुनर्विचार याचिका दायर करने की समय सीमा

  • सुप्रीम कोर्ट के नियमों, 1999 के तहत, फैसले या आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर इस तरह की याचिका दायर की जानी चाहिए।
  • कुछ परिस्थितियों में, अदालत पुनर्विचार याचिका दायर करने में देरी को माफ कर सकती है यदि याचिकाकर्ता देरी के लिए कोई उचित कारण अदालत के सामने स्थापित कर दे।

न्यायालय में अनुपालित प्रक्रिया

  • 1999 के नियमों के अनुसार, वकीलों द्वारा मौखिक दलील के बिना पुनर्विचार याचिका पर विचार किया जाता है।
  • पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई उन न्यायधीशों द्वारा भी की जा सकती है जिन्होंने उस मामले पर निर्णय दिया था।
  • यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त या अनुपलब्ध है, तो न्यायाधीशों की वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्थापन किया जाता है।

यदि पुनर्विचार याचिका विफल हो जाए

  • अंतिम प्रयास के तौर पर, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से न्याय की गलती नहीं हो सकती है। अदालत ने एक उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) की अवधारणा विकसित की है, जिस प्रक्रिया के तहत पुनर्विचार के खारिज होने के बाद भी सुना जा सकता है।

उपचारात्मक याचिका(Curative Petition)

  • उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) अंतिम न्यायिक सुधारात्मक उपाय है जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी भी निर्णय के सम्बन्ध में दिया जा सकता है ।
  • शिकायतों के निवारण के लिए उपलब्ध आखिरी और अंतिम विकल्प माना जाता है जिसका प्रयोग केवल दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है ।
  • इस तरह की याचिका की अनुमति देने के पीछे का उद्देश्य केवल कानून की प्रक्रियाओं के किसी भी दुरुपयोग को कम करना है और न्याय की प्रणाली में सकल गलतियों और खामियोंको ठीक करना है।
  • उपचारात्मक याचिका की अवधारणा को सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) के मामले में विकसित किया था, जहां सवाल यह था कि क्या एक पीड़ित पक्ष सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले/आदेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका के ख़ारिज होने के बाद किसी भी राहत का हकदार है।

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गोल्डन राइस


  • बांग्लादेश जल्द ही गोल्डन राइस को बिक्री और उपयोग के लिए मंजूरी की घोषणा करने वाला है, जिससे यह गोल्डन राइस को अपनाने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा।
  • बांग्लादेश ने 2017 की शुरुआत में बांग्लादेश राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (BRRI) में गोल्डन राइस का सीमित क्षेत्र परीक्षण पूरा किया।
  • बांग्लादेश में चावल की इस किस्म का विकास फिलीपींस स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा किया जा रहा है।
  • शोधकर्ताओं ने बीटा-कैरोटीनजीन से युक्त, धान-29 नामक चावल की किस्म उगाया, जो बांग्लादेश में शुष्क मौसम के दौरान व्यापक रूप से उगाया जाता है और राष्ट्रीय पैदावार का लगभग 14% योगदान देता है।

गोल्डन राइस

  • गोल्डन राइस पारंपरिक चावल है जो बीटा-कैरोटीन के उच्च स्तर के लिए आनुवंशिक रूप से इंजीनियर किया गया है।
  • गोल्डन राइस बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने मक्का से बीटा-कैरोटीन वालेजीन को निकाल कर चावल के पौधों में संश्लित किया। ऐसा करने सेचावल के पौधों ने नारंगी रंग का पिगमेंट पैदा करना शुरू हो गया |

विकास के घटनाक्रम

  • 1982 में रॉकफेलर फाउंडेशन के पहल परगोल्डन राइस की खोज शुरू हुई।
  • यह सफलता वर्ष 1999 में मिली थी, जब दो जीव विज्ञानी स्विट्जरलैंड में इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट साइंसेज के इंगो पोट्रीकस और जर्मनी के फ्रीबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पीटर बेयर ने सफलतापूर्वक गोल्डन राइस का विकास किया था।
  • 2004 में लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी एग्रीकल्चर सेंटर द्वारा इस चावल की खेती का पहला क्षेत्र परीक्षण किया गया।
  • बाद में, फिलीपींस एवं ताइवान में और बांग्लादेश में अतिरिक्त परीक्षण किए गए हैं।

किस्मों

  • गोल्डन राइस के दो संस्करण अब तक विकसित हुए हैं- गोल्डन राइस 1 और 2 दोनों जपोनिका (चिपचिपा, सूखा हुआ) राइस है।

आवश्यकता

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान के अनुसार, लगभग 250 मिलियन पूर्व-स्कूली बच्चे विटामिन A की कमी (VAD) से प्रभावित होते हैं और लगभग 7 मिलियन बच्चे इस कमी के कारण मर जाते हैं। दिए गए परिदृश्य में, गोल्डन राइस को अपनाना विकासशील देशों में आबादी के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है।

लाभ

  • परम्परागत चावल मेंबीटा-कैरोटीन पिगमेंट स्वाभाविक रूप से कम होता है, बीटा-कैरोटीन पिगमेंट को शरीर विटामिन ए बनाने के लिए उपयोग करता है। गोल्डन चावल में यह होता है, जो इसके सुनहरे रंग का कारण है।
  • अनुसंधान ने संकेत दिया है कि एक कप गोल्डन राइस एक वयस्क की दैनिक आवश्यकता का 50 प्रतिशत तक विटामिन ‘ए’ प्रदान कर सकता है।
  • चावल में विटामिन ए की कमी (VAD) के कारण होने वाली मृत्यु और बीमारी को कम करने या समाप्त करने की क्षमता है, जो बच्चों में अंधेपन का प्रमुख कारण है और खसरा जैसी संक्रामक बीमारियों से होने वाली मृत्यु का कारण बन सकता है।
  • गोल्डन राइस अपनाने वाले देशों द्वारा विभिन्न आर्थिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। गोल्डन राइस कुपोषण के मुद्दे से निपटता है जिससे चिकित्सा देखभाल पर कम खर्च करना पड़ता है | बेहतर स्वस्थ्य श्रम उत्पादकता को भी बढ़ा सकता है।

मुद्दे

संग्रहण समस्या

  • गोल्डन राइस के साथ भंडारण की समस्या है क्योंकि चावल में बीटा-कैरोटीन ऑक्सीजन की उपस्थिति में अस्थिर होता है। इस प्रकार, सामान्य भंडारण स्थितियों में, गोल्डन राइस अनाज में बीटा-कैरोटीन तेजी से अवक्रमित होगा।
  • उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की खेती, भंडारण और घरेलू परिस्थितियों के तहत, गिरावट और भी तेज हो सकती है जोकि गोल्डन राइस के प्रस्तावित पोषण संबंधी लाभों के कम करेगा।
  • गोल्डन राइस को तीन महीने से अधिक समय तक संग्रहीत नहीं किया जाना चाहिए क्योकि इसके बाद यह अपने पोषक तत्वों को खो सकता है | इस स्थिति में इसके उपभोग का लाभ नगण्य हो जाता है।

गुणवत्ता और मात्रात्मक मुद्दा

  • 2017 में, इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर साइंस के एक अध्ययन ने गोल्डन राइस के लक्षणों में असामान्यताओं की खोज की, और इसके लक्षणों में कम उत्पादकता, गुणात्मक रूप से (कमविटामिन-ए) और मात्रात्मक (उपजवार) दोनों हैं।
  • इसके अलावा, यह देखा गया कि गोल्डन राइस पर्याप्त विटामिन ए प्रदान नहीं करता है, जैसा कि,6ug विटामिन ए प्रति ग्राम चावल दावा किया जा रहा है। विटामिन ए के दैनिक सेवन को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को 3300 ग्राम से अधिक चावल का सेवन करना पड़ता है। यह मात्रा उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए बहुत अधिक होगी जिन्हें चावल की आवश्यकता होती है।
  • इसके अलावा विटामिन ए वसा में घुलनशील है, इसलिए विटामिन ए का सेवन करने वाले व्यक्ति को अपने आहार में वसा की आवश्यकता होगी। दुर्भाग्य से, पर्याप्त प्रोटीन और वसा युक्त भोज्यपदार्थ विकासशील देशों में आसानी से उपलब्ध नहीं है|

नैतिक मुद्दा

  • गोल्डन राइस को पेश करने के नैतिक निहितार्थों भी है जिसको ले कर चिंताएं बढ़ रही हैं। विकासशील देशों में इसका प्रयोग, प्रयोगशाला में गिनी पिग पर परीक्षण के समान है |
  • अब तक इस आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल की खपत पर मानव स्वास्थ्य प्रभावों को इंगित करने के लिए कोई शोध या परीक्षण नहीं किया गया है। इसके पूर्ण निहितार्थों को जाने बिनाएक बड़े पैमाने पर फसल पैदा करना, संभवतः लाखों लोगों के जीवन को खतरे में डाल सकता है जो अमानवीय कदम है।
  • इसके अलावा, इस फसल को उपजाने के लिए स्थानीय किसानों को अपनी आजीविका और खेती के मौजूदा तरीकों को बदलने के लिए मजबूर किया गया है जिसे वे अपने पूरे जीवन उपजाते रहे हैं | यह कदम फसल की सामूहिक स्वीकृति पर नैतिक सवाल भी उठाते हैं।

