पीआईबी न्यूज आर्थिक

हिमाचल प्रदेश राज्य सड़क रूपांतरण परियोजना


भारत सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार और विश्व बैंक ने 7 सितंबर, 2020 को हिमाचल प्रदेश राज्य सड़क रूपांतरण परियोजना के कार्यान्वयन के लिए 82 मिलियन डॉलर ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए।

  • परियोजना राज्य सड़क नेटवर्क की स्थिति, सुरक्षा, लचीलापन एवं इंजीनियरिंग मानकों में सुधार लाने के जरिये हिमाचल प्रदेश के परिवहन एवं सड़क सुरक्षा संस्थानों को सुदृढ़ बनायेगा।
  • अंतरराष्ट्रीय पुनर्संरचना एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) से 82 मिलियन ऋण की पांच वर्षों की अनुग्रह अवधि सहित 15 वर्षों की अंतिम परिपक्वता है।

संक्षिप्त खबरें संस्थान-संगठन

भारतीय ताराभौतिकी संस्थान


भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics-आईआईए) ने 12 अगस्त, 2020 को अपना 50वां स्थापना दिवस मनाया।

  • भारतीय ताराभौतिकी संस्थान देश का एक प्रमुख संस्थान है, जो खगोल विज्ञान, ताराभौतिकी एवं संबंधित भौतिकी में शोधकार्य को समर्पित है।
  • इसका उद्गम मद्रास (चेन्नई) में 1786 में स्थापित की गई एक निजी वेधशाला से जुड़ा है। 1971 में इसने एक स्वायत्त संस्था भारतीय ताराभौतिकी संस्थान का रूप लिया। संस्थान का मुख्यालय कोरमंगला, बेंगलुरू में स्थित है।
  • संस्थान की प्रमुख प्रेक्षण सुविधायें कोडैकनाल, कावलूर, गौरीबिदनूर एवं हान्ले में स्थापित हैं।
  • कावलूर स्थित वेणुबप्पू वेधशाला 1960 के दशक से रात्रिकालीन खगोल की मुख्य प्रकाशिक वेधशाला रही है। यहां 2.34 मी. वेणुबप्पू दूरदर्शी कार्यशील है।
  • दक्षिण पूर्व लद्दाख के हान्ले नामक स्थान में नई उच्च उत्तुंग (high altitude) भारतीय खगोल वेधशाला है, जहां वर्ष 2001 से 2 मी. व्यास का ‘हिमालयन चंद्रा दूरदर्शी’ कार्यशील है।

सामयिक खबरें अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रदूषण, अवक्रमण और जलवायु परिवर्तन

यूरोपीय ग्रीन डील


  • 11 दिसंबर, 2019 को यूरोपीय आयोग ने यूरोपीय ग्रीन डीलपेश किया,जो यूरोपीय नागरिकों और व्यवसायों को स्थायी हरित संक्रमण (green transition) से लाभान्वित होने में सक्षम बनाएगा।
  • इस समझौते में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया है और विशेष रूप से परिवहन, ऊर्जा, कृषि, भवनों और इस्पात, सीमेंट, आईसीटी, वस्त्र और रसायन जैसे उद्योगों पर जोर दिया गया है।

लक्ष्य

  • यह यूरोपीय संघ (EU) को आधुनिक, संसाधन-कुशल और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने के साथ एक निष्पक्ष और समृद्ध समाज में बदलने का लक्ष्य रखता है।
  • यूरोपीय संघ की प्राकृतिक पूंजी कासंरक्षण और संवर्धन करने के साथ ही पर्यावरण से संबंधित जोखिमों और दुष्प्रभावों से नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा करना।

जरूरत

  • यूरोपीय संघमें 28 सदस्य देश शामिल हैं जोचीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है।

 

यूरोपीय डील के प्रमुख बिंदु

जलवायु तटस्थ यूरोप

  • यह यूरोपीय ग्रीन डील का अति महत्वपूर्ण उद्देश्य है। EU2050 तक शुद्ध-शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तक पहुंचने का लक्ष्य रखता है, जिसे मार्च 2020 में प्रस्तुत किये जाने वाले ‘क्लाइमेट लॉ’में शामिल किया जायेगा।

उत्सर्जन कमी के लक्ष्य को बढ़ाना

  • यूरोपीय संघ 1990 के स्तर की तुलना में 2030 तक अपने उत्सर्जन में 40 प्रतिशत की कमी करने के लिए प्रतिबद्ध है जो पेरिस समझौते के तहत घोषित इसकी जलवायु कार्य योजना का हिस्सा है। लेकिन अब उत्सर्जन को कम से कम 50 प्रतिशत तक कम कर,55 प्रतिशत की दिशा में बढ़ने का फैसला किया गया है।

सर्कुलर अर्थव्यवस्था

  • मार्च 2020 में,एक नई ‘सर्कुलर अर्थव्यवस्था कार्य योजना’ पेश की जाएगी जो यूरोपीय संघ की व्यापक औद्योगिक रणनीति होगी। इसमें एक स्थायी(sustainable) उत्पाद नीति को शामिल किया जायेगा, जो "हम कैसे चीजें बनाते हैं पर निर्देश" होगी | इससे सुनिश्चित होगा कि कम सामग्री का उपयोग कर, उत्पादों का पुन: उपयोग और पुनर्नवीनीकरण किया जा सके।

भवन का नवीनीकरण

  • यह ग्रीन डील के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक है जिसका मुख्य उद्देश्य इमारतों के नवीकरण दर को ‘कम से कम दोगुना यातिगुना’ करना है | वर्तमान में यह लगभग 1% है।

शून्य प्रदूषण

  • इसका उद्देश्य 2050 तक "प्रदूषण-मुक्त वातावरण" का निर्माण करना है जो हवा, मिट्टी या पानी के शुन्य प्रदुषण से सम्बंधित है। नई पहल में "विषाक्त-मुक्त वातावरण" के लिए रासायनिक रणनीति शामिल है।

पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को पुनर्जीवित करना

  • अक्टूबर 2020 मे,चीन में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता शिखर सम्मेलन आयोजित होगा | इस सम्मलेन से पहले, मार्च 2020 में एक नई जैव विविधता रणनीति प्रस्तुत की जाएगी।
  • इसमें मिट्टी और जल प्रदूषण से निपटने के उपाय के साथ-साथ एक नई वन रणनीति शामिल हैं।
  • निर्वनीकरण से मुक्त कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए नए लेबलिंग नियम बनाए जाएंगे।

फार्म टू फोर्क रणनीति

  • वसंत 2020 में पेश की जाने वाली नई रणनीति "हरा और स्वस्थ कृषि" प्रणाली को लक्ष्य करती है। इसमें रासायनिक कीटनाशकों, उर्वरकों और एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग को कम करने की योजना है।

परिवहन

  • इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए 2025 तक पूरे यूरोप में 1 मिलियन सार्वजनिक चार्जिंग पॉइंट निर्मित किये जाएंगे ।
  • सतत वैकल्पिक ईंधन - जैव ईंधन और हाइड्रोजन - को विमानन, शिपिंग और सड़क परिवहन में बढ़ावा दिया जाएगा जहां विद्युतीकरण संभव नहीं है।

हरित निवेश

  • यूरोपीय निवेश बैंक (EIB) ने 2021 के अंत में जीवाश्म ईंधन से सम्बंधित परियोजनाओं को धन न उपलब्ध कराने का फैसला किया।
  • आने वाले वर्षों में सतत यूरोप निवेश योजना लागू की जाएगी जिसके माध्यम से यूरोपीय ग्रीन डील की नीतियों को वित्त पोषित किया जायेगा।

संक्रमण निधि

  • "किसी को भी पीछे नहीं छोड़ने" के उद्देश्य की घोषणा करता है और आयोग जीवाश्म ईंधन पर सबसे अधिक निर्भर क्षेत्रों को मदद करने के लिए एक उचित संक्रमण तंत्र का प्रस्ताव करता है। यह सबसे कमजोर क्षेत्रों और क्षेत्रकों को लक्षित कर,100 बिलियन यूरो आबंटित करने का लक्ष्य रखता है। 


प्रभाव

  • रोडमैप प्रदान करना: यह स्वच्छ एवं सर्कुलर अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन को रोकने, जैव विविधता के नुकसान को कम करने और प्रदूषण में कटौती करके संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देने के कार्यों के लिए रोडमैप प्रदान करता है।
  • पर्यावरण में सुधार: जैव विविधता की हानि को रोकने से सम्बंधित पहलें पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार करके प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ लाएगी ।
  • स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार: इसमें विशिष्ट कार्य शामिल हैं जो जनता के स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार करेंगे। इनमें वायु और जल प्रदूषण,जैसे खतरनाक रसायनों से होने वाले प्रदूषण, से निपटने के लिए कार्य योजना शामिल हैं।
  • उपभोक्ताओं को लाभ: उपभोक्ता अधिक टिकाऊ उत्पादों से लाभान्वित होंगे, जो मरम्मत योग्य तथा टिकाऊ होंगे और कम ऊर्जा का उपयोग कर कार्य करेंगे। यह उत्पादों के सम्पूर्ण जीवनकाल में उपयोग की लागत को कम करने में मदद कर सकता है ।
  • व्यापार को बढ़ावा देना: यह उत्पादकों को अपने उत्पादों को आधुनिक और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने का अवसर प्रदान करता है। बहु-वार्षिक वित्तीय ढांचे से निवेश और नवाचार कार्यक्रमों को समर्थन प्राप्त होगा जिसका उपयोग कर उद्योग नई पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियों और स्थायी समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित होंगे |

आगे की राह

  • यूरोपीय संघ विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसलिए यह निर्णय पूरे विश्व पर प्रभाव डालेगी । यह एजेंडा 2030 और सतत विकास लक्ष्यों को लागू करने की रणनीति का एक अभिन्न हिस्सा है।
  • यूरोपीय ग्रीन डील को कार्यान्वित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित नीतियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। ये क्षेत्र अर्थव्यवस्था, उद्योग, उत्पादन और खपत, बुनियादी ढांचे, परिवहन, खाद्य और कृषि, निर्माण, कराधान स्वच्छ ऊर्जा आदि से सम्बंधित हो सकते है |
  • इसके उत्सर्जन में कटौती से सम्बंधित लक्ष्य अपर्याप्त है जो जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी और अपरिवर्तनीय प्रभावों से विश्व को बचाने के लिए आवश्यक होगा।
  • चीन और भारत जैसे बड़े विकासशील देशों सहित अन्य बड़े उत्सर्जकों से भी यह संकेत मिल रहा है कि वे भी अपने जलवायु कार्यों को तत्काल बढ़ाने पर विचार कर रहे है |
  • जब तक कई अंतरराष्ट्रीय साझेदार यूरोपीय संघ के समान महत्वाकांक्षी लक्ष्य प्राप्त करना निर्धारित नहीं करते है, तब तक कार्बन रिसाव का खतरा बना रहेगा है | क्योंकि यूरोपीय संघ से उत्पादन कमी अन्य देशों केकम महत्वाकांक्षी लक्ष्य से स्थानांतरित हो जायेगा या यूरोपीय संघ के उत्पादों को अधिक कार्बन-गहन आयात द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जायेगा |
  • यदि ऐसा हो जाता हैतो वैश्विक उत्सर्जन में कमी नहीं होगी, और यह पेरिस समझौते के वैश्विक जलवायु उद्देश्यों को पूरा करने के लिए यूरोपीय संघ और इसके प्रयासों को हतोत्साहित करेगा।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना


  • हाल ही में, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के योजना डिजाइन और कार्यान्वयन दोनों के बारे में चिंता व्यक्त की गई है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना को महत्वपूर्ण कमियों से ग्रस्त पाया गया है।

PMMVY के मुद्दों को समझना

लंबा दस्तावेजीकरण

  • लंबे दस्तावेज़ीकरण की प्रक्रिया में 32 पृष्ठों के छह दस्तावेजों को भरना शामिल है |इसमें आधार कार्ड को बैंक खाते से जोड़ने के लिए आवेदन, दूसरा डाकघर खाते से आधार कार्ड को जोड़ने के लिए आवेदन और एक फीडबैक फॉर्म शामिल है।
  • इस थकाऊ प्रक्रिया ने एकल महिलाओं और युवा दुल्हनों को इसके दायरे से बाहर किया।
  • इसके अलावा, दस्तावेज़ीकरण की जटिल प्रक्रिया के कारण हाशिये पर रहने वाली महिलाओं जैसे- यौन कर्मियों, हिरासत में रहने वालीं महिलाएँ, प्रवासी महिलाएँ इस योजना का लाभ नहीं उठा पाती हैं, जबकि उन्हें मौद्रिक मुआवजे की सबसे अधिक आवश्यकता होती हैं।

