तटीय अपरदन का मात्स्यिकी पर प्रभाव

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री परशोत्तम रुपाला द्वारा दिया गया उत्तरः भारत की तट रेखा के कुछ हिस्सों में प्राकृतिक कारणों या मानव जनित गतिविधियों की वजह से अपरदन का स्तर अलग-अलग हो सकता है। तटीय अपरदन का प्रभाव अपरदन संभावित क्षेत्रों में रहने वाले तटीय समुदाय पर भी पड़ता है जिनमें मछुआरा समुदाय भी शामिल है।

  • Øराष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का एक अधीनस्थ कार्यालय है, भारतीय तट के साथ-साथ तट रेखा परिवर्तन की निगरानी करता है। राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र ने तटीय प्रबंधन रणनीति के लिए जानकारी प्रदान करने हेतु नौ तटीय राज्यों तथा दो संघ राज्य क्षेत्रों के साथ वर्ष 1990 से 2018 तक 28 वर्षों के सेटेलाइट आंकड़ों का उपयोग करके, भारतीय तट के लिए राष्ट्रीय तट रेखा परिवर्तन मूल्यांकन मानचित्रण किया है। राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) की रिपोर्ट के आधार पर लगभग 32% तट रेखा के अपरदन का स्तर (निम्न, मध्यम और उच्च) अलग-अलग है, 27% अभिवृद्धि की प्रकृति है और 41% स्थायी अवस्था में है।
  • ØNCCR अध्ययन के अनुसार केरल की 41% तटरेखा के अपरदन का स्तर अलग-अलग है, 31% स्थायी है जबकि 21% अभिवृद्धि में है। इसके अलावा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र और जलशक्ति मंत्रालय के अधीन केंद्रीय जल आयोग द्वारा भी तट रेखा परिवर्तन / अपरदन तथा इसके प्रभाव के संबंध में अध्ययन किया जाता है।
  • Øसमुद्री राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं के अनुसार और अपने खुद के संसाधनों से समुद्री अपरदन-रोधी उपायों के लिए योजना तैयार करने और उन्हें लागू किए जाने का कार्य किया जाता है। इस संबंध में, केंद्रीय सरकार की भूमिका तकनीकी, परामर्शदात्री तथा उत्प्रेरक प्रकृति की है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र और राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान के माध्यम से केरल सरकार को समुद्री अपरदन-रोधी उपाय संबंधी योजना तैयार करने में तकनीकी सहायता प्रदान की गई है।

Source : सिविल सर्विसेज क्रॉनिकल ऑनलाइन, अक्टूबर, 2021