ग्रास माशे तकनीक

  • 15 Sep 2026

हाल ही में, श्रीनगर के एक शिल्पकार ने ग्रास माशे तकनीक का विकास किया की है, जिसके अंतर्गत डल झील से निकाली गई जलीय खरपतवार और घास को सजावटी एवं उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है।

ग्रास माशे तकनीक क्या है?

  • यह एक नवीन शिल्प तकनीक है जो हस्तशिल्प के लिए कच्चे माल के रूप में डल झील से निकाली गई जलीय खरपतवार और घास का उपयोग करती है।
  • इसके अंतर्गत जैविक कचरे को सजावटी और उपयोगी उत्पादों में बदलने हेतु कश्मीर की पारंपरिक पेपर-माशे (Papier-Mâché) तकनीक को अपनाया जाता है।

यह कैसे काम करती है?

  • जलीय खरपतवार को सुखाकर बारीक रेशेदार लुगदी में तैयार किया जाता है।
  • इस लुगदी को उपयुक्त सामग्रियों के साथ मिलाकर मनचाहे आकार में ढाला जाता है और सुखाया जाता है।
  • तैयार उत्पादों से एक प्राकृतिक, पत्थर जैसी आकार प्राप्त होती है, जो पारंपरिक शिल्प कला को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ जोड़ती है।

कश्मीर पेपर-माशे: सांस्कृतिक संदर्भ

  • उत्पत्ति: इसे 14वीं शताब्दी में फारस से आए मुस्लिम संत मीर सय्यद अली हमदानी द्वारा कश्मीर में लाया गया था।
  • विषय-वस्तु (थीम्स): फूल, बॉक्स पैटर्न और जंगल के स्वरूप ।
  • डिजाइन: 'हजारा' (Hazara) और 'गुल-इ-विलायत' (Gul-i-wilayat) प्रमुख पारंपरिक पैटर्न हैं, जिनमें फूल, पत्तियां और पक्षीयों को चित्रित किया जाता हैं।
  • जीआई संरक्षण: भौगोलिक उपदर्शन (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत पंजीकृत और संरक्षित ।