पहला बच्चा मानदंड

  • पात्रता मानदंड में खामी यह है कि लाभ केवल पहले बच्चे के जन्म के लिए प्रदान किया जाता है।
  • 33 के कुल प्रजनन दर (TFR) वाले देश में, इस योजना को केवल पहले बच्चे तक सीमित रखने की नीति अव्यावहारिक है ।
  • इस योजना के अंतर्गत गर्भपात या शिशु मृत्यु दर को समायोजित नहीं किया जाता है। यदि आठ महीने की गर्भवती महिला, जिसने पहले से ही योजना का उपयोग किया है, अपने बच्चे को खो देती है, तो वह अपनी अगली गर्भावस्था के लिए दूसरी या तीसरी किस्त के योग्य नहीं होती है।

एकल महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे

  • इस योजना में पंजीकरण के लिये आवेदक महिला को अपने पति का आधार संबंधी विवरण प्रदान करना होता है जिससे एकल महिलाएं, अविवाहित माताएं, परित्यक्त पत्नियां और विधवा महिलाएं इस योजना का लाभ उठाने से वंचित रह जाती हैं।

नवविवाहिता स्त्रियां

  • नवविवाहित महिला को PMMVY का लाभ उठाने के लिए अपने ससुराल के पते का प्रमाण देना होता है, जो उसके मायके में रहने की स्थिति में एक बड़ी चुनौती साबित होती है।

नवविवाहिता

  • इस योजना में आवेदन करने की न्यूनतम आयु 19 वर्ष है अतः 18 वर्ष से कम आयु की नवविवाहिता इस योजना का लाभ उठाने से वंचित रह जाती हैं।
  • पहले शिशु को जन्म देने वाली लगभग 30-35% महिलाएँ 18 वर्ष से कम आयु की हैं।

भ्रष्टाचार के मुद्दे

  • यह योजना भ्रष्टाचार से प्रभावित है जो इसके उचित कार्यान्वयन को सीमित करता है। आवेदक महिलाओं से आवेदन प्रक्रिया के दौरान रिश्वत की मांग की जाती है, जो कि प्रत्येक स्तर पर 500 रुपये तक होती है।

 

थकाऊ दस्तावेजीकरण

कैसे PMMVVY को बाहर करता है

  1. केवल पहले जन्म के लिए,
  2. कई शर्तों को पूरा करने के बाद प्रदान किया जाता है- गर्भावस्था का पंजीकरण, कम से कम जांच, बच्चे के जन्म और टीकाकरण का पंजीकरण आदि,
  3. ससुराल के पते का प्रमाण,
  4. पति का आधार कार्ड,
  5. न्यूनतम आयु 19 वर्ष,
  6. पिता और माता को अलग-अलग वचन देने की आवश्यकता है कि बच्चा उन दोनों के लिए पहला जीवित बच्चा है |

दस्तावेजों की सूची

  • लाभार्थी द्वारा भरे जाने वाले कुल 32 पृष्ठों के साथ कुल 6 आवेदन फॉर्म भरे जाते हैं |
  • 9 पहचान पत्रों की मांग किया जाना : आधार कार्ड (या नामांकन पर्ची) की प्रतिलिपि, पहचान प्रमाण की प्रतिलिपि, पति और पत्नी दोनों के लिए मतदाता पहचान पत्र (आयु प्रमाण के रूप में), राशन कार्ड की प्रतिलिपि (ससुराल के पते के प्रमाण के रूप में), पासबुक की कॉपी, माता और बाल संरक्षण कार्ड की प्रति |

 

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY)

  • 2016 में शुरू की गई PMMVY एक मातृत्व लाभ कार्यक्रम है, जिसने इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना (IGMSY) को प्रतिस्थापित किया।
  • यह एक प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजना है जिसके तहत 5000 रुपये का नकद प्रोत्साहन गर्भवती महिला एवं स्तनपान कराने वाली माताओं (PW&LM) के खाते में प्रदान किया जाता है जो विशिष्ट शर्तों को पूरा करती है |
  • पात्र लाभार्थियों को जननी सुरक्षा योजना (JSY) के तहत नकद प्रोत्साहन भी मिलता है। इस प्रकार औसतन एक महिला को 6,000 रुपये मिलते है।

उद्देश्य

  • गर्भावस्था, प्रसव और स्तनपान के दौरान उपयुक्त अभ्यास, देखभाल और संस्थागत सेवा के उपयोग को बढ़ावा देना।
  • महिलाओं को पहले छह महीनों के शुरुआत में स्तनपान सहित (इष्टतम) पोषण और खिलाने के अभ्यास का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली मां के बेहतर स्वास्थ्य और पोषण के लिए नकद प्रोत्साहन प्रदान करना।

लक्षित लाभार्थियों

  • केंद्र सरकार या राज्य सरकारों या सार्वजनिक उपक्रमों के साथ नियमित रूप से रोजगार प्राप्त या किसी भी कानून के तहत समान लाभ की प्राप्ति करने वाली महिलाओं को छोड़करसभी गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं (PW&LM)।
  • सभी पात्र गर्भवती महिलाएँ और स्तनपान कराने वाली माताएँ जिनकी पहली गर्भावस्था परिवार में 01.01.2017 को या उसके बाद हुई है।
  • लाभार्थी के लिए गर्भावस्था की तारीख और चरण उसकी LMP(last menstrual period) तारीख से गिना जाएगा जैसा MCP (Mother and Child Protection Card ) कार्ड में बताया गया है।

कार्यान्वयन

  • PMMVY महिला और बाल विकास मंत्रालय के द्वारा चलाया गया है जो एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की आंगनवाड़ी सेवा योजना के मंच का उपयोग करके कार्यान्वित किया जाता है।
  • इसकी PMMVY-CAS, एक वेब आधारित सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन,का उपयोग कर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बारीकी से निगरानी की जाती है।

समावेशी उपाय

  • सबसे पहले, कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को सरकार का औपचारिक प्रतिनिधित्व करना चाहिए, ताकि इस योजना को समावेशी और सहायक बनाया जा सके।
  • दूसरा, सरकार को इस योजना की समीक्षा करने की आवश्यकता है ताकि बच्चों और साथ सभी महिलाओं तक इसकी पहुँच हो और इस योजना को सार्वभौमिक बनाया जा सके।
  • तीसरा, इसके तहत प्रदान की जाने वाली धन राशि कम से कम न्यूनतम मजदूरीया न्यूनतम वेतनके अनुसार होनी चाहिए।

राज्य मातृत्व योजना

दो राज्यों- तमिलनाडु और ओडिशा ने केंद्र प्रायोजित योजना को लागू नहीं किया है और अपनी स्वयं की मातृत्व योजनाओं को शुरू किया है।

डॉ.मुथुलक्ष्मी रेड्डी मातृत्व लाभ योजना- तमिलनाडु

  • यह योजना 1987 में शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सर्वोत्तम पोषण प्रदान करना और गर्भावस्था के दौरान होने वाले नुकसान की भरपाई करना है।
  • देश में अपनी तरह की पहली योजना ने शुरुआत में गरीबी रेखा से नीचे की प्रत्येक महिला को प्रसव के दौरान होने वाले खर्चों को कवर करने में मदद करने के लिए 300 रुपये की राशि प्रदान की।
  • सरकार ने वित्तीय सहायता को बढ़ाया है, पहले दो गर्भधारण के लिए 4,000 रुपये की नकद राशि और पोषण किट प्रदान करता है।

 

ममता योजना- ओडिशा

  • यह गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण में सुधार करके मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा सितंबर, 2011 में शुरू की गयी थी |
  • इसके तहत, सभी महिलाओं के पहले दो गर्भधारण के लिए 5,000 रुपये की धनराशि प्रदान की जा रही हैं।
  • आदिवासी जैसे कमजोर समूहों के लिए, धन तीसरे जन्म के लिए भी दिया जाता है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय रैंकिंग, रिपोर्ट, सर्वेक्षण और सूचकांक

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स - 2020


  • 14 दिसंबर, 2019 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स-2020 प्रकाशित किया, जो वैश्विक लैंगिक असमानता की वर्तमान स्थिति और इसे ख़त्म करने के प्रयासों के सम्बन्ध में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

लक्ष्य

  • इसका उद्देश्य स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति में महिलाओं और पुरुषों के बीच सापेक्ष अंतराल पर प्रगति को ट्रैक करना |

सूचकांक के बारे में

  • ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को पहली बार 2006 में WEF द्वारा लिंग-आधारित असमानताओं के परिमाण को जानने और समय के साथ उनकी प्रगति पर नज़र रखने के उद्देश्य से पेश किया गया था।
  • सूचकांक में शामिल होने के लिए, किसी देश के पास सूचकांक के 14 संकेतकों में से न्यूनतम 12 संकेतकों से सम्बंधित डेटा उपलब्ध होना चाहिए।
  • सूचकांक चार प्रमुख आयामों के आधार पर अंतराल को मापता है-
  • आर्थिक भागीदारी और अवसर: इसमें तीन अवधारणाएँ शामिल हैं: भागीदारी अंतर, पारिश्रमिक अंतर और उन्नति अंतर।
  • शैक्षिक प्राप्ति: यह प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा में महिलाओं के अनुपात की गणना करता है जिसके माध्यम से शिक्षा तक महिलाओं एवं पुरुषों की वर्तमान पहुंच के बीच की खाई को मापा जाता है।
  • स्वास्थ्य और जीवन रक्षा: इन दो संकेतकों के उपयोग के माध्यम से महिलाओं और पुरुषों के स्वास्थ्य के बीच अंतर को मापा जाता है।
  • राजनीतिक सशक्तीकरण: यह राजनीतिक निर्णय लेने के उच्चतम स्तर पर पुरुषों और महिलाओं के बीच के अंतर को मापता है,जो मंत्री पदों और संसदीय पदों पर महिलाओं और पुरुषों के अनुपात के माध्यम से व्यक्त होता है।

मुख्य निष्कर्ष

ग्लोबल स्पेसिफिक फाइंडिंग

  • आइसलैंड लगातार 11वीं बार दुनिया का सबसे लिंग-समान देश है।
  • आइसलैंड के बाद नॉर्वे (2रा), फिनलैंड (3रा) और स्वीडन (4था) है। शीर्ष 10 अन्य अर्थव्यवस्थाओं में निकारागुआ (5वें), न्यूजीलैंड (6ठे), आयरलैंड (7वें), स्पेन (8वें), रवांडा (9वें) और जर्मनी (10वें) शामिल हैं।
  • यमन सबसे अंतिम (153 वां) स्थान पर है।
  • रिपोर्ट द्वारा मूल्यांकन किए गए आठ क्षेत्रों ने औसतन 60.5% (मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में औसत स्कोर) और 76.7% (पश्चिमी यूरोप में औसत स्कोर) अंक प्राप्त किये।
  • उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप (9%) और लैटिन अमेरिका और कैरेबियाईदशों (72.2%) से कुछ प्रतिशत नीचे है मगरपूर्वी यूरोप और मध्य एशिया (71.3%) के साथ लगभग समान है। उसके बाद पूर्वी एशिया और प्रशांत (68.5%), उप-सहारा अफ्रीका (68.2%) और दक्षिण एशिया (66.1%) हैं।
  • विश्व स्तर पर, समता के लिए प्राप्त की गई औसत (जनसंख्या-भारित) 6% है, जो कि पिछले संस्करण से सुधार को दर्शाता है।
  • राजनीतिक सशक्तीकरण असमानता को सबसे बड़ी लैंगिक असमानता बताई गई है।2020 में वैश्विक राजनीतिक सशक्तीकरण असमानता केवल 7% ही ख़त्म हो पायी है।
  • दूसरा सबसे बड़ा अंतर आर्थिक भागीदारी और अवसर में है; इस अंतर का 8% अब तक ख़त्म किया गया है, जो पिछले साल के अपेक्षा मामूली सुधार है।

स्रोत:IE

भारत विनिर्दिष्ट विशेषताएं

  • लैंगिक असमानता के मामले में भारत को चीन (106वां), श्रीलंका (102वां), नेपाल (101वां), ब्राजील (92वां), इंडोनेशिया (85वां) और बांग्लादेश (50वां) जैसे देशों से नीचे112वें स्थान पर रखा गया है। इसके जिम्मेदार कारकस्वास्थ्य,उत्तरजीविता और आर्थिक भागीदारी में व्यापत असमानता है।
  • भारत ने राजनीतिक सुधार में18स्थान का सुधरा किया है; यह स्वास्थ्य भागीदारी और अवसर पर 150वें स्थान पर पहुंच गया है, आर्थिक भागीदारी और अवसर के मामले में 149वें और शैक्षिक प्राप्ति के लिए 112वें स्थान पर है।