इंडिया

  • 2016 में, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि IARI ने आनुवंशिक रूप से संशोधित गोल्डन राइस विकसित किया है, जो विटामिन-ए से समृद्ध है।
  • बिहार के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में, डेवलपमेंट ऑफ़ गोल्डन राइस नामक एक परियोजना चलायी जा रही है जो गोल्डन राइस को उपजाने से सम्बंधित है। राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय कृषि विकास कार्यक्रम (National Agriculture Development Programme) के तहत वित्तीय सहायता दी गई।
  • दो ICAR अनुसंधान निकायों, भारतीय कृषि अनुसंधान और राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसन्धान केंद्रको भारत में चावल को पेश करने से पहले स्थानीय चावल किस्म 'स्वर्ण' के साथ संकर किस्म विकसित करने के लिए अनुसंधान शुरू किया गया था।
  • परिणामस्वरूप पौधों बौने थे जिनकी पत्तियों का रंग पीलापन लिए हरा था और ‘स्वर्ण’ की तुलना में अनाज की संख्या और उपज दोनों में कमी आई।

बांग्लादेश में विरोध

  • बांग्लादेश के किसान और पर्यावरण समर्थक गोल्डन राइस की व्यावसायिक खेती की अनुमति देने के सरकार के फैसले से नाराज हैं।
  • कार्यकर्ताओं को डर है कि व्यावसायिक खेती से बांग्लादेश की समृद्ध जैव विविधता का नुकसान होगा। यह आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों का उत्पादन खाद्य विविधता, पारंपरिक बीज के साथ-साथ स्थानीय कृषि प्रणाली पर कॉर्पोरेट नियंत्रण को बढ़ा सकता है।
  • उनका दावा है कि गोल्डन राइस की तुलना में शकरकंद में बीटा कैरोटीन का स्तर 50 गुना अधिक होता है जिन्हें बांग्लादेश में गैर-कृषि योग्य भूमि पर भी उगाया जा सकता हैं।

 

अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI)

  • IRRI एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थान है, जिसकी स्थापना 1960में फिलीपीन सरकार के समर्थन से फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन द्वारा की गई थी। संस्थानका मुख्यालय लॉस बानोस, फिलीपींस में है।
  • यह विश्व का प्रमुख अनुसंधान संगठन है जो चावल विज्ञान के माध्यम से गरीबी और भूखमरी को कम करने; चावल किसानों और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए चावल उगाने वाले पर्यावरण की रक्षा करने के लिए समर्पित है।
  • 1960 और 1970 के दशक के अंत में IRRI एशिया में "हरित क्रांति" आंदोलन में अपने योगदान के लिए जाना जाता है।

आगे की राह

  • चावल रोजाना आधी दुनिया का मुख्य भोजन है। कई देशों में चावल 60% से अधिक, संभवतः 80%, कुल दैनिक आवश्यक कैलोरी की पूर्ति करता है। विटामिन ए की कमी व्यापक है, और उन देशों में विशेष रूप से गंभीर है जहां चावल प्रधान भोजन है।
  • इन कारणों से, गोल्डन राइस को स्थानीय स्तर पर उपजाने को प्रोत्साहित करनेके लिए सुविधा प्रदान करना होगा तथा इसमें राष्ट्रीय सरकार, स्थानीय सरकार, ग्राम स्तर के संगठनों तथा पारिवारिक संगठनोंको शामिल करना होगा।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय अवसंरचना

राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट


  • हाल ही में, सरकार ने पांच औद्योगिक गलियारे परियोजनाओं के विकास को मंजूरी दीजो राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट (National Industrial Corridor Development and Implementation Trust - NICDIT) के माध्यम से कार्यान्वित किये जायेंगे।
  • सरकार ने दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा परियोजना कार्यान्वयन ट्रस्ट फंड (DMIC-PITF) के विस्तार को मंजूरी दे दी और इसे राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट (NICDIT) के रूप में नामित किया।

राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट (NICDIT)

  • NICDIT की स्थापना 2017 में की गयी थी | यह औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (DIPP) के प्रशासनिक नियंत्रण के तहतदेश के सभी पांच औद्योगिक गलियारों के समन्वित और एकीकृत विकास के लिए सर्वोच्च निकाय है।

कार्य

  • यह विकास परियोजनओं से सम्बंधित गतिविधियों का मूल्यांकन, अनुमोदन तथामंजूरी प्रदान करने से सम्बंधित है।
  • यह विकास परियोजनाओं को भारत सरकार के कोषों के साथ-साथ संस्थागत कोषोंकी उपलब्धता सुनिश्चित करता है जिससे किव्यापक राष्ट्रीय हित में विभिन्न औद्योगिक गलियारों और शहर के विकास से सम्बंधित परियोजनाओं का विकास एवं कार्यान्वयन हो सके।

लाभ

  • औद्योगिक गलियारों के विकास से अनुभव को साझा करने का मंच उपलब्ध करता है ।
  • समग्र योजना और विकास दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है |
  • ऐसी परियोजनाओं के योजना बनाने, प्रारूपके विकास और वित्त पोषण जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देता है |
  • देश में विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाने, विनिर्माण और सेवा उद्योग क्षेत्रों में निवेश को आकर्षित करने में सहायक है ।

पांच औद्योगिक गलियारे

  • भारत सरकार द्वारा पांच औद्योगिक गलियारा परियोजनाओं को प्रारंभ किया गया है। ये गलियारे औद्योगिकीकरण और नियोजित शहरीकरण को गति प्रदान करने है एवं समावेशी विकास को ध्यान में रखते हुए पूरे भारत में फैले हुए हैं।

उद्देश्य                                

  • जीडीपी में विनिर्माण की कुल हिस्सेदारी में वृद्धि, अच्छा प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों की मजबूती का लाभ उठाना।
  • समग्र आर्थिक समृद्धि को बढ़ाने के लिए उच्च तकनीक और उच्च मूल्य संवर्धित क्षेत्रों को बढ़ावा देना।
  • वैश्विक उत्पादन नेटवर्क और वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में व्यापार प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना।
  • लैंगिक समानता और एमएसएमई क्षमताओंके माध्यम से समावेशन को विकसित करना।

क्र.सं.

औद्योगिक गलियारा

राज्यों

1

दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC)

उत्तर प्रदेश, हरियाणा,राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र

2

अमृतसर कोलकाता औद्योगिक गलियारा (AKIC)

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल

3

चेन्नई बेंगलुरु इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (CBIC)

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल

4

विजाग चेन्नई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (VCIC) के साथ ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर (ECEC) चरण -1

पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु

5

बेंगलुरु मुंबई औद्योगिक गलियारा (BMIC)

कर्नाटक, महाराष्ट्र

 

औद्योगिक गलियारों की वर्तमान स्थिति

दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC)

  • सभी चिन्हित नोड्स/शहरों के लिए विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी)का गठनकर लिया गया हैं, भूमि निपटान नीतियों को अंतिम रूप दे कर निम्नलिखित स्थानों पर निवेशकों को भूमि आवंटन की प्रक्रिया शुरू की गई है:
    • धोलेरा गुजरात में विशेष निवेश क्षेत्र
    • महाराष्ट्र में शेंद्रा-बिडकिन औद्योगिक क्षेत्र
    • उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप परियोजना
    • मध्य प्रदेश में उज्जैन के पास एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप परियोजना ‘विक्रमउद्योगपुरी’

अमृतसर कोलकाता औद्योगिक गलियारा (AKIC)

  • AKIC कॉरिडोर का समग्र ख़ाका तैयार किया जा चुका है और निम्नलिखित राज्यों में एकीकृत विनिर्माण क्लस्टर (IMC) विकास के लिए साइट की पहचान की जा चुकी है:
    • पंजाब (राजपुरा-पटियाला)
    • उत्तराखंड (प्राग-खुर्पिया फार्म)
    • उत्तर प्रदेश (भाऊपुर)
    • बिहार (गम्हरिया)
    • झारखंड (बरही)
    • पश्चिम बंगाल (रघुनाथपुर)
    • हरियाणा (साहा)

चेन्नई बेंगलुरु इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (CBIC)

  • गलियारे के लिए समग्रपरिप्रेक्ष्य योजना पूरी हो चुकी है और विकास के लिए तीन नोड्स की पहचान की गई है:
    • कृष्णापटनम (आंध्र प्रदेश)
    • तुमकुरु (कर्नाटक)
    • पोंनेरी (तमिलनाडु)
  • आंध्र प्रदेश में कृष्णापटनम नोड में परियोजना के निष्पादन के लिए एक एसपीवी को निगमित किया जा चुका है। विस्तृत मास्टर प्लानिंग और प्रारंभिक इंजीनियरिंग गतिविधियों का अंतिम प्रारूप तैयार कर किया गया जिसे NICDIT ने 30 अगस्त, 2019 को हुई बैठक में परियोजना प्रस्ताव पर विचार कर और आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) से अंतिम अनुमोदन के लिए भेज दी।

विजाग चेन्नई औद्योगिक गलियारा (VCIC)

  • आंध्र प्रदेश सरकार (GoAP) 631 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ADB ऋण के साथ VCIC परियोजना को लागू कर रही है। एशियाई विकास बैंक (ADB) ने VCIC के लिए प्रारंभिक परियोजना विकास गतिविधियों को अंजाम दिया है।
  • ADB ने विकास के लिए विशाखापत्तनम, चित्तूर, दोनाकोंडा और मछलीपट्टनम नामक चार नोड्स की पहचान की है। इनमें से विशाखापत्तनम और चित्तूर को आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा प्राथमिकता दी गई है।

बेंगलुरु मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (BMIC)

  • कर्नाटक में समग्र BMEC परियोजना और धारवाड़ नोड के लिए परिप्रेक्ष्य योजना पूरी कर ली गई है और इसके कार्यान्वयन के लिए धारवाड़ नोड (कर्नाटक) को प्राथमिकता नोड के रूप में पहचाना की गयी है।
  • महाराष्ट्र सरकार भूमि और पानी की समस्याओं के कारण नोड्स के गठन को अंतिम रूप नहीं दे पाई है।

औद्योगिक गलियारों की महत्ता

  • प्रगति के पहिये: औद्योगिक गलियारे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की अन्योन्याश्रयता को मान्यता देते हैं और उद्योग और बुनियादी ढांचे का प्रभावी एकीकरण करते हैं जिससे समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास होता है। औद्योगिक गलियारे अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे बने होते है; जैसे उच्च गति परिवहन (रेल/सड़क) नेटवर्क, उन्नत कार्गो हैंडलिंग उपकरण के साथ बंदरगाह, आधुनिक हवाई अड्डों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों/औद्योगिक क्षेत्रों, लॉजिस्टिक पार्क आदि | ये उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से बनाये गए होते है।
  • विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा: इन गलियारों में से प्रत्येक में विनिर्माण एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि होगा और इन परियोजनाओं कासमग्र जीडीपी में, विनिर्माण का हिस्से को बढ़ाने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कॉरिडोर के किनारे स्मार्ट औद्योगिक शहर विकसित किए जा रहे हैंजो विनिर्माण और नियोजित शहरीकरण को बढ़ावा देगा।
  • बड़े पैमाने पर रोजगार: औद्योगिक गलियारा औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने के इरादे से बनाये जा रहे है | यह विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की नौकरियों) करने में सक्षम है।
  • राज्यों की आर्थिक वृद्धि: यह परियोजना रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा देगा |राज्य के बाहर कार्य कर रहे युवा श्रम शक्ति (कुशल एवं अकुशल) को अपने राज्य में कार्य करने के लिए आकर्षित करेगा| इस परियोजना से राज्यों की समग्र आर्थिक वृद्धि और इसकी रोजगार सृजन को स्थायी मोड पर लाया जा सकता है।
  • लॉजिस्टिक लागत को कम करना: औद्योगिक गलियारा मल्टी-मोडल परिवहन सेवा उपलब्ध कराता है जो मुख्य धमनी के रूप में राज्यों से होकर गुजरेगी। इस मुख्य धमनी के दोनों किनारों पर स्थित औद्योगिक और राष्ट्रीय विनिर्माण और निवेश क्षेत्र (NMIZ) से माल को रेल और सड़क फीडर लिंक के माध्यम से औद्योगिक गलियारे में लाया जाएगा जो लास्ट मील कनेक्टिविटी प्रदान करेगा। इससे लॉजिस्टिक्स की लागत कम होगी और कंपनियां ‘कोर कम्पटीशन’ पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।
  • मेक इन इंडिया का प्रोत्साहन: मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों को देश के आगामी औद्योगिक गलियारों को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आकर्षित होंगे और देश की आर्थिक वृद्धि होगी।
  • सामाजिक एकता में वृद्धि: गलियारे लोगों को घरों के करीब रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं और उन्हें दूर-दूर के स्थानों पर नहीं जाना पड़ता है, जिससे एक संस्था के रूप में परिवार का संरक्षण होता है। अंततः इससेदेश में सामाजिक एकीकरण भी बढ़ेगा।

 

औद्योगिक गलियारों के विकास को चुनौती

भूमि अधिग्रहण

  • भूमि अधिग्रहण राज्य का विषय है, और गलियारे में भूमि अधिग्रहण एक प्रमुख मुद्दा रहा हैं, जिससे परियोजना कार्यान्वयन में देरी हुई है। चूंकि औद्योगिक गलियारा राज्य के बीच से होकर गुजरेगी, इसलिए कानूनी बाधाओं और मुआवजे की राशि के विवाद के कारण भूमि का अधिग्रहण धीमा हो गया है।
  • औद्योगिक गलियारे में बड़े पैमाने पर निवेश, मानव विस्थापन और उपजाऊ कृषि भूमि के औधोगिक कार्य में विपथन जैसे समस्याओं को जन्म देगा |इससे देश में खाद्य सुरक्षा और अन्य विभिन्न सामाजिक समस्याओं के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।

परियोजना अनुमोदन में देरी

  • भारत में किसी भी औद्योगिक गतिविधि के लिए अवधारणा से लेकर आयोग तक कई मंजूरी की आवश्यकता होती है और औद्योगिक गलियारा इसके अपवाद नहीं है।

नीतिगत अड़चनें

  • कंबोडिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे पड़ोसी देशों की तुलना में भारत में बहुत अधिक कॉर्पोरेट कर की दर है। यह प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत को एक अनाकर्षक निवेश गंतव्य बनाता है।
  • इसके अलावा, भारत में आयात शुल्क की दर अधिकहै, जो वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को स्थापित करने के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति बनती है।

आगे की राह

  • औद्योगिक गलियारों की रणनीति एक स्वस्थ औद्योगिक आधार विकसित करने के लिए जरुरी है, जिससे उत्कृष्ट बुनियादी ढांचे का विकास और विनिर्माण की स्वाभाविक वृद्धि होगी। हालाँकि, यह सब केवल आलंकारिक ही रहेगा अगर औद्योगिक गलियारे की परियोजनाओं के मुद्दों का समाधान नहीं किया जाता है।
  • इसके लिए सभी सरकारी विभागों और हितधारकों को समग्र दृष्टिको के साथ भागीदारी की आवश्यकता है जो जमीन अधिगृहित किये गए किसानों ,उत्पादनके लिए इकाइयां स्थापित करने वाले निर्माता,परिवहन ऑपरेटरों आदि को शामिल करता हो ।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय भारत को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह

कैबिनेट की जहाज पुनर्चक्रण विधेयक-2019 को मंजूरी


  • 20 नवंबर, 2019 कोकेंद्र ने जहाज पुनर्चक्रण विधेयक, 2019 (Recycling of Ships Bill, 2019)के साथ-साथ हांगकांग इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर सेफ एंड एनवायरनमेंटली साउंड रीसाइक्लिंग शिप्स, 2009 के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
  • 13 दिसंबर, 2019 को भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद यह अधिनियम बन गयाहै |
  • हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन को जहाज पुनर्चक्रण विधेयक, 2019 के विभिन्न प्रावधानों द्वारा लागू किया जाएगा |

लक्ष्य

  • भारत में जहाजपुनर्चक्रण उद्योग को बढ़ावा देना |

विधेयक की जरूरत

  • भारत वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण उद्योग में25% से अधिक की हिस्सेदारी रखताहै जोविश्व में सर्वाधिक है। लेकिन यह उद्योग श्रमिकों की सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण की चिंता जैसे मुद्दों से ग्रस्त है।

मुख्य विशेषताएं

रीसाइक्लिंग सुविधाओं का प्राधिकरण

  • विधेयक के तहत, जहाज पुनर्चक्रण सुविधाओं को प्रदान करने वाले संस्थानों को अधिकृत(Authorized)होना होगा और जहाजों को केवल ऐसे अधिकृत जहाज पुनर्चक्रण सुविधाओं(facilities) में हीजहाजों कापुनर्नवीनीकरण किया जाएगा।

जहाज-विशिष्ट पुनर्चक्रण योजना

  • विधेयक यह भी प्रावधान करता है कि जहाजों को एक जहाज-विशिष्ट पुनर्चक्रण योजना के अनुसार पुनर्नवीनीकरण किया जाएगा। भारत में पुनर्नवीनीकरण किए जाने वाले जहाजों को हांगकांग कन्वेंशन (एचकेसी) के अनुसार ‘तैयार पुनर्चक्रण प्रमाण पत्र’ (Ready to Recycling Certificate) प्राप्त करने की आवश्यकता होगी।

खतरनाक सामग्री पर प्रतिबंध

  • यह खतरनाक सामग्री के उपयोग या स्थापना को प्रतिबंधित करता है, जो इस बात पर ध्यान दिए बिना लागू होता है कि कोई जहाज रीसाइक्लिंग के लिए है या नहीं। जहाजों में प्रयुक्त खतरनाक सामग्री की सूची पर जहाजों का सर्वेक्षण और प्रमाणित किया जाएगा।

मौजूदा जहाजों के लिए ग्रेस पीरियड

  • नए जहाजों के लिए, खतरनाक सामग्री के उपयोग पर इस तरह का प्रतिबंध तत्काल होगा, अर्थात, जिस दिन से यह कानून लागू होता है, जबकि मौजूदा जहाजों के अनुपालन के लिए पांच साल की अवधि होगी।
  • हालांकि, खतरनाक सामग्री के उपयोग पर प्रतिबंध सरकार द्वारा संचालित युद्धपोतों और गैर-वाणिज्यिक जहाजों पर लागू नहीं होगा।

प्रभाव

  • जहाज पुनर्चक्रण उद्योग को नियमित करना: विधेयक अंतरराष्ट्रीय मानकों को निर्धारित करता है और ऐसे मानकों के प्रवर्तन के लिए वैधानिक तंत्र को स्थापित करता है | जिससे की जहाज पुनर्चक्रण उद्योग का विनियमन के माध्यम से विकास हो सके।

 

हांगकांग इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर सेफ एंड एनवायरनमेंटली साउंड रीसाइक्लिंग शिप्स

  • इसे हांगकांग कन्वेंशन (HKC) के रूप में भी जाना जाता है, जिसे मई 2009 में हांगकांग में आयोजित एक राजनयिक सम्मेलन में अपनाया गया था।
  • यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के सदस्य देशों और गैर-सरकारी संगठनों के इनपुट के साथ और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन एवं बेसेल कन्वेंशन ऑन द कण्ट्रोल ऑफ ट्रांसबाउंड्री मूवमेंट्स ऑफ हजार्ड वेस्ट्स एंड देयर डिस्पोजल के सहयोग के साथ विकसित किया गया था।
  • कन्वेंशन अभी लागूहोना है क्योंकि यह 15 देशों द्वारा पुष्टि नहीं की गई है, जो सकल टन भार (क्षमता) द्वारा विश्व व्यापारी शिपिंग के 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते है और वार्षिक जहाज रीसाइक्लिंग मात्रा के अनुसारदेशों के संयुक्त टन भार के 3 प्रतिशत से कम न हो।
  • अब तक, नॉर्वे, कांगो, फ्रांस, बेल्जियम, पनामा, डेनमार्क, तुर्की, नीदरलैंड, सर्बिया, जापान, एस्टोनिया, माल्टा, जर्मनी और भारत ने सम्मेलन में भाग लिया है।