स्रोत:WEF 

महत्ता

  • प्रगति ट्रैक करने का साधन: यह वैश्विक लैंगिक असमानता की वर्तमान स्थिति को दर्शाने के साथ इसे ख़त्म करने के प्रयासों के सम्बन्ध में व्यापक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। सूचकांक प्रगति को ट्रैक करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रकट करने के लिए एक बेंचमार्किंग टूल प्रदान करता है। इस वार्षिक रिपोर्ट के माध्यम से, प्रत्येक देश के हितधारक अपनी विशिष्ट आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ में प्राथमिकताओं को निर्धारित करने में सक्षम होंगे।
  • देश के कानूनी और सामाजिक ढांचे की तस्वीर प्रदान करना: यह देशों के मध्य व्याप्त प्रदर्शन भिन्नता को उजागर करता है | यह अच्छे प्रदर्शन करने वाले देशों के सर्वोत्तम प्रथाओं, कानूनी और सामाजिक ढांचे का एक स्नैपशॉट भी प्रदान करता है जिसके कारण अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • लैंगिक समानता पर नवीनतम शोध प्रदान करना: यह किसी देश के लैंगिक असमानता और उसके आर्थिक प्रदर्शन के बीच मजबूत संबंध को उजागर करता है और लैंगिक समानता के मामले पर नवीनतम शोधों में से कुछ को सारांशित करता है।
  • नीति-निर्माताओं को संदेश: रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को संदेश प्रधान करती है कि अगर वो अपने देश जो प्रतिस्पर्धी और समावेशी बनाना चाहते हैं, उन्हें लैंगिक समानता को मानव पूंजी विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।

 

विश्व आर्थिक मंच

  • 1971 में गैर-लाभकारी फ़ाउंडेशन के रूप में क्लॉस श्वा द्वारा स्थापित किया गया और इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
  • फोरम वैश्विक, क्षेत्रीय और उद्योग एजेंडा को आकार देने के लिए राजनीतिक, व्यापारिक,सांस्कृतिक और समाज के अन्य नेताओं को शामिल करता है।

WEF द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण रिपोर्ट

  • वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता रिपोर्ट,
  • ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट,
  • वैश्विक यात्रा और पर्यटन रिपोर्ट,
  • वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी रिपोर्ट |

सामयिक खबरें राष्ट्रीय सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप

आंध्र प्रदेश दिशा विधेयक - 2019


  • हाल ही में, आंध्र प्रदेश विधानसभा ने आंध्र प्रदेश आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2019 पारित किया।
  • तेलांगना में एक पशु चिकित्सक का बलात्कार कर हत्या कर दी गई थी, जिसके श्रद्धांजलि के तौर पर प्रस्तावित नए आपराधिक कानून (एपी संशोधन) अधिनियम, 2019 को दिशा अधिनियम नाम दिया गया है।

दिशा विधेयक की मुख्य विशेषताएं

महिला और बाल अपराधियों की रजिस्ट्री

  • विधेयक में “महिला और बाल अपराधियों की रजिस्ट्री” इलेक्ट्रॉनिक रूप में स्थापित करने, संचालित करने और बनाए रखने की परिकल्पना की गई है | यह रजिस्ट्री सार्वजनिक होगी और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए उपलब्ध होगी।

बलात्कार अपराध के लिए मौत की सजा

  • इसमें बलात्कार के पर्याप्त निर्णायक सबूत होने पर मौत की सजा निर्धारित की गयी है । भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया है।

निर्णय अवधि को कम करना

  • विधेयक के अनुसार, बलात्कार अपराधों के मामलों में अपराध की तारीख से 21 कार्य दिवसों में फैसला सुनाया जाएगा।
  • जाँच सात कार्य दिवसों में और सुनवाई 14 कार्य दिवसों में पूरा किया जाएगा।

बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए सजा

  • यह बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान करता है।
  • भारतीय दंड संहिता, 1860 में नई धारा 354F और धारा 354G ‘बच्चों पर यौन उत्पीड़न’ जोड़ा जा रहा है।

सोशल मीडिया के माध्यम से उत्पीड़न के लिए सजा

  • भारतीय दंड संहिता, 1860 में एक नई धारा 354E ‘महिलाओं का उत्पीड़न’ जोड़ा जा रहा है।
  • ई-मेल, सोशल मीडिया, डिजिटल मोड या किसी अन्य रूप से महिलाओं के उत्पीड़न के मामलों में, दोषी को पहले जुर्म पर दो साल कारावास की सजा एवं दूसरे और बाद के मामलों में दोषी पाए जाने पर चार साल तक सजा हो सकती है।

विशिष्ट विशेष न्यायालयों की स्थापना

  • यह सरकार को राज्य के प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना करने का निर्देश देता है ताकि शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित किया जा सके। ये अदालतें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बलात्कार, एसिड हमले, सोशल मीडिया के माध्यम से उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न और POCSO अधिनियम के तहत दर्ज अन्य सभी अपराधों के मामलों से निपटेंगी।

निपटान की अवधि कम

  • अपील के मामलों के निपटान की अवधि को घटाकर तीन महीने कर दिया गया है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 374 और 377 में संशोधन किए जा रहे हैं।

विशेष पुलिस टीमों का गठन

  • यह सरकार को जिला स्तर पर विशेष पुलिस टीमों का गठन करने का आदेश देता है, जिसे महिलाओं और बच्चों से संबंधित अपराधों की जांच के लिए डीएसपी के नेतृत्व में जिला विशेष पुलिस दल कहा जाता है।
  • इसके अलावा, सरकार प्रत्येक विशेष अदालत के लिए एक विशेष सरकारी वकील भी नियुक्त करेगी।

 

नया कानून, एक गेम चेंजर ?

1.   बलात्कार के लिए मौत की सजा

  • वर्तमान कानूनों के तहत, बलात्कार के चरम मामलों में अपराधी को आजीवन कारावास या मौत की सजा दी जाती है |

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • पर्याप्त सबूत होने पर एपी सरकार ने बलात्कार के अपराधों के लिए मौत निर्धारित किया है। कोई अन्य विकल्प नहीं दिए गए हैं।
  • यह भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 में संशोधन करके किया गया प्रावधान है |

 2.  निर्णय अवधि को घटाकर 21 दिन करना

  • निर्भया अधिनियम, 2013 और आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2018 के अनुसार, यह 4 महीने का है।

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • निर्णय अवधि 21 कार्य दिवसों तक कम हो गई,
  • जांच 7 कार्य दिवसों में खत्म हो जाएगी, परीक्षण 14 कार्य दिवसों में पूरा होगा |

3.   बच्चों के खिलाफ यौन अपराध

  • POCSOअधिनियम, 2012 के तहत बच्चों पर छेड़छाड़/यौन उत्पीड़न के मामले में 3 से 7 साल तक जेल की सज़ा |

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • नया कानून बच्चों के खिलाफ अन्य यौन अपराधों के लिए उम्रकैद की सजा देता है |
  • भारतीय दंड संहिता, 1860 में नई धारा 354F और धारा 354G "बच्चों पर यौन शोषण" जोड़ा जा रहा है।

4.   बच्चों पर यौन हमला

  • मौजूदा कानूनों में, बच्चों पर यौन शोषण के मामलों में मुकदमे को पूरा करने की अवधि 12 महीने है |

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • बच्चों पर यौन हमले के मामले में निर्णय की अवधि को 21 कार्यदिवसों में कम कर दिया गया है |
  • जांच 7 कार्य दिवसों में और परीक्षण 14 कार्यदिवसों में पूरा किया जाएगा |

5.   महिलाओं के खिलाफ सोशल मीडिया का दुरुपयोग

  • IPC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है |

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • ई-मेल, सोशल मीडिया, डिजिटल मोड या किसी अन्य रूप से उत्पीड़न के मामलों में दोषी को जेल मिलेगी |
  • जेल अवधि: पहली सजा पर दो साल, बाद में सजा पर चार साल |

6.   हर जिले में विशेष अदालतें

  • कुछ राज्यों में विशेष अदालतें हैं लेकिन हर जिले में नहीं। ये निर्दिष्ट न्यायालय हैं, प्रकृति में अनन्य नहीं हैं |

एपी दिशा अधिनियम, 2019

  • ये अदालतें महिलाओं के खिलाफ अपराधों, बलात्कार, एसिड हमलों, पीछा करने, दर्शनरति, सोशल मीडिया उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न और POCSO अधिनियम के तहत सभी अपराधों से निपटेंगी |
  • इसके लिए ‘महिलाओं और बच्चों के खिलाफ निर्दिष्ट अपराधों के लिए आंध्र प्रदेश के विशेष न्यायालय अधिनियम, 2019’ का प्रस्ताव है |

स्रोत:TOI

दिशा विधेयक वर्तमान विधानों से किस प्रकार भिन्न है?

  • भारत सरकार ने यौन अपराधियों की एक राष्ट्रीय रजिस्ट्री शुरू की है, लेकिन डेटाबेसडिजिटल नहीं है और जनता के लिए सुलभ नहीं है।
  • वर्तमान में, बलात्कार के मामले में एक अपराधी को दंडित करने का प्रावधान एक निश्चितकारावास है ।
  • निर्भया अधिनियम, 2013 और आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2018 के अनुसार मौजूदानिर्णय अवधि 4 महीने (जांच अवधि के दो महीने और परीक्षण अवधि के दो महीने) है।
  • POCSO अधिनियम, 2012 के तहत बच्चों के साथ छेड़छाड़/यौन उत्पीड़न के मामलों में, न्यूनतम सजा तीन साल से लेकर अधिकतम सात साल के कारावास तक है।
  • सोशल मीडिया के माध्यम से महिलाओं के उत्पीड़न की सजा के लिए भारतीय दंड संहिता मेंकोई प्रावधान मौजूद नहीं है।
  • वर्तमान में, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बलात्कार के मामलों से संबंधित अपील मामलोंके निपटान की अवधि छह महीने है।

महत्ता

  • अपराधनिवारक: नया कानून राज्य भर में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के निवारक के रूप में कार्य करेगा।
  • मजबूत न्याय प्रणाली: इसके अलावा, यह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध करने वाले अपराधी पर आपराधिक न्याय प्रणाली को सख्त बना देगा।
  • स्पीडी ट्रायल: यह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की परीक्षण प्रक्रिया को तेज करने में मदद करेगा।

विधेयक पर संशय

विधेयक ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और कानून विशेषज्ञों में संसय पैदा की है, जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने और इसकी व्यावहारिकता की दक्षता पर संदेह जताया है।

अपर्याप्त कार्यबल

  • बिल के सीमित जांच और परीक्षण अवधि पर सवाल उठाए गए हैं। अधीनस्थ न्यायपालिका में 58 प्रतिशत रिक्तियों और पुलिस अधिकारियों में 25 प्रतिशत रिक्तियों के साथ है; क्या आंध्र प्रदेश सरकार 21 दिनों में कोई सुनवाई पूरी कर सकती है?
  • इसी तरह, इसने पुलिस के विशेष दल का गठन किया है, जिसके लिए अभी तक किसी पुलिस भर्ती की प्रक्रिया शुरू नहीं की गयी है। एक-चौथाई रिक्तियों के साथ, पुलिस कोई भी कुशल या त्वरित जांच नहीं कर सकती है।

लंबित मामलों का बोझ

  • एपी सरकार ने धन आवंटन या एक भी नया पद सृजित किए बिना, प्रत्येक जिले में विशेष अदालतों का गठन किया है।
  • इसके अलावा, पहले से ही मौजूद अदालतों और न्यायाधीशों पर कई सैकड़ों लंबित मामले का बोझ परा हैं। नया अधिनियम केवल न्यायपालिका प्रणाली पर बोझ डाल देगा, जो इसे अक्षम बना देगा।

आगे की राह

  • आंध्र प्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने महिलाओं के प्रति अपराध कम करने एवं बदमाशों को दंडित करने के लिए कानूनों को कड़ा बनाया है |यह महिलाओं के साथ-साथ बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए देश के अन्य राज्यों को भी इसी तरह कदम उठाने को प्रेरित करेगा, जो स्वागत योग्य कदम है।

सामयिक खबरें अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग, रिपोर्ट, सर्वेक्षण और सूचकांक

मानव विकास रिपोर्ट - 2019


  • 9 दिसंबर, 2019 को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने मानव विकास रिपोर्ट (HDR), 2019 जारी की।
  • इसका शीर्षक"आय से परे, औसत से परे, आज से परे: 21 वीं सदी में मानव विकास में असमानताएं" रखा गया है,इसके अनुसार लाखों लोगों के लिए बुनियादी जीवन स्तर के अंतर में कमी हो रही है और उन्नति करने की ललक बढती जा रही हैं।
  • 2019 की रिपोर्ट मानव विकास से सम्बंधित सभी सूचकांकों को प्रतिधारित करना है जिनमे शामिल है; मानव संसाधन विकास सूचकांक (HDI), असमानता अन्याय मानव विकास सूचकांक (IHDI), लैंगिक विकास सूचकांक (GDI), लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI)।

प्रमुख निष्कर्ष

बेहतरीनव खराब प्रदर्शन करने वाला

  • मानव विकास सूचकांक (HDI) में नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड ने क्रमशः शीर्ष तीन स्थान पर प्राप्त किया है ।
  • जर्मनी को हांगकांग के साथ चौथे स्थान पर रखा गया है, और ऑस्ट्रेलिया ने वैश्विक रैंकिंग में पांचवीं रैंक हासिल की है।
  • जबकि, नाइजर, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान, चाड और बुरुंडी को HDI के स्वास्थ्य, शिक्षा और आय में राष्ट्रीय उपलब्धियों के आधार पर सबसे कम अंक हैं।

भारत व उसके पड़ोसी देशों का प्रदर्शन

  • HDI, 2019 में भारत 189 देशों में से 129 वें स्थान पर है, पिछले साल यानी 2018 में 130वें स्थान से एक स्थान ऊपर है।
  • 1990 से 2018 के बीच, भारत के HDI मान में 50 प्रतिशत (431 से 0.647) की वृद्धि हुई, जो इसे मध्यम मानव विकास समूह (0.634) में शामिल करता है।
  • भारत के पड़ोसी देशों में, श्रीलंका (71) और चीन (85) रैंक में ऊपर हैं, जबकि भूटान (134), बांग्लादेश (135), म्यांमार (145), नेपाल (147), पाकिस्तान (152) और अफगानिस्तान (170) ) सूची में निचले स्थान पर है।
  • लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) में भारत 162 देशों में से 122 पर है। चीन (39), श्रीलंका (86), भूटान (99), म्यांमार (106) को भारत से ऊपर रखा गया।

स्रोत:TOI

क्षेत्रीय प्रदर्शन

  • रिपोर्ट के अनुसार, 1990-2018 में दक्षिण एशिया मानव विकास की प्रगति में सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र था, इसके बाद पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 43% की वृद्धि हुई। 

रिपोर्ट की महत्ता

  • असमानताओं पर फोकस: HDR, 2019 महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विकास में असमानताओं पर केंद्रित है। यह असमान जीवन के अवसरों को आकार देने वाले कारकों की बहुत व्यापक समझ प्रदान करता है।
  • असमानताओं की नई पीढ़ी की शुरुआत: रिपोर्ट आगाह करता है कि असमानताओं के नए रूप भविष्य में जलवायु परिवर्तन और तकनीकी परिवर्तन के माध्यम से प्रकट होंगे जो मौजूदा सामाजिक और आर्थिक विभाजन को गहरा करने की क्षमता रखते हैं।
  • सतत विकास लक्ष्य (SDG) अभी भी बहुत दूर: संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुसार विश्व 2030 तक लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए ट्रैक पर नहीं है। वर्तमान विकास परिदृश्य के साथ, आर्थिक अवसर में लैंगिक असमानता को ख़त्म करने में 202 वर्ष लग सकते हैं।
  • लैंगिक असमानता पर फोकस: रिपोर्ट एक नया सूचकांक प्रस्तुत करती है जो यह बताता है कि पूर्वाग्रह और सामाजिक मान्यताएँ लैंगिक समानता को कैसे बाधित करती हैं, जिससे पता चलता है कि विश्व भर में केवल 14% महिलाओं और 10% पुरुषों में कोई लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं है।

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई)

  • HDI एक सांख्यिकीय साधन है जिसका उपयोग किसी देश की सामाजिक और आर्थिक आयामों में समग्र उपलब्धि को मापने के लिए किया जाता है। इस सूचकांक में उच्च रैंक वाले राष्ट्रों में कम स्कोर वाले राष्ट्रों की तुलना में उच्च स्तर की शिक्षा, उच्च जीवन काल, और प्रति व्यक्ति अधिक सकल राष्ट्रीय आय है।
  • HDI को पहली बार 1990 में लॉन्च किया गया था और 2012को छोड़कर इसे सालाना जारी किया जाता है।

संकेतक

  • दीर्घजीवन: यह जन्म के समय जीवन प्रत्याशा द्वारा मापा जाता है। जन्म के समय जीवन प्रत्याशा का मतलब है कि नवजात शिशु के कितने साल तक इस दुनिया में जीवित रहने की उम्मीद है। यह मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में स्वास्थ्य के तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।
  • शिक्षा या ज्ञान: यह वयस्क साक्षरता और स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों के भारित औसत द्वारा मापा जाता है। इसके लिए दो-तिहाई महत्व वयस्क साक्षरता को दिया जाता है और एक-तिहाई महत्व स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों को दिया जाता है।
  • जीवन स्तर: यह किसी देश की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय को क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) की कीमतों पर मापा जाता है, जिसे विभिन्न देशों की मुद्राओं की क्रय शक्ति के साथ समायोजित किया जाता है।

महत्ता

  • HDI किसी देश के विकास के स्तर का ट्रैक रखने का सबसे अच्छा साधन है, क्योंकि यह सभी प्रमुख सामाजिक और आर्थिक संकेतकों को दर्शाता है जो आर्थिक विकास के लिए जिम्मेदार हैं।

कमियां

  • यह कई कारकों को हटा देता है जो जीवन की गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं, जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण। उदाहरण के लिए, औद्योगिक प्रदूषण और वनों की कटाई, जटिल स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे लसीका फाइलेरिया) या मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों को |यह जरूरी नहीं कि इनसे मृत्यु दर पर प्रभाव पड़े लेकिन किसी व्यक्ति के जीवनयापन की गुणवत्ता को खराब कर सकती हैं।
  • दूसरी ओर, साक्षरता दर का अनुमान लगाने के लिए, आरंभिक उम्र में बच्चों द्वारा स्कूली शिक्षा के वर्षों का उपयोग किया जाता है, जो कि साक्षरता दर की सही गणना प्रदर्शित नहीं करता है |प्राथमिक स्कूल में शामिल होने वाले कई बच्चे बाद में किसी न किसी स्तर पर शिक्षा प्राप्ति से वंचित हो जाते हैं।
  • इसके अलावा, मानव विकास सूचकांक अभी भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों को गणना में शामिल नहीं करता है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय कार्यक्रम और योजनाएँ

सुगम्य भारत अभियान


  • हाल ही में, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign-AIC) अंतर्गत लक्ष्यों के प्राप्ति की समय सीमा मार्च 2020 तक बढ़ा दी है |
  • इसके अंतर्गत 50 शहरों के सबसे महत्वपूर्ण 25-50 सरकारी भवनों को पूरी तरह से सुगम्य बनाया जाना था और सुगम्यता ऑडिट किया जाना था ।

कारण

  • अभियान के तहत, सभी राज्यों की राजधानियों के सभी सरकारी भवनों को पूरी तरह से सुगम्य बनाने का लक्ष्य रखा गया था, जिसको प्राप्त नहीं किया जा सका है।
  • दिसंबर 2018 तक एनसीटी के50% सरकारी भवनों को पूरी तरह से सुगम्य बनाया जाना था मगर इस पर कार्य करने की गति काफी धीमी है |

सुगम्य भारत अभियान (AIC)

  • विकलांग व्यक्तियों (PwD) या दिव्यांगजनों के लिए सार्वभौमिक पहुँच प्रदान करने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी अभियान ‘सुगम्य भारत अभियान’चलाया गया | इसे दिसंबर, 2015 में विकलांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण विभाग द्वारा शुरू किया गया था।

लक्ष्य

  • विकलांग लोगों को सार्वभौमिक पहुंच उपलब्ध कराना |
  • जीवन के सभी पहलुओं में विकास, स्वतंत्र जीवन और भागीदारी के लिए समान अवसर प्रदान करना जो समावेशी समाज की आवश्यक विशेषता है।
  • एक सुलभ भौतिक वातावरण बनाना जो सभी को लाभ पहुंचाता है।

AIC के घटक

निर्मित पर्यावरण पहुंच

  • सुलभ भौतिक वातावरण न केवल विकलांग व्यक्तियों को बल्कि सभी को लाभ देता है। इसके अंतर्गत स्कूलों, चिकित्सा सुविधाओं और कार्यस्थलों सहित सभी जगहों पर आतंरिक और बाह्य बाधाओं को खत्म किया जाना शामिल है।
  • इनमें न केवल इमारतों से संबंधति संरचनाएं शामिल है बल्कि फुटपाथ पर पैदल चलने वालों के आवागमन को अवरुद्ध करने वाली बाधाओं को भी दूर किया जाना शामिल है।

परिवहन प्रणाली पहुंच

  • परिवहन स्वतंत्र जीवन का महत्वपूर्ण घटक है, और समाज के अन्य लोगों की तरह, विकलांग व्यक्ति भीएक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए परिवहन सुविधाओं पर निर्भर हैं।
  • ‘परिवहन’ शब्द में हवाई यात्रा, बस, टैक्सी और ट्रेन सहित कई माध्यमों से यात्रा को शामिल किया जाता है।

सूचना और संचार इको-सिस्टम अभिगम्यता

  • सूचना तक पहुंच समाज के सभी वर्गों के लिए अवसर पैदा करती है । लोग अपने दैनिक जीवन के बारे में निर्णय लेने के लिए कई रूपों में जानकारी का उपयोग करते हैं।
  • यह शारीरिक रूप से एक हॉल में प्रवेश करने, किसी कार्यक्रम में भाग लेने, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की पुस्तिका पढ़ने, एक ट्रेन समय सारिणी को समझने या वेब पेजों को देखने जैसी क्रियाओं से सम्बंधित हो सकता है।

महत्ता

  • सुगम्य भारत अभियान के साथ, भारत विश्व के उनदेशों के समकक्ष हो गया है जहाँ सर्वव्यापी समावेशी समाज है | समावेशी समाज व्यक्ति के अधिकारों और जीवन स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
  • बेहतर भौतिक पहुंच संबंधी कार्य शिक्षा, रोजगार और आजीविका की प्राप्ति को सभी के लिए सुलभ बनायेंगे जिससे एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण होगा ।

एआईसी की ओर हाल के विकास

प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS)

  • सितंबर, 2019 में दिव्यांग जनसशक्ति करण विभाग (DEPwD) ने AIC के हित धारकों के लिए एक प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) विकसित की।
  • MIS पोर्टल AIC के प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति के लिएकिये जा रहे कार्य की निगरानी में सहायक है एवं सभी नोडल मंत्रालयों और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को एक मंच पर लाता है ।
  • पोर्टल डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सभी फ़ंक्शन को बनाए रखने और वास्तविक समय पर डेटा प्राप्त करने में उपयोगी होगा।

वेबसाइट अभिगम्यता परियोजना

  • जनवरी, 2018 में दिव्यांग जनसशक्ति करण विभागने ERNET(Education and Research Network) इंडिया के माध्यम से वेबसाइट अभिगम्यता परियोजना शुरू की | यह सुगम्य भारत अभियान के तहत राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकार के लिए प्रारंभ की गयी है जिसके माध्यम से वेबसाइटों को दिव्यांगजनों के लिए सुलभ बनाया जाना है |

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम –2016

  • दिसंबर 2016 में बनायह अधिनियम विकलांगता से ग्रस्त लोगों की पूर्ण स्वीकृति की सुविधा प्रदान करता है और समाज में ऐसे व्यक्तियों की पूर्ण भागीदारी और समावेश सुनिश्चित करता है।

लक्ष्य

  • समाज में विकलांग व्यक्तियों की गरिमा को बनाए रखना और किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकना।

मुख्य विशेषताएं

  • यह लंबे समय तक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदी दुर्बलता वाले किसी भी व्यक्ति कोविकलांग व्यक्तिय के रूप में परिभाषित करता है ।
  • विकलांगों के मौजूदा 7 प्रकार से बढ़ाकर 21 प्रकार कर दिए गए हैं और इसके अनुसार, केंद्र सरकार के पास अधिक प्रकार की विकलांगताओं को जोड़ने की शक्ति है।
  • भाषण और भाषा विकलांगता और विशिष्ट शिक्षण विकलांगता को पहली बार जोड़ा गया है।
  • एसिड अटैक पीड़ितों को शामिल किया गया है।
  • बौनापन, स्नायु अपविकास को निर्दिष्ट विकलांगता के अलग वर्ग के रूप में इंगित किया गया है।
  • विकलांगों की नई श्रेणियों में तीन रक्त विकार, थैलेसीमिया, हेमोफिलिया और हंसिया कोशिका रोग शामिल है |

महत्ता

  • अधिनियम विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन(UNCRPD) के अनुरूप है, जिसका भारत 2007 से एक हस्ताक्षरकर्ता है। यह UNCRPD के संदर्भ में भारत की ओर से दायित्वों को पूरा करेगा।
  • इसके अलावा, यह न केवल दिव्यांगजन के अधिकारों और हक को बढ़ाने में मदद करता है, बल्कि उनके सशक्तिकरण और समाज में संतोषजनक समावेश को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी तंत्र भी प्रदान करता है।

विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्रीय सम्मेलन (UNCRPD)

  • दिसंबर, 2006 में अंगीकृत UNCRPD पहला अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो विकलांग लोगों के अधिकारों के पहचान साथ-साथ उनके अधिकारों को बढ़ावा देना सुनिश्चित करता है।
  • कन्वेंशन 3 मई, 2008 को लागू हुआ।
  • यह एक बेंचमार्क दस्तावेज है जो विकलांग लोगों के मानवाधिकारों और मूलभूत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

लक्ष्य

  • यह सुनिश्चित करना कि विकलांग लोग सभी के समान मानवाधिकारों का उपयोग करे और वे दूसरों के समान अवसर प्राप्त करके समाज में अपना योगदान कर सकें।

सुगम्य भवन क्या है?

  • सुगम्य भवन वह भवन होता हैजहां एक विकलांग व्यक्ति बिना किसी बाधा के इसमें प्रवेश कर सके और उपलब्ध सुविधाओं का इस्तेमाल कर सके।
  • निर्मित सुविधाओं में शामिल हैं- सेवाएं, सीढि़यां तथा रैंप्स, प्रवेश द्वार, आकस्मिक निकास, अलार्म सिस्टम तथा प्रसाधन जैसी आंतरिक तथा बाह्य सुविधाएं।

मानदंड

  • सुगम्य भवन की पहचान करने के लिए वार्षिक पहुँच क्षमता ऑडिट की आवश्यकता होती है जो यह निर्धारित करती है कि सुविधाएँ सहमत मानकों पर बनी है या नहीं।
  • एक बार एक भवन को पूरी तरह से सुगम्यके रूप में पहचान हो जाने पर वार्षिक ऑडिट आवश्यक नहीं होती है, लेकिन इसमें निहित संरचना या सिस्टम में किसी भी प्रस्तावित परिवर्तन के लिए आवश्यक होती है |
  • सुगम्यता के मानक,जहां तक संभव हो, स्थानीय संदर्भ लेते हुए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होने चाहिए जैसे आईएसओ ।
  • आईएसओ 21542:2011, भवन निर्माण से सम्बंधित आवश्यकताओं और सिफारिशों की रूपरेखा बनाती है | यह भवन की सुगम्यता, पहुँच,निर्माण, संयोजन, उपकरणों और फिटिंग आदि के बारे में बताती है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे

विश्व मलेरिया रिपोर्ट,2019


 

  • 4 दिसंबर, 2019 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विश्व मलेरिया रिपोर्ट, 2019 जारी की, जो 2018 के अंत तक मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में वैश्विक प्रगति का सारांश है।
  • यह WHO की मलेरिया के लिए वैश्विक तकनीकी रणनीति 2016–2030(Global Technical Strategy - GTS) के लॉन्च के बाद से चौथी विश्व मलेरिया रिपोर्ट है।
  • यह 80 से अधिक देशों के मलेरिया संचरण वाले क्षेत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

प्रमुख निष्कर्ष

वैश्विक विशिष्ट निष्कर्ष

  • वर्ष 2010 में 251 मिलियन और 2017 में 231 मिलियन मामलों की तुलना में 2018 में विश्व भर में मलेरिया के अनुमानित 228 मिलियन मामले थे।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 2018 में अधिकांश मलेरिया के मामले अफ्रीकी क्षेत्र (93%) में थे, इसके बाद दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र (SEAR - 4%) और पूर्वी भूमध्य सागरीय क्षेत्र (2.1%) में है।
  • विश्व भर में मलेरिया के आधे से अधिक मामलों में छह देशों, नाइजीरिया (25%), कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (12%), युगांडा (5%), और कोटे डी आइवर, मोज़ाम्बिक एवं नाइजर (4%) का हिस्सा है।
  • 2010 से 2018 के बीच मलेरिया की घटना दर विश्व स्तर पर घट गई, जो प्रति 1000 आबादी पर 71 से 57 मामले हो गया है।
  • अफ्रीकी क्षेत्र में प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे अधिक प्रचलित मलेरिया पर जीवी है, जो 2018 में अनुमानित मलेरिया मामलों के 99.7% के लिए जिम्मेदार है।
  • 75% मलेरिया के मामलों का प्रतिनिधित्व करने वाले अमेरिका के क्षेत्र में प्लास्मोडियमवाइवैक्स (Plasmodium vivax) सबसे प्रमुख परजीवी है।प्लास्मोडियम वाइवैक्स भारत में अधिकांश मामलों के किये जिम्मेदार है ।
  • 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे मलेरिया से प्रभावित सबसे कमजोर समूह हैं। 2018 में, विश्व भर में मलेरिया से होने वाली मौतों में उनका 67% हिस्सा था।

उच्च बोझ से उच्च प्रभाव

  • 2018 में 11 उच्च बोझ से उच्च प्रभाव (High Burden to High Impact - HBHI) देशों में लगभग 155 मिलियन मलेरिया के मामले थे, जबकि 2010 में 177 मिलियन थे।
  • पिछले वर्ष की तुलना में 2018 में,भारत और युगांडा में मलेरिया के मामलों में पर्याप्त कमी हुए है जिसके कारण डब्ल्यूएचओ ने विशेष उल्लेख किया है।

भारत विनिर्दिष्ट विशेषताएं

  • भारत में,2017 की तुलना में 2018 में 2.6 मिलियन मलेरिया के मामलों में कमी देखी गई | डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अधिक मलेरिया प्रभावित देश होने के बावजूद, भारत ने 2017 की तुलना में रिपोर्ट किए गए मामलों को आधे से कम कर दिया।
  • 2018 में, 29 राज्यों में से केवल सात राज्य कुल मामलों के 90 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।

2010 की तुलना में 2018 में भारत में अनुमानित मलेरिया के मामले

मलेरिया के मामले की अनुमानित संख्या (मिलियन में)

झारखण्ड     पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश   छत्तीसगढ़    ओडिशा गुजरात मध्य प्रदेश

 

स्रोत:IE

रिपोर्ट का महत्व

  • व्यापक अद्यतन सूचनाप्रदान करना: यह वैश्विक और क्षेत्रीय मलेरिया डेटा और रुझानों पर एक व्यापक अद्यतन सूचना प्रदान करता है। यह रिपोर्ट मलेरिया कार्यक्रमों और अनुसंधान के साथ-साथ सभी हस्तक्षेपों,रोकथाम, निदान, उपचार, उन्मूलन और निगरानी, में प्रगति को समाविष्ट करता है।
  • ट्रैकिंग रोल बैक मलेरिया (आरबीएम): यह मलेरिया के खतरे को समाप्त करने से सम्बंधित योजना रोल बैक मलेरिया (आरबीएम) का प्रति पालन और कार्यान्वयन निर्धारित करता है एवं निवेश को सुगम बनता है ।
  • मलेरिया के खिलाफ रणनीति पर प्रकाश डालना: रिपोर्ट में मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में निवेश के विभिन्न तरीकों पर प्रकाश डाला गया है जो एसडीजी की प्राप्ति और 13वें जनरल प्रोग्राम ऑफ़ वर्क (GPW13) के “ट्रिपल बिलियन” लक्ष्यों में योगदान देता है।

मलेरिया उन्मूलन की दिशा में पहल

वैश्विक पहल

मलेरिया के लिए वैश्विक तकनीकी रणनीति (GTS), 2016-2030

  • इसे मई 2015 में विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा अपनाया गया था | जीटीएस, मलेरिया उन्मूलन की दिशा में प्रगति के लिए देशों को मार्गदर्शन करता है।
  • रणनीति 2016-2030 की अवधि में महत्वाकांक्षी लेकिन प्राप्य लक्ष्य निर्धारित करती है, जिसमें शामिल हैं:
    • कम से कम 90% मलेरिया के मामलों में कमी,
    • मलेरिया मृत्यु दर को कम से कम 90% कम करना,
    • कम से कम 35 देशों में मलेरिया को खत्म करना,
    • मलेरिया से मुक्त सभी देशों में मलेरिया के पुनरुत्थान को रोकना |
  • यह जोखिम वाले क्षेत्रों की सभी आबादी के लिए कोर मलेरिया हस्तक्षेपों के सार्वभौमिक कवरेज की आवश्यकता पर जोर देता है और निर्णय लेने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले निगरानी डेटा का उपयोग करने के महत्व पर प्रकाश डालता है।

मलेरिया से मुक्त विश्व : एक नजर

स्तंभ 1

मलेरिया की रोकथाम, निदान और उपचार के लिए सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करें

स्तंभ 2

मलेरिया मुक्त स्थिति के उन्मूलन और प्राप्ति की दिशा में प्रयासों में तेजी लाना

स्तंभ 3

एक कोर हस्तक्षेप में मलेरिया निगरानी रूपांतरण

उद्देश्य

मील के पत्थर

लक्ष्य

2020

2025

2030

1. 2015 की तुलना में मलेरिया की मृत्यु दर को कम करना

कम से कम 40%

कम से कम 75%

कम से कम 90%

2.2015 की तुलना में विश्व स्तर पर मलेरिया के मामले/घटनाओं को कम करना

कम से कम 40%

कम से कम 75%

कम से कम 90%

3. 2015 में जिन देशों में मलेरिया का संक्रमण हुआ, उनमें से मलेरिया को खत्म करना

कम से कम 10 देश

कम से कम 20 देश

कम से कम 35 देश

4. मलेरिया मुक्त सभी देशों में मलेरिया की पुन:स्थापन को रोकना

 

पुन:स्थापन को रोकना

पुन:स्थापन को रोकना

पुन:स्थापन को रोकना

GTS: मलेरिया के लिए वैश्विक तकनीकी रणनीति2016-2030

विश्व का पहला मलेरिया वैक्सीन

  • अफ्रीकी देश मलावी ने अप्रैल, 2019 मेंग्लैक्सोस्मिथक्लाइन (GSK) द्वारा विकसित विश्व का पहला मलेरिया टीका, RTS,S/AS01 (RTS,S) लॉन्च किया।
  • टीका नियंत्रण का एक पूरक उपकरण है - जिसे मलेरिया की रोकथाम के लिए WHO द्वारा सुझाए गए उपायों के मुख्य संकुल में जोड़ा जाना है |
  • उच्च बोझ से उच्च प्रभाव
  • नवम्बर 2018 में, WHO ने RBM के साथ मलेरिया के खिलाफ ‘उच्च बोझ से उच्च प्रभाव: नियोजित मलेरिया प्रतिक्रिया’ (High burden to high impact: a targeted malaria response) को मोजाम्बिक में लॉन्च किया ।
  • यह वैश्विक मलेरिया के खिलाफ प्रगति को पुनः प्राप्त करने के लिए देशों को प्रतिबद्ध करता है।
  • इसका उद्देश्य रोकथाम और उपचार को बढ़ाना है, और कमजोर लोगों को घातक बीमारी से बचाने के लिए निवेश को बढ़ाना है।
  • यह योजना मलेरिया मामलों और मौतों की अधिकता वाले देशों को मदद करती है,जो चार स्तंभों पर आधारित है-
    • मलेरिया से होने वाली मौतों को कम करने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीतिक पर ध्यान देना,
    • सूचना के रणनीतिक उपयोग के माध्यम से ड्राइविंग प्रभाव,
    • मलेरिया स्थानिक देशों के लिए उपयुक्त सर्वोत्तम वैश्विक मार्गदर्शन, नीतियों और रणनीतियों की स्थापना,
    • एक समन्वित देश प्रतिक्रिया को लागू करना।

ई-2020 पहल

  • प्रमुख मानदंडों के आधार पर 2016 में WHO ने 5 क्षेत्रों के 21 देशों की पहचान की, जहाँ से 2020 तक मलेरिया का पूर्ण रूप से उन्मूलन हो सकता हैं। साथ में, वे ई-2020 पहल का निर्माण करते हैं।
  • यह इन 21 देशों में मलेरिया उन्मूलन की दिशा में प्रगति और चुनौतियों पर नवीनतम जानकारी प्रदान करता है।

भारतीय पहल

मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना (2017-22)

  • जुलाई, 2017 में शुरू की गई यह योजना अगले 5 वर्षों में मलेरिया की समाप्ति के लिए वर्षवार उन्मूलन लक्ष्य निर्धारित करती है।
  • इसमें अगले पांच वर्षों के लिए मलेरिया निगरानी को मजबूत करना, मलेरिया के प्रकोप का जल्द पता लगाने और रोकथाम के लिए एक तंत्र स्थापित करना, लॉन्ग लास्टिंग इन्सेक्टीसाईडल नेट्स (LLINs) के उपयोग से मलेरिया की रोकथाम को बढ़ावा देना, प्रभावी इनडोर स्प्रे और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए जनशक्ति और क्षमताओं में वृद्धि करना शामिल है।
  • इसके तहत 2022 तक मलेरिया को खत्म करने की परिकल्पना सभी 15 कम (श्रेणी 1) और 11 मध्य (श्रेणी 2) प्रसार वाले राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों सहित सभी 26 राज्यों के लिए की गई है।

मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय ढांचा- 2016-2030

  • मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय ढांचा- 2016-2030,WHO के वैश्विक तकनीकी रणनीति (GTS) और एशिया पैसिफिक लीडर्स मलेरिया एलायंस मलेरिया एलिमिनेशन रोडमैप के अनुकूल है |

लक्ष्य

  • 2030 तक पूरे देश से मलेरिया (शून्य देशी मामले) को खत्म करना,
  • उन क्षेत्रों में मलेरिया-मुक्त स्थिति बनाए रखना, जहाँ मलेरिया संचरण समाप्त हो गया है, और मलेरिया के पुन:संचरण को रोकता है।

प्लास्मोडियम प्रजाति (Genus)

  • प्लास्मोडियम प्रजाति से संबंधित एकल-कोशिका वाले परजीवी के संक्रमण से मलेरिया होता है।
  • प्लास्मोडियम की पांच प्रजातियों को मनुष्यों में बीमारी का कारण माना जाता है: पी. फाल्सीपेरम, पी. वाईवैक्स, पी. ओवले, पी. मलेरिया, और पी. नॉलेसी।
  • विश्व स्तर पर, मलेरिया के अधिकांश मामलों के लिए प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम और प्लास्मोडियम वाईवैक्स होते हैं।
  • प्लाज़मोडियम फाल्सीपेरम अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार है जब कि प्लास्मोडियम विवैक्सिस सभी मलेरिया प्रजातियों में से सबसे व्यापक है, गंभीर रूप से घातक परिणाम और महत्वपूर्ण वैश्विक रुग्णता और मृत्यु दर का कारण बन सकता है।

आगे की राह

  • मलेरिया प्रभावित जनसंख्या समूहों, व्यक्तियों और समुदायों पर भारी आर्थिक और सामाजिक बोझ डालती है। सबसे अधिक वंचित आबादी, विशेष रूप से बच्चों और गर्भवती महिलाओं,के मलेरिया से सबसे प्रभावित होने की संभवना सबसे अधिक होती है।
  • वैश्विक गरीबी और असमानता मलेरिया का प्रमुख कारण और परिणाम दोनों हैं। मलेरिया को रोकने, नियंत्रित करने और खत्म करने के प्रयासों ने सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को 3 - स्वास्थ्य और सभी के लिए कल्याण में योगदान दिया है।
  • इसके अलावा, मलेरिया से मुक्त विश्व को प्राप्त करना, यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) के सफल अंगीकरण द्वारा त्वरित होगा, जो हर जगह सुलभ, सस्ती और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करेगा।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय पर्यावरण प्रदूषण, गिरावट और जलवायु परिवर्तन

टॉरफिकेशन टेक्नोलॉजी


  • सर्दियों में उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता में तेज गिरावट देखी जाती है | इसमें परली जलाने से निकलने वाले प्रदूषण का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्तमान में,भारत एक स्वीडिश तकनीक - टॉरफिकेशन का परीक्षण कर रहा है, जो चावल के ठूंठ को जैव-कोयला में बदल सकता है।
  • बायोएंडेव (स्वीडिश कंपनी) के साथ मिलकर भारत सरकार ने प्रौद्योगिकी की व्यवहार्यता का मूल्यांकन कर रहा है | पंजाब के मोहाली में राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान में एक पायलट संयंत्र स्थापित किया जा रहा है जिसके लिए वित्त पोषण किया जा चुका है।

टॉरफिकेशन टेक्नोलॉजी क्या है?

  • टॉरफिकेशन टेक्नोलॉजी, 200-300°C एवं कम ऑक्सीजन की उपस्थिति में थर्मोकैमिकल प्री-ट्रीटमेंट प्रक्रिया है, जो बायोमास को ठोस बायो-ईंधन (कोयला जैसी छर्रों) में बदल देता है।
  • टॉरफिकेशन टेक्नोलॉजी विभिन्न प्रकार के बायोमास को संसाधित करने में सक्षम बनाती है:
    • वुडी बायोमास
    • फॉरेस्ट अवशिष्ट
    • सॉ मिल अवशिष्ट (जैसे सॉ, धूल, चिप्स, छाल)
    • पुआल, घास

पैरामीटर

  • टॉरफिकेशनप्रक्रिया को प्रभावित करने वाले विभिन्न पैरामीटर हैं:
  1.  प्रतिक्रिया तापमान,
  2.  तापक दर,
  3.  ऑक्सीजन की अनुपस्थिति,
  4.  निवास समय,
  5.  परिवेश दबाव,
  6.  लचीला फीडस्टॉक,
  7.  फीडस्टॉक नमी, और
  8.  फीडस्टॉक कण आकार।

प्रक्रिया

  • जैव-कोयला उत्पन्न करने के लिए टॉरफिकेशनमें लिग्नोसेल्युलोज घटकों का अवमूल्यन, अपचयन और अपघटन किया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के दौरान, द्रव्यमान का 70% एक ठोस उत्पाद के रूप में बनाए रखा जाता है, और 90% प्रारंभिक ऊर्जा सामग्री को बरकरार रखता है।

टॉरफिकेशनके अंतिम उत्पाद

  • तीन अलग-अलग उत्पादों का उत्पादन किया जाता है:
  • भूरा से काली एकसमान ठोस बायोमास, जिसका उपयोग जैव ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है,
  • पानी, एसिटिक एसिड, एल्डीहाइड, अल्कोहल, और केटोन्स युक्त संघननशील वाष्पशील कार्बनिक यौगिक,
  • छोटी मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन जैसे गैर-संघननशील गैसें।

जैव कोयला

  • जैव-कोयला (ईट) को किसी भी रासायनिक, गोंद या बांधने की मशीन के बिना उच्च संपीड़नप्रक्रिया द्वारा कृषि, लकड़ी और वानिकी कचरे से बनाया जाता है।
  • यह ‘बाइंडर-लेस’प्रौद्योगिकी उत्पाद है जो100% प्राकृतिकपर्यावरण के अनुकूल, प्रदूषण रहित ठोस ईंधन है। यह ऊर्जा का एक अक्षय स्रोत हैंऔर वायुमंडल में जीवाश्म कार्बन को निर्मुक्त होने से बचाता हैं।
  • इसे अपशिष्ट पदार्थ जैसे चूरा, मूंगफली के गोले, कपास केडंठल, अरंडी के बीज के गोले आदि को संपीड़ित कर बनाया जा सकता है और जो जलावन वाली लकड़ी और कोयले की जगह ले सकता है।

लाभ

आर्थिक

  • टॉरफाइड बायोमास को दहन के लिए एक बेहतर ठोस ईंधन माना जाता है, विशेषकर जब इसके उच्च ऊर्जा घनत्व और कोयले जैसी हैंडलिंग गुणों के कारण कोयले के साथ सह-प्रज्वलित किया जाता है। आमतौर पर टॉरफिकेशन के दौरान, 70% द्रव्यमान को एक ठोस उत्पाद के रूप में रखा जाता है, जिसमें 90% प्रारंभिक ऊर्जा सामग्री होती है।
  • टॉरफिकेशनदहनशील गैसों को छोड़ता है जिनका उपयोग आवश्यक ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है या इस पूरी प्रक्रिया को शक्ति प्रदान करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  • यह कुछ कठिनाइयों को सामना करता है जो कम ऊर्जा घनत्व और उच्च जल सामग्रीवाले बायोमास फीडस्टॉक के बड़े पैमाने पर उपयोग में बाधा उत्पन्न की है।
  • टॉरफाइडउत्पाद मूल बायोमास सामग्री की तुलना में स्थिर, भंगुर, पीसने में आसान होता है इसके अलावां इसकेभंडारण में कम जैविक अवनतिहोती है।
  • उच्च ऊर्जा घनत्व के कारण इनका उत्पादन एवं उपयोग आर्थिक रूप से व्यवहार्य है। पेरालाइज़िंग के माध्यम से परिवहन लागत को कमकिया जा सकता है |लंबी ढुलाई के लिएखुले रेल कार और समुद्री जहाज उपयुक्त है।

कोयले की तुलना में टॉरफाइड बायोमास ईट के लाभ

सामान्य बायोमास की तुलना में टॉरफाइड बायोमास ईट के लाभ

  • कोयला की तरह जलाता है - मौजूदा बुनियादी ढांचे का उपयोग किया जा सकता है
  • कम फीडस्टॉक की लागत
  • कम शिपिंग लागत
  • बिजली संयंत्र की न्यूनतम डी-रेटिंग
  • अक्षय ऊर्जा प्रदान करता है
  • कम सल्फर और राख सामग्री का उत्पादन(कोयले की तुलना में)
  • उच्च कैलोरी मान
  • अधिक सजातीय उत्पाद
  • हाइड्रोफोबिक प्रकृति/पानी विकर्षक
  • परिवहन और सामग्री हैंडलिंग कम खर्चीली और आसान है
  • बाह्य भंडारण संभव
  • कम महंगा भंडारण विकल्प
  • बायोमास में नमी के पुनःअवशोषण की वजह से ऊर्जा के क्षय को बचाया जाता है
  • नगण्य जैविक गतिविधि (अपघटन का प्रतिरोध)
  • ईंधन की निम्नीकरण के बिना लंबे समय तक भंडारण जीवन
  • उच्च स्थायित्व
  • धुआं पैदा करने वाले यौगिक अनुपस्थित

पर्यावरण

  • टॉरफिकेशन प्रक्रिया का मुख्य लाभ यह है कि यह कोयले के समान हैऔर इसका उपयोग विभिन्न ऊर्जा इकाइयों में कोयला प्रतिस्थापन के लिए किया जा सकता हैजिससे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकपर कुल नकारात्मक प्रभाव कम होगा ।

आगे की राह

  • जीवाश्म ईंधन के प्रतिस्थापन के रूप में बायोमास का उपयोग कई मुद्दों की ओर ले जाती है, जैसे कि अत्यधिक कटाई और सीमित वृक्षारोपण के कारण उनकी कीमत और पर्यावरणीय परिणामों में वृद्धि होती है |इस कारण वनों की कटाई होती है और जैव विविधता में कमी आती है।
  • बायोमास की व्यापक खपत पानी और मिट्टी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है |यहविभिन्न पारिस्थितिकी प्रणालियों को प्रभावित करखाद्य श्रृंखलाओं को प्रभावित कर सकता है।
  • हालांकि, बायोमास का टॉरफिकेशन एक आदर्श प्रक्रिया साबित हुई है क्योंकि यह ऊर्जा स्रोत जीवाश्म ईंधन के उपयोग का एक अच्छा विकल्प साबित हुआ है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय भारतीय अर्थव्यवस्था

स्वतंत्र निदेशकोंका डेटाबैंक शुरू


  • 2 दिसंबर, 2019 को कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) ने कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार स्वतंत्र निदेशकों डेटाबैंक लॉन्च किया।

लक्ष्य

  • संस्थान के स्वतंत्र निदेशकों को मजबूत करना

पृष्ठभूमि

  • 22 अक्टूबर 2019 को MCA ने स्वतंत्र निदेशकों के लिए डेटाबैंक के निर्माण और रखरखाव से संबंधित अधिसूचनाएं जारी कीं। ये निम्नलिखित से संबंधित हैं:
    • कंपनियों की अधिसूचना (स्वतंत्र निदेशकों के डेटाबैंक का निर्माण और रखरखाव) नियम, 2019
    • बोर्ड की रिपोर्ट में अतिरिक्त खुलासा
    • स्वतंत्र निदेशकों के डेटाबैंक के लिए संस्थान का गठन
    • स्वतंत्र निदेशकों द्वारा अपेक्षित शिकायतें

डाटाबैंक की जरूरत

  • हाल के दिनों में, कई कंपनियों के स्वतंत्र निदेशक, कंपनियों के असफल और डिफ़ॉल्ट होने के संबंध में कई लोग नियामक लेंस के तहत आए हैं | जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के डिफॉल्ट मामले में |
  • इन विफलताओं ने इस समस्या को उजागर किया कि निर्देशकों को अपनी विवेकाधीन जिम्मेदारियों के बारे में अधिक जागरूकता की कमी है एवं उन्हें जागरूक बनाने की आवश्यकता है।

डाटाबैंक के बारे में

  • डाटाबैंक एक पोर्टल हैजिसे कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के लिए भारतीय संस्थान, आईआईसीए, द्वारा विकसित किया गया है और इसका रखरखाव भी इसी के द्वारा किया जाएगा।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 150 में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कोई भी व्यक्ति, संस्थान या एसोसिएशन द्वारा बनाए गए डेटाबैंक से एक स्वतंत्र निदेशक का चयन किया जा सकता है।
  • यह मौजूदा के साथ-साथ स्वतंत्र निदेशकों के योग्य पात्र व्यक्तियों के डाटाबेस के रूप में काम करेगा।
  • डेटाबैंक में उन व्यक्तियों के नाम, पते और योग्यताएं शामिल होंगी जो स्वतंत्र निदेशकों के रूप में कार्य करने के लिए पात्र और इच्छुक हैं।
  • वर्तमान स्वतंत्र निदेशकों को एक मूल ऑनलाइन प्रवीणता स्व-मूल्यांकन परीक्षा पास करना आवश्यक है जो मार्च 2020 से उपलब्ध होगा।
  • MCA ने स्वतंत्र निदेशकों के संस्थान को मजबूत करने और एजेंट ऑफ चेंज के रूप में कार्य करने के लिए कुशल पेशेवरों का एक पूल बनाने के माध्यम से इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के महत्व को महसूस किया है।

महत्ता

  • ज्ञान प्राप्त करने, नए कौशल विकसित करने, उनकी समझ का आकलन करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू करने में मदद करने के लिए व्यक्तियों को एक मंच प्रदान करेगा।
  • कॉरपोरेट गवर्नेंस, विनियामक ढांचे, वित्तीय विवेक और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं से संबंधित विषयों पर ई-लर्निंग पाठ्यक्रम प्रदान करके व्यक्तियों की क्षमता निर्माण में मदद करेगा।
  • स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति के लिए अवसरों और कॉर्पोरेट की तलाश करने वाले व्यक्तियों का इको-सिस्टम बनाने में मदद करेगा। सहकारी समितियां सही कौशल और दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों के साथ खोजऔरचयन के लिए खुद को डेटाबैंक में पंजीकृत कर सकती हैं।

स्वतंत्र निदेशक (Independent Director - ID)

  • एक स्वतंत्र निदेशक एक गैर-कार्यकारी निदेशक है, जिसका कंपनी, उसके प्रमोटरों और वरिष्ठ प्रबंधन या संबद्ध कंपनियों के साथ कोई आर्थिक या वित्तीय संबंध नहीं होता है |
  • कंपनी अधिनियम, 1956 हमें एक स्वतंत्र निदेशक की विशिष्ट परिभाषा प्रदान नहीं करता है।
  • स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 149 में निहित हैं, जिन्हें कंपनियों के नियम 4 और नियम 5 (निदेशक की नियुक्ति और योग्यता) नियम, 2014 के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

भूमिका

  • स्वतंत्र निदेशक को वित्तीय रिपोर्टिंग प्रक्रिया की निगरानी, कंपनी की वित्तीय जानकारी के प्रकटीकरण की निगरानी करने, लिस्टिंग और अन्य कानूनी आवश्यकताओं का अनुपालन सुनिश्चित करने, संबंधित पार्टी लेनदेन और योग्यता का खुलासा करनेसम्बंधित जिम्मेदारी होती है | इसके लिए सूचीबद्ध कंपनियों को ऑडिट समितियों में कम से कम दो-तिहाई निदेशकों का रखना चाहिए।
  • स्वतंत्र निदेशककंपनी के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। उनकी भूमिकाओं में कॉर्पोरेट विश्वसनीयता और शासन मानकों में सुधार करना और जोखिम प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शामिल है।
  • स्वतंत्र निदेशक कंपनी द्वारा सुशासन सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न समितियों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

महत्ता

  • स्वतंत्र निदेशक महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक स्वतंत्र निर्णय लेने में सहायक होते है | ये कौशल का एक विविध सेट लाकर बोर्डों पर कॉर्पोरेट प्रशासन के महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते है।
  • बोर्ड में अन्य निदेशकों के साथ स्वतंत्र निदेशककंपनी का एक अभिन्न अंग हैं जिसे कंपनी की कार्यक्षमता और समग्र शासन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाती हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013

  • कंपनी अधिनियम 2013 भारत में निगमन, विघटन और कंपनियों को चलाने वाला कानून है जो 12 सितंबर, 2013 को पूरे भारत में लागू हुआ ।
  • कंपनी अधिनियम 2013, शासन, ई-प्रबंधन, अनुपालन और प्रवर्तन, प्रकटीकरण मानदंडों, लेखा परीक्षकों और विलय और अधिग्रहण से संबंधित प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव पेश करता है।

उद्देश्य

  • कंपनियों से संबंधित कानून को समेकित और संशोधित करना।

प्रमुख विशेषताऐं

  • प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के लिए अनुमत अधिकतम सदस्यों (शेयर धारकों) को 50 से बढ़ाकर 200 कर दिया गया है।
  • अधिनियम की धारा 135 कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रावधान करता है।
  • यह कंपनी कानून न्यायाधिकरण और कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण की स्थापना करता है ।

संशोधन

  • 31 जुलाई, 2019 को, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2019 पेश किया।
  • इसका उद्देश्य कंपनी अधिनियम, 2013 में निहित कॉर्पोरेट प्रशासन नियमों और अनुपालन प्रबंधन को मजबूत करने के लिए अधिक जवाबदेही और बेहतर प्रवर्तन सुनिश्चित करना है।

सामयिक खबरें राष्ट्रीय रैंकिंग, रिपोर्ट, सर्वेक्षण और सूचकांक

उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण


  • हाल ही में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अखिल भारतीय घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के परिणाम को जारी नहीं करने का फैसला किया जो 2017-2018 के दौरान राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किये गए ।
  • मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि डेटा के आँकड़ों को गुणवत्ता की वजह से इसे जारी नहीं करने का निर्णय लिया है।

आंकड़े को दबाने के कारण

  • मीडिया लीक से पता चला है कि 2017-18 के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के नतीजे के प्रतिकूल निष्कर्षों के कारण रोक दिए गए थे, जिससे पता चलता है कि उपभोक्ता खर्च गिर रहा था।
  • वस्तु एवं सेवाओं के वास्तविक उत्पादन को दर्शाने वाले प्रशासनिक आँकड़ों से ज्ञात होता है कि विगत वर्षों में लोगों के उपभोग व्यय में न केवल वृद्धि हुई है बल्कि उनके उपभोग के पैटर्न में भी विविधता आई है।
  • परिवारों द्वारा सामाजिक सेवाओं, विशेषकर स्वास्थ्य एवं शिक्षा, के खपतपर सर्वेक्षण की क्षमता का अभाव है।
  • 2017-18 के सर्वेक्षण के लीक हुए संस्करण के अनुसार, मासिक प्रति व्यक्ति व्यय (एमपीएसई -MPCE) में गिरावट आयी है |इस तरह की यह पहली गिरावट 1972-73 के दौरान आयी थी |वास्तविक कीमतों पर वर्ष 2011-12 में MPCE 1,501 रुपए (मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित) था जो वर्ष 2017-18 में घटकर 1,446 रुपए रह गया।

सरकार का जवाब

  • सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालयने कहा कि आंकड़े और रिपोर्टों के पुनरीक्षण करने की एक कठोर प्रक्रिया है, जो सर्वेक्षण के माध्यम से निर्मित होती है। मंत्रालय में आनेवाली ऐसी सभी प्रस्तुतियां, प्रकृति में मसौदे हैं और अंतिम रिपोर्ट नहीं मानी जा सकती।
  • सरकार ने विशेषज्ञों की एक समिति को मामले की समीक्षा के लिए भेजा, जिसने सर्वेक्षण पद्धति में शोधन और समवर्ती आधार पर डेटा गुणवत्ता पहलुओं में सुधार सहित कई सिफारिशें की | भविष्य के सर्वेक्षणों में कार्यान्वयन के लिए समिति की सिफारिशों की जांच की जा रही है।

उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (सीईएस)

  • सीईएस, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा किया गया एक पंचवर्षीय (हर पांच साल बाद होने वाला) सर्वेक्षण है, जो पूरे देश के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों के उपभोग खर्च पैटर्न पर जानकारी एकत्र करने के लिए बनाया गया है।
  • उपभोक्ता व्यय पर अंतिम सर्वेक्षण का आयोजन जुलाई 2011 से जून 2012 के दौरान किया गया था जो 68वें चरण का सर्वेक्षण था।

व्यय पर सभी जानकारियां

  • उपभोग व्यय सर्वेक्षण में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोग के पैटर्न, जीवन स्तर और परिवारों के कल्याण को दर्शाते हैं, जिनका उपयोग विभिन्न सरकारी संगठनों द्वारा योजना और नीति निर्माण के लिए किए जाते हैं।

खाद्य और गैर-खाद्य व्यय

  • चार्ट जुलाई 2011-जून 2012 के दौरान प्रति व्यक्ति खाद्य, गैर-खाद्य पदार्थों पर उपभोक्ता व्यय (एमपीसीई) को दर्शाता है। जो ग्रामीण एवं शहरी दोनों जगहों से लिए जाते है |

खाद्य पदार्थों में शामिल

  • अनाज एवं अनाज के विकल्प,दालें व उनके उत्पाद ,दुग्धव दुग्ध उत्पाद,खाद्य तेल,अंडा, मछली और मांस,सब्जियां,फल,चीनी, नमक और मसाले,पेय पदार्थ, जलपान, प्रसंस्कृत आहार |

गैर-खाद्य पदार्थों में शामिल

  • पान, तम्बाकू व नशायुक्त पदार्थ, ईंधन व प्रकाश ,वस्त्र एवं जूते, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, परिवहन को छोड़कर उपभोक्ता सेवाएं, विविध वस्तुएं, मनोरंजन, किराया, कर एवं उपकर, टिकाऊ वस्तुएं |

एमपीसीई (2011-2012) के अखिल भारतीय ग्रामीण व शहरी वितरण

  • ग्रामीण भारत में 5% सबसे गरीब एक महीने में 816 रुपये खर्च करते हैं जबकि 5% सबसे धनी लगभग 3000 रुपये खर्च करते हैं। यह अंतर शहरी क्षेत्रों में (5 प्रतिशत परिवारों के लिए) 827 रुपये प्रति माह और शेष 95 प्रतिशत परिवारों के लिए 6000 रुपये से अधिक घोषित किया गया था।

सीईएस का महत्व

  • मासिक प्रति व्यक्ति व्यय का अनुमान: इस सर्वेक्षण में इकट्ठा किए गए आंकड़ों से वस्तुओं (खाद्य और गैर-खाद्य) और सेवाओं पर प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय का पता चलता है और इस के साथ-साथ एमपीसीई वर्ग में शामिल अवयवों पर परिवारों एवं व्यक्तियों के खर्च वितरण की प्रकृति का भी पता चलता है।
  • जीवन स्तर और वृद्धि का आकलन: प्रति व्यक्ति खपत खर्च के अनुमान अर्थव्यवस्था की मांग गतिशीलता को समझने में महत्वपूर्ण हैं।इसके साथ ही वस्तुओं और सेवाओं के स्थानांतरण प्राथमिकताओं को समझने और जीवन स्तर और विकास के रुझानों का आकलन करने में सहायक होगा |
  • महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक और पूर्वानुमान साधन: यह एक अमूल्य विश्लेषणात्मक साधन उपलब्ध कराता है जो नीति निर्माताओं को संभावित संरचनात्मक विसंगतियों के पूर्वानुमानएवं पहचान करने में सहायक है | वास्तव में, इसका इस्तेमाल सरकार द्वारा जीडीपी और अन्य वृहद-आर्थिक संकेतकों को पुनर्निर्धारण करने में किया जाता है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ)

  • यह अखिल भारतीय स्तर पर, विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित नमूना सर्वेक्षण का संचालन करता है। देशव्यापी घरेलू सर्वेक्षणों के माध्यम से विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विषयों, उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण (एएसआई) आदि पर आंकड़े एकत्र किये जाते हैं।
  • यह ग्रामीण और शहरी कीमतों पर आंकड़े भी एकत्र करता है | शहरी क्षेत्र में नमूना सर्वेक्षण के लिए इसका अपना संगठनात्मक ढांचा है।

अंतिम शब्द

  • यदि आंकड़े के गुणवत्ता के मुद्दे थे, तो रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने से बहुत पहले ही इसे खोज लिया जाना चाहिए था। यहां तक ​​कि एकत्र किए गए आंकड़ों में गंभीर विसंगतियों को मानते हुए, सही निष्कर्षों और कथित सीमाओं के साथ एक रिपोर्ट प्रकाशित करना चाहिए, जो शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी हो सकता है।
  • मसौदा रिपोर्ट प्रकाशित होनी चाहिए क्योंकि सरकार ने आंकड़े इकट्ठा करने में लाखों रुपये खर्च किए हैं| नागरिकों करों के रूप में सरकार को भुगतान करते है जिसका उपयोग ऐसे रिपोर्ट तैयार करने में किया जाता है।
  • सर्वेक्षण के निष्कर्षों को वापस लेना समकालीन खपत आंकड़े से नीति निर्माताओं को वंचित करता है |अगले सर्वेक्षण केआंकड़े 9 या 10 वर्षों के अंतरालके बाद 2020-21 या 2021-22 में आएगा। यह समय पर एवं प्रभावी हस्तक्षेप रणनीतियों के निर्माण को हतोत्साहित करेगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विशेष डेटा प्रसार मानक (एसडीडीएस) का भागीदार होने के नाते भारत चार क्षेत्रों में वृहत स्तर के आर्थिक आंकड़े प्रसारित करने के लिए बाध्य है- 1) आंकड़ों का समयानुसार, निश्चित समय के अंतराल पर कवरेज, 2) आंकड़ों की जनता तक पहुंच, 3) आंकड़ों की अखंडता, 4) आंकड़ों की गुणवत्ता।
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एनुअल आब्ज़रवेंस रिपोर्ट 2018 के अनुसार, भारत अपने आर्थिक आँकड़ों के प्रकाशन में प्रायः देरी करता है जो एसडीडीएस के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
  • आवश्यक आंकड़े का दमन पारदर्शी एवं जवाब देह सरकार के सिद्धांत के विरूद्ध है | एक स्वतंत्र सांख्यिकीय प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को कम करना बुनियादी रूप से राष्ट्रीय हित के खिलाफ है।

सामयिक खबरें अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रदूषण, अवक्रमण और जलवायु परिवर्तन

यूएनईपी UNEP उत्सर्जन गैप रिपोर्ट - 2019


  • नवम्बर 2019 में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा ‘संयुक्त राष्ट्र उत्सर्जन गैप रिपोर्ट-2019’ जारी की गयी | यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 'देशों को क्या करने की आवश्यकता है' (पेरिस समझौते के लक्ष्यों के अनुरूप) और 'विभिन्न देश वास्तव में क्या कर रहे हैं' के बीच के अंतर को मापता है। उत्सर्जन गैप रिपोर्ट विभिन्न देशों के 2030 में प्रत्याशित उत्सर्जन के आकलन पर आधारित होता है |

रिपोर्ट के बारे में

  • उत्सर्जन गैप रिपोर्ट की यह दसवीं श्रृंखला है | यह रिपोर्ट देशों के जलवायु संकल्प और कार्य एवं वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (जीएचजी) की प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है |
  • इस वर्ष की रिपोर्ट में ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र पर जोर दिया गया है जिसमें विद्युतीकरण और ऊर्जा दक्षता को सफल ऊर्जा संक्रमण की कुंजी माना गया है।
  • यह रिपोर्ट उत्सर्जन अंतर को कम करने के लिए छह बिंदुओं की पहचान करता है जो निम्नलिखित हैं:
  1. वायु प्रदूषण, वायु गुणवत्ता, स्वास्थ्य,
  2. शहरीकरण,
  3. शासन, शिक्षा, रोजगार,
  4. डिजिटलीकरण,
  5. जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए ऊर्जा- और भौतिक-दक्ष सेवाएं,
  6. भूमि उपयोग, खाद्य सुरक्षा, जैव-ऊर्जा | इस रिपोर्ट में इनकी स्थिति में सुधार करने की सिफारिश की गयी है |

प्रमुख निष्कर्ष

GHG उत्सर्जन में वृद्धि जारी

  • जीएचजी उत्सर्जन पिछले दशक में प्रति वर्ष 5 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। वर्ष 2018 में कुल जीएचजी उत्सर्जन 55.3गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया।
  • 2030 तक, उत्सर्जन को 2018 की तुलना में 55 प्रतिशत कम करने की आवश्यकता होगी ताकिकम से कम लागतपरविश्व पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त कर सके।

शीर्ष उत्सर्जक

  • चीन, यूरोपीय यूनियन, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका कुल चार शीर्ष उत्सर्जकहैं जो55 प्रतिशत से अधिकजीएचजीकाउत्सर्जन करते हैं।
  • वे क्षेत्र जो सबसे बड़े उत्सर्जक हैं- ऊर्जा>उद्योग>वानिकी>परिवहन>कृषि>भवन।

 

बड़ी अर्थव्यवस्था, बड़ा उत्सर्जन

जी-20 के सदस्य देशों में विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाएं शामिल है जिनका कुल जीएचजी उत्सर्जन में योगदान 78 प्रतिशत है |

लक्ष्य पूरा करने की संभावना नहीं

अधिकांश जी-20 देशों द्वारा पेरिस समझौते के लक्ष्य को पूरा करने की संभावना नहीं हैं जिनमें

ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख है |

लक्ष्य पूरा करना

ईयू के 28 देश, चीन और मेक्सिको

कम से कम 15% से अधिक लक्ष्य को प्राप्त करना

भारत, रूस* और तुर्की*

प्रदर्शन अनिश्चित

अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, सऊदी अरब

*रूस और तुर्की अपने जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों को पूरा कर सकते हैं, लेकिन जर्मनी के जलवायु एक्शन ट्रैकर के अनुसार लक्ष्य खुद "गंभीर रूप से अपर्याप्त" हैं।

स्रोत:यूएनईपी उत्सर्जन गैप रिपोर्ट, 2019

निवल शून्य उत्सर्जन

  • हालांकि 2050 के लिए निवल शून्य GHG उत्सर्जन लक्ष्यों की घोषणा करने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है, मगर केवल कुछ देशों ने ही अभी तक औपचारिक रूप से UNFCCC के समक्ष दीर्घ कालिक रणनीति प्रस्तुत की है।
  • पांच जी-20 सदस्यों (ईयू और चार अन्य सदस्यों) ने शून्य उत्सर्जन लक्ष्य के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त किया है । शेष पंद्रह जी-20 सदस्य अभी तक शून्य लक्ष्यीकरण के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं।

बड़ा उत्सर्जन गैप

  • 2030 में, 2 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य और 5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मौजूदा एनडीसी की तुलना में क्रमशः15 गीगाटन COऔर 32 गीगाटन COउत्सर्जनकम होना चाहिए।

राष्ट्रीय निर्धारित भागीदारी (एनडीसी) को मजबूत करना

  • 2020 से सभी देशों को अपनी एनडीसी महत्वाकांक्षाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। 2°C से कम तापमान केलक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एनडीसी महत्वाकांक्षाओं को तीन गुनाऔर 5°C से कम तापमान केलक्ष्य प्राप्त करने के लिए पांच गुना से अधिक करने की आवशयकता है।

 

भारत सरकार केहालिया प्रयास

  • 2030 तक उत्सर्जन अन्तराल कम करने के लिए एनडीसी के निम्नलिखिततीन संख्यात्मक लक्ष्य हैं:
  • 2005 के स्तर से उत्सर्जन की तीव्रता को 33 प्रतिशत से घटाकर 35 प्रतिशत करना,
  • गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 40 प्रतिशत की स्थापित बिजली क्षमता हासिल करना, और
  • जंगल और वृक्षों के आवरणको बढ़ा कर,2.5-3.0 गीगाटन अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण करना।
  • 2018 में, अक्षय ऊर्जा का फैलाव पारंपरिक ईंधन की तुलना में अधिक था, हालांकि 2022 तक 175गीगावाट लक्ष्य से कम रहने का अनुमान है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को शुरू किया गया है |2019 में जारी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का उद्देश्य पीएम2.5 और पीएम10 सांद्रता को 25 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक कम करना है|
  • व्यापक ऊर्जा पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए ‘सौभाग्य’ जैसे कार्यकम का संचालन किया गया |2019 की शुरुआत में,100 प्रतिशत घरों का विद्युतीकरण कर दिया गया है ।
  • 2019 की शुरुआत में किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (KUSUM) योजना शुरू की गई |इसका उद्देश्य 2022 तक 26गीगावाट सौर कृषि पंप स्थापित करने के लक्ष्य के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है।
  • मार्च 2019 में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा भारत कूलिंग एक्शन प्लानजारी की गई |जिसका कार्य सभी क्षेत्रों में गर्मी से राहत दिलाने तथा सतत् शीतलता प्रदान करने वाले वैकल्पिक तकनीकों औरअप्रत्यक्ष उपायों को अपनाने के बारे सलाह देना, तकनीशियनों के कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करना, शीतलता से संबंधित आवश्यकताओं से जुड़ी मांग तथा ऊर्जा आवश्यकता का आकलन करना आदिहै |
  • सार्वजनिक और निजी परिवहन के साधनों को विद्युतीकृत करने की नीतियों की शुरुआत की है। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स, थ्री-व्हीलर्स, फोर-व्हीलर्स और बसों के अपग्रेड करने के उद्देश्य से 2019 में फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (FAME) का दूसरा चरण शुरू किया गया, जिससे7.2 मेगाटनCO2 उत्सर्जन की कमी होगी।
  • भारत अगले दशक में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले सभी दो-तीन व चार पहिया वाहनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लक्ष्य पर विचार-विमर्श कर रहा है।
  • भारत का लक्ष्य 2021-2022 तक अपने सभी ब्रॉड गेज रेलवे मार्गों का विद्युतीकरण करना है।

भारत के लिए उपयोगी उपाय

  • कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से संक्रमण की योजना बनाना,
  • शून्य-उत्सर्जन प्रौद्योगिकियों में निवेश,
  • हरित औद्योगिकीकरण रणनीति विकसित करना,
  • मास पब्लिक ट्रांज़िट सिस्टम का विस्तार करना,
  • समय समय पर हरित लक्ष्यों को परिक्षण एवं अद्यतन करना ।

उत्सर्जन अंतराल क्या है?

  • उत्सर्जन अंतराल को प्रतिबद्धता अंतराल भी कहते है |यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं और वास्तव में क्या करना है के बीच के अंतर को मापता है।
  • यह गैप उत्सर्जन के निम्न स्तरों के बीच का अंतर है, जिसे विश्व के देशों को अपनीवर्तमान प्रतिबद्धताओं के आधार पर अकार्बनिकरण(decarbonization) के लिए कम करने की आवश्यकता है।

यह महत्वपूर्ण क्यों है?

  • यहअंतराल इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर हम उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को पूरा नहीं करते हैंतो दुनिया भर में गंभीर जलवायु प्रभाव तेजी से बढेगा।
  • यह देश के नीति निर्माता और नागरिकदोनों के लिए महत्वपूर्ण है | इस अंतराल के बारे में जागरूकता, एक देश को इसे कम या समाप्त करने की प्रतिप्रतिबद्ध बनाएगा।

आगे की राह

  • हालांकि, रिपोर्ट कहती है कि स्पष्ट परिवर्तन अभी भी 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित हो सकता है। इसके लिए, देशों को उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य के साथ-साथ देशों को 2050 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करनेके लिए प्रतिबद्धहोना चाहिए | इसके अनुरूप महत्वाकांक्षीएनडीसी लक्ष्योंका निर्धारण करना चाहिए ।
  • ग्लोबल वार्मिंग लक्ष्यों को प्राप्त करने में देशों को “गैर-राज्य कर्ताओं’(जैसे कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों) और उप-नागरिकों (राज्य सरकारों और शहर प्रशासन) की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए। CO2 उत्सर्जक गतिविधियों को हतोत्साहित करने के लिए कार्बन कर लगाने पर विचार किया जाना चाहिए।

यदि उत्सर्जन अंतराल को ख़त्म करने से जुड़े लक्ष्यों को प्राप्त किए जाते हैं, तो इससे भारत को सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्तिमें भीसहायता मिलेगी।