लक्ष्य

  • वर्तमान जहाज तोड़ने के व्यवसायों के स्वास्थ्य और सुरक्षा में सुधार करना,
  • मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना |

महत्ता

  • एक बार प्रभाव में आने के बाद, यह जहाज रीसाइक्लिंग स्थानों में काम करने वाले लोगों के स्वस्थ्य और पर्यावरण के स्थिति की चिंताओं को दूर करने में मदद करेगा।
  • यह खतरनाक पदार्थों जैसे एस्बेस्टस, भारी धातु, हाइड्रोकार्बन, ओजोन क्षरण वाले पदार्थ और अन्यप्रमुख मुद्दों को पता लगाने में मदद करेगा, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

भारत के लिए लाभ

  • जहाज पुनर्चक्रण उद्योग कोप्रोत्साहन: HKC में शामिल होनेसे पुनर्चक्रण उद्योग को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि जापान, कोरिया जैसे देशों से अधिक जहाजों को पुनर्नवीनीकरण करने के व्यवसाय प्राप्त हो सकेंगे। वर्तमान में, बहुत से देश भारतीय जहाज-निर्माण उद्योग पर पर्यावरण और सुरक्षा संबंधित मुद्दों को उठाते हैं।
  • निवेश के अवसर: जहाज पुनर्चक्रण में वैश्विक खिलाड़ी होने के नाते, इस कदम से वैश्विक धनराशि भारत के जहाज-पुनर्चक्रण केंद्रों में आ सकेगी।
  • जहाजों की हरित पुनर्चक्रण: यह भारत को पुनर्चक्रण उद्योगों में अपनाई जाने वाली सर्वोत्तम प्रथाओं को लाने में मदद करेगा, यह सुनिश्चित करेगा कि जहाजों को पर्यावरण के अनुकूल और जिम्मेदार तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए।

 

भारत में जहाज पुनर्चक्रण उद्योग में मुद्दे

सुरक्षा के मुद्दे

  • ऐसे किन्द्रों में आमतौर पर व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की कमी होती है औरयदि होती भी है तो उनको उपयोग करने काप्रयाप्त प्रशिक्षणनहींदिया गया होता है। अपर्याप्त सुरक्षा नियंत्रण औरनिगरानी एवं विस्फोटों का उच्च जोखिम खतरनाक काम की स्थिति पैदा करता है।
  • मानक के बारे में मानदंडों के अभाव के कारण जोखिम को कम करने या खत्म करने के उपायों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और अंततः दुर्घटनाएं होती हैं।
  • कार्य प्रक्रियाओं के समन्वय का अभाव, सुविधाओं की अनुपस्थिति और सुरक्षा नियंत्रण की अनुपस्थिति जोखिम का कारण है जो शारीरिक चोटों का कारण बनती है।
  • श्रमिक की मृत्यु के लिए किसी भी यार्ड के मालिक को कभी भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता है जो इस मुद्दे के निराकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है |

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं

  • जहाज तोड़ने वाले समुद्र तटों पर, एस्बेस्टस और फाइबर खुली हवा में चारों ओर उड़ते हैं, और श्रमिक अपने नंगे हाथों से एस्बेस्टस इन्सुलेशन सामग्री निकालते हैं। जहाजों के कई हिस्सों में पाए जाने वाले अन्य भारी धातुओं (जैसे पेंट, कोटिंग्स, एनोड और बिजली के उपकरण से) के संपर्क में आने से कैंसर हो सकता है और रक्त वाहिकाओं को भी नुकसान हो सकता है।
  • श्रमिक दूषित कीचड़ में धंसे हुए भारी धातुओं और जहरीले पेंट कणों में अपना पूरा दिन बिताते हैं ।
  • श्रमिकों की स्वास्थ्य सेवाओं और आवास तक बहुत सीमित पहुंच होती है, कल्याण और सैनिटरी सुविधाओं के कमी श्रमिकों की दुर्दशा को और बढ़ा देती हैं। एक जहाज को तोड़ने वाली जगह पर तैनात हजारों कर्मचारियों के बावजूद, शायद ही किसी भी स्थल पर डॉक्टरों की उपस्थिति या क्लीनिककी व्यवस्था होती है।

अपशिष्ट प्रबंधन के मुद्दे

  • जहाज पुनर्चक्रण उद्योग द्वारा उत्पन्न कचरे को मोटे तौर पर खतरनाक और गैर-खतरनाक कचरे में वर्गीकृत किया जा सकता है। खतरनाक कचरे की प्रवाह में एस्बेस्टस, पॉलीक्लोराइनेटेड बिपेनिल (पीसीबी), पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच), टेंजाइलेटिन टीबीटी, भारी धातुएं आदि शामिल हैं।
  • ठोस कचरे के अलावा, एयर कंडीशनिंग सिस्टम से अमोनिया, क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) जैसी गैसें और तेल टैंकरों की पाइपलाइनों में ज्वलनशील गैसें मौजूद हो सकती हैं। हालांकि ये अपशिष्ट जहाज के कुल डेड वेट कालगभग 1% होते हैं, परन्तुइनसे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए एक बड़ा जोखिम होता है।

पर्यावरण के मुद्दें

जल प्रदूषण

  • जल निकाय, मुख्य रूप से समुद्री वातावरण, निलंबित ठोस पदार्थों, नाइट्रेट्स, फॉस्फेट, भारी धातुओं, तेल और जहाज के तल में एकत्र गन्दा पानी से प्रदूषित हो जाता है।
  • तेल फैल जाता है, भारी धातुएँ जैसे सीसाऔरपारा जैसे टेंजेनिल्टिन (टीबीटी) समुद्री पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा बनते हैं जिसमें पक्षी और स्तनधारी, ज़ूप्लांकटन, फाइटोप्लांकटन, आदि शामिल हैं।

मृदा प्रदूषण

  • पेंट चिप्स, एस्बेस्टस फाइबर और पॉलीक्लोराइनेटेड बाइफिनाइल्स (पीसीबी) में पाए जाने वाले भारी धातु (सीसा, कैडमियम) जहाज पुनर्चक्रण स्थल के आसपास फैल जाते है जिससे मिट्टी के दूषित होने के संभावना बनीरहती हैं।

वायु प्रदूषण

  • जहाज पर पेंट और अन्य प्रकार की कोटिंग आमतौर पर ज्वलनशील होते हैं और इसमें पीसीबी, भारी धातु (जैसे सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, जस्ता और तांबा) जैसे जहरीले यौगिक और टीबीटी जैसे कीटनाशक होते हैं।
  • जब रबर पाइप और अन्यगैर-पुनर्नवीनीकरण पदार्थों को खुली हवा में जला दी जाती हैतबइनसे जहरीले धुएं उत्पन्न होते है | इनसे संभवतः डाइऑक्सिन, फुरेंस और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) उत्पन्न होते हैं ।
  • जहाज की स्ट्रिपिंग के दौरान उत्पन्न सूक्ष्म कण,प्रशीतन प्रणाली से उन्मुक्त सीएफसी या अन्य रसायनों के रिसावके कारण वायु प्रदूषण बढ़ता है।

आगे की राह

  • भारत में जहाज पुनर्चक्रण उद्योग वैश्विक जहाज पुनर्चक्रण व्यवसाय का एक हिस्सा है।अन्य उद्योगों की तरह इस उद्योग मेंकई चुनौतियां और अवसर हैं। जहाज पुनर्चक्रणएक हरी प्रक्रिया (green process) है जिसमें पुराने एवं उपयोग में ना आने वाले जहाज से पुन: उपयोग किये जा सकने वाले भाग प्राप्त किया जाता है |लेकिन इस जटिल प्रक्रिया में श्रम सुरक्षा, स्वास्थ्यऔरपर्यावरण जैसे मुद्दे एवं चुनौतियां हैं जो आलोचना का विषय है।
  • इसके कमियों के बावजूद, सैद्धांतिक रूप से, शिपब्रेकिंग के कई लाभ हैं - यह प्राकृतिक संसाधनों के खनन की आवश्यकता को कम करके स्थायी विकास (sustainable development) को बढ़ावा देता है | यह स्टील के उत्पादन में योगदान देता है जो रोजगार सृजन में मदद करता है। इस उद्योग के भारत में प्रमुख आर्थिक गतिविधि होने की भरपूर संभावना है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय रैंकिंग, रिपोर्ट, सर्वेक्षण और सूचकांक

भारत में सड़क दुर्घटनाओं पर वार्षिक रिपोर्ट - 2018


  • 19 नवंबर, 2019 कोसड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने भारत में सड़क दुर्घटनाओंपर वार्षिक रिपोर्ट-2018 को जारी किया।
  • यह सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के परिवहन अनुसंधान विंग द्वारा प्रकाशित एक वार्षिक प्रकाशन है जो राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के पुलिस विभागों द्वारा प्रदान की गई जानकारी के आधार पर दुर्घटनाओं, संबंधित मौतों और घायलों काकैलेंडर-वार रिपोर्ट है।

प्रमुख निष्कर्ष

सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि

  • 2018 के दौरान देश में सड़क दुर्घटनाओं में 46% की वृद्धि हुई है।
  • देश में 2018 में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगों की संख्या एक साल पहले के मुकाबले 4% बढ़कर 1.5 लाख से अधिक पहुंच गई जो पूर्व वर्ष में1.47 लाख थी ।

दुर्घटनाओं की वार्षिक वृद्धि दर घटाना

  • 2010-2018 की अवधि में सड़क दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों की संख्या की मिश्रित सालाना वृद्धि दर में काफी गिरावट आई जो ऑटोमोबाइल के विकास की बहुत उच्च दर के बावजूद, पिछले दशकों की तुलना में कम है।

राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग दुर्घटनाएं

  • कुल सड़क दुर्घटनाओं का 2 प्रतिशत और 2018 में 35.7 प्रतिशत मौतों का कारण राष्ट्रीय राजमार्गहै।
  • 2 प्रतिशत और 26.8 प्रतिशत क्रमशः दुर्घटनाओं और मौतों का कारणराज्य राजमार्ग है।

सड़क उपयोगकर्ता दुर्घटना का प्रकार

  • सड़क उपयोगकर्ता के प्रकार से दुर्घटनाओं के शिकार के संदर्भ में, पैदल चलने वालों की संख्या 15% थी, जबकि साइकिल चालकों और दोपहिया वाहन चालकों की हिस्सेदारी क्रमशः 4% और 36.5% थी।
  • इसश्रेणी क साथ दुर्घटनाओं में शिकार लोगों का 9% है और वैश्विक रुझानों के अनुरूप सबसे असुरक्षित श्रेणी हैं।

आयु-समूह संबंधी दुर्घटनाएं

  • 2018 के दौरान, 18 से 45 वर्ष के युवा वयस्क लगभग 69.6 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओंसेपीड़ित थे।
  • कुल सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों में 18-60 के कामकाजी आयु समूह की हिस्सेदारी 84.7 प्रतिशत थी।

पुरुष अधिक दुर्घटना के लिए प्रवण

  • कुल दुर्घटना मौतों की संख्या में पुरुषों की हिस्सेदारी 86% थी जबकि 2018 में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% थी।

राज्य का परिदृश्य

  • तमिलनाडु राज्य ने 2018 में सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाओं को दर्ज किया, जबकि 2018 में मारे गए सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश राज्य में थे।


स्रोत:
द हिंदू

 

सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण

तेज गति

  • 64 प्रतिशत सड़क मौतों के लिहाज से यह भारत में सड़कों पर मौतों का सबसे आम कारण है।

शराब पी कर गाड़ी चलाना

  • भारत में सड़क दुर्घटनाओं का एक और आम कारण है। हालांकि, 2017 से 2018 के बीच नशे में ड्राइविंग के मामलों में 14 प्रतिशत की कमी आई है।

सुरक्षा उपकरणोंके उपयोग नहीं

  • हेलमेट और सीटबेल्ट जैसे सुरक्षा उपकरणों का उपयोग न करने से दुर्घटनाएं नहीं होती हैं, जो सड़क दुर्घटना में घातक और गंभीर चोटों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

ट्रैफिक कानूनों का खराब प्रवर्तन

  • भारत के यातायात कानून अन्य देशों की तुलना में सख्त हैं लेकिन ये कानून ठीक ढंग से लागू नहीं होते हैं।
  • वैश्विक सड़क सुरक्षा रिपोर्ट 2018 के अनुसार गति और नशे में ड्राइविंग पर कानूनों का प्रवर्तन चीन मेंक्रमशः8 और 9(10 में से)वहीँ भारत में क्रमशः3 और 4 (10 में से) है।

ख़राब सड़क का बुनियादी ढांचा

  • भारत के ग्रामीण के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में खराब निर्माण वाली सड़कों की समस्या लंबे समय से है। देश में बढ़ती दुर्घटनाओं, मौतों एवं स्वास्थ्य समस्याओं के लिए गड्ढे, निर्माणाधीन सड़कें, सड़कों पर खराब स्पीड ब्रेकर और सड़कों पर नीचे-बाहर जलनिकासी प्रणाली तथाअसंगत चेतावनी के संकेत आदि कारण हैं।

अधिक लदान

  • वाहन अधिक लदान भारत में दुर्घटनाओं का एक और प्रमुख कारण है जो गंभीर दुर्घटना का खतरा बना हुआ है, खुद को और अन्य सड़क उपयोगकर्ताओं को खतरे में डाल रहा है।

मौसम

  • प्रतिकूल मौसम जैसे कि भारी बारिश, घना कोहरा और ओलावृष्टि दोनों ही सड़क की सतह की स्थिति और मोटर चालक की दृश्यता को प्रभावित करते हैं, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।

सड़क सुरक्षा के प्रति सरकार की पहल

मोटर वाहन संशोधन अधिनियम- 2019

  • मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम -2019, जो मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में संशोधन करता है, 1 सितंबर, 2019 से लागू हुआ।
  • अधिनियम का उद्देश्य सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में सुधार लाना, नागरिक सुविधाओं को बढ़ाना, सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से भ्रष्टाचार को कम करना,पारदर्शिता लानातथा बिचौलियों को दूर करना है।
  • यह अधिनियम सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने, रक्षा करने और बीमा एवं क्षतिपूर्ति व्यवस्था में सुधार लाने में मदद करेगा।

राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति -2017

  • यह विभिन्न नीतिगत उपायों को रेखांकित करता है, जैसे- जागरूकता को बढ़ावा देना, सुरक्षित परिवहन के लिए बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहित करना, जिसमें बुद्धिमतापूर्ण परिवहन का उपयोग, सुरक्षा कानूनों का का अनुपालन आदि शामिल हैं।

 

शमन के उपाय

शिक्षा और जागरूकता के उपाय

  • यह मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के माध्यम से सड़क सुरक्षा जागरूकता और विनियमन के प्रसार पर निर्भर करता है।
  • सड़क सुरक्षा को एक सामाजिक आंदोलन बनाने के लिए मंत्रालय कई प्रयास कर रहा है। सरकार ने टीवी, रेडियो, सिनेमा पर प्रसारण करने, सड़क सुरक्षा संदेशों के साथ कैलेंडर प्रिंट करने के साथ-साथ सड़क उपयोगकर्ताओं (पैदल यात्री, साइकिल चालक, स्कूली बच्चे, भारी वाहन चालक आदि) के लिए संदेश के साथ सड़क सुरक्षा पर सेमिनार और प्रदर्शनियों का आयोजन एवं प्रचार कर रही हैं।

इंजीनियरिंग (सड़क और वाहन दोनों) उपाय

  • राजमार्गों पर दुर्घटनाप्रवण स्थानोंकी पहचान और सुधार को उच्च प्राथमिकता दी गई है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर इंजीनियरिंग उपायों के माध्यम से सड़क सुरक्षा में सुधार के लिए ठोस प्रयास किए गए हैं।

सड़क सुरक्षा ऑडिट

  • राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क सुरक्षा ऑडिट करने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश अधिसूचित किए गए हैं। विभिन्न चरणों में सड़क सुरक्षा ऑडिट को इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (ईपीसी) और बिल्ड, ऑपरेट, ट्रांसफर (बीओटी) मोड पर सभी सड़क विकास परियोजनाओं का हिस्सा बनाया गया है।

सड़क सुरक्षा कानूनों का उचित प्रवर्तन

  • मोटर वाहन संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम सेसरकार यातायात नियमों का बेहतर कार्यान्वयन एवं लागू करने को सुनिश्चित करना चाहती है, जो सड़क सुरक्षा और दुर्घटना शमन उपायों के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं।

आगे की राह

  • देश में सड़क नेटवर्क, मोटर गाड़ियों के सज्जीकरणऔर शहरीकरण में विस्तार के साथ सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है, जो सड़क पर होने वाली चोटों और घातकताओं के लिए एक प्रमुख मुद्दा है और भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य के चिंता का विषय है।
  • जबकि भारत के पास विश्व के 3 प्रतिशत से कम वाहन हैं, यह विश्व की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु के लगभग 12 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।
  • सड़क दुर्घटनाओं से युक्त एक बहु-क्षेत्रीय प्रयास की आवश्यकता है जिसमें कानून प्रवर्तन, प्रशासन, (ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण का मुद्दा), इंजीनियरिंग (उपयुक्त सड़क डिजाइन) जागरूकता बढ़ाने और दुर्घटना के बाद के पीड़ित के देखभाल और प्रबंधन शामिल हैं।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय आदिवासियों से संबंधित मुद्दे

मिजोरम में वन अधिकार अधिनियम निरस्त


  • 19 नवंबर, 2019 कोमिजोरम सरकार ने अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) के कार्यान्वयन को रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया।
  • मिजोरम ने 29 अक्टूबर, 2009 को अधिनियम को लागू करने का प्रस्ताव पारित किया था। यह अधिनियम राज्य में 21 दिसंबर, 2009 से लागू हुआ है।
  • अनुच्छेद 371 (जी) के तहत प्रदान किये गए विशेष प्रावधानों का उपयोग करते हुए, राज्य सरकार ने एफआरए को रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया।

निरस्त करने का कारण

  • मिजोरम सरकार ने आरोप लगाया कि एफआरए,अनुच्छेद 371 (जी) के तहत राज्य कोप्राप्त विशेष दर्जा का सीधे अतिक्रमण करता है |
  • राज्य सरकार के अनुसार,2014-15 से केंद्र सरकार FRA के कार्यान्वयन के लिए धन प्रदान नहीं कर रही है। 8 अप्रैल, 2015 को आयोजित अपनी परियोजना मूल्यांकन समिति की बैठक में केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने राज्य में अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए राज्य के 10 लाख रुपये के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था जिसके बाद राज्य को इस मद में सहायता नहीं मिली है।

अनुच्छेद 371 (जी)

  • संविधान का अनुच्छेद 371 (जी) मिजोरम राज्य को विशेष दर्जा देता है |इसके अनुसार, संसद मिज़ो के धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं, भूमि के नागरिक और आपराधिक कानून, भूमि स्वामित्व हस्तांतरण, और प्रथागत के मामलों पर राज्य विधानसभा की सहमति के बिना कानून प्रक्रिया पर निर्णय नहीं ले सकती है।
  • 1986 में केंद्र और तत्कालीन भूमिगत मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) के बीच ऐतिहासिक मिजो समझौते पर हस्ताक्षर हुआ जिसके बाद यह प्रावधान लागू हुआ।
  • यह इस संविधान में मिजोरम राज्य के संबंध में विशेष प्रावधान प्रदान करता है,

(a) संसद द्वारा बनाया गयाकोई भी नियम मिजोरम राज्य पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक की राज्य की विधानसभा ऐसा करने का निर्णय न करे -

i.मिज़ो की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएं

ii.मिजो प्रथागत कानून और प्रक्रिया

iii.मिजो प्रथागत कानून के अनुसार निर्णय लेने वाले नागरिक और आपराधिक न्याय का प्रशासन

iv.भूमि का स्वामित्व और हस्तांतरण |

(b) मिजोरम राज्य की विधान सभा में चालीस से कम सदस्य नहीं होंगे |

  • भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा 2017 की राज्य वन रिपोर्ट के अनुसार, मिज़ोरम में कुल 5,641 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का लगभग 20 प्रतिशत अवर्गीकृत वन के रूप में है जो स्वायत्त ज़िला परिषदों के अधीन है।(नोट:राज्य में वनों का एक बड़ा हिस्सालाई, मारा और चकमा स्वायत्त ज़िला परिषदों के स्वामित्व में है।)
  • वनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जो पारंपरिक रूप से नियंत्रित और प्रबंधित समुदाय द्वारा प्रबंधित होते हैं, वे अवर्गीकृत वन की श्रेणी में आते हैं।
  • सभी उत्तर पूर्वी राज्यों में मिज़ोरम में अवर्गीकृत वन का क्षेत्र सबसे कम है, जिसमें कहा गया है कि एफआरए कार्यान्वयन की क्षमता भी राज्य में सबसे अधिक है।

प्रभाव

  • मिज़ोरम राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा वनाच्छादित है तथा उस भूमि पर विभिन्न समुदायों का स्वामित्त्व है,एफआरए को निरस्त करने का एक अर्थ वन भूमि को वन विभागों के पास रखना है जिसे बाद में किसी अन्य उद्देश्य के लिए प्रयोग किया सकता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, हाशिए पर पड़ेसामाजिक-आर्थिक वर्ग का वन एवं वन-उत्पादों पर अधिकार को मान्यता देता है |
  • इसके साथ ही यह अधिनियम उपरोक्त अधिकारएवं पर्यावरण की रक्षाके बीच संतुलन को भी स्थापित करता है |

एफआरए के तहत प्रदान किए गए विशेष अधिकार

व्यक्तिगत वन अधिकार

  • अनुसूचित जनजाति से संबंधित कोई भी व्यक्ति चार हेक्टेयर तक रहने और खेती करने केअधिकार का दावा कर सकता है बशर्ते कि उसने उस पर कब्जा कर लिया हो और 13दिसंबर 2005 तक उस पर निर्भर रहा हो।
  • इस आवश्यकता के अतिरिक्त, गैर-आदिवासी के मामले में, उसे दिसंबर 2005 से पहले 75वर्षों के लिए वन भूमि के आसपास के क्षेत्र में अपने परिवार के निवास को साबित करनाहोगा।

सामुदायिक वन अधिकार

  • यह अधिनियम देहाती समुदायों के मामले में वन भूमि की पारंपरिक सीमाओं के भीतर वनभूमि पर ग्राम सभा के अधिकारों को मान्यता देता है। यह ग्रामीणों को लकड़ी के अलावामामूली वन उपज का संग्रह और उपयोग और निपटान करने के साथ ही अन्यलोगों को भूमि और जल निकायों का उपयोग करने की भी अनुमति देताहै।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकार

  • यह अधिकार ग्राम सभा को अपने जंगल की सुरक्षाऔर प्रबंधन का अधिकार देता है। कोई भी परियोजना जंगल में नहीं आ सकती है और न हीग्राम सभा की मंजूरी के बिना जंगल के लिए कोई संरक्षण योजना बनाई जा सकती है।

 

अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया

  • वन अधिकार समिति से सूचना प्राप्त होने पर, वन और राजस्व विभागों के अधिकारी दावों के सत्यापन के दौरान मौजूद रहेंगे और उनके पदनाम, तिथि और टिप्पणियों के साथ हस्ताक्षर करेंगे।
  • वन या राजस्व विभागों के प्रतिनिधि के फील्ड सत्यापन के दौरान अनुपस्थितहोने के आधार पर दर्ज आपत्ति की स्थिति मेंग्राम सभा द्वारा फिर से सत्यापन किया जाएगाऔर यदि प्रतिनिधि फिर से सत्यापन प्रक्रिया में भाग लेने में विफल रहते हैं, तो फील्ड सत्यापन पर ग्राम सभा का निर्णय अंतिम होगा।

एफआरए का महत्व

अधिनियम सुरक्षित करता है -

  • सामुदायिक अधिकार या उनके व्यक्तिगत अधिकारों के अलावा समुदायों केसंसाधनों पर सामान्य संपत्ति अधिकार को,
  • सभी वन गांवों, पुरानी बस्ती, गैर-सर्वेक्षण किए गए गांवों और जंगलों के अन्य गांवों को विवादित भूमि पर निपटानऔरअधिकार को मान्यता प्रदान करता है | साथ ही ऐसे गांवों को राजस्व गांवों में बदलने का अधिकार,
  • किसी भी सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जनन या संरक्षण या प्रबंधन करने का अधिकार, जिसे समुदाय पारंपरिक रूप से स्थायी उपयोग के लिए संरक्षित करता रहा है।
  • जैव विविधता और सांस्कृतिक विविधता से संबंधित बौद्धिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान का अधिकार,
  • विस्थापित समुदायों के अधिकार,
  • विकासात्मक गतिविधियों पर अधिकार |

सामयिक खबरें राष्ट्रीय गरीबी और भूख

भारतीय पोषण कृषि कोष


  • देश में कुपोषण के खतरे को सामना करने के लिए18 नवंबर, 2019 को, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सह-अध्यक्ष बिल गेट्स के साथकेंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय (WCD)ने भारतीय पोषण कृषि कोष (BPKK) की शुरुआत की।

लक्ष्य

  • कृषि सहित बहु-क्षेत्रीयपरिणाम-आधारित ढांचे के माध्यम से महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण को कम करना,
  • प्राथमिक आहार प्रथाओं को बढ़ावा देना |

जरुरत

  • आधुनिक खानपान के तरीके में वृद्धि: आधुनिक खानपान तरीके के परिणामस्वरूप कम पौष्टिक औद्योगिक और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों का सेवन बढ़ा है एवं पारंपरिक और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों के सेवनमें कमी हुई है, जिससे सभी आयु वर्ग में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में वृद्धि हुई है।
  • आहार विविधता में कमी: देश में आहार विविधता का अभाव है, जो प्रचलित कुपोषण के प्रमुख कारणों में से एक है।
  • चावल और गेहूं का वर्चस्व: पिछले कुछ दशकों में, अन्य सभी पोषण अनाज को निष्प्रभ कर केवल दो अनाज- चावल और गेहूं भारतीय आहार का मुख्य आधार रहा है।

BPKK के बारे में

  • WCD मंत्रालय और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के परामर्श से, परियोजना टीम लगभग 12 उच्च फोकस वाले राज्यों का चयन करेगी जो भारत की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और संरचनात्मक विविधताओं के प्रतिनिधि हैं।
  • प्रत्येक राज्य या राज्यों के समूह में परियोजना टीम एक स्थानीय साझेदार संगठन की पहचान करेगी, जिसके पास सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार (Social and Behaviour Change Communication-SBCC) एवं नक्‍शा तैयार करने के लिये पोषक आहारों का आवश्‍यक अनुभव होना चाहिए।
  • इसके अलावा, भारत को पोषण के मामले में सुरक्षित बनाने के लिए पांच-सूत्रीय कार्ययोजना प्रस्तावित किया गया है-
  • महिलाओं, गर्भवती महिलाओं तथा बच्‍चों के लिए कैलरी से भरपूर आहार सुनिश्चित करना,
  • महिलाओं और बच्‍चों में मुखमरी खत्‍म करने हेतु भोजन में समुचित मात्रा में दालों के रूप में प्रोटीन का शामिल किया जाना,
  • विटामिन ए, विटामिन बी, आयरन तथा जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी के कारण होने वाली गुप्त भूख को खत्‍म करना,
  • स्‍वच्‍छ पीने के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना,
  • 100 दिन से कम आयु के बच्‍चों वाले गांवों में महिलाओं को पोषण के बारे में जागरुक बनाना |
  • पांच सूत्री कार्य योजना विभिन्न सतत विकास लक्ष्यों (SDG) जैसे कि SDG-2 (शून्य भूख), SDG-3 (अच्छा स्वास्थ्य) और एसडीजी 6 (स्वच्छ जल व स्वच्छता) के साथ संरेखित करता है।

 

पोषण एटलस

  • पोषण अभियान के तहत सरकार के बहु-मंत्रालय अभिसरण मिशन के साथ2022 तककुपोषण मुक्त भारत की प्राप्ति सुनिश्चित करने की दृष्टि से मंत्रालय हार्वर्ड चान स्कूल ऑफपब्लिक हेल्थ और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ क्षेत्रीय आहार प्रथाओं का अध्ययन करेगा और भारत का पहला पोषण एटलस का विकास करेगा।

महत्त्व

  • पोषण एटलस देश के विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों और खाद्यान्नों का नक्शातैयार करेगा क्योंकि कुपोषण से निपटने का उपाय क्षेत्रीय फसल पैटर्न को बढ़ावा देने औरप्रोटीन से भरपूर स्थानीय खाद्य पदार्थों का सेवनकरने से दूर किया जा सकता है |
  • एटलस के माध्यम से प्राप्त जानकारी को सभी हितधारकों - किसानों, खाद्य आपूर्तिमध्यस्थों और उपभोक्ताओं के बीच कार्यान्वयन के लिए प्रसारित किया जाएगा।

महत्ता

  • मार्गदर्शक बल: यह मार्गदर्शक बल के रूप में कार्य करेगा, अभिभावकों और समुदायों को यह बताएगा कि क्या खिलाना है और क्या उपभोग करना है।
  • व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करना: हमारी फसल विविधता और पौष्टिक भोजन में क्षेत्रीय विविधताओं के बारे में जागरूकता और ज्ञान देश भर की मांग में परिवर्तन एवं व्यवहार परिवर्तन को प्रेरित करेगा, इसके साथ हीकिसानों और कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को उपभोक्ता जरूरतों को पूरा करने के अवसर प्रदान करेगा।
  • बेहतर परिणाम के लिए अलग-अलग सहयोग: इसके अलावा, परियोजना सरकार, अकादमिया, वैज्ञानिक समुदाय, निजी क्षेत्र और सांस्कृतिक समूहों को सहयोग का मंच प्रदान करती है | यह सामुदायिक स्तर पर लागू होने वाले स्थानीय, व्यावहारिक समाधान खोजने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाती है।

सामयिक खबरें अंतर्राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संधियां और समझौते

पेरिस समझौते से यूएसए बाहर


  • नवंबर 2019 के पहले सप्ताह में, ट्रम्प प्रशासन नेसंयुक्त राष्ट्र को पेरिस जलवायु समझौते से हटने कीऔपचारिक नोटिस दी।
  • यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के अनुसार, नोटिफिकेशन को देने के एक साल बाद निकासी प्रभावी होगी।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में सेविश्व का एकमात्र सदस्य देशहोगा जो अब समझौते का हिस्सा नहीं है।

पृष्ठभूमि

  • पेरिस समझौता के एक प्रावधान के कारण 2017 में ट्रम्प की घोषणा के बावजूदसमझौते से पीछे हटने के औपचारिक कदम के लिए इस वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। 2015कापेरिस समझौता4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ था |इसके लागू होने की तारीख से तीन साल तकपरिबंधन अवधि थी ।
  • अधिसूचना अमेरिका के समझौते से हटने के लिए औपचारिक एवं लंबी प्रक्रिया शुरू करती है। इसका मतलब यह होगा कि अमेरिका स्पेन के मैड्रिड में दिसंबर, 2019 में होने वाली चर्चाओं का हिस्सा बना रहेगा।

बाहर निकलने का कारण

  • अपने 2016 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान, डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था कि पेरिस समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका के हित के लिए अनुचित है।
  • वर्तमान सरकार का मानना ​​है कि पेरिस समझौता अमेरिकी प्रतिस्पर्धा को कम करता है और रोजगार और पारंपरिक ऊर्जा उद्योगों दोनों को प्रभावित करता है।
  • USA के इस कदम का नकारात्मक प्रभाव‘ग्रीन क्लाइमेट इनिशिएटिव’ के वित्तीयन पर पड़ेगा
  • शेल गैस के विकास के कारण, संयुक्त राज्य अमेरिका के कार्बन उत्सर्जन में पिछले वर्षों में कमी आई है, इसलिए USA महसूस करता है कि कठोर नियमों की बहुत आवश्यकता नहीं है।
  • पेरिस समझौता तभी सफल होगा जब सभी देश अपने आशयित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDCs) को पूरा करेंगे लेकिन जैसा कि समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, दूसरे देश लचीलेपन के कारण अबाध्यकारी लक्ष्य का लाभ लेंगे जबकि अमेरिका को गंभीर नियमों का सामना करना पड़ेगा।

 

पेरिस समझौता

  • पेरिस समझौता एक ऐतिहासिक पर्यावरणीय समझौता है जिसे जलवायु परिवर्तन और इसके नकारात्मक प्रभावों को दूर करने के लिए 2015 में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के 21वें सम्मेलन (CoP) में अपनाया गया था।
  • यह समझौता 4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ।
  • नवंबर 2019 तक, 195 UNFCCC के सदस्यों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, और 187 इसके लिए पार्टी बन गए हैं।

लक्ष्य

  • जलवायु परिवर्तन के खतरे के लिए वैश्विक अनुक्रिया को मजबूत करना |

महत्वपूर्ण बातें

  • पूर्व-औद्योगिक समय से 2.0oC (3.6oF) से नीचे वैश्विक तापमान रखना और उन्हें 1.5oC तक सीमित करने का प्रयास करना |
  • 2050 और 2100 के बीच की अवधि मेंमानव गतिविधि द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को उसी स्तर तक सीमित करना, जो पेड़, मिट्टी और महासागर प्राकृतिक रूप से अवशोषित कर सकते हैं |
  • हर पांच साल में उत्सर्जन में कटौती के लिए प्रत्येक देश के योगदान की समीक्षा करना |

    •    अमीर देशों के लिए जलवायु परिवर्तन और अक्षय ऊर्जा पर स्विच करने के लिए "जलवायु वित्त" प्रदान करके गरीब देशों की मदद करना।

 

पेरिस समझौते से बाहर निकलने हेतु एक देश के लिए प्रक्रिया

  • समझौते के अनुच्छेद 28 के अनुसार, कोई सदस्य समझौते में शामिल होने के तीन साल बाद औपचारिक तौर परबाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
  • निकासी की अधिसूचना के डिपॉजिटरी द्वारा स्वीकार की तारीख से एक वर्ष की समाप्तिपर, या इस तरह की बाद की तारीख पर निकासी की अधिसूचना में निर्दिष्ट किया हो, किसी भी तरह की निकासी प्रभावी होगी।

समझौते पर लौटने की यूएसए की संभावना

  • पेरिस समझौते से जुड़े किसी देश पर कोई रोक नहीं है, बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका को समझौते पर लौटने का अवसर प्रदान करता है।
  • समझौते के अनुच्छेद 21में कहा गया है कि एक देश जो समझौते के लिए एक पक्ष नहीं है, वह औपचारिक अधिसूचना प्रस्तुत करके इसमें शामिल हो सकता है, जो 30 दिन बाद प्रभावी होगा।
  • यूएसए के बाहर निकलने का प्रभाव
  • संयुक्त राज्य अमेरिका ग्रीनहाउस गैसों का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2005 के स्तर से वर्ष 2025 तक अपने उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत कम करने का वादा किया था।
  • यह कदम वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के विश्व के उद्देश्य को गंभीरता से खतरे में डाल सकता है।
  • जलवायु कार्यों को सक्षम करने के लिए वित्तीय प्रवाह पर सबसे बड़ा प्रभाव हो सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक स्तर पर वित्तीय संसाधनों को जुटाने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, और इसकी अनुपस्थिति उस प्रयास को गंभीरता से रोक सकती है।
  • हालांकि, पेरिस समझौते से हटने से, अमेरिका किसी उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बाध्यनहीं होगा है जो पेरिस समझौते का लक्ष्य कोप्राप्त करने के प्रयास को और अधिक कठिन एवं महंगा बना देगा।
  • अमेरिका के बाहरनिकलने का मतलब होगा कि अन्य देशों को ग्रीनहाउस उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए अपने प्रयासों को आगे बढ़ाना होगा। इसका मतलब सबसे बड़ा और तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक चीन और भारत जैसे विकासशील देशों पर दबाव बढ़ सकता है।

आगे की राह

  • अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए, अमेरिका के बाहर निकलने से अन्य सदस्य देशों से जलवायु के नेतृत्व का अवसर मिलता है। ऐतिहासिक रूप सेयूरोपीय संघ के साथ संयुक्त राज्य अमेरिकाअब तक रियो से पेरिस तक के जलवायु एजेंडे को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
  • भले ही संयुक्त राज्य अमेरिका भविष्य में पेरिस समझौते को फिर से लागू करे, बल्कि अन्य देश याद रखेगा कि संयुक्त राज्य अमेरिका नेवैश्विक समर्थन प्राप्त समझौते को छोड़ दिया था | एक विश्वसनीय अंतर्राष्ट्रीय साझेदार के रूप में अमेरिका की प्रतिष्ठा को पहले ही नुकसान हो चुका है जिसे सुधारने में लंबा समय लगेगा।
  • हालांकि, विकासशील देशों से कार्बन उत्सर्जन में तेजी से वृद्धि को देखते हुए, इन देशों से जलवायु नेतृत्व और कार्रवाई वैश्विक उत्सर्जन दर को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। दो सबसे अधिक आबादी वाले और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों - चीन और भारत से उत्साहजनक संकेत देखे जाते हैं, जो वर्तमान में अपने एनडीसी संकल्पों को प्राप्त करने पर कार्य कर रहे हैं।
  • पिछले कुछ वर्षों में, चीन ने अक्षय उर्जा के क्षेत्र में काफी कामयाबी प्राप्त की है | चीन की पवन और सौर ऊर्जा के क्षेत में सबसे अधिक स्थापित क्षमता है |इसने विश्व की सबसे बड़ी कार्बन ट्रेडिंग योजना पेश की है और विश्वसनीय एवं प्राप्त करने योग्य प्रतिबद्धताएं बनाईं। दूसरी ओर, भारत 2022 तक अपने 40% अक्षय ऊर्जा क्षमता के एनडीसी लक्ष्य को पूरा करने के राह पर है। इसने सौर ऊर्जा के दोहन के लिए 120 से अधिक देशों के अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) की शुरुआत की है और आने वाले वर्षों में वैश्विक जलवायु शासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अनुमान है।
  • अमेरिका के बाहर निकलने से शेष देशों के लिए सामूहिक रूप से समझौते को लागू करना और मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखाना महत्वपूर्ण है ताकि ग्रीन हाउस गैसों की उत्सर्जन लक्ष्यों को पेरिस समझौते के अनुरूप प्राप्त किया जा सके।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय भारतीय अर्थव्यवस्था

उच्च स्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी) रिपोर्ट


  • हाल ही में, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने उच्च स्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी) की रिपोर्ट जारी की।
  • मौजूदा वैश्विक व्यापार परिदृश्य में चुनौतियों और अवसरों का पता लगाने के लिए सुरजीत एस भल्ला के नेतृत्व में एचएलएजी का गठन सितंबर, 2018 में किया गया था।

सदस्य

  • सुब्रमण्यम जयशंकर, राजीव खेर, संजीव सान्याल, आदिल जैनुल भाई, हर्षवर्धन सिंह, शेखर शाह, विजय चौथावले, पुलोक घोष, जयंत दासगुप्ता, राजीव के लूथरा, चंद्रजीत बनर्जी।

उद्देश्य

  • वैश्विक परिदृश्य का आकलन करने और वैश्विक व्यापार एवं सेवाओं के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी और महत्व को बढ़ाने के लिए सिफारिशें प्रदान करना।
  • द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर दबाव का प्रबंधन करना और नई पीढ़ी के नीति निर्माण को मुख्य धारा में लाना।

प्रमुख सिफारिशें

निर्यात के लिए एक्जिम बैंक और क्रेडिट बीमा

  • एक्जिम बैंक के पूंजी आधार को 2022 तक अन्य 20,000 करोड़ रुपये से बढ़ाना और शेष पूंजी को निरंतर तरीके से बढ़ाना।
  • नेट स्वामित्व फंड में बैंक की उधार सीमा (वर्तमान सीमा 10 गुना है) को 20 गुना बढ़ाना।
  • निर्यात ऋण गारंटी निगम (ईसीजीसी) का पूंजीगत आधार 350 करोड़ रुपये तक बढ़ाना।
  • बीमा नियामक व विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) नियमों से ईसीजीसी को छूट।

प्रभावी कॉर्पोरेट कर दरों को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना

  • भारत को कॉर्पोरेट कर की दर को 22% (छूट के साथ) में कटौती करनी चाहिए। इससे 18% प्रभावी कॉर्पोरेट कर की दर प्राप्त होगी।

प्रतियोगियों के साथ पॉलिसी दर संरेखण

  • भारत को 10 सबसे अच्छे प्रदर्शन करने वाले ओईसीडी देशों की औसत पूंजी को कम करने का लक्ष्य रखना चाहिए।
  • नीति संचालन को अब प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की तकनीक को पूरी तरह से शामिल करना चाहिए।
  • रेपो दरों में सरकारी बचत योजनाओं की लिंक को फिर से स्थापित करना।

व्यापक निर्यात रणनीति बनाना

  • डेटाबेस जो विभिन्न एफटीए, आरटीए, सीईपीए आदि के उपयोग का विवरण देता है, तैयार करना।
  • 4-अंकीय हार्मोनाइज्ड सिस्टम (एचएस) स्तर पर वस्तुओं की पहचान के लिए बड़े डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करना जहां भारत को निर्यात लाभ होता है और इन उत्पादों में घरेलू प्रतिस्पर्धा का निर्माण होता है।

निवेश संवर्धन एजेंसी (निवेश भारत++) का सुदृढ़ीकरण

  • निवेश भारत को लाइसेंस जारी करने के लिए केंद्रीकृत प्राधिकरण बनाना और पूर्व-निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले मामलों में प्रोत्साहन देने के लिए इसे सशक्त बनाना।
  • डीजीएफटी, आईटीपीओ, टीसीपीआई के स्थान पर एक अलग इकाई के रूप में एक शीर्ष व्यापार संवर्धन संगठन बनाना।
  • एकल-खिड़की निस्तारण (सिंगल-विंडो क्लीयरेंस) को साधने के लिए एक विश्वस्तरीय ‘वॉर रूम’ बनाना।

मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वार्ताओं में सुधार

  • गैर-टैरिफ अवरोधों की पहचान करने और हल करने की प्रक्रिया शुरू करना, जो प्रमुख आयातक देशों तक भारतीय निर्यात को पहुंचने से रोकते हैं - उन प्रमुख देशों के साथ शुरू करना जिनके साथ भारत का एफटीए है।
  • बेहतर एफटीए में मदद करने के लिए पंसदीदा बाजारों में भारतीय उत्पादों की मूल्य प्रतिस्पर्धा का आकलन करने के लिए क्षेत्रीय विश्लेषण का मूल्यांकन करना।
  • पूरकता और दीर्घकालिक स्थिरता के आधार पर पहचाने गए एफटीए वार्ता के लिए पंचवर्षीय कार्यक्रम लांच करना।

एलीफैंट बांड जारी करना

  • एलीफैंट बांड जारी कर भारत के विदेशों में जमा काले धन का 500 बिलियन डॉलर तक प्राप्त किया जा सकता है।
  • अघोषित आय की घोषणा करने वाले लोग 20-30 वर्षों की अवधि के लिए 5% की कूपन दर के साथ 40% निवेश करने के लिए बाध्य होंगे। फंड का इस्तेमाल केवल अवसंरचना परियोजनाओं के लिए किया जाएगा।

वित्तीय सेवा क्षेत्र में सुधार

  • भारत के निधि प्रबंधन गतिविधि को संभालने के लिए विदेशी निवेश कोषों और व्यक्तिगत निवेशकों हेतु विनियामक एवं कर ढांचे को सरल बनाना।

भारत का आरसीईपी में शामिल होना जरूरी

  • पैनल भारत को क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) में शामिल होने के पक्ष में है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन द्विपक्षीय व्यापार युद्ध में लिप्त होने पर आरसीईपी जैसे मुक्त व्यापार क्षेत्र में शामिल होकर भारत और भी अधिक लाभान्वित हो सकता है।
  • यह रिपोर्ट प्रस्तावित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) के लिए वार्ता के साथ आगे बढ़ने के नरेंद्र मोदी सरकार के संकल्प को मजबूत करेगी।

 

सेक्टर विशिष्ट सिफारिशें

कृषि

  • मॉडल कृषि उपज और पशुधन विपणन अधिनियम, 2017 का कार्यान्वयन तेजी से किया जाना चाहिए।
  • चावल और अनाज के बजाय फलों और सब्जियों के निर्यात को बढ़ावा देना।
  • कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्र में एफडीआई को सुगम बनाना।
  • उर्वरक और कीटनाशक के उपयोग में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आकलन का निर्माण करना।

औषधीय, जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सकीय उपकरण

  • विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय को सक्षम बनाने के लिए औषधीय और जैव प्रौद्योगिकी पर एक सशक्त स्वतंत्र आयोग नियुक्त करना।
  • दवाओं / सौंदर्य प्रसाधनों से चिकित्सा उपकरणों का अलग से विनियमन।
  • संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में चिकित्सकीय उपकरणों के नियमन के लिए एकल मंत्रालय बनाना।
  • भारत में निर्मित चिकित्सकीय उपकरणों पर प्रतिलोमित शुल्क संरचना में सुधार करना।

वस्त्र और परिधान

  • सेक्टर के लिए निर्यात से पूंजीगत वस्तु निर्यात संवर्धन (ईपीसीजी) योजना को अलग करना।
  • प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (टीयूएफएस) सब्सिडी का तेजी से वितरण करना।

इलेक्ट्रानिक्स

  • इलेक्ट्रॉनिक्स के विनिर्माण के लिए टैरिफ-आधारित नीति से प्रोत्साहन-आधारित नीति में बदलाव।
  • औद्योगिक पार्क स्थापित करना जो इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करेगा।

पर्यटन और आतिथ्य

  • सरकार और उद्योग के विभिन्न हिस्सों के बीच समन्वय के लिए अखिल भारत पर्यटन बोर्ड बनाना।
  • पर्यटन अवसंरचना को सामंजस्य अवसंरचना का दर्जा।
  • चिकित्सा वीजा व्यवस्था को सरल बनाना।
  • जागरूकता फ़ैलाने और चिकित्सीय मूल्य गंतव्य के रूप में भारत के ब्रांड निर्माण के लिए एक चिकित्सा पर्यटन (मेडिकल टूरिज्म) अभियान बनाना।

महत्व

  • आर्थिक विकास का मार्ग: यह भारत के लिए उपलब्ध सभी अवसरों को अंगीकार करके एक आकर्षक निवेश गंतव्य बनने का मार्ग प्रशस्त करता है ताकि भारत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1 ट्रिलियन डॉलर के योगदान के निर्यात के लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम हो।
  • भारतीय निर्यात को बढ़ावा देना: एचएलएजी की सिफारिशों से सरकार को 2018 में 500 बिलियन डॉलर से 2025 में 1,000 बिलियन डॉलर से अधिक वस्तुओं और सेवाओं के भारत के निर्यात को दोगुना करने में मदद मिलेगी।
  • महत्वपूर्ण नीतियों पर जोर: रिपोर्ट उन नीतियों से संबंधित है जो भारत को निर्यात वृद्धि (और परोक्ष रूप से जीडीपी वृद्धि) की अपनी क्षमता की ओर आक्रामक रूप से बढ़ने के लिए मैक्रो और माइक्रो, विनियामक और कराधान, बुनियादी ढांचा विकास, नौकरशाही का हस्तक्षेप और ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस की आवश्यकता